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मंगलवार, 27 जनवरी 2009

भारत के बालक (डॉ० रूपचंद्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

हम भारत के भाग्य विधाता, नया राष्ट्र निर्माण करेंगे ।

देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।


गौतम, गाँधी, इन्दिरा जी की, हम ही तो तस्वीर हैं,

हम ही भावी कर्णधार हैं, हम भारत के वीर हैं,

भेद-भाव का भूत भगा कर, चारु राष्ट्र निर्माण करेंगे ।

देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।

चम्पा, गेन्दा, गुल-गुलाब ने, पुष्प-वाटिका महकाई,

हिन्द, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में भाई-भाई,

सब मिल-जुल कर आपस में, सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण करेगे ।

देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।


भगतसिंह, अशफाक -उल्ला की, आन न हम मिटने देगे,

धर्म-मजहब की खातिर अपनी ,शान न हम मिटने देंगे,

कौमी -एकता को अपना कर धवल -राष्ट्र निर्माण करेंगे ।

देश-प्रेम के लिए न्योछावर,हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।


दिशा-दिशा में, नगर-ग्राम में, बीज शान्ति के उपजायेंगे,

विश्व शान्ति की पहल करेंगे, राष्ट्र पताका लहरायेंगे,

भारत के सच्चे प्रहरी बन, स्वच्छ राष्ट्र निर्माण करेंगे ।

देश-प्रेम के लिए न्योछावर, हँस-हँस अपने प्राण करेंगे ।।

रविवार, 25 जनवरी 2009

हो गया क्यों देश ऐसा ? (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक")

कल्पनाएँ डर गयी हैं,
भावनाएँ मर गयीं हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

पक्षियों का चह-चहाना,
लग रहा चीत्कार सा है।
षट्पदों का गीत गाना,
आज हा-हा कार सा है।
गीत उर में रो रहे हैं,
शब्द सारे सो रहे हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

एकता की गन्ध देता था,
सुमन हर एक प्यारा,
विश्व सारा एक स्वर से,
गीत गाता था हमारा,
कट गये सम्बन्ध प्यारे,
मिट गये अनुबन्ध सारे ,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

आज क्यों पागल,
स्वदेशी हो गया है ?
रक्त क्यों अपना,
विदेशी हो गया है ?
पन्थ है कितना घिनौना,
हो गया इन्सान बौना,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

आज भी लोगों को,
पावस लग रही है ,
चाँदनी फिर क्यों ,
अमावस लग रही है ?
शस्त्र लेकर सन्त आया,
प्रीत का बस अन्त आया,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

स्वागत नव -वर्ष ( डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" )

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥
ज्ञान गंग की बहती धारा ,
चन्दा , सूरज से उजियारा ।
आन -बान और शान हमारी -
संविधान हम सबको प्यारा ।
प्रजातंत्र पर भारत वाले करते हैं अभिमान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

शीश मुकुट हिमवान अचल है ,
सुंदर -सुंदर ताजमहल है ।
गंगा - यमुना और सरयू का -
पग पखारता पावन जल है ।
प्राणों से भी मूल्यवान है हमको हिन्दुस्तान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

स्वर भर कर इतिहास सुनाता ,
महापुरुषों से इसका नाता ।
गौतम , गांधी , दयानंद की ,
प्यारी धरती भारतमाता ।
यहाँ हुए हैं पैदा नानक , राम , कृष्ण , भगवान् ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री की वेदना

गाँधी बाबा के भारत में ,
जब - जब मक्कारी फलती है ।
आजादी मुझको खलती है ॥

वोटों की जीवन घुट्टी पी हो गये पुष्ट हैं मतवाले ,
केंचुली पहिन कर खादी की छिप गए सभी विषधर काले ,
कुछ काम नही बैठे ठाले , करते है केवल घोटाले ,
अब विदुर नीति तो रही नही -
केवल दुर्नीति चलती है ॥
आजादी मुझको खलती है ॥

दानव दहेज़ का निगल चुका , कितनी निर्दोष नारियों को ,
प्रियतम का प्यार नसीब नही , कितनी ही प्राण - प्यारियों को ,
फांसी खाकर मरना पड़ता , अबला असहाय क्वारियों को ,
निर्धन के घर कफ़न पहन -
धरती की बेटी पलती है ॥
आजादी मुझको खलती है ॥

निर्बल मजदूर किसानों के हिस्से में कोरे नारे हैं ,
चाटुकार , मक्कारों के ही होते वारे -न्यारे हैं ,
ये रक्ष संस्कृति के पोषक , जन-गण-मन के हत्यारे हैं ,
सभ्यता इन्ही की बंधक बन ,
रोती है आँखें मलती है ॥
आजादी मुझको खलती है ॥

मैकाले की काली शिक्षा, भिक्षा की रीति सिखाती है ,
शिक्षित बेकारों की संख्या, दिन -प्रतिदिन बढती जाती है ,
नौकरी उसी के हिस्से में जो नेताजी का नाती है ,
है बाल अरुण बूढा-बूढा -
दोपहरी ढलती जाती है ॥
आजादी मुझको खलती है ॥

डॉ.रूपचंद्र शास्त्री का एक देश भक्ति गीत

मन - सुमन हों खिले , उर से उर हों मिले ,
लह- लहाता हुआ वो चमन चाहिए ।
ज्ञान - गंगा बहे , शान्ति और सुख रहे -
मुस्कराता हुआ वो वतन चाहिए ..

दीप आशाओं के हर कुटी में जलें ,
राम लछमन से बालक घरों में पलें,
प्यार ही प्यार हो , ऐसा परिवार हो -
देश में प्रान्त में अब अमन चाहिए ॥

छेनियों और हथौडों की झंकार हो ,
श्रम ,श्रजन ,स्नेह दें ऐसे परिवार हों ,
खेत, उपवन , धरा सींचती ही रहे -
ऐसी दरिया -ए- गंग-ओ- जमुन चाहिए ॥

आदमी ने इंसानियत दूर हो ,
पुष्प - कलिका सुगंधों से भरपूर हों ,
चेतना से भरे मन औ तन चाहिए ॥

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" का एक गीत

मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए,
जाने कितने जनम और मरण चाहिए ।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

लैला-मजनूेको गुजरे जमाना हुआ,
किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ,
प्राीत की पोथियाँ बाँचने के लिए-
ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए ।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

सन्त का पन्थ होता नही है सरल,
पान करती सदा मीराबाई गरल,
कृष्ण और राम को जानने के लिए-
सूर-तुलसी सा ही आचरण चाहिए ।
ंप्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

सच्चा पे्रमी वही जिसको लागी लगन,
अपनी परवाज में हो गया जो मगन,
कण्टकाकीर्ण पथ नापने के लिए-
शूल पर चलने वाले चरण चाहिए।।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

झर गये पात हों जिनके मधुमास में,
लुटगये हो वसन जिनके विश्वास में,
स्वप्न आशा भरे देखने के लिए-
नयन में नींद का आवरण चाहिए ।।
प्यार का राग आलापने के लिए,
शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।

शनिवार, 24 जनवरी 2009

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" की एक बाल कविता

बादल तो बादल होते हैं ।

नभ में कृष्ण दिखाई देते,

निर्मल जल का सिन्धु समेटे,

लेकिन धुआँ-धुआँ होते हैं ।

बादल तो बादल होते हैं ।

बल के साथ गरजते रहते,

दल के साथ लरजते रहते,

जग में यहाँ-वहाँ होते हैं ।

बादल तो बादल होते हैं ।

चन्द्र,सूर्य का तेज घटाते,

इनसे तारागण ढक जाते,

बादल जहाँ-जहाँ होते हैं ।

बादल तो बादल होते हैं ।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

शुभकामनाएं



सुख का सूरज उगे गगन में, दु:ख का बादल छँट जाए।

हर्ष हिलोरें ले जीवन में, मन की कुंठा मिट जाए।

चरैवेति के मूल मंत्र को अपनाओ निज जीवन में -

झंझावातों के काँटे पगडंडी पर से हट जाएँ।

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