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शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

गली-गाँव में धूम मची है,फागों और फुहारों की।।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


गली-गाँव में धूम मची है,
फागों और फुहारों की।।
मन में रंग-तरंग सजी है,
होली के हुलियारों की।।


गेहूँ पर छा गयीं बालियाँ,
नूतन रंग में रंगीं डालियाँ,
गूँज सुनाई देती अब भी,
बम-भोले के नारों की।।

पवन बसन्ती मन-भावन है,
मुदित हो रहा सबका मन है,
चहल-पहल फिर से लौटी है,
घर - आँगन, बाजारों की।।



जंगल की चूनर धानी है,
कोयल की मीठी बानी है,
परिवेशों में सुन्दरता है,
दुल्हिन के श्रंगारों की।।


होली लेकर, फागुन आया,
मीठी-हँसी, ठिठोली लाया,
सावन जैसी झड़ी लगी है,
प्रेम-प्रीत, मनुहारों की।।

गली-गाँव में, धूम मची है,
फागों और फुहारों की।।
मन में रंग-तरंग सजी है,
होली के हुलियारों की।।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

खुशियों की सौगात लिए होली आई है (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

खुशियों की सौगात लिए होली आई है।

रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।


रंग-बिरंगी पिचकारी ले,

बच्चे होली खेल रहे हैं।

मम्मी-पापा दोनों मिल कर,

मठरी-गुझिया बेल रहे हैं।

पकवानों को साथ लिए, होली आई है।

रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।


जाड़ा भागा, गरमी आई,

होली यह सन्देशा लाई।

कोयल बोल रही बागों में,

कौए ने पाँखे खुजलाई।

ठण्डी कुल्फी हाथ लिए, होली आई है।

रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।


सरसों फूली, टेसू फूले,

आम-नीम बौराये हैं।

मक्खी, मच्छर भी होली का,

गीत सुनाने आये हैं।

साथ चाँदनी रात लिए, होली आई है।

रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

रंग-बिरंगी आई होली। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

आयी होली, आई होली।

रंग-बिरंगी आई होली।

मुन्नी आओ, चुन्नी आओ,

रंग भरी पिचकारी लाओ,

मिल-जुल कर खेलेंगे होली।

रंग-बिरंगी आई होली।।

मठरी खाओ, गुँजिया खाओ,

पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,

मस्ती लेकर आई होली।

रंग-बिरंगी आई होली।।


रंगों की बौछार कहीं है,

ठण्डे जल की धार कहीं है,
भीग रही टोली की टोली।

रंग-बिरंगी आई होली।।


परसों विद्यालय जाना है,

होम-वर्क भी जँचवाना है,
मेहनत से पढ़ना हमजोली।

रंग-बिरंगी आई होली।।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

क्या सच्चा वैदिक धर्म यही है ? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


अपनी अल्प-बुद्धि से यह लेख लिखने से पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ कि मेरी विचारधारा किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की नही है। यह केवल मेरी अपनी व्यक्तिगत मान्यता है। मैं हिन्दु धर्म का विरोधी नही हूँ, बल्कि कृतज्ञ हूँ कि यदि हिन्दू नही होते तो वेदों का प्रचार-प्रसार करने वाले स्वामी देव दयानन्द कहाँ से आते?

वैदिक विचारधारा क्या है? इस पर हमें गहराई से सोचना होगा। उत्तर एक ही है कि ‘वेदो अखिलो धर्म मूलम्’ अर्थात वेद ही सब धर्मो का मूल है। जब वेद ही सब धर्मों का मूल है तो फिर विभिन्न धर्मों में एक रूपता क्यों नही है। वेद में तो केवल ईश्वर के निराकार रूप का की वर्णन है। फिर मूर्तिपूजा का औचित्य है? महर्षि स्वामी देव दयानन्द घोर मूर्तिपूजक परिवार से थे, लेकिन उन्होंने मूर्तिपूजा का घोर विरोध किया और वेदों में वर्णित धर्म के सच्चे रूप को लोगों के सामने प्रस्तुत किया।

हमारे इतिहास-पुरूष भी निर्विकार पूजा को श्रेष्ठ मानते हैं परन्तु साथ ही साथ साकार पूजा के भी प्रबल पक्षधर हैं। कारण स्पष्ट है आज धर्म को लोगों ने आजीविका से से जोड़ लिया है।

पहला उदाहरण-परम श्रद्धेय आचार्य श्रीराम लगातार 25 वर्षों तक स्वामी दयानन्द के मिशन आर्य समाज से मथुरा में जुड़े रहे। परन्तु वहाँ मूर्ति पूजा थी ही नही । अतः उन्होंने अपने मन से एक कल्पित गायत्री माता की मूर्ति बना ली और शान्ति कुंज का अपना मिशन हरद्वार में बना लिया। जबकि वेदों में एक छन्द का नाम ‘गायत्री’ है।

दूसरा उदाहरण- स्वामी दिव्यानन्द ने आर्य समाज को छोड़कर श्री राम शरणम् मिशन बनाया।

तीसरा उदाहरण आचार्य सुधांशु जी महाराज ने आर्य समाज का उपदेशक पद छोड़ कर ओम् नमः शिवाय का सहारा ले लिया। ऐसे न जाने कितने उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। लेकिन आजीविका का रास्ता ढूँढने की होड़ में इन्होंने वैदिक धर्म का स्वरूप ही बदल कर रख दिया। हाँ एक बात इनके प्रवचनों में आज भी दिखाई देती है । वह यह है कि ये लोग आज भी बात तर्क संगत कहते हैं। अनकी विचारधारा में अधिकतम छाप आर्य समाज की ही है। लेकिन चढ़ावा बिना गुजर नही होने के कारण इन्होंने उसमें मूर्तिपूजा का पुट डाल दिया है।

आज सभी ‘ओम जय जगदीश हरे की आरती बड़े प्रेम से मग्न हो कर गाते हैं परन्तु यह आरती केवल गाने भर तक ही सीमित हो गयी है। यदि उसके अर्थ पर गौर करें तो- इसमे एक पंक्ति है ‘ तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति’ कभी सोचा है कि इसका अर्थ क्या है? सीधा सा अर्थ है-हे प्रभू तुम दिखाई नही देते हो, तुम हो एक लेकिन पूजा में रखे हुए हैं ‘अनेक’। आगे की एक पंक्ति में है- ‘.......तुम पालनकर्ता’ लेकिन इस पालन कर्ता की मूर्ति बनाकर स्वयं उसको भोग लगा रहे हैं अर्थात् खिला रहे हैं। क्या यही वास्तविक पूजा है? क्या यही सच्चा वैदिक धर्म का स्वरूप है। सच तो यह है कि हम पूजा पाठ की आड़ में अकर्मण्य बनते जा रहे हैं।

दुकान पर लाला जी सबसे पहले पूजा करते हैं और पहला ग्राहक आते ही उसे ठग लेते हैं। शाम को फिर पूजा करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो हमने आज जो झूठ बोलने के पाप कर्म किये हैं उनको क्षमा कर देना। क्योंकि हमारे धर्माचार्यों ने उनके मन में यह कूट-कूट कर भर दिया है कि ईश्वर पापों को क्षमा कर देते हैं। काश् यह भी समझा दिया होता कि ईश्वर का नाम रुद्र भी है। जो दुष्टों को रुलाता भी है।

खैर अब आवश्यकता इस बात की है कि फिर कोई महापुरुष भारत में जन्म ले और वैदिक धर्म की सच्ची राह दिखाये। जहाँ चाह है वहाँ राह है। एक आशा है कि युग अवश्य बदलेगा।

मंजिलें पास खुद, चलके आती नही। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


अब जला लो मशालें, गली-गाँव में,

रोशनी पास खुद, चलके आती नही।

राह कितनी भले ही सरल हो मगर,

मंजिलें पास खुद, चलके आती नही।।


लक्ष्य छोटा हो, या हो बड़ा ही जटिल,

चाहे राही हो सीधा, या हो कुछ कुटिल,

चलना होगा स्वयं ही बढ़ा कर कदम-

साधना पास खुद, चलके आती नही।।


दो कदम तुम चलो, दो कदम वो चले,

दूर हो जायेंगे, एक दिन फासले,

स्वप्न बुनने से चलता नही काम है-

जिन्दगी पास खुद, चलके आती नही।।


ख्वाब जन्नत के, नाहक सजाता है क्यों,

ढोल मनमाने , नाहक बजाता है क्यों ,

चाह मिलती हैं, मर जाने के बाद ही-

बन्दगी पास खुद, चलके आती नही।।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

सब तुम्हें भी पता, सब हमें भी पता। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


सब तुम्हें भी पता, सब हमें भी पता।

क्या पता किससे, कितनी हुई थी खता।

प्यार दिल में बसाकर भी गम्भीर था,

अपनी आँखों में लाया नही नीर था,

छोड़ क्यों चल दिये, दो हमें भी बता।।

क्या पता किससे, कितनी हुई थी खता।

कल तलक तो हमारी, डगर एक थी।

लक्ष नजदीक था जब, नजर नेक थी।

तुम मुकर जाओगे, यह नही था पता।।

क्या पता किससे, कितनी हुई थी खता।

याद करती तुम्हें, गाँव की सब गली।

राह पहचानती हैं, जहाँ तुम चली।

भूल जाओगे उनको, नही था पता।।

क्या पता किससे, कितनी हुई थी खता।


देखने को तुम्हें नैन, बेताब हैं,

बिन तुम्हारे अधूरे हैं, पड़े ख्वाब हैं,

चैन सुख छिन गया, नींद है लापता।।
क्या पता किससे, कितनी हुई थी खता।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों? (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


मेरे वैरागी उपवन में,

सुन्दर सा सुमन सजाया क्यों?


सूने-सूने से मधुबन में,

गुल को इतना महकाया क्यो?



मधुमास बन गया था पतझड़,

संसार बन गया था बीहड़,


दण्डक-वन से, इस जीवन में,

शीतल सा पवन बहाया क्यों?



दिन-रैन चैन नही आता था,

मुझको एकान्त सुहाता था,


चुपके से आकर नयनों में,

सपनों का भवन बनाया क्यों?



नही हँसता था, नही रोता था,

नही अन्तर्मन को धोता था,


चुपके से आकर आँगन में,

मुझको दर्पण दिखलाया क्यों?



स्वर नही सजाना आता था,

नही साज बजाना आता था,


चुपके से कानों में आकर,

सुन्दर संगीत सुनाया क्यों?

काँटो की पहरेदारी में,ही गुलाब खिलते हैं।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


आशा और निराशा के क्षण,

पग-पग पर मिलते हैं।


काटों की पहरेदारी में,

ही गुलाब खिलते हैं।



पतझड़ और बसन्त कभी,

हरियाली आती है।


सर्दी-गर्मी सहने का,

सन्देश सिखाती है।


यश और अपयश साथ-साथ,

दायें-बाये चलते हैं।


काँटो की पहरेदारी में,

ही गुलाब खिलते हैं।




जीवन कभी कठोर कठिन,

और कभी सरल सा है।


भोजन अमृततुल्य कभी,

तो कभी गरल सा है।


सागर के खारे जल में,

ही मोती पलते हैं।


काँटो की पहरेदारी में,

ही गुलाब खिलते हैं।

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

।।बाल-गीत।। मेरा झूला बडा़ निराला।। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



मम्मी जी ने इसको डाला।


मेरा झूला बडा़ निराला।।




खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,


जब झूला पा जाती हूँ।


होम-वर्क पूरा करते ही,


मैं इस पर आ जाती हूँ।


करता है मन को मतवाला।


मेरा झूला बडा़ निराला।।




मुझको हँसता देख,


सभी खुश हो जाते हैं।


बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,


नये खिलौने लाते हैं।


आओ झूलो, मुन्नी-माला।


मेरा झूला बडा़ निराला।।

।।बाल-गीत।। भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


भैया! मुझको भी,

लिखना-पढ़ना, सिखला दो।

क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी,

गिनती भी बतला दो।।


पढ़ लिख कर मैं,

मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।

दुनिया भर में,

बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।


रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,

मैं भी उठा करूँगी।

पुस्तक लेकर पढ़ने में,

मैं संग में जुटा करूँगी।।


बस्ता लेकर विद्यालय में,

मुझको भी जाना है।

इण्टरवल में टिफन खोल कर,

खाना भी खाना है।।


छुट्टी में गुड़िया को,

ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।

उसके लिए पेंसिल और,

इक कापी भी लाऊँगी।।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

इत्तफाक या हादसा (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

घोड़ी ने पटक दिया!
मुहूरत खराब चल रहा है।

कई साल पुरानी बात है। मुझे एक बारात में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। गाँव की बारात थी और उसे किसी दूसरे गाँव में ही जाना था।
नया-नया दूल्हा था, नई-नई घोड़ी थी। कहने का मतलब यह है कि घोड़ी की भी पहली ही बारात थी और दूल्हे की भी पहली ही बारात थी। घोड़ी को आतिशबाजी देखने और बैण्ड-बाजा सुनने का इससे पूर्व का कोई अनुभव नही था।
इधर दूल्हा भी बड़ी ऐंठ में था। अपनी बारात चढ़वाने के लिए वह तपाक से घोड़ी पर सवार हो गया। कुछ देर तक तो बेचारी घोड़ी ने सहन कर लिया। परन्तु जैसे ही बैण्ड बजना शुरू हुआ। घोड़ी बिफर गयी उसने धड़ाम से दूल्हे को जमीन पर पटक दिया और भाग खड़ी हुई। बारातियों ने उसे पकड़ने की बड़ी कोशिश की लेकिन उसने तो चार किलोमीटर दूर अपने घर आकर ही दम लिया।
उघर जमीन पर पड़ा दूल्हा दर्द से कराह रहा था। गाँव से डॉक्टर बुलाया गया और दूल्हे की मिजाज-पुरसी की गयी। कुछ देर बाद दूल्हे के कूल्हे का दर्द कुछ कम हुआ तो उसे दूसरी घोड़ी पर बिठाने की कोशिशे हुईं। परन्तु वह दूसरी पर बैठने को तैयार ही नही हुआ।
जैसे-तैसे रिक्शा मे ही दूल्हे को बैठा कर बारात चढायी गयी। अगले दिन बारात लौटी तो दुल्हन भी साथ थी।
अब दूल्हे के जीवन में घोड़ी तो नही, पत्नी-रूपी नारी थी। जो हर मायने में बेचारे.............पर भारी थी । शादी में घोड़ी ने पटका था, अब पत्नी बेचारे........ को रोज ही झिड़कती है।
जब उस बेचारे..............से पूछते हैं तो वह मायूसीभरा जवाब देता है- साहब जी मेरा तो शादी से ही मुहूरत खराब चल रहा है।

एक दिन प्रीत उपहार हो जायेगा।। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

गीत गाते रहो, गुनगुनाते रहो,
एक दिन मीत संसार हो जायेगा।

चमचमाते रहो, जगमगाते रहो,
एक दिन प्रीत उपहार हो जायेगा।।

जीतनी जंग है जिन्दगी की अगर,
पार करनी पड़ेगी, कठिन सी डगर,
पथ सजाते रहो, आते-जाते रहो,
एक दिन राह को प्यार हो जायेगा।।

स्वप्न सुख के बुनों, खार को मत चुनो,
कुछ स्वयं भी कहो, कुछ उन्हें भी सुनो,
मुस्कुराते रहो, सबको भाते रहो,
एक दिन सुख का अम्बार हो जायेगा।।

भूल करना नही, दिल दुखाना नही,
साथ देना, कभी दूर जाना नही,
सुर मिलाते रहो, सिर हिलाते रहो,
एक दिन उनको एतबार हो जायेगा।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

दामाद बहुत ही भाता है। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

पाहुन का है अर्थ घुमक्कड़,
यम का दूत कहाता है।
सास-ससुर की छाती पर,
बैठा रहता जामाता है।।

खाता भी, गुर्राता भी है,
सुनता नही सुनाता है।
बेटी को दुख देता है तो,
सीना फटता जाता है।।

चंचल अविरल घूम रहा है ,
ठहर नही ये पाता है।
धूर्त भले हो किन्तु मुझे,
दामाद बहुत ही भाता है।।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

गुरू सहाय भटनागर ‘बदनाम की एक खूब सूरत गजल-प्रस्तुतिः डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

वो शम्मा मोहब्बत की,
चला कर चले गये।
एक याद मेरे दिल में,
बसा कर चले गये।।

बुझती नहीं है आग,
लगायी जो सनम ने,
यादों की पालकी में,
बैठा कर चले गये।।

वो इश्क के वादों में,
कसम प्यार की खाकर,
दामन को अपने हमसे,
छुड़ा कर चले गये।।

खुशियां थी बेसुमार,
जब वो पास मेरे थे
वो शम्मा आरजू की,
बुझा कर चले गये।।

अपनी तो जफा याद है,
उनकी न वफा न याद,
घर को मेरे ‘बदनाम’,
बनाकर चले गये।

भक्ति-भाव से मिलकर बोलो, रघुपति राघव राजा राम।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)



दीन दुखी के रक्षक गा्ंधी,
तुमको शत्-शत् मेरा प्रणाम।
श्रद्धा-सुमन समर्पित तुमको,
जग में अमर तुम्हारा नाम।।




आत्म-संयमी, व्रतधारी की,
महिमा को हम गाते हैं।
राजनीति-पटु,महा-आत्मा को,
हम शीश नवाते हैं।।


तन-मन में रमे हुए गांधी,
जैसे काशी और काबा हैं।
भारत के जन,गण,मन में,
रचते-बसते गांधी बाबा हैं।।


शस्त्र अहिंसा का लेकर,
तुमने अंग्रेज भगाया था।
शान्ति प्रेम की लाठी से,
भारत आजाद कराया था।।


छुआ-छूत का भूत भगा,
चरखे का चक्र चलाया था।
सत्यमेव जयते का सबको,
पावन पाठ पढ़ाया था।।


आदर और श्रद्धा से लेते,
हम बापू-गांधी का नाम।
भक्ति-भाव से मिलकर बोलो,
रघुपति राघव राजा राम।।

आशा की एक किरण अब भी बाकी है........ (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

पिछले कई वर्षों से मैं दो-मंजिले पर रहता हूँ। मेरे कमरे में तीन रोशनदान हैं। उनमें जंगली कबूतर रहने लगे थे। वहीं पर वो अण्डे भी देते थे, परन्तु कानिश पर जगह कम होने के कारण अण्डे नीचे गिर कर फूट जाते थे। मुझे यह अच्छा नही लगता था।
एक दिन कुछ फर्नीचर बनवाने के लिए बढ़ई लगाया तो मुझे कबूतरों की याद आ गयी। मैंने बढ़ई से उनके लिए दो पेटी बनवा ली और किसी तरह से उनको रोशनदान में रखवा दिया।
अब कबूतर उसमें बैठने लगे। नया घर पाकर वो बहुत खुश लगते थे। धीरे-धीरे कबूतर-कबूतरी ने पेटी में तिनके जमा करने शुरू कर दिये। थोड़े दिन बाद कबूतरी ने इस नये घर में ही अण्डे दिये। कबूतर और कबूतरी बारी-बारी से बड़े मनोयोग से उन्हें सेने लगे।
एक दिन पेटी में से चीं-चीं की आवाज सुनाई देने लगी। अण्डों में से बच्चे निकल आये थे। अब कबूतर और कबूतरी उनको चुग्गा खिलाने लगे। धीरे-धीरे बच्चों के पर भी निकलने शुरू हो गये थे। एक दिन मैंने देखा कि कबूतरों के बच्चे उड़ने लगे थे। जैसे ही उनके पूरे पंख विकसित हो गये वे घोंसला छोड़ कर पेटी से उड़ गये ।
आज भी यह क्रम नियमित रूप से चल रहा है। कबूतर अण्डे देते हैं। अण्डों में से छोटे-छोटे बच्चे निकलते हैं और पंख आने के बाद उड़ जाते हैं। क्या संसार की यही नियति है? बालक जवान होते ही माता-पिता को ऐसे छोड़ कर चले जाते हैं जैसे कि कभी उनसे कोई नाता ही न रहा हो और माता-पिता देखते रह जाते हैं।
वे पुनः घोंसले में अण्डे देते हैं। उन्हें इस उम्मीद से सेते हैं कि इनमें से निकलने वाले बच्चे बड़े होकर हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।
शायद उनके मन में आशा की एक किरण अब भी बाकी है........

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

मुझे लेना नही आया। उन्हे देना नही भाया।। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

मिलन के गीत मन ही मन,
हमेशा गुन-गुनाता था।
हृदय का शब्द होठों पर,
कभी बिल्कुल न आता था।

मुझे कहना नही आया।
उन्हें सुनना नही भाया।।

कभी जो भूलना चाहा,
जुबां पर उनकी ही रट थी।
अन्धेरी राह में उनकी,
चहल कदमी की आहट थी।

मुझे सपना नही आया।
उन्हें अपना नही भाया।।

बहुत से पत्र लाया था,
मगर मजमून कोरे थे।
शमा के भाग्य में आये,
फकत झोंकें-झकोरे थे।

मुझे लिखना नही आया।
उन्हें पढ़ना नही आया।।

बने हैं प्रीत के क्रेता,
जमाने भर के सौदागर।
मुहब्बत है नही सौदा,
सितम कैसे करूँ उन पर।

मुझे लेना नही आया।
उन्हे देना नही भाया।।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

अपना चमन बरबाद कर डाला। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

गुलों की चाह में,
अपना चमन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

चहकती थीं कभी,
गुलशन की छोटी-छोटी कलियाँ जब,
महकती थी कभी,
उपवन की छोटी-छोटी गलियाँ जब,
गगन की छाँह में,
शीतल पवन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

चमकती थी कभी बिजली,
मिरे काँधे पे झुक जाते,
झनकती थी कभी पायल,
तुम्हारे पाँव रुक जाते,
ठिठुर कर डाह में,
अपना सुमन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

सिसकते हैं अकेले अब,
तुम्ही को याद कर-कर के,
बिलखते हैं अकेले अब,
फकत फरयाद कर-कर के,
अलम की बाँह में,
अपना जनम बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

गुरू सहाय भटनागर ‘बदनाम’ की एक गजल ।। मधुमास सुहाना आ जाता ।।

हर साल बरसता था सावन,

अब की बरसात नहीं आयी।

तुम आ जाते तो शायद फिर,

मधुमास सुहाना आ जाता।

हम आस के पंछी वर्षा के,

आने की दुआयें करते हैं।

चूड़ी की खनक, पायल की झनक,

मौसम फिर खुश्नुमा आ जाता।

खुश्क हवाओं के झोंके,

आते हैं तो गुल मुस्काते हैं।

यादों के सूने गुलशन में,

सूखी बरसातें होती हैं।

घिर-घिर के घटायें आती हैं,

और बिन बरसे रूक जाती हैं।

तुम आ जाते ऐसे में कहीं,

सावन का महीना आ जाता।

आने की तुम्हारी चाहते में,

हम आस लगाये रहते हैं।

गुलचीं के लिये फिर गुलशन में,

वीरान बहारें होती हैं।

तुम आ जाते ‘बदनाम’ से फिर,

मिलने का जमाना आ जाता।

इश्क की गन्ध छुप न पायी है। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

दिल किसी काम में नही लगता,

याद जब से तुम्हारी आयी है।


घाव रिसने लगें हैं सीने के,

पीर चेहरे पे उभर आयी है।


साँस आती है, धडकनें गुम है,

क्यों मेरी जान पे बन आयी है।

गीत-संगीत बेसुरा सा है,

मन में बंशी की धुन समायी है।

मेरी सज-धज हैं, बेनतीजा सब,

प्रीत पोशाक नयी लायी है।

होठ हैं बन्द, लब्ज गायब हैं,

राज की बात है, छिपायी है।

चाहे कितनी बचा नजर मुझसे,

इश्क की गन्ध छुप न पायी है।

इन पहाड़ों में बसे कुछ प्राण भी हैं।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

प्यार का पल चाहते पाषाण भी हैं।
इन पहाड़ों में बसे कुछ प्राण भी हैं।।

प्रस्तरों में भी हृदय है, प्रस्तरों में भी दया है।
चीड़ का परिवार, इनके अंक में ही बस गया है।

गोद में बैठे हुए, किस प्यार से अधिकार से।
साल के छौने किलोलें,कर रहे दे(देव)-दार से।

कंकड़ों और पत्थरों के ढेर पर।
गगनचुम्बी कोण जैसे पेड़ पर।

सेव, काफल, नाशपाती से,रसीले फल उगे हैं।
जो मनुज की भूख,निर्बलता मिटाने में लगे हैं।

मात्र ये प्रहरी नही परित्राण भी हैं।
इन पहाड़ों में बसे कुछ प्राण भी हैं।।

पत्थरों में बिष्ट, ओली और टम्टा रह रहे हैं।
सरलता, ईमानदारी ,मूक चेहरे कह रहे हैं।

पत्थरों के देवता हैं,पत्थरों के घर बने हैं।
पत्थरों में पक्षियों के,घोंसले सुन्दर घने हैं।

पत्थरों में प्राण भी हैं,और हैं, पाषाण भी।
पत्थरों में आदमी हैं,और हैं भगवान भी।

मात्र ये कंकड़ नही,कल्याण भी हैं।
इन पहाड़ों में बसे,कुछ प्राण भी हैं।।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

जब याद किसी की आती है। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

दिल में कुछ-कुछ होता है,
जब याद किसी की आती है।
मन सब सुध-बुध खोता है,
जब याद किसी की आती है।

गुलशन वीराना लगता है,
पागल परवाना लगता है,
भँवरा दीवाना लगता है,
दिल में कुछ-कुछ होता है,
जब याद किसी की आती है।

मधुबन डरा-डरा लगता है,
जीवन मरा-मरा लगता है,
चन्दा तपन भरा लगता है,
दिल में कुछ-कुछ होता है,
जब याद किसी की आती है।

नदियाँ जमी-जमी लगती हैं,
दुनियाँ थमी-थमी लगती हैं,
अँखियाँ नमी-नमी लगती हैं,
दिल में कुछ-कुछ होता है,
जब याद किसी की आती है।
मन सब सुध-बुध खोता है,
जब याद किसी की आती है।।

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

अमृत भी पा सकता हूँ।(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अपना माना है जब तुमको,
चाँद-सितारे ला सकता हूँ ।
तीखी-फीकी, जली-भुनी सी,
सब्जी भी खा सकता हूँ।

दर्शन करके चन्द्र-वदन का,
निकल पड़ा हूँ राहों पर,
बिना इस्तरी के कपड़ों में,
दफ्तर भी जा सकता हूँ।

गीत और संगीत बेसुरा,
साज अनर्गल लगते है,
होली वाली हँसी-ठिठोली,
मैं अब भी गा सकता हूँ।

माता-पिता तुम्हारे मुझको,
अपने जैसे लगते है,
प्रिये तम्हारी खातिर उनको,
घर भी ला सकता हूँ।

जीवन-जन्म दुखी था मेरा,
बिना तुम्हारे सजनी जी,
यदि तुम साथ निभाओ तो,
मैं अमृत भी पा सकता हूँ।

प्रीत का मौसम सुहाना हो गया। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हाथ लेकर जब चले, तुम साथ में,

प्रीत का मौसम, सुहाना हो गया है।


इक नशा सा, जिन्दगी में छा गया,

दर्द-औ-गम, अपना पुराना हो गया है।


जन्म-भर के, स्वप्न पूरे हो गये,

मीत सब अपना, जमाना हो गया है।


दिल के गुलशन में, बहारें छा गयीं,

अब चमन, मेरा ठिकाना हो गया है।


चश्म में इक नूर जैसा, आ गया,

बन्द अब आँसू , बहाना हो गया है।


तार मन-वीणा के, झंकृत हो गये,

सुर में सम्भव, गीत गाना हो गया है।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

कामुकता में वह छला गया। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जल में मयंक प्रतिविम्बित था,
अरुणोदय होने वाला था।
कली-कली पर झूम रहा,
एक चंचरीक मतवाला था।।

गुंजन कर रहा, प्रतीक्षा में,
कब पुष्प बने कोई कलिका।
मकरन्द-पान को मचल रहा,
मन मोर नाच करता अलि का।।

लाल-कपोल, लोल-लोचन,
अधरों पर मृदु मुस्कान लिए।
उपवन में एक कली आयी,
सुन्दरता का वरदान लिए।।

देख अधखिली सुन्दर कलिका,
भँवरे के मन में आस पली।
और अधर-कपोल चूमने को,
षट्पद के मन में प्यास पली।।

बस रूप सरोवर में देखा,
और मुँह में पानी भर आया।
प्रतिछाया को समझा असली,
और मन ही मन में ललचाया।।

आशा-विश्वास लिए पँहुचा,
अधरों से अधर मिला बैठा।
पर भीग गया लाचार हुआ,
जल के भीतर वह जा पैंठा।।

सत्यता समझ ली परछाई,
कामुकता में वह छला गया।
नही प्यास बुझी उस भँवरे की,
इस दुनिया से वह चला गया।।

प्रणय-दिवस पर शुभकामनाएँ एवं सन्देश (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

प्रणय-दिवस पर, मर्यादा में,
बँध कर प्यार करेंगे,
शेष तीन सौ चौंसठ दिन भी,
जम कर प्यार करेंगे।

साथ निभाने का जीवन भर,
वचन निभाना होगा,
प्रेम-दिवस को प्रतिदिन,
प्रतिपल हमें मनाना होगा।

सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।
अनुबन्ध आज सारे, बाजार हो गये हैं।।

न वो प्यार चाहता है, न दुलार चाहता है,
जीवित पिता से पुत्र, अब अधिकार चाहता है,
सब टूटते बिखरते, परिवार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।।

घूँघट की आड़ में से, दुल्हन का झाँक जाना,
भोजन परस के सबको, मनुहार से खिलाना,
ये दृश्य देखने अब, दुश्वार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।।

वो सास से झगड़ती, ससुरे को डाँटती है,
घर की बहू किसी का, सुख-दुख न बाटँती है,
दशरथ, जनक से ज्यादा बेकार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।।

जीवन के हाँसिये पर, घुट-घुट के जी रहे हैं,
माँ-बाप सहमे-सहमे, गम अपना पी रहे हैं,
कल तक जो पालते थे, अब भार हो गये हैं।
सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

प्रेम दिवस के नाम....(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सात रंग में, रूप तुम्हारा,

छिपा हुआ है नया-नया।

सावन-भादों मे छायेगा,

रूप तुम्हारा नया-नया।।


सीपों के मोती में पाया,

रूप तुम्हारा नया-नया।

सागर तल में गहरायेगा,

रूप तुम्हारा नया-नया।।


रचा - बसा चन्दा-मामा में,

रूप तुम्हारा नया-नया।

रात चाँदनी में आयेगा,

रूप तुम्हारा नया-नया।।


मलयानिल के झोंको में है,

रूप तुम्हारा नया-नया।

प्रेम-दिवस पर छा जायेगा,

रूप तुम्हारा नया-नया।

कर लेंगे उत्तीर्ण परीक्षा.......(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

खेल-कूद में रहे रात-दिन,
अब पढ़ना मजबूरी है।
सुस्ती - मस्ती छोड़,
परीक्षा देना बड़ा जरूरी है।।

मात-पिता,विज्ञान,गणित है,
ध्यान इन्हीं का करना है।
हिन्दी की बिन्दी को,
माता के माथे पर धरना है।।

देव-तुल्य जो अन्य विषय है,
उनके भी सब काम करेगें।
कर लेंगें, उत्तीर्ण परीक्षा,
अपना ऊँचा नाम करेंगे।।

श्रम से साध्य सभी कुछ होता,
दादी हमें सिखाती है।
रवि की पहली किरण,
हमेशा नया सवेरा लाती है।।

हिन्दी-स्वरावलि (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

‘‘अ‘’
‘‘अ‘’ से अल्पज्ञ सब, ओम् सर्वज्ञ है।
ओम् का जाप, सबसे बड़ा यज्ञ है।।

‘‘आ’’
‘‘आ’’ से आदि न जिसका, कोई अन्त है।
सारी दुनिया का आराध्य, वह सन्त है।।

‘‘इ’’
‘‘इ’’ से इमली खटाई भरी, खान है।
खट्टा होना खतरनाक, पहचान है।।

‘‘ई’’
‘‘ई’’ से ईश्वर का जिसको, सदा ध्यान है।
सबसे अच्छा वही, नेक इन्सान है।।

‘‘उ’’
उल्लू बन कर निशाचर, कहाना नही।
अपना उपनाम भी यह धराना नही।।

‘‘ऊ’’
ऊँट का ऊँट बन, पग बढ़ाना नही।
ऊँट को पर्वतों पर, चढ़ाना नही।।

‘‘ऋ’’
‘‘ऋ’’ से हैं वह ऋषि, जो सुधारे जगत।
अन्यथा जान लो, उसको ढोंगी भगत।।

‘‘ए’’
‘‘ए’’ से है एकता में, भला देश का।
एकता मन्त्र है, शान्त परिवेश का।।

‘‘ऐ’’
‘‘ऐ’’ से तुम ऐठना मत, किसी से कभी।
हिन्द के वासियों, मिल के रहना सभी।।

‘‘ओ’’
‘‘ओ’’ से बुझती नही, प्यास है ओस से।
सारे धन शून्य है, एक सन्तोष से।।

‘‘औ’’
‘‘औ’’ से औरों को पथ, उन्नति का दिखा।
हो सके तो मनुजता, जगत को सिखा।।

‘‘अं’’
‘‘अं’’ से अन्याय सहना, महा पाप है।
राम का नाम जपना, बड़ा जाप है।।

‘‘अः’’
‘‘अः’’ के आगे का स्वर,अब बचा ही नही।
इसलिए, आगे कुछ भी रचा ही नही।।

इन्सानियत की राह में, मजहब का क्या है काम? (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अल्लाह निगह-ए-बान है, वो है बड़ा करीम।
जाति, धरम से बाँध मत, मौला को ऐ शमीम।।

बख्शी है हर बशर को, उसने इल्म की दौलत,
इन्सां को सँवारा है, दे शऊर की नेमत,
क्यों भाई , को भाई से जुदा कर रहा फईम।
जाति, धरम से बाँध मत, मौला को ऐ करीम।।

कर नेक दिल से, रब की इबादत अरे बन्दे,
सच्चाई पे चल, दफ्न कर, काले सभी धन्धे,
बन जा जमीं का आदमी और छोड़ दे नईम।
जाति, धरम से बाँध मत,मौला को ऐ करीम।।

शैतानियत की राह से, नाता तू तोड़ ले,
हुब्बे वतन की राह से, नाता तू जोड़ ले,
मिल सबसे तू खुलूस से, कह राम और रहीम।
जाति, धरम से बाँध मत, मौला को ऐ करीम।।

आबाद मत फरेब कर, नाहक न हो बदनाम,
इन्सानियत की राह में, मजहब का नही काम,
सबके दिलों बैठ जा, बन करके तू नदीम।
जाति, धरम से बाँध मत,मौला को ऐ करीम।।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिन्दगी और मौत पर भी, हबस है छाने लगी।
आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी।।

हबस के कारण, यहाँ गणतन्त्रता भी सो रही।
दासता सी आज, आजादी निबल को हो रही।।

पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है।
हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।

उच्च-शिक्षा में अशिक्षा, हबस बन कर पल रही।
न्याय में अन्याय की ही, होड़ जैसी चल रही।।

हबस के साये में ही, शासन-प्रशासन चल रहा।
हबस के साये में ही नर, नारियों को छल रहा।।

डॉक्टरों, कारीगरों को, हबस ने छोड़ा नही।
मास्टरों ने भी हबस से, अपना मुँह मोड़ा नही।।

बस हबस के जोर पर ही, चल रही है नौकरी।
कामचोरों की धरोहर, बन गयी अब चाकरी।।

हबस के बल पर हलाहल, राजनीतिक घोलते।
हबस की धुन में सुखनवर, पोल इनकी खोलते।।

चल पड़े उद्योग -धन्धे, अब हबस की दौड़़ में।
पा गये अल्लाह के बन्दे, कद हबस की होड़ में।।

राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।।

शूद्र वन्दना (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हैं पूजनीय कोटि पद, धरा उन्हें निहारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

चरण-कमल वो धन्य हैं,
समाज को जो दें दिशा,
वे चाँद-तारे धन्य हैं,
हरें जो कालिमा निशा,
प्रसून ये महान हैं, प्रकृति है सँवारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

जो चल रहें हैं, रात-दिन,
वो चेतना के दूत है,
समाज जिनसे है टिका,
वे राष्ट्र के सपूत है,
विकास के ये दीप हैं, मही इन्हें दुलारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

जो राम का चरित लिखें,
वो राम के अनन्य हैं,
जो जानकी को शरण दें,
वो वाल्मीकि धन्य हैं,
ये वन्दनीय हैं सदा, उतारो इनकी आरती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।

सीमाएँ मत पार कीजिए। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

प्रेम-प्रीत के चक्कर में पड़,
सीमाएँ मत पार कीजिए।
वैलेन्टाइन के अवसर पर,
सच्चा-सच्चा प्यार कीजिए।।

भोले-भाले प्रेमी को भरमाना, अच्छी बात नही,
चिकनी-चुपड़ी बातों से बहलाना, अच्छी बात नही,
ख्वाब दिखा कर आसमान के,
धरती से, मत वार कीजिए।
वैलेन्टाइन के अवसर पर,
सच्चा-सच्चा प्यार कीजिए।।

जन्म-जिन्दगी के साथी से, झूठे वादे मत करना,
दिल के कोने में घुस कर, नापाक इरादे मत करना,
हाथ थाम कर साथ निभाना,
गंदा मत, व्यवहार कीजिए।
वैलेन्टाइन के अवसर पर,
सच्चा-सच्चा प्यार कीजिए।।

धड़कन जैसे बँधी साँस से, ऐसा गठबन्धन कर लो,
पानी जैसे बँधा प्यास से, ऐसा परिबन्धन कर लो,
सच्चे प्रेमी बन साथी से,
अपनी आँखे चार कीजिए।।
वैलेन्टाइन के अवसर पर,
सच्चा-सच्चा प्यार कीजिए।।

प्रेम-दिवस की भाँति, बसन्ती सुमनों को खिलना होगा,
रैन-दिवस की भाँति, हमें हर-रोज गले मिलना होगा,
हरी-भरी जीवन बगिया में,
नित ऐसा व्यापार कीजिए।
वैलेन्टाइन के अवसर पर,
सच्चा-सच्चा प्यार कीजिए।।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

बरसो बादल! (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नभ में कितने घन-श्याम घिरे,
बरसी न अभी जी भर बदली।
मुस्कान सघन-घन दे न सके,
मुरझाई आशाओं की कली।

प्यासा चातक, प्यासी धरती,
प्यास लिए, अब फसल चली।
प्यासी निशा - दिवस प्यासे,
प्यासी हर सुबह-औ-शाम ढली।

वन, बाग, तड़ाग, सुमन प्यासे,
प्यासी ऋषियों की वनस्थली।
खग, मृग, वानर, जलचर प्यासे,
प्यासी पर्वत की तपस्थली।

सूखा क्यों जलद तुम्हारा उर,
मानव मन की मनुहार सुनो।
इतने न बनो घनश्याम निठुर,
चातक की करुण पुकार सुनो।

फिर आओ गगन तले बादल,
अब तो मन-तन जी-भर बरसो।
विरहिन की ज्वाल, करो शीतल,
जाना अपने घर, कल - परसो।

तकदीर बदल जाती है (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आमन्त्रण में बल हो तो ,
तस्वीर बदल जाती है।
पत्थर भी भगवान बनें,
तकदीर बदल जाती है।।

अपने अधरों को सीं कर,
इक मौन निमन्त्रण दे दो,
नयनों की भाषा से ही-
मुझको आमन्त्रण दे दो,
भँवरे की बिन गुंजन ही-
तदवीर बदल जाती है।
आमन्त्रण में बल हो तो ,
तस्वीर बदल जाती है।।

सरसों फूली, टेसू फूले,
फूल रहा है, सरस सुमन,
होली के रंग में भीगेंगे,
आशाओं के तन और मन,
आलिंगन के सागर में-
ताबीर बदल जाती है।
आमन्त्रण में बल हो तो,
तस्वीर बदल जाती है।।

पगचिन्हों का ले अवलम्बन,
आगे बढ़ता जाता हूँ ,
मन के दर्पण में राही की,
धड़कन पढता जाता हूँ,
पल-पल में परछांई की,
तासीर बदल जाती है।
आमन्त्रण में बल हो तो,
तस्वीर बदल जाती है।।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

अब तक (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) (टिप्पणी करते- करते बन गई कविता.)

पहले भी मैं भटक चुकी हूँ,

अब तक भटक रही हूँ मैं।


कब तलाश ये पूरी होगी,

अब तक अटक रही हूँ मैं।


ना जाने कितनों के मन में,

अब तक खटक रही हूँ मैं।


गुलशन के भँवरों में फँस कर,

अब तक लटक रही हूँ मैं।


यादें पीछा नही छोड़तीं,

अब तक चटक रही हूँ मैं।


जुल्फों में जो महक बसी थी,

अब तक झटक रही हूँ मैं।

समाजवाद (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

समाजवाद से-
कौन है अंजाना?
लोगों ने भी यह जाना।
समाजवाद आ गया है,
क्या यह प्रयोग नया है?
डाका, राहजनी, और चोरी,
सुरसा के मुँह के समान-
बढ़ रही है,रिश्वतखोरी।
देख रहे हैं-
गरीब और मजदूर,
होता जा रहा है,
चिकित्सा और न्याय-
उनसे दूर।
बढ़ता जा रहा है-
भ्रष्टाचार, व्यभिचार और शोषण,
नेतागण कर रहे हैं-
अपना और अपने परिवार का पोषण।
क्या समाजवाद-
सबके हित की-आवाज है?
क्या देश में दीन-दुखी,
आम आदमी का राज है?
पछता रहे हैं,
गरीब और कमजोर,
क्यों भेजा था उन्होंने संसद में-
एक निकम्मा और चोर?
आज केवल-
नेता ही आबाद है,
जनता आज भी बरबाद है।
क्या यही समाजवाद है?
यही लोकतंत्र है,
हाँ यही समाजवाद है।

काश ये ज़ज्बा हमारे भीतर भी होता?(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सन् 1979, बनबसा जिला-नैनीताल का वाकया है। उन दिनों मेरा निवास वहीं पर था । मेरे घर के सामने रिजर्व कैनाल फौरेस्ट का साल का जंगल था। उन पर काले मुँह के लंगूर बहुत रहते थे।
मैंने काले रंग का भोटिया नस्ल का कुत्ता पाला हुआ था। उसका नाम टॉमी था। जो मेरे परिवार का एक वफादार सदस्य था। मेरे घर के आस-पास सूअर अक्सर आ जाते थे। जिन्हें टॉमी खदेड़ दिया करता था । एक दिन दोपहर में 2-3 सूअर उसे सामने के कैनाल के जंगल में दिखाई दिये। वह उन पर झपट पड़ा और उसने लपक कर एक सूअर का कान पकड़ लिया। सूअर काफी बड़ा था । वह भागने लगा तो टॉमी उसके साथ घिसटने लगा। अब टॉमी ने सूअर का कान पकड़े-पकड़े अपने अगले पाँव साल के पेड़ में टिका लिए।
ऊपर साल के पेड़ पर बैठा लंगूर यह देख रहा था। उससे सूअर की यह दुर्दशा देखी नही जा रही थी । वह जल्दी से पेड़ से नीचे उतरा और उसने टॉमी को एक जोरदार चाँटा रसीद कर दिया और सूअर को कुत्ते से मुक्त करा दिया।
हमारे भी आस-पास बहुत सी ऐसी घटनाएँ आये दिन घटती रहती हैं परन्तु हम उनसे आँखे चुरा लेते हैं और हमारी मानवता मर जाती है।
काश! जानवरों सा जज्बा हमारे भीतर भी होता।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

रूमानी शायर गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’ की की पुस्तक शाम-ए तन्हाई की एक गजल -प्रस्तुति-(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


लिखने को लिख दिया खत मैंने, अब उनका जवाब आता होगा।
घबरा-न-ए दिल, कुछ सब्र तो कर, उनको भी ख्याल आता होगा।
आते ही ख्याल, बहारों का, दिल चैन कहाँ पाता होगा।
लबरेज है जो पैमाना-ए-दिल, भरते ही छलक जाता होगा।

गुलशन में निकल जाते होंगे, दिल सोच के, बहलाते होंगे,
लहराता हवाओं में आँचल, खारों में उलझ जाता होगा।
दुनिया ने मेरा उलझा दामन, वीराने मे लाकर छोड़ दिया,
‘बदनाम’ का दिल शायद यूँ ही, खत लिख के बहल जाता होगा।

सीधी-सच्ची बात (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




वतन में अमन की, जागर जगाने की जरूरत है,


जहाँ में प्यार का सागर, बहाने की जरूरत है।


मिलन मोहताज कब है,ईद,होली और क्रिसमस का-


दिलों में प्रीत की गागर, सजाने की जरूरत है।।

क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में, मैं गजल? (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अब हवाओं में फैला गरल ही गरल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

गन्ध से अब, सुमन की-सुमन है डरा,
भाई-चारे में, कितना जहर है भरा,
वैद्य ऐसे कहाँ, जो पिलायें सुधा-
अब तो हर मर्ज की है, दवा ही अजल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

धर्म की कैद में, कर्म है अध-मरा,
हो गयी है प्रदूषित, हमारी धरा,
पंक में गन्दगी तो हमेशा रही-
अब तो दूषित हुआ जा रहा, गंग-जल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

आम, जामुन जले जा रहे, आग में,
विष के पादप पनपने, लगे बाग मे,
आज बारूद के, ढेर पर बैठ कर-
ढूँढते हैं सभी, प्यार के चार पल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

आओ! शंकर, दयानन्द विष-पान को,
शिव अभयदान दो, आज इन्सान को,
जग की यह दुर्गति देखकर, हे प्रभो!
नेत्र मेरे हुए जार हे हैं, सजल ।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

रूमानी शायर गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’ की दो गजलें-


(1)
मोहब्बत करके खुद ही दर्द पैदा कर लिया मैंने।
तेरी मासूमियत पर क्यों भरोसा कर लिया मैंने??
पियूँ जितनी शराब-ए-हुस्न, दिल को चैन न आये,

कहो अन्दाज पीने का, ये कैसा कर लिया मैंने??
हमारे दम से है रोशन, तेरी यह अंजुमन साकी,

खुशी में गम भी शामिल,आज अपना कर लिया मैंने।।
जला कर आशियाँ अपना, किया है तेरा घर रोशन,

खता तेरी थी, घर अपना, अन्धेरा कर लिया मैंने।।
परेशां हूँ बहुत ‘बदनाम’ तेरी बज्म में आकर,

कि तोड़ा दिल का आईना, तेरा क्या कर लिया मैंने।।
मोहब्बत करके खुद ही दर्द पैदा कर लिया मैंने।
तेरी मासूमियत पर क्यों भरोसा कर लिया मैंने??

(2)
कैसे? कहाँ? हुई थी मुलाकात याद है।
घिर-घिर के छा गयी थी घटा, रात याद है।।
सुनसान जगह पर तेरा,रूकना वो ठिठकना,
बिजली की चमक से तेरा, घबराना याद है।
डर कर मेरे आगोश में आये, निकल गये,
फिर दूर जा के, हमसे सिमटना वो याद है।
शर्माना, मुस्कराना, फिर दामन निचोड़ना,
बारिश में तर -बदन का वो, थर्राना याद है।
दीवाना कर गयी, मेरे दिल को तेरी अदा,
आरिज पे तेरी जुल्फ का, लहराना याद है।
लज्जत मिली थी हमको, जिन्दगी में पहली बार,‘
बदनाम’ को उस रात का, अफसाना याद है।।
प्रस्तुति
-(डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

‘‘जिन्दगी का गीत रोटी मे छिपा है’’ (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिन्दगी का गीत रोटी मे छिपा है।
साज और संगीत, रोटी में छिपा है।।

रोटियों के लिए ही, मजबूर हैं सब,
रोटियों के लिए ही, मजदूर हैं सब।

कीमती सोना व चाँदी, तब तलक,
रोटियाँ संसार में हैं, जब तलक।

खेत और खलिहान सुन्दर, तब तलक,
रोटियाँ उनमें छिपी हों, जब तलक।

झूठ, मक्कारी, फरेबी, रोटियों के रास्ते हैं,
एकता और भाईचारे, रोटियों के वास्ते हैं।

हम सभी यह जानते है, रोटियाँ इस देश में हैं,
रोटियाँ हर वेश में है, रोटियाँ परिवेश में है।

रोटियों को छीनने को , उग्रवेशी छा गये हैं,
रोटियों को बीनने को ही, विदेशी आ गये हैं।

याद मन्दिर की सताती, रोटियाँ जब पेट में हों,
याद मस्जिद बहुत आती, रोटियाँ जग पेट में हों।

राम ही रोटी बना और रोटिया ही राम हैं,
पेट की ये रोटियाँ ही, बोलती श्री-राम हैं।

रोटियों से, थाल सजते, आरती के,
रोटियों से, भाल-उज्जवल भारती के।

रोटियों से बस्तियाँ, आबाद हैं,
रोटियाँ खाकर, सभी आजाद हैं।

प्यार और मनमीत, रोटी में छिपा है।
जिन्दगी का गीत, रोटी मे छिपा है।।

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

‘‘आदमी’’ का चमत्कार (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आदमी के प्यार का,को रोता रहा है आदमी।
आदमी के भार को, ढोता रहा है आदमी।।

आदमी का विश्व में, बाजार गन्दा हो रहा।
आदमी का आदमी के साथ, धन्धा हो रहा।।

आदमी ही आदमी का, भूलता इतिहास है।
आदमी को आदमीयत का नही आभास है।।

आदमी पिटवा रहा है, आदमी लुटवा रहा।
आदमी को आदमी ही, आज है लुटवा रहा।।

आदमी बरसा रहा, बारूद की हैं गोलियाँ।
आदमी ही बोलता, शैतानियत की बोलियाँ।।

आदमी ही आदमी का,को आज है खाने लगा।
आदमी कितना घिनौना, कार्य अपनाने लगा।।

आदमी था शेर भी और आदमी बिल्ली बना।
आदमी अजमेर था और आदमी दिल्ली बना।।

आदमी था ठोस, किन्तु बर्फ की सिल्ली बना।
आदमी के सामने ही, आदमी खिल्ली बना।।

आदमी ही चोर है और आदमी मुँह-जोर है ।
आदमी पर आदमी का, हाय! कितना जोर है।।

आदमी आबाद था, अब आदमी बरबाद है।
आदमी के देश में, अब आदमी नाशाद है।।

आदमी की भीड़ में, खोया हुआ है आदमी।
आदमी की नीड़ में, सोया हुआ है आदमी।।

आदमी घायल हुआ है, आदमी की मार से।
आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से।।

एक शेर में परिचय-,एक गजल


रूमानी शायर गुरू सहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’
आवास-विकास, खटीमा (उत्तराखण्ड)
मोबाइलः 09411282774

एक ढलती शाम, मेरी जिन्दगी,
प्यार का उपनाम, मेरी जिन्दगी।
हर किसी से हँस के है मिलती गले-
इसलिए बदनाम, मेरी जिन्दगी।।

तेरी मुहब्बत का हमको, गुजरा वो जमाना याद आया।
रंगीं वो मंजर याद आये, वो शहर पुराना याद आया।।

मिलते थे कहीं दीवानों से, चलते थे कहीं बेगानों से,
उस राह-ए मुहब्बत का ऐ दिल, इक-इक अफसाना याद आया।।

वो भी तो इक जमाना था, तुम पलके बिछाये रहते थे,
हमको तो मुहब्बत का तेरी, हर राज पुराना याद आया।।

मिट जायेंगे हम, मर जायेंगे हम, इस राह-ए मुहब्बत में इक दिन,
उन तेरी फरेबी नजरों का, ‘बदनाम’ फसाना याद आया।।

कलियुग का व्यक्ति (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

जीवन की अभिव्यक्ति यही है,
क्या शायर की भक्ति यही है?

शब्द कोई व्यापार नही है,
तलवारों की धार नही है,
राजनीति परिवार नही है,
भाई-भाई में प्यार नही है,
क्या दुनिया की शक्ति यही है?

निर्धन-निर्धन होता जाता,
अपना आपा खोता जाता,
नैतिकता परवान चढ़ाकर,
बन बैठा धनवान विधाता,
क्या जग की अनुरक्ति यही है?

छल-प्रपंच को करता जाता,
अपनी झोली भरता जाता,
झूठे आँसू आखों में भर-
मानवता को हरता जाता,
हाँ कलियुग का व्यक्ति यही है?

वाह! क्या सीन है? (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

आज के पाँच चित्र
(1)
कल तक आदमी,
चेहरे बदलता था।
दुनिया के साथ-साथ,
स्वयं को भी छलता था।
सोचता था,
दर्पण को भी छल लूँगा,
बोला-
मैं खुद अपना चेहरा बदल लूँगा।
क्या ईमान और क्या दीन है?
वाह क्या सीन है?
(2)
कल तक,
माखन चुराता था कन्हैया।
लेकिन,
आज का गोपाल भैया।
अश्लील-गीत,
गाता जा रहा है।
जाम पर जाम,
पीता जा रहा है।
क्या नौजवान संवेदनहीन है?
वाह क्या सीन है?
(3)
कल तक,
खोजता इन्सान था,
भगवान को।
परन्तु,
आज भगवान ही खोजता,
इन्सान को।
क्यों?
क्या जानता नही,भगवान?
आदमी तो बहुत है,
लेकिन,
थोड़े बचे इन्सान।
मालिक ! कौन सी धुन में तल्लीन है?
वाह क्या सीन है?
(4)
कल तक,
मंजिल को-
ढूँढता था मुसाफिर।
किन्तु,
वक्त हो गया है,
कितना काफिर ?
अब मंजिल खोजती है-
एक अदद मुसाफिर।
परिणाम है,
मात्र सिफर।
क्या मंजिल,
इतनी लाचार और क्षीण है?
वाह क्या सीन है?
(5)
कल तक,
रिश्वत खोजती थी कानून को।
परन्तु आज अन्याय,
बिना डकार लिए-
पीता है-न्याय के खून को।
साहब की कुर्सी जहाँ आसीन है।
पेशकार की मेज के नीचे-
वाह क्या सीन है.............

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

एक व्यंग (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

(स्वभाव के विपरीत व्यंग का प्रथम प्रयास)

एक पादप साल का,
जिसका अस्तित्व नही मिटा पाई,
कभी भी,समय की आंधी ।
ऐसा था,
हमारा राष्ट्र-पिता,महात्मा गान्धी ।।
कितना है कमजोर,
सेमल के पेड़ सा-
आज का नेता ।
जो किसी को,कुछ नही देता ।।
दिया सलाई का-
मजबूत बक्सा,
सेंमल द्वारा निर्मित,एक भवन ।
माचिस दिखाओ,और कर लो हवन ।
आग ही तो लगानी है,
चाहे-तन, मन, धन हो या वतन।।
यह बहुत मोटा, ताजा है,
परन्तु,
सूखे साल रूपी,गांधी की तरह बलिष्ट नही,
इसे तो गांधी की सन्तान कहते हुए भी-
.........................।।

कोढ़ में खाज (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

निर्दोष से प्रसून भी डरे हुए हैं आज।
चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।

अश्लीलता के गान नौजवान गा रहा,
चोली में छिपे अंग की गाथा सुना रहा,
भौंडे सुरों के शोर में, सब दब गये हैं साज।
चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।

श्वान और विडाल जैसा मेल हो रहा,
नग्नता, निलज्जता का खेल हो रहा,
कृष्ण स्वयं द्रोपदी की लूट रहे लाज।
चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।

भटकी हुई जवानी है भारत के लाल की,
ऐसी है दुर्दशा मेरे भारत - विशाल की,
आजाद और सुभाष के सपनों पे गिरी गाज।
चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।

लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने को आयें,
लिख -कर कठोर सत्य किसे आज सुनायें,
दुनिया में सिर्फ मूर्ख के, सिर पे धरा है ताज।
चिड़ियों के कारागार में पड़े हुये हैं बाज।।

रोती पवित्र भूमि, आसमान रो रहा,
लगता है, घोड़े बेच के भगवान सो रहा,
अब तक तो मात्र कोढ़ था, अब हो गयी है खाज।
चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।

कैसे जी पायेंगें कसाइयों के देश में? (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नम्रता उदारता का पाठ, अब पढ़ाये कौन?
उग्रवादी छिपे जहाँ सन्तों के वेश में।

साधु और असाधु की पहचान अब कैसे हो,
दोनो ही सुसज्जित हैं, दाढ़ी और केश में।

कैसे खेलें रंग-औ-फाग, रक्त के लगे हैं दाग,
नगर, प्रान्त, गली-गाँव, घिरे हत्या-क्लेश में।

गांधी का अहिंसावाद, नेहरू का शान्तिवाद,
हुए निष्प्राण, हिंसा के परिवेश में ।

इन्दिरा की बलि चढ़ी, एकता में फूट पड़ी,
प्रजातन्त्र हुआ बदनाम देश-देश में।

मासूमों की हत्याये दिन-प्रतिदिन होती,
कैसे जी पायेंगे, कसाइयों के देश में।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

मन-सुमन हों खिले, उर से उर हों मिले,
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।
ज्ञान-गंगा बहे, शन्ति और सुख रहे-
मुस्कराता हुआ वो वतन चाहिए।।

दीप आशाओं के हर कुटी में जलें,
राम-लछमन से बालक, घरों में पलें,
प्यार ही प्यार हो, ऐसा पतवार हो-
देश में प्रान्त में अब अमन चाहिए।
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।।

छेनियों और हथौड़ों की झनकार हो,
श्रम-श्रजन-स्नेह दें, ऐसे परिवार हों,
खेत, उपवन सदा सींचती ही रहे-
ऐसी दरिया-ए गंग-औ-जमुन चाहिए।
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।।

आदमी से न इनसानियत दूर हो,
पुष्प, कलिका सुगन्धों से भरपूर हो,
साज सुन्दर सजें, एकता से बजें,
चेतना से भरे, मन-औ-तन चाहिए।
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।।

शहीदों को नमन (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन,
प्राण देकर बचाया तुम्हीं ने वतन।

देश-रक्षा की खातिर जो ली थी कसम,
कारगिल होया पंजाब या हो असम,
तुमने लौटा दिया वादियों का अमन।
ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।

वीरता से लड़े, धीरता से लड़े,
तुम समर में सदा आगे-आगे बढ़े,
मातृ-भू पर निछावर किये अपने तन।
ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।

धन्य माता हुई, धन्य है यह धरा,
हो गया वो अमर, जो वतन पर मरा,
हैं समर्पित तुम्हें, वाटिका के सुमन।
ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।

हास्य तथा व्यंगकार कवि गेंदालाल शर्मा ‘निर्जन’


हास्य तथा व्यंगकार कवि गेंदालाल शर्मा ‘निर्जन’ की कलम से-
सम्पर्क- 05943-251449, मो0- 9997209139, खटीमा
(1)
कुर्सी की आड़ में, जनता की राड़ में,
खेले जो शिकार वही सच्चा खिलाड़ी है।
दिन में होय गूँगा, अरु टाँग एक टूटी होय,
रात में जो जुड़ जाये, सच्चा भिखारी है।
बिल्डिंग कई मंजिली, एक ईट दीवार होय,
घूँसा मार गिर जाये, जानो काम सरकारी है।
दिन में दवाई खायें, रात को मलाई खायें,
डाक्टर भी कहे, फैसनेबिल बीमारी है ।
(2)
दामाद-
जो किसी की न सुने, घूमे आवारा बन,
उसको इस युग में आजाद कहते है।
जो शादी से पहले, एडवांस ले बयाना,
उस भयानक जीव को दामाद कहते है।

प्रस्तुति-डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

भय का भूत (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

यह घटना मेरे बचपन की है। मेरी आयु उस समय 13-14 वर्ष की रही होगी। मेरा बचपन नजीबाबाद, उ0प्र0 मे बीता, वहीं पला व बड़ा हुआ । पास ही में एक गाँव अकबरपुर-चौगाँवा है, वहाँ मेरे मौसा जी एक मध्यमवर्ग के किसान थे । मैं अक्सर छुट्टियों में वहाँ चला जाता था । खेती किसानी में मुझे रुचि थी इसीलिए मौसा जी भी मुझको पसन्द करते थे ।
नवम्बर का महीना था। मैं और मौसा जी खेत में पानी लगाने के लिए चले गये। पानी लगाते हुए कुछ रात सी हो गयी थी । मौसा जी का खेत सड़क के किनारे पड़ता था, खेत में एक पीपल का पुराना पेड़ भी था । मैने मिट्टी तेल की लालटेन जला ली और पीपल के पेड़ में टाँग दी । उस समय नजीबाबाद में कोई भी अदालत नही थी । अतः लोग बिजनौर रेलगाड़ी से अदालत के काम से जाया करते थे । उस दिन रेलगाड़ी भी कुछ लेट हो गयी थी । अतः लोगों को गाँव लौटते हुए रात के लगभग 10 बज गये थे ।
अगले दिन मैं और मौसा जी मुखिया की चौपाल पर बैठे थे । तभी गाँव के कुंछ लोगों ने अपनी व्यथा सुनानी शुरू कर दी । कहने लगे- रात को हमने पीपल के पेड़ में भूतों की लालटेन जलती देखी थी , खेत में उनके चलने की आवाज भी आ रही थी । हम लोगों ने जब यह नजारा देखा तो भाग खडे हुए और चार मील का रास्ता तय कर दूसरे रास्ते से 11 बजे घर पहुँचे ।
अब तो मेरा हँसते-हँसते बुरा हाल था । मौसा जी भी खूब रस ले-ले कर बात को सुन रहे थे । किसी ने सच ही कहा है कि भय का ही भूत होता है ।
डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
(पूर्व सदस्य-अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,उत्तराखण्ड सरकार)
कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर, पिनकोड- 262 308
फोन/फैक्सः 05943-250207, मोबाइल- 09368499921

‘‘कुम्हार अनुसूचित जाति के वास्तविक हकदार ’’

‘‘कुम्हार अनुसूचित जाति के वास्तविक हकदार ’’
अनुसूचित जाति के यदि पारिभाषिक शब्द पर विचार करें तो दलित वर्ग में आने वाली प्रत्येक जाति अनुसूचित वर्ग में आने की हकदार है । अब प्रश्न उठता है कि क्या कुम्हार जाति दलित वर्ग से सम्बन्ध रखती है ? इसका एक ही उत्तर है ‘‘हाँ’’ ।
प्रजापति समाज अर्थात कुम्हार जाति के व्यक्ति समाज के दलित-शोषत वर्ग के अन्तर्गत ही क्यांे आने चाहिए ? इसके अनेक प्रमाण पाठकों के सामने व्यक्त करना मैं अपना परम कर्तव्य समझता हूँ ।
देश की 80 प्रतिशत जनता ग्रामों में निवास करती है । आप यदि भौगोलिक परिस्थितियों पर गौर करें तो आपने पाया होगा कि पहले गाँव के एक कोने पर वाल्मीकि समाज के व्यक्ति का घर होता था तथा गाँव के दूसरे कोने पर कुम्हार का घर होता था । अर्थात समाज से अलग-थलग पडें हुए यह व्यक्ति होते थे । जबकि बढ़ई, लोहार आदि समाज के लोगें के घर गाँव के मध्य में होते थे । आखिर क्यों यह परम्परा थी ? क्या यह कारण इस समाज का दलित होना परिलक्षित नही करता है ?
मिट्टी के बरतन बनाने वाला कुम्हार समाज के अगड़े वर्ग के लोगों में अपने मिट्टी के बरतन पहुँचाता था । जहाँ उसके बनाये गये पात्रों का विधिवत् पूजन अर्चन पण्डित के द्वारा किया जाता था । बल्कि उसके बनाये कलश (घड़े) में सर्वप्रथम कलावा बाँधा जाता था, उसके बनाये दीपक से भगवान की आरती की जाती थी । लेकिन इन पात्रों के निर्माता कुम्हार कों शामिल भी नही होने दिया जाता था । उसका स्थान कहाँ था ? समाज व देश का संविधान बनाने वाले भली-भाँति जानते हैं परन्तु अनजान हैं, अतः यह बताना आवश्यक ही है कि विवाह-शादी में कुम्हार का स्थान द्वार पर होता था । जहाँ कि वैवाहिक कार्यों में भाग लेने वाले लोगों के जूते-चप्पल उतारे गये होते थे । वहीं पर बैठा यह दलित कुम्हार अपनी गुहार लगाता रहता था कि ‘‘यजमान पारिस (खाना) भिजवा दो, बच्चे भूखे हैं । इससे अधिक दुर्दशा इस समाज की और क्या होगी ? क्या यह कारण इस समाज का दलित होना नही दर्शाता है ।
अब मैं आपको महाराज मनु के युग में ले जाना चाहता हूँ । मनु महाराज ने अपनी मनुस्मृति में लिखा है ‘‘दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। दशध्वजसमो देशो दशवेशसमो नृपः।।’’
(मनुस्मृति 4/85)
अर्थ - दश हत्या के समान चक्र अर्थात् कुम्हार, गाड़ी से आजीविका करनेवाले, दश चक्र के समान धोबी तथा मद्य को निकाल कर बेचनेवाले, दश ध्वज के समान वेश अर्थात वेश्या, भड़ुआ, भांड ,दूसरे की नकल करने वाले और अन्यायी राजा के यहाँ का अन्न अतिथि ग्रहण न करें ।
इस श्लोक के अनुसार तो कुम्हार दलित ही नही अछूत की श्रेणी में भी आते हैं । अतः कुहार जाति को अनुसूचित जाति वर्ग में न रखना सरकार का सरासर अन्याय है ।
अब यदि राजनीतिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो आजादी के बाद से अब तक एक भी प्रजापति समाज अर्थात् कुम्हार जाति का सांसद नही है । बड़े या छोटे किसी भी राजनीतिक दल ने आज तक एक भी कुम्हार जाति के व्यक्ति को देश की सर्वोच्च अदालत यानि संसद में भेजने के लिए टिकट तक नही दिया । यानि आज भी प्रजापति (कुम्हार) जाति राजनीतिक रूप से भी अछूत है । फिर उसके मौलिक अधिकार यानि अनुसूचित जाति में शामिल करने से परहेज क्यों ?
यदि सामाजिक परिवेश की बात करें तो कुम्हार समाज वर्षों से दबा-कुचला हुआ है और आज भी उसके साथ समाज के अगड़े लोगों द्वारा वही व्यवहार किया जा रहा है । देश के कर्णधार/कानूनविद् इस समाज से क्या अपेक्षा करते हैं ? आज यदि प्रजापति समाज अनुसूचित जातिवर्ग में सम्मिलित होने के लिए अपनी आवाज उठाता है तो उसको बलपूर्वक क्यों दबा दिया जाता है ?
इस लेख के माध्यम से मैं प्रजापति समाज को आह्वान करता हूँ कि समाज ने हमें अनुसूचित केवल व्यवहारिक रूप में माना है। कानूनी रूप से नही । अपना अधिकार लेने के लिए प्रजापति समाज को बलिदान तो देना ही होगा ।
 प्रजापति डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
पूर्वसदस्य-उत्तराखण्ड अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,देहरादून। कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर
फोन-(05943)250207, मो0-09368499921

तीन दोहे (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

बेमौसम आँधीं चलें, दुनिया है बेहाल ।
गीतों के दिन लद गये,गायब सुर और ताल ।।

नानक, सूर, कबीर के , छन्द हो गये दूर ।
कर्णभेद संगीत का , युग है अब भरपूर । ।

रामराज का स्वप्न अब, लगता है इतिहास ।
केवल इनके नाम का, राजनीति में वास । ।

स्वागत नव-वर्ष

स्वागत नव-वर्ष
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे । नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे ।
कुछ ने मँहगाई फैलादी, कुछ हैं मँहगाई के मारे ।।

काँपे माता काँपे बिटिया, भरपेट न जिनको भोजन है ।
क्या सरोकार उनको इससे क्या नूतन और पुरातन है ।

सर्दी में फटे वसन फटे सारे । नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे।।

जो इठलाते हैं दौलत पर, वो खूब मनाते नया-साल ।
जो करते श्रम का शीलभंग,वो खूब कमाते द्रव्य-माल ।

वाणी में केवल हैं नारे । नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे ।।

नव-वर्ष निरन्तर आता है,सुख के निर्झर अब तक न बहे।
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने ही दारुण-दुख-दर्द सहे ।।

मक्कारों के वारे-न्यारे । नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे ।।

रोटी-रोजी के संकट में, नही गीत-प्रीत के भाते हैं ।
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं ।।

सब स्वप्न हो गये अंगारे, नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे ।।

टूटा तन मन भी टूटा है, अभिलाषाएँ ही जिन्दा हैं ।
आयेगीं जीवन में बहार, यह सोच रहा कारिन्दा हैं ।।

अब चमकेंगेें अपने तारे, नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे ।।

 प्रजापति डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
पूर्वसदस्य-उत्तराखण्ड अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,देहरादून। कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर

संस्मरण:- ‘‘आर्य समाज: नागार्जुन की दृष्टि में’’ -

संस्मरण:- ‘‘आर्य समाज: नागार्जुन की दृष्टि में’’ -
राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में हिन्दी के विभागाध्यक्ष वाचस्पति शर्मा थे । बाबा नागार्जुन अक्सर उनके यहाँ प्रवास कर लिया करते थे । इस बार भी जून के अन्तिम सप्ताह में बाबा का प्रवास खटीमा में हुआ । दो जुलाई, 1989, महर्षि दयानन्द विद्या मन्दिर टनकपुर में बाबा नागार्जुन के सम्मान में कवि गोष्ठी का आयोजन था । उसमें बाबा ने कहा शास्त्री जी 5,6,7 जुलाई को मैं खटीमा मे आपके घर रहूँगा । प्रातःकाल 5 जुलाई को प्रातःकाल शर्मा जी का बड़ा पुत्र अनिमेष बाबा को मेरे निवास पर पहुँच गया । 6 जुलाई को सुबह बाबा का मनपसन्द नमकीन दलिया नाश्ते में बनाया गया । बाबा जी बड़ ही अच्छे मूड में थे । दलिया भी कुछ गरम था । उसी समय बाबा ने अपने जीवन के बाल्यकाल का संस्मरण सुनाया - ‘‘शास्त्री जी उस समय मेरी आयु 12 या 14 वर्ष की रही होगी । उस समय में संस्कृत विद्यालय बनारस में पढ़ता था । मन में विचार आया कि इलाहाबाद में पं0 गंगाप्रसाद उपाध्याय आर्य समाज के बहुत बड़े कार्यकर्ता हैं, उनसे मिला जाये । उस समय आर्य समाज की बड़ी धूम भी थी । मैंने अपने दो सहपाठी साथ में चलने के तैयार कर लिए तो पदल ही बनारस से इलाहाबाद को चल पड़े । चलते-चलते प्यास लगने लगी । आगे एक गाँव रास्ते में पड़ा तो कुएँ पर गये । पनिहारिनों ने पानी पिलाने से मना कर दिया और कहा भाई तुम पण्डितों के लड़का मालूम होते हो । हम तो नीच जाति की है, हम तुम्हारा धर्म नही बिगाड़ेंगी । प्यास बहुत जोर की लगी थी । हमने बहुत अनुनय-विनय की तो उन्होंने पानी पिलाया । हम तीनों ने ओक से पानी पिया । उसी रास्ते पर एक ऊँट वाला भी जा रहा था । वह आगे-आगे सबसे कहता चला जा रहा था कि भाई पीछे जो तीन ब्राह्मण लड़के आ रहे हैं , इन्होंने दलितों के कुएँ पर पानी पिया है । इनका धर्म भ्रष्ट हो गया है । अतः लोग हमें बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखते । अन्ततः हमने रास्ता छोड़ खेतो की मेढ़-मेढ़ चलना शुरू कर दिया । साथ के देानो सहपाठी तो कष्टोें को देख कर घबरा कर साथ छोड़ कर वापिस चले गये...वगैरा-वगैरा । किसी तरह इलाहाबाद पहुँचा तो पं0 ग्रंगाप्रसाद उपाध्याय का घर पूछा- लोगों ने बताया कि चैक में पंडित जी रहते हैं । खैर पण्डित जी के घर पँहुचा, उनकी श्रीमती जी से कहा बनारस से आया हूँ, पैदल, पण्डित जी से मिलना है । उन्होंने प्यार से भीतर बुलाया, तख्त पर बैठाया और गर्म-गर्म दूध एक कटोरे में ले आयीं । जब मैंने दूध पी लिया तो उन्होंने कहा कि तुम विश्राम करो । पं0 जी शाम को 7 बजे तक आयेंगे । शाम को जब पण्डित जी आये तो बातचीत हुई । उन्होंन कहा कि तुम बहुत थके हो कल सभी बातें विस्तार में होगी और अपनी पत्नी कलावती को आवाज लगाई, कहा कि देखो ये अपने सत्यव्रत जी के ही समान हैं , इनको 3-4 दिन तक खूब खिलाओ-पिलाओ.....वगैरा-वगैरा । 3-4 दिन तक पण्डित जी के यहाँ रहा खूब प्रेम से बाते हुईं । जब विदा हुए तो पण्डित जी, उनकी पत्नी और पुत्र सत्यव्रत रेलगाड़ी पर पहुँचाने आये , टिकट दिलाया । अन्त में उनकी पत्नी ने (उस समय में ) दो रुपये जेब खर्च के लिए दिये । पण्डित जी बोले कि देखो कभी पैदल मत आना । जब भी इच्छा हो टिकट कटा कर रेलगाड़ी से आया करो । उसके पश्चात 2-3 बार पण्डित जी के यहाँ गया व एक - एक सप्ताह ठहरा । अन्त में बाबा नागार्जुन ने बताया कि ‘आर्य समाज बहुत ही अच्छी संस्था है’ परन्तु आजकल पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय सरीखे लोगों की कमी हो गयी है ।’’ साथ ही बताया कि ’’आर्य समाज ऊँचा उठने की प्रथम सीढ़ी है ।’’ 
डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
पूर्वसदस्य-उत्तराखण्ड अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,देहरादून।
कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर फोन नं0-05943-250207, मो0- 09368499921

लघु कथा‘‘हाय री शराब , हाय रे शराबी’’

मई-जून का महीना था । एक बार बस से लखनऊ तक की यात्रा करनी पड़ी । संयोगवश सबसे पीछे की सीट मिली । उसी सीट पर तीन व्यक्ति पीलीभीत से भी सवार हो गये । वे अपने साथ बीयर लेकर आये थे । बस की सीट पर बैठ कर उन्होंने आराम से बीयर पी । आगे की सीट पर भी दो शराबी बैठे हुए थे । वह यह नजारा बड़े यान से देखते रहे । उनकी मुद्रा ऐसी थी कि मन मे पछता रहे हों कि हमने ठण्डी बीयर लेकर क्यों नही पी । अब शाम हो चली थी और अन्धेरा भी होने लगा था । समय यही कोई आठ बजे का रहा होगा। अब बीयर पीने वालों को लघुशंका लगने लगी । उनमें से एक बोला कि ‘‘यार पेशाब जोर से लगा है बस रुकवानी चाहिए ।’’ तभी उनका एक साथी बोला कि ‘‘बस रुकवाने में अनावश्यक देर होगी । अतः क्यों न इन खाली बोतलों का सदुपयोग किया जाये ।’’ बस फिर क्या था, सबने खाली बीयर की बोतलों मे ही लघुशंका कर ली और बोतलों को खिडक़ी से बाहर फेंकने ही जा रहे थे कि आगे वाले शराबी बोले ‘‘ सर क्या बीयर गरम हो गयी है जो इन्हें आप बाहर फेंकना चाह रहे हो ।’’ पीछे वाले व्यक्ति में हाँ में सिर हिलाया ।’’‘‘सर इस बीयर को आप हमें दे दीजिए ।’’आगे वाले शराबी बोले पीछे की सीट वालों ने बोतले उन्हें दे दी । आगे वाले शराबियों ने बोतले खोंलीं और गट-गट कर पी गये । यह नजारा देख कर मैं सन्न रह गया कि ‘‘हाय री शराब और हाय रे शराबी।’’ डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर

अब बसन्त का मौसम आया । (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

पहिन बसन्ती-पीली साड़ी,

फुली सरसों मनभावन है।

गीत और संगीत बसन्ती,

मौसम लोक लुभावन है।

वासन्ती परिधान ओढ़कर,

सूरज ने भी रंग दिखाया।

मुझको यह आभास होगया-

अब बसन्त का मौसम आया ।।


आम, नीम भी बौराए है,

तरुवर नव पल्लव पाये है।

पीपल,गूलर भी हर्षित हैं,

भँवरे गुल पर आकर्षित हैं।

सेमल में भी फूल खिले हैं,

जंगल में ढाका मुस्काया।

मुझको यह आभास होगया-

अब बसन्त का मौसम आया ।।


नील-गगन से छँटा कुहासा,

कोयल मीठे स्वर में गातीं,

हिमगिरि साफ दिखाई देते,

नदिया कल-कल नाद सुनातीं।

हीटर, गीजर बन्द हो गए ,

सरदी ने निज कोप घटाया।

मुझको यह आभास होगया-

अब बसन्त का मौसम आया ।।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

जीवन जीने की आशा है (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन इक खेल तमाशा है,
जीवन जीने की आशा है ।

जिसने जग में जीवन पाया,
आया अदभुत् सा गान लिए।
मुस्कान लिए अरमान लिए,
जग में जीने की शान लिए।
इस बालक से जब यह पूछा,
बतलाओ तो जीवन क्या है?
बोला दुनिया परिभाषा है ,
सारा जीवन एक भाषा है।
जीवन इक खेल तमाशा है,
जीवन जीने की आशा है ।

पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
अपने पथ पर बढ़ते-बढ़ते।
इक नीड़ बसाया जब उसने,
संसार सजाया जब उसने।
तब मैंने उससे यह पूछा-
बतलाओ तो जीवन क्या है?
वह बोला जीवन आशा है,
जीवन तो मधुर सुधा सा है ,
जीवन इक खेल तमाशा है,
जीवन जीने की आशा है ।

कुछ श्वेत-श्याम केशों वाले,
अनुभव के परिवेशों वाले।
अलमस्त पौढ़ और फलवाले,
जीवन बगिया के रखवाले।
बूढ़े बरगद से यह पूछा-
बतलाओ तो जीवन क्या है?
बोला जीवन अभिलाषा है,
जीवन तो एक पिपासा है।
जीवन इक खेल तमाशा है,
जीवन जीने की आशा है ।

जब आनन दन्त-विहीन हुआ,
तन सूख गया, बल क्षीण हुआ।
जब पीत बन गयी हरियाली,
मुरझाई जब डाली-डाली।
फिर मैंने उससे यह पूछा-
अब बतलाओ जीवन क्या है?
तब उसने अपना मुँह खोला,
और क्षीण भरे स्वर में बोला।
जीवन तो बहुत निराशा है।
जीवन तो बहुत जरा सा है।।
जीवन इक खेल तमाशा है,
जीवन जीने की आशा है ।

भारत माँ के मधुर रक्त को,(डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक")

आज देश में उथल-पुथल क्यों,
क्यों हैं भारतवासी आरत?
कहाँ खो गया रामराज्य,
और गाँधी के सपनों का भारत?

आओ मिलकर आज विचारें,
कैसी यह मजबूरी है?
शान्ति वाटिका के सुमनों के,
उर में कैसी दूरी है?

क्यों भारत में बन्धु-बन्धु के,
लहू का आज बना प्यासा?
कहाँ खो गयी कर्णधार की,
मधु रस में भीगी भाषा?

कहाँ गयी सोने की चिड़िया,
भरने दूषित-दूर उड़ाने?
कौन ले गया छीन हमारे,
अधरों की मीठी मुस्काने?

किसने हरण किया गान्धी का,
कहाँ गयी इन्दिरा प्यारी?
प्रजातन्त्र की नगरी की,
क्यों आज दुखी जनता सारी?

कौन राष्ट्र का हनन कर रहा,
माता के अंग काट रहा?
भारत माँ के मधुर रक्त को,
कौन राक्षस चाट रहा?

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