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मंगलवार, 31 मार्च 2009

‘‘.....................बदल जाते हैं।’’ (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

युग के साथ-साथ, सारे हथियार बदल जाते हैं।

नौका खेवन वाले, खेवनहार बदल जाते हैं।

प्यार-मुहब्बत के वादे, सब नही निभा पाते हैं,

नीति-रीति के मानदण्ड, व्यवहार बदल जाते हैं।

‘कंगाली में आटा गीला’, भूख बहुत लगती है,

जीवन यापन करने के, आधार बदल जाते हैं।

जप-तप, ध्यान-योग, केवल, टीवी, सीडी. करते हैं,

पुरुष और महिलाओं के, संसार बदल जाते हैं।

क्षमा, सरलता, धर्म-कर्म ही सच्चे आभूषण हैं,

आपा-धापी में निष्ठा के, तार बदल जाते हैं।

फैशन की अंधी दुनिया ने, नंगापन अपनाया,

बेशर्मी की गफलत में, श्रंगार बदल जाते हैं।

माता-पिता तरसते रहते, अपनापन पाने को,

चार दिनों में बेटों के, घर-द्वार बदल जाते हैं।

भइया बने पड़ोसी, वैरी बने जिन्दगी भर को,

भाई-भाई के रिश्ते औऱ, प्यार बदल जाते हैं।

"आ जाओ अब तो पास प्रिये!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



मन मेरा बहुत उदास प्रिये!


आ जाओ अब तो पास प्रिये!



मेरे वीराने मधुवन में,


सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?


जीवन पथ पर आगे बढ़ना,


बोलो मुझको सिखलाया क्यों?


अपनी साँसों के चन्दन से,


मेरे मन को महकाया क्यों?


तुम बन जाओ मधुमास प्रिये!


आ जाओ अब तो पास प्रिये!



मन में सोई चिंगारी को,


ज्वाला बनकर भड़काया क्यो?


मधुरिम बातों में उलझा कर,


मुझको इतना तडपाया क्यों?


सुन लो आकर अरदास प्रिये!


आ जाओ अब तो पास प्रिये!



सपनों मे मेरे आ करके,


जीवन दर्शन सिखलाया क्यों?


नयनों में मेरे छा करके,


जगमग नभ को दिखलाया क्यों?


कर लो अब तो विश्वास प्रिये।


आ जाओ अब तो पास प्रिये!!


सोमवार, 30 मार्च 2009

गुरूसहाय भटनागर बदनाम का एक गजल - प्रस्तुति- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

स्मानी शायर गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’

दर्द के वर्क पर



दर्द के वर्क पर गीत हमने लिखे,


रोज़ ही हम उन्हें गुनगुनाते रहे।


गाहे आबादियाँ गाहे बीरानियाँ,


उनसे मिलने की यादें सजाते रहे।


नाम लिख-लिख के उनका हर रोज ही,


अपने दिल में उन्हें हम बसाते रहे।


उनकी खुश्यिों की खातिर कहाँ से कहाँ,


मंजिलों में भी महफिल सजाते रहे।


चल दिये छोड़ कर साथ कुछ इस तरह,


जिन्दगी भर हमें याद आते रहे।


बन के ‘बदनाम’ ओढ़ी है रूसवाइयाँ,


वो हमें हम उन्हें याद आते रहे।।

‘‘बरगद का वृक्ष’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)






हमारे पूर्वजों ने,


बरगद का एक वृक्ष लगाया था,


आदर्शों के ऊँचे चबूतरे पर,


इसको सजाया था।


कुछ ही समय में,


यह देने लगा शीतल छाया,


परन्तु हमको,


यह फूटी आँख भी नही भाया।


इसकी शीतल छाया में,


हम बिल्कुल ही डूब गये,


और जल्दी ही,


सारे सुखों से ऊब गये।


हमने काट डाली,


इसकी एक बड़ी साख,


और अपने नापाक इरादों से,


बना डाला एक पाक।


हम अब भी लगे हैं,


इस पेड़ को काटने में,


अपने पापी इरादों से,


लगें है दिलों को बाँटने में।


हे बूढ़े वृक्ष बरगद!


तूने हमारी हमेशा,


धूप और गर्मी से रक्षा की,


और हमने तेरी,


हर तरह से उपेक्षा की।


क्या तुझको आभास नही था,


परिवार में वृद्ध की,


यही होती गति है,


बूढ़े बरगद!


आज तेरी भी,


यही नियति है।।


चाल-बाजी की भी सीमाएँ होती हैं। (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

चाल-बाजी की भी सीमाएँ होती हैं। परन्तु मेरा वास्ता एक ऐसे चालबाज से पड़ा था। जिसने जाल-साजी की सभी हदें पार कर ली थी।

मेरे एक कवि मित्र थे-श्रीमान वैद्य जी! उनका पूरा नाम लिखना तो इस स्वर्गवासी की आत्मा को ठेस पहुँचाना ही होगा। इसलिए सिर्फ वैद्य जी के नाम से ही काम चला लेता हूँ। ये महाशय जाल-साजी की एक जीती-जागती मिसाल थे।

वाकया 1987-88 का है। उन दिनों उ0प्र0 में कांग्रेस का शासन था। पं0 नारायण दत्त तिवारी उन दिनो यहाँ के मुख्यमन्त्री हुआ करते थे। जो मुझे बहुत पसन्द करते थे।

वैद्य जी भी कांग्रेस के नेता अपने आप को कहते थे। और पं0 नाराणदत्त तिवारी जी को अपना कथित लंगोटिया यार कहते थे। क्योंकि ये अपनी डींग मारने में नम्बर एक के थे। इसलिए लोगों ने इनकी बात को कुछ हद तक सही भी मान लिया था।

किस्मत की बात कि कुछ शिक्षित बे-रोजगारों को नौकरी दिलाने के लिए इन्होंने अपने जाल में फाँस लिया था। जिनकी संख्या दस थी।

हर एक से इन्होंने पाँच-पाँच हजार रुपये ऐंठ लिये थे। उन दिनों पचास हजार रुपये एक अच्छी-खासी मोटी रकम मानी जाती थी।

अब ठगे गये व्यक्तियों को इनके घर के चक्कर तो लगाने ही थे। इनका कोई घर द्वार तो था ही नही। एक कमरे को किराये पर ले रखा था। उसी में अपनी धर्मपत्नी के साथ रहते थे। कविता सुनाने के बहाने से अक्सर मेरे पास बैठे रहते थे।

तभी कुछ लोग इनको ढूंढते हुए खटीमा आ गये।

इनका पता पूछा तो लोगों ने बताया- ‘‘वो शास्त्री जी के पास ज्यादातर बैठते हैं।’’

अतः वे लोग मेरे घर ही आ गये। वैद्य जी भी मेरे पास ही बैठे थे। वे यहीं पर उनसे बात करने लगे। वैद्य जी उनको पहाड़ा पढ़ाते रहे।

उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा- ‘‘वैद्य जी आपका घर कौन सा है?’’

वैद्य जी ने उत्तर दिया- ‘‘यही तो मेरा घर है। ये मेरे छोटे भाई हैं। इनके पिता जी वो जो चारपाई पर बैठे हैं। मेरे चाचा जी हैं।’’

वैद्य जी की बात सुन कर, अब मेरे चौंकने की बारी थी।

उस समय बाबा नागार्जुन तो मेरे पास नही थे। जो इनको खरी खोटी सुनाते।

हाँ, मेरी माता जी यह सब सुन रही थीं।

वे उठ कर आयीं और वैद्य जी का हाथ पकड़ कर कहा- ‘‘वैद्य के बच्चे! उठ तो सही यहाँ से। तेरे कौन से बाप ने ये घर बनाया है? न जात न बिरादरी, बड़ा आया अपना घर बताने।’’

अब तो वैद्य जी की की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी।

वो अपने इन लोगों को लेकर चुपचाप उठ गये और कहने लगे- ‘‘चाची जी का स्वभाव तेज है, आओ- बाहर चल कर बाते करते हैं।’’

शेष अगली कड़ी में-..............................।

रविवार, 29 मार्च 2009

‘प्रियवर निन्दक’ के अनुरोध पर


अपने एक अन्तरंग युवा मित्र


‘प्रियवर निन्दक’ के अनुरोध पर


मैंने उसके गद्य में लिखे भावों को


केवल कुछ पंक्तियों में बाँधा है।


‘मधुरिमा’ ने उसके भाव पढ़ लिए होंगे।






जिन्दगी में सुमन, सुन्दर खिल गये हैं,


जब से मन के तार,उनसे मिल गये हैं।


लाल, पीले, हरे रंग, भाने लगे हैं,


स्वप्न सुख के नयन में, छाने लगे हैं।


शब्द का संसार, अधरों में समाया है,


जबसे उनसे अपना दिल मैंने मिलाया है।


भाव सब परिकल्पना, में खो गये हैं,


अब प्रिये! हम तो तुम्हारे हो गये हैं।


वन्दना, आराधना और प्यार से,


गुल महकता है बड़ी मनुहार से।



प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें। (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




वन्दना, आराधना उपहार की बातें करें।।

प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।



नेह की लेकर मथानी, सिन्धु का मन्थन करें,


छोड़ कर छल-छद्म, कुछ उपकार की बातें करें।


प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।



आस का अंकुर उगाओ, दीप खुशियों के जलें,


प्रीत का संसार है, संसार की बातें करें।


प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।



भावनाओं के नगर में, छेड़ दो वीणा के सुर,


घर सजायें स्वर्ग सा, मनुहार की बातें करें।


प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।



कदम आगे तो बढ़ाओ, सामने मंजिल खड़ी,


जीत के माहौल में, क्यों हार की बातें करें।


प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।


शनिवार, 28 मार्च 2009

प्यार करने का जमाना आ गया है। (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)







हसरतें छूने लगी आकाश को,


पत्थरों को गीत गाना आ गया है।



मूक स्वर थे कण्ठ भी अवरुद्ध था,


वन्दना में सुर सजाना आ गया है।



लक्ष्य मुश्किल था बहुत ही दूर था,


साधना मुझको निशाना आ गया है।



मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े,


अब गुलों को चहचहाना आ गया है।



हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े,


साथ उनको भी निभाना आ गया है।



जिन्दगी के जख्म सारे भर गये,


प्यार करने का जमाना आ गया है।


नैनीताल व हरिद्वार की संसदीय सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गयी हैं? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)




चित्र में- पं0 नारायणदत्त तिवारी जी के साथ डा0 के0डी0 पाण्डेय तथा डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री।

क्या उत्तराखण्ड के हरिद्वार और नैनीताल-ऊधमसिंहनगर की संसदीय सीट भा0ज0पा0 की झोली में जाने वाली हैं?


मैं कोई भविष्यवक्ता या नजूमी नही हूँ। लेकिन आकलन तो कर ही सकता हूँ।


पहले हरिद्वार संसदीय सीट की चर्चा करता हूँ। हरिद्वार भा0ज0पा0 का गढ़ माना जाता रहा है। यहाँ से भा0ज0पा0 ने अपना प्रत्याशी स्वामी चिन्मयानन्द को बनाया है। जब तक कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार इस सीट पर घोषित नही किया था तब तक तो यह आँकड़ा लगाया जा रहा था कि यह सीट उसकी झोली में से निकल गयी है। क्योंकि इस सीट पर स्वामी चिन्मयानन्द के मुकाबले मदन कौशिक अधिक लोकप्रिय माने जाते थे। वे इस समय उत्तराखण्ड सरकार में शिक्षामन्त्री भी हैं और उनकी दावेदारी भी मजबूत थी। लेकिन हाई कमान ने उन्हें टिकट नही दिया।


अब बारी कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित करने की थी। सो उसने हरीश चन्द्र सिंह रावत के नाम की घोषणा करके यह सीट शायद भा0ज0पा0 को दान में दे दी है।


हरीश रावत के अब तक के आँकड़ों पर नजर डाली जाये तो पता लगता है कि वे अपने गृह जनपद अल्मौड़ा से भी कई बार अपनी सीट बरकरार रखने में असफल साबित हुए हैं। ऐसे में हरिद्वार सीट पर वे विजयी हो सकेंगे। यह तो समय ही बतायेगा।


अब नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय सीट पर नजर डालें तो यह सदैव से ही पं0 नारायणदत्त तिवारी का क्षेत्र रहा है । श्री तिवारी इस सीट पर कई बार विजयी हुए हैं। यद्यपि इस सीट पर टिकट प्राप्त कर चुके श्री के0सी0 सिंह बाबा सिटिंग एम0पी0 हैं। लेकिन जिस समय वे सांसद चुने गये थे । उस समय प्रदेश में कांग्रेस का शासन था और इसके मुखिया पं0 नारायणदत्त तिवारी थे। लेकिन वर्तमान समय में यहाँ भा0ज0पा0 का शासन है। भा0ज0पा0 ने इस सीट से उत्तराखण्ड भा0ज0पा0 के अध्यक्ष श्री बचीसिंह रावत का टिकट पक्का किया है।


यदि इस सीट पर कांग्रेस यहाँ के दिग्गज और वर्तमान में आंध्र-प्रदेश के राज्यपाल पं0 नारायणदत्त तिवारी को अपना प्रत्याशी बना देती तो उसे बिना किसी परिश्रम के यह सीट हाँसिल हो सकती थी।


इसके बाद यदि लोक प्रियता के मापदण्ड पर कोई प्रत्याशी खरा उतर सकता था तो वह पूर्व सांसद डाॅ0 महेन्द्र सिंह पाल हो सकते थे। जो भा0ज0पा0 के बची सिंह रावत को कड़ी टक्कर दे सकते थे।


जहाँ तक के0सी0सिंह बाबा का प्रश्न है वह एक नेक व्यक्ति हैं। परन्तु उनकी लोकप्रियता केवल काशीपुर तक ही सिमट कर रह जाती है। वे वर्तमान में सांसद अवश्य है। पर लोगों को उनसे यह शिकायत है कि वे काशीपुर से बाहर निकलते तक नही हैं। यहाँ तक कि वे पार्टी के कार्यकर्ताओं तक को भी नही पहचानते हैं। अब केवल उंगलियों पर गिने जाने वाले कार्यकर्ताओं के भरोसे तो उनकी नैया पार होने से रही।


अतः समझा यही जा रहा है कि कांग्रेस ने नैनीताल व हरिद्वार की सीटें भा0ज0पा0 को दान कर दीं हैं। यह तो आने वाला कल ही बता पायेगा कि कांग्रेस किस प्रकार इन सीटों पर अपनी साख बचा पाती है।


‘‘समय का फेर’’ - (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



पहले का आदमी कर्मशील था,
कहलाता था निष्कामी।
आज का आदमी अकर्मण्य है,
और कहलाता है कामी।

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

‘‘अच्छा साहित्यकार बनने से पहले अच्छा व्यक्ति बनना बहुत जरूरी है’’-बाबा नागार्जुन। (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



चित्र में- (बालक) मेरा छोटा पुत्र विनीत, मेरे कन्धें पर हाथ रखे बाबा नागार्जुन
और चाय वाले भट्ट जी, पीछे-बीस वर्ष पूर्व का खटीमा बस स्टेशन।



बाबा नागार्जुन की तो इतनी स्मृतियाँ मेरे मन व मस्तिष्क में भरी पड़ी हैं कि एक संस्मरण लिखता हूँ तो दूसरा याद हो आता है।

मेरे व वाचस्पति जी के एक चाटुकार मित्र थे। जो वैद्य जी के नाम से मशहूर थे। वे अपने नाम के आगे ‘निराश’ लिखते थे। अच्छे शायर माने जाते थे। आजकल तो दिवंगत हैं। परन्तु धोखा-धड़ी और झूठ का व्यापार इतनी सफाई व सहजता से करते थे कि पहली बार में तो कितना ही चतुर व्यक्ति क्यों न हो उनके जाल में फँस ही जाता था।

उन दिनों बाबा का प्रवास खटीमा में ही था। वाचस्पति जी हिन्दी के प्राध्यापक थे। इसलिए विभिन्न कालेजों की हिन्दी विषय की कापी उनके पास मूल्यांकन के लिए आती थीं। उन दिनों चाँदपुर के कालेज की कापियाँ उनके पास आयी हुईं थी।

तभी की बात है कि दिन में लगभग 2 बजे एक सज्जन वाचस्पति जी का घर पूछ रहे थे। उन्हें वैद्य जी टकरा गये। और राजीव बर्तन स्टोर पर बैठ कर उससे बातें करने लगे। बातों-बातों में यह निष्कर्ष निकला कि उनके पुत्र का हिन्दी का प्रश्नपत्र अच्छा नही गया था। इसलिए वो उसके नम्बर बढ़वाने के लिए किन्ही वाचस्पति प्रोफेसर के यहाँ आये हैं।

वैद्य जी ने छूटते ही कहा- "प्रोफेसर वाचस्पति तो मेरे बड़े अच्छे मित्र हैं। लेकिन वो एक नम्बर बढ़ाने के एक सौ रुपये लेते हैं। आपको जितने नम्बर बढ़वाने हों हिसाब लगा कर उतने रुपये दे दीजिए।"

बर्तन वाला राजीव यह सब सुन रहा था। उसकी दूकान के ऊपर ही वाचस्पति जी का निवास था और वह उनका भक्त था।

राजीव चुपके से अपनी दूकान से उठा और वाचस्पति जी से जाकर बोला- ‘‘सर जी! आप भी 100 रु0 नम्बर के हिसाब से ही परीक्षा में नम्बर बढ़ा देते हैं क्या?’’ और उसने अपनी दुकान पर हुई पूरी घटना बता दी।

वाचस्पति जी ने राजीव से कहा- "जब वैद्य जी! चाँदपुर से आये व्यक्ति का पीछा छोढ़ दें, तो उस व्यक्ति को मेरे पास बुला लाना।"

इधर बैद्य जी ने 10 अंक बढ़वाने के लिए चाँदपुर वाले व्यक्ति से एक हजार रुपये ऐंठ लिए थे।

बाबा नागार्जुन भी राजीव और वाचस्पति जी की बातें ध्यान से सुन रहे थे।

थोड़ी ही देर में वैद्य जी वाचस्पति जी के घर आ धमके। इसी की आशा हम लोग कर रहे थे। पहले तो औपचारिकता की बातें होती रहीं। फिर वैद्य जी असली मुद्दे पर आ गये।

वाचस्पति जी ने कहा- ‘‘वैद्य जी मैं यह व्यापार नही करता हूँ।’’

तब तक राजीव चाँदपुर वाले व्यक्ति को भी लेकर आ गया। हम लोग तो वैद्य जी से कुछ बोले नही।

परन्तु बाबा नागार्जुन ने वैद्य जी की क्लास लेनी शुरू कर दी। सभ्यता के दायरे में जो कुछ भी कहा जा सकता था बाबा ने खरी-खोटी के रूप में वो सब कुछ वैद्य जी को सुनाया।

अब बाबा ने चाँदपुर वाले व्यक्ति से पूछा- ‘‘आपसे इस दुष्ट ने कुछ लिया तो नही है।’’

तब 1000 रुपये वाली बात सामने आयी।

बाबा ने जब तक उस व्यक्ति के रुपये वैद्य जी से वापिस नही करवा दिये तब तक वैद्य जी का पीछा नही छोड़ा।

बाबा ने उनसे कहा- ‘‘वैद्य जी अब तो यह आभास हो रहा है कि तुम जो कविताएँ सुनाते हो वह भी कहीं से पार की हुईं ही होंगी। साथ ही वैद्य जी को हिदायत देते हुए कहा कि "अच्छा साहित्यकार बनने से पहले अच्छा व्यक्ति बनना बहुत जरूरी है।"

‘‘स्वागत है नव-सम्वत्सर का’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





मंजुल पुष्पों की गन्धों से, महकें जीवन बन चन्दन।


नव-सम्वत्सर का हम, करते हैं स्वागत-अभिनन्दन।।



पावन वसुन्धरा पर सुख की, हरियाली छा जायें।


समय-समय पर मेघ-घटा, जल और अन्न बरसायें।।



प्रेम-एकता, सत्य-शान्ति की, निर्मल धारा सदा बहे।


असत्य-हिंसा, वैर-भाव, नही कभी किसी के पास रहे।।



आड़ धर्म की लेकर, भारत में नही कोई दंगा हो।


जन,गण,मन हो वैभवशाली, कोई न भूखा-नंगा हो।।



प्यार करें भारत-माता को, जो भी यहाँ निवासी हैं।


याद रहे यह सबसे पहले, हम भारत के वासी हैं।।



कभी ठेस नही पहुँचाना, महापुरुषों की अभिलाषा को।


सब धर्मों का मान करें, और प्यार करें भाषा को।।



लेकिन याद सदा ये रखना, अपनी भाषा हिन्दी है।


भारत माता के माथे की, ये ही पावन बिन्दी है।।



मंगलदायी सम्वत्सर हो, छाया सुखद सवेरा हो।


उर में हों उर्वशी उमंगें, सुख का सघन बसेरा हो।।



गुरुवार, 26 मार्च 2009

निर्वाचन (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)




भारत की महानता का, नही है अतीत याद,

वोट माँगने को, अभिनेता को बुलाया है।

देश का कहाँ है ध्यान, होता नित्य सुरापान,

जाति, धर्म, प्रान्त जैसे, मुद्दों को भुनाया है।

आज युवराज चल पड़े, गलियों की ओर-

निर्वाचन के दौर ने, ये दिन भी दिखाया है।



"तुम तो अखबार पढ़ना भी नही जानते" - बाबा नागार्जुन! (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



मेरी 6 जुलाई 1989 की सुबह, बाबा नागार्जुन की से डाँट से शरू हुई। प्रातःकाल अखबार बाँटने वाला नित्य की तरह अखबार डाल कर गया। मैं अखबार पढ़ने लगा।
बाबा भी पास ही बैठे थे। मैंने पाँच मिनट में सुर्खियाँ देख कर अखबार रख दिया ।
बाबा बोले- ‘‘शास्त्री जी! आपने अखबार पढ़ लिया।’’
मैंने कहा- ‘‘जी बाबा !
‘‘बाबा ने कहा- ‘‘आपको अखबार भी ढंग से पढ़ना नही आता।‘‘
मैंने उत्तर दिया- ‘‘बाबा आप ये क्या कह रहे हैं? अखबार कैसे पढ़ूँ ? आप ही बता दीजिए।’’
बाबा बोले - ‘‘देखो सबसे पहले समाचार पत्र में जो चित्र छपे होते हैं। उनको देखना जरूरी होता है। उसके बाद ही सुर्खियाँ पढ़ी जाती हैं। आपने तो सरसरी नजर से सिर्फ हेड-लाइन्स पढ़ जी और अखबार का काम तमाम कर दिया।’’
बाबा ने कहा- ‘‘मुझे भी इस अखबार की कुछ खबरें सुनाओ।’’
मैंने उन्हें समाचार पत्र पढ़कर सुनाना शुरू कर दिया। बाबा की नजर उम्र के इस पड़ाव में जवाब दे चुकीं थी। इसलिए वे मैग्नेफाइंग-ग्लास से ही थोड़ा-बहुत लिख पढ लेते थे।
बाबा ने अपने हाथ में मैग्नेफाइंग-ग्लास पकड़ा हुआ था।
सबसे पहले उन्होंने अखबार में छपे चित्रों को देखा और उसके नीचे लिखा विवरण मुझसे सुना।
अब बाबा को पूरा अखबार सुनाना था। मैंने अखबार सुनाना शुरू किया। सबसे पहले हत्या और लूट-पाट की एक बड़ी खबर लगी थी।
बाबा ने अनमने ढंग उसे सुना। इसके बाद स्थानीय खबरें थीं। बाबा ने उन्हे भी सुनना पसन्द नही किया। अब गैंग-रेप की एक घटना थी।
बाबा ने कहा- आगे बढ़ो।
बाबा नागार्जुन ने कौन सी खबरें पसन्द कीं थी । यही मैं बताने जा रहा हूँ।
अखबार के बीच में एक पन्ना होता है, जिसमें सम्पादकीय होता हैं।
पहले तो बाबा ने उसे सुना। उसके बाद इस पन्ने पर राजनीतिज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने जो कुछ लिखा था। वो सब बाबा ने सुना। जिसे कि कुछ ही लोग पढ़ते हैं।
बाबा ने मुझे समझाया- ‘‘शास्त्री जी अखबार पढ़ने का यही सही तरीका है। जब एक रुपया खर्च कर रहे हो तो ढाई आने की बात क्यों पढते हो? पूरे रुपये का मजा लो। एक बात ध्यान में सदैव रखना कि अखबार मनोरंजन का ही साधन नही है। यह ज्ञानवर्धन का साधन भी है।’’

बुधवार, 25 मार्च 2009

बाबा नागार्जुन का एक रूप ऐसा भी- (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)


चित्र में- (खड़े हुए) टीकाराम पाण्डेय एकाकी

डा0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, बाबा नागार्जुन, देवदत्त प्रसून (चारपाई पर बैठे हुए)



इस संस्मरण को लिखने का मेरा उद्देश्य है कि बाबा नागार्जुन के मन में कहीं यह जरूर छिपा हुआ था कि देश के भावी कर्णधार शिक्षित हों। भारत अन्य देशों की तुलना में शिक्षा में पिछड़ा हुआ न हो। साथ ही विद्यार्थियों को इससे प्रेरणा भी मिले कि उन्हें परीक्षा में प्रथम-श्रेणी उत्तीर्ण होना चाहिए। शायद यही प्रेरणा उस महान विभूति की थी कि मेरा बड़ा पुत्र हाई-स्कूल के बाद इण्टर में भी प्रथम श्रेणी मे ही पास हुआ।


आज बाबा को साथ लेकर जाना था पीलीभीत जिले के मझोला कस्बे में। मझोला कस्बे में को-आपरेटिव शुगर फैक्ट्री में एक साहित्य विभाग भी था। यह विभाग बनवाने में पीलीभीत के महान साहित्य-सेवी स्व0 रोशन लाल शर्मा का योगदान था। इसके पीछे उनकी यह सोच थी कि इससे किसी गरीब साहित्यकार के बच्चों और उसके परिवार का पेट-पालन होगा और दूसरी बात यह थी कि फैक्ट्री की स्टेशनरी की खरीद-फरोख्त, उसकी प्रिंटिंग तथा पत्र पत्रिकाओं में फैक्ट्री के विरुद्ध या अनुकूल जो कुछ छप रहा है, उस पर दृष्टि रखना व उसका जवाब देना।


इसी शुगर फैक्ट्री में एक मदन विरक्त भी थे। उन दिनों वे इसके साहित्य विभाग में सम्पादक के पद पर नियुक्त थे। वे बाबा से बहुत लगाव रखते थे। एक दिन वे भी बाबा से मिलने के लिए आये। बाबा से बतियाते रहे और मझोला शुगर फैक्ट्री में कवि-गोष्ठी आयोजित करने के लिए बाबा से अनुमति ले ली।


रविवार के दिन मझोला शुगर फैक्ट्री के गेस्ट-हाउस में गोष्ठी निश्चित हो गयी। बाबा के सुझाव पर गोष्ठी भी ऐसी वैसी नही उच्च-कोटि की रखी गयी। बाबा ने कहा था कि गोष्ठी में क्षेत्र के उन सभी विद्यार्थियों को बुलाना है जिन्होंने 10वीं या 12वीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी प्राप्त की हो। बस अपनी मार्क-शीट की फोटो स्टेट कापी जमा करनी होगी। शुगर फैक्ट्री की ओर से इन सब विद्यार्थियों को पुरस्कार भी बाबा के ही कर-कमलों से दिलवाया गया। मेरे ज्येष्ठ-पुत्र नितिन को भी हाई-स्कूल में प्रथम श्रेणी लाने पर एक कांस्य मैडल व प्रमाण पत्र बाबा के कर कमलों से दिया गया था।


गोष्ठी में टीकाराम पाण्डेय एकाकी, देवदत्त प्रसून, वाचस्पति जी, डा0 शम्भू शरण अवस्थी, गेन्दालाल शर्मा निर्जन, डा।रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, ध्रुव सिंह धु्रव, रवीन्द्र पपीहा, रामदेव आर्य, मदन विरक्त, फैक्ट्री के तत्कालीन प्रशासक (जिलाधिकारी-पीलीभीत),विजय कुमार, खूबसिंह विकल, अम्बरीश कुमार आदि ने भाग लिया।


गोष्ठी के संयोजक मदन विरक्त ने तो -

‘‘वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।

पत्नी उस वीर की हूँ, शस्त्र जिसका गहना।’’

का सस्वर पाठ किया। जिसकी बाबा ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।


इसके बाद बाबा ने अपनी रचना ‘अकाल और उसके बाद’


कई दिनो तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास,

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास,

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त,

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकश्त।


दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद,

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद,

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद,

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

का पाठ किया और इसकी एक-एक लाइन की व्याख्या करके सुनाई।



मंगलवार, 24 मार्च 2009

बाबा नागार्जुन-एक झलक! (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



बाबा नागार्जुन जुलाई 1989 के प्रथम सप्ताह में 5 जुलाई से 8 जुलाई तक मेरे घर में रहे। मेरे दोनो पुत्रों नितिन और विनीत के तो मजे ही आ गये। बाबा उनसे खूब बातें किया करते थे। कुछ प्रेरणा देने वाली कहानियाँ भी उन्हें सुना ही देते थे।


दिन में सोना तो बाबा का रोज का नियम था। दो-पहर को वे डेढ़-दो बजे सो जाते थे और शाम को साढ़े चार बजे तक उठ जाते थे। इसके बाद वो मेरे पिता जी से काफी बातें करते थे। दोनों की बातें घण्टों चलतीं थी।



खटीमा में जुलाई का मौसम उमस भर गर्मी का होता है और अचानक बारिस भी हो जाती है। बाबा को बारिस को देखना बड़ा अच्छा लगता था। वह घण्टों मेरे घर के बरांडे में बिछी हुई खाट बैठे रहते थे और बारिस को देखते रहते थे। हम लोग कहते थे बाबा बहुत देर से बैठे हो थोड़ा आराम कर लो। तो बाबा कहते थे कि मुझे बारिस देखना अच्छा लगता है।


बाबा को 8 जुलाई को शाम को 5 बजे मेरे दोनों पुत्र और मेरे पिता जी वाचस्पति जी के घर तक पहुँचाने के लिए गये। उसी समय का एक चित्र प्रकाशित कर रहा हूँ। जिसमें मेरे पिता श्री घासीराम जी, बड़ा पुत्र नितिन और बाबा नागार्जुन ने छोटे पुत्र विनीत के कन्धे पर हाथ रखा हुआ है।

बाबा की प्रवृत्ति तो शुरू से ही एक घुमक्कड़ की रही है। दिल्ली जाने के बाद बाबा ने मुझे एक पत्र लिखा था। जिसमें पिथौरागढ़ और शाहजहाँपुर जाने का जिक्र किया है। वो पोस्ट-कार्ड भी मैं प्रकाशित कर रहा हूँ।


बाबा नागार्जुन की स्मृति में उनकी एक रचना भी प्रस्तुत कर रहा हूँ। जो आजकल के चुनावी परिवेश में बिल्कुल खरी उतरती है।


आए दिन बहार के!‘

श्वेत-श्याम-रतनार’ अँखिया निहार के,


सिंडकेटी प्रभुओं की पग-धूर-झार के,


खिलें हैं दाँत ज्यों दाने अनार के,


आए दिन बहार के!


बन गया निजी काम-



दिखायेंगे और अन्न दान के, उधार के,



टल गये संकट यू. पी.-बिहार के,



लौटे टिकट मार के!



आए दिन बहार के!





सपने दिखे कार के,



गगन-विहार के,



सीखेंगे नखरे, समुन्दर-पार के,


लौटे टिकट मार के!


आए दिन बहार के!


इतने स्वाभिमानी थे बाबा नागार्जुन। (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)




नैनीताल जनपद तथा आस-पास के क्षेत्र के सात्यिकारों को अखबारों से जब यह पता लगा कि बाबा नागार्जुन खटीमा आये हुए हैं तो मेरे तथा वाचस्पति जी के पास उनके फोन आने लगे।

हम लोगों ने भी सोचा कि बाबा के सम्मान में एक कवि-गोष्ठी ही कर ली जाये।


चित्र में धर्मशाला, खटीमा में 9 जुलाई,1989 को सम्पन्न
कवि गोष्ठी के चित्र में-गम्भीर सिंह पालनी, जवाहरलाल वर्मा,
दिनेश भट्ट, बल्लीसिंह चीमा, वाचस्पति, कविता पाठ करते हुए
ठा.गिरिराज सिंह, बाबा नागार्जुन तथा ‘डा. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक’

अतः 9 जलाई 1989 की तारीख, समय दिन में 2 बजे का और स्थान सनातन धर्मशाला का सभागार निश्चित कर लिया गया।

उन दिनों ठा0 गिरिराज सिंह नैनीताल जिला को-आपरेटिव बैंक के महाप्रबन्धक थे। वो एक बड़े साहित्यकार माने जाते थे। जब उनको इस गोष्ठी की सूचना अखबारों के माध्यम से मिली तो वह भी बाबा से मिलने के लिए पहुँच गये।

सनातन धर्मशाला , खटीमा में गोष्ठी शुरू हो गयी। जिसकी अध्यक्षता ठा. गिरिराज सिंह ने की। बाबा को मुख्य अतिथि बनाया गया। इस अवसर पर कथाकार गम्भीर सिंह पालनी, गजल नवोदित हस्ताक्षर बल्ली सिंह चीमा, जवाहर लाल वर्मा, दिनेश भट्ट,देवदत्त प्रसून, हास्य-व्यंग के कवि गेंदालाल शर्मा निर्जन, टीका राम पाण्डेय एकाकी,रामसनेही भारद्वाज स्नेही, डा. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, भारत ग्राम समाचार के सम्पादक मदन विरक्त, केशव भार्गव निर्दोष आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। गोष्ठी का संचालन राजकीय महाविद्यालय, खटीमा के हिन्दी के प्राध्यापक वाचस्पति ने किया।

इस अवसर पर साहित्य शारदा मंच, खटीमा को अध्यक्ष होने के नाते मैंने ओढ़ा कर साहित्य-स्नेही की मानद उपाधि से अलंकृत भी किया था।

उन दिनों मैं हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की स्थायी समिति का सदस्य था। सम्मेलन के प्रधानमन्त्री श्री श्रीधर शास्त्री से मेरी घनिष्ठता अधिक थी। मैंने उन्हें भी बाबा नागार्जुन के खटीमा में होने की सूचना दे दी थी। उनका उत्तर आया कि बाबा को 14 सितम्बर, हिन्दी दिवस के अवसर पर प्रयाग ले आओ। सम्मेलन की ओर से उन्हें सम्मानित कर देंगे।

मैंने बाबा के सामने श्रीधर शास्त्री जी का प्रस्ताव रख दिया। बाबा ने अनसुना कर दिया। मैंने बाबा को फिर याद दिलाया। अब तो बाबा का रूप देखने वाला था।

वह बोले-‘‘श्रीधर जी से कह देना कि मैं उनका वेतन भोगी दास नही हूँ। उन्हें ससम्मान मुझे स्वयं ही आमन्त्रित करना चाहिए था।’’

मैंने बाबा को बहुत समझाया परन्तु बाबा ने एक बार जो कह दिया वह तो अटल था। इतने स्वाभिमानी थे बाबा।

सोमवार, 23 मार्च 2009

बाबा नागार्जुन को मैंने लिखते हुए भी देखा है। (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



चित्र में- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री, स्कूटर पर हाथ रखे बाबा नागार्जुन,
मेरी माता जी, मेरी श्रीमती अमर भारती और छोटा पुत्र विनीत।

बाबा नागार्जुन, अपने दिल्ली के पड़ोसी मित्र और जाने-माने चित्रकार और कवर डिजाइनर हरिपाल त्यागी के साथ खटीमा महाविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष वाचस्पति शर्मा के यहाँ आये हुए थे। वाचस्पति जी मेरे अभिन्न मित्रों में से थे। इसलिए बाबा जी मुझे भी बड़ा प्यार करने लगे।

अब हरिपाल त्यागी जी बातें हुईं तो पता लगा कि वे तो मेरे शहर नजीबाबाद के पास के गाँव महुआ के ही मूल निवासी निकले। बातों ही बातों में उन्होंने कहा कि मेरे भतीजे रूपचन्द त्यागी तो नजीबाबाद के ही किसी इण्टर कालेज में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे।

जब रूपचन्द त्यागी की बात चली तो मैंने उन्हें बताया कि उन्होंने तो मुझे इण्टर में अंग्रेजी पढ़ाई है। फिर मैंने उनसे पूछा कि अशोक त्यागी आपके कौन हुए। उन्होंने बताया कि वह मेरा पोता है और रूपचन्द त्यागी का सगा भतीजा है। मैंने कहा कि वो मेरा क्लास-फैलो था और मेरा सबसे अच्छा मित्र था।

दो मिनट के बाद त्यागी जी ने मुझे एक रेखा-चित्र दिखाया और कहा- ‘‘शास्त्री जी! ये आप ही हैं।’’ वो रेखा चित्र-अगले किसी संस्मरण में प्रकाशित करूँगा। उसके बाद बाबा से बातें होने लगी।

बाबा ने कहा- ‘‘शास्त्री जी! मैं आपके घर परसों आऊँगा।’’

ठीक 2 दिन बाद बाबा वाचस्पति जी के दोनों पुत्रों अनिमेष और अलिन्द के साथ मेरे घर सुबह 8 बजे पहुँच गये। ये दोनों बालक मेरे ही विद्यालय में पढ़ते थे। बाबा के आने के बाद नाश्ते की तैयारी शुरू हुई। उनसे पूछा गया कि बाबा नाश्ते में क्या लेना पसन्द करोगे?

बाबा बोले- ‘‘मुझे नाश्ते में मीठा दलिया बना दो।’’

मेरी श्रीमती जी दलिया बना कर ले आयीं और बाबा को दे दिया।

बाबा जी तो ठहरे साफ-साफ कहने वाले।

बोले- ‘‘तुम इतनी बड़ी हो गयी हो। तुम्हें दलिया भी बनाना नही आता। इसमें क्या खा लूँ । इसमें तो दूध ही दूध है। दलिया तो नाम मात्र का ही है।’’

खैर बाबा ने दलिया खा लिया। दोपहर को श्रीमती जी ने बाबा से खाने के बारे में पूछा गया कि बाबा खाने में क्या पसन्द है?

बाबा ने श्रीमती जी को पुचकारा और कहा- ‘‘बेटी मेरे कहने का बुरा मत मानना। मैंने तुम्हारे भले के ही लिए डाँटा था।’’ (तब से श्रीमती जी दलिया अच्छा बनाने लगीं हैं।)

बाबा ने कहा - ‘‘मुझे कटहल बड़ा प्रिय लगता है। लेकिन बुढ़ापे में ज्यादा पचता नही है। तुरई, लौकी जल्दी पच जातीं हैं।’’

दोपहर को श्रीमती जी ने कटहल की और लौकी की सब्जी बनाई। बाबा ने बड़े चाव से भोजन किया।

मैंने बाबा से कहा कि बाबा यहीं ड्राइंग रूम में दीवान पर सो जाना।

बाबा बोले- ‘‘नही मैं तो तुम्हारे स्कूल के कमरे में ही सोऊँगा।’’

अतः बाबा की इच्छानुसार उनका वहीं पर बिस्तर कर दिया गया।

एक बात तो लिखना भूल ही गया, बाबा अपने साथ एक मैग्नेफाइंग ग्लास रखते थे। उसी से वो पढ़ पाते थे।

रात में जब मेरी आँख खुली तो मैंने सोचा कि एक बार बाबा को देख आऊँ। मैं जब उनको देखने गया तो बाबा ट्यूब लाइट जला कर एक हाथ में मैंग्नेफाइंग ग्लास ग्लास लिए हुए थे और कुछ लिख रहे थे। मैंने बाबा को डिस्टर्ब करना उचित नही समझा और उल्टे पाँव लौट आया।

एक बात तो आज भी घर के सब लोग याद करते हैं कि बाबा नहाने के मामले में बड़े कंजूस थे। वे हफ्तों तक नहाते ही नही थे। खैर बाबा 3-4 दिन मेरे घर रहे। दिन में वे मेरे दोनों पुत्रों और पिता जी व माता जी के साथ काफी बातें करते थे। रात को स्कूल की क्लास-रूम में सो जाते थे।

रात में जब 1-2 बजे मेरी आँख खुलती थी तो बाबा के एक हाथ में मैग्नेफाइंग-ग्लास होता था और दूसरे हाथ में पेन।

मैंने बाबा को 76 साल की उम्र में भी रात में कुछ लिखते हुए ही पाया था।

बाबा नागार्जुन के साथ कवि-गोष्ठी की यात्रा। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

स्कूटर से यात्रा करते हुए
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री, बाबा नागार्जुन और वाचस्पति शर्मा।
महर्षि दयान्द विद्या मन्दिर, टनकपुर के प्रबन्धक/संचालक राम देव आर्य बाबा से मिलने के लिए खटीमा आये। उन्होने बाबा से प्रभावित होकर उनके सम्मान में एक गोष्ठी अपने विद्यालय में रख दी। 12 जुलाई1989 को दिन में 2 बजे से गोष्ठी का आयोजन तय हुआ।

आखिर वो दिन ही आ ही गया। बाबा नागार्जुन के साथ आज काफिला चला टनकपुर की ओर।

बाबा ने कहा-‘‘शास्त्री जी! टनकपुर आपके स्कूटर पर बैठ कर ही जायेंगे।’’

मैंने बाबा से कहा-‘‘बाबा खटीमा से टनकपुर की दूरी 25 कि.मी. की है। आप स्कूटर पर थक जाओगे।’’

अब बाबा तो बाबा ही थे। उनका जिद्दी स्वभाव तो था ही।

कहने लगे-‘‘खटीमा टनकपुर के बीच घना जंगल है। प्रकृति के नजारे देखने की इच्छा है। मैं करीब 30-40 साल पहले कैलाश मानसरोवर गया था तब तो बियाबान जंगल था। अब फिर उसे देखने का मन है।’’

मन मार कर बाबा को मैंने स्कूटर पर बैठाया। क्योंकि बाबा शरीर से कमजोर तो थे ही, कहीं गिर न जायें इसलिए वाचस्पति शर्मा जी भी उनके पीछे स्कूटर पर बैठ गये। प्रकृति के सुन्दर नजारों को देखते हुए हम लोग अब टनकपुर की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में बनबसा से आगे आम का बगीचा पड़ा। बाबा को आम बहुत प्रिय थे और आमों में भी वह लंगड़ा बनारसी आम बहुत पसन्द करते थे। हम लोग आम के बगीचे में रुक गये। बाबा ने बड़े प्रेम से आम खाये।

आम के बाग की रखवाली करने में एक बंगाली भी था। बाबा बंगाली बहुत अच्छी बोल लेते थे। अब तो बाबा उससे बंगाली भाषा में खूब बतियाये।

अब टनकपुर आ गया था। बाबा ने गोष्ठी में भाग लिया। बाबा के साथ काव्य-पाठ करने वाले सौभाग्यशाली थे। मदन ‘विरक्त’, ध्रुव सिंह ‘ध्रुव’, रामदेव आर्य, देवदत्त ‘प्रसून’, बदरीदत्त पन्त, कैलाशचन्द्र लोहनी, रामसनेही भारद्वाज ‘स्नेही’, राजेन्द्र बैजल, केशवभार्गव ‘निर्दोष’, फौजी कवि टीका राम पाण्डेय, हरिश्चन्द्र शर्मा और स्वयं मैं रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ आदि। बाबा ने इस गोष्ठी में-

‘‘कालिदास, सच-सच बतलाना!

इन्दुमति के मृत्युशोक से,

अज रोया या तुम रोये थे?

कालिदास, सच-सच बतलाना!’’ कविता का काव्य-पाठ किया।

गोष्ठी का संचालन खटीमा महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष वाचस्पति शर्मा ने किया।

अन्त में आयोजक श्री रामदेव आर्य ने बाबा का सम्मान किया और उन्हें गांधी-आश्रम का सिला-सिलाया कुर्ता पाजामा और एक शॉल भी भेंट किया।

यह थी बाबा नागार्जुन के साथ कवि-गोष्ठी की यात्रा।

रविवार, 22 मार्च 2009

स्मृति शेष बाबा नागार्जुन। (डा.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गोष्ठी में बाबा को सम्मानित करते हुए
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री व जसरा रजनीश ।

हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित कवि बाबा नागार्जुन की अनेकों स्मृतियाँ आज भी मेरे मन में के कोने में दबी हुई हैं। मैं उन खुशकिस्मत लोगों में से हूँ, जिसे बाबा का भरपूर सानिध्य और प्यार मिला। बाबा के ही कारण मेरा परिचय सुप्रसिद्ध कवर-डिजाइनर और चित्रकार श्री हरिपाल त्यागी और साहित्यकार रामकुमार कृषक से हुआ। दरअसल ये दोनों लोग सादतपुर, दिल्ली मे ही रहते हैं। बाबा भी अपने पुत्र के साथ इसी मुहल्ले में रहते थे।

बाबा के खटीमा प्रवास के दौरान खटीमा और सपीपवर्ती क्षेत्र मझोला, टनकपुर आदि स्थानों पर उनके सम्मान में 1989-90 में कई गोष्ठियाँ आयोजित की गयी थी। बाबा के बड़े ही क्रान्तिकारी विचारों के थे और यही उनके स्वभाव में भी सदैव परिलक्षित होता था। किसी भी अवसर पर सही बात को कहने से वे चूकते नही थे।

एक बार की बात है। वाचस्पति शर्मा के निवास पर बाबा से मिलने कई स्थानीय साहित्यकार आये हुए थे। जब 5-7 लोग इकट्ठे हो गये तो कवि गोष्ठी जैसा माहौल बन गया। बाबा के कहने पर सबने अपनी एक-एक रचना सुनाई। बाबा ने बड़ी तन्मयता के साथ सबको सुना।

उन दिनों लोक निर्माण विभाग, खटीमा में तिवारी जी करके एक जे।ई. साहब थे। जो बनारस के रहने वाले थे। सौभाग्य से उनके पिता जी उनके पास आये हुए थे, जो किसी इण्टर कालेज से प्रधानाचार्य के पद से अवकाश-प्राप्त थे। उनका स्वर बहुत अच्छा था। अतः उन्होंने ने भी बाबा को सस्वर अपनी एक कविता सुनाई।

जब बाबा नागार्जुन ने बड़े ध्यान से उनकी कविता सुनी तो तिवारी जी ने पूछ ही लिया- ‘‘बाबा आपको मेरी कविता कैसी लगी।

’’ बाबा ने कहा-‘‘तिवारी जी अब इस रचना को बिना गाये फिर पढ़कर सुनाओ।’’

तिवारी जी ने अपनी रचना पढ़ी। अब बाबा कहाँ चूकने वाले थे। बस डाँटना शुरू कर दिया और कहा- ‘‘तिवारी जी आपकी रचना को स्वर्ग में बैठे आपके अम्माँ-बाबू ठीक करने के लिए आयेंगे क्या? खड़ी बोली की कविता में पूर्वांचल-भोजपुरी के शब्दों की क्या जरूरत है।’’

इसके आद बाबा ने विस्तार से व्याख्या करके अपनी सुप्रसिद्ध रचना-‘‘अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है।’’ को सुनाया। उस दिन के बाद तिवारी जी इतने शर्मिन्दा हुए कि बाबा को मिलने के लिए ही नही आये।

शेष अगले संस्मरण में..................



शनिवार, 21 मार्च 2009

अन्तर्राष्ट्रीय कविता दिवस पर (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




वन्दना



शारदे माँ! आज मेरी वन्दना स्वीकार कर लो।


छा रहा अज्ञान का मन में अन्धेरा,


तम हरो कर दो उजाले का सवेरा,


दास की आराधना को मातु अंगीकार कर लो।


शब्द के आयाम में साहित्य दे दो,


भाव में मेरे सुखद लालित्य दे दो,


मैं बहुत नादान हूँ माता मुझे भी प्यार कर लो।


गुरूकुल यात्रा-२- "पिता जी पीछे-पीछे और मैं आगे-आगे।"



गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर (हरद्वार) से मैं भाग कर घर आ गया था। पिता जी को यह अच्छा नही लगा। अतः वे मुझे अगले दिन फिर ज्वालापुर गुरूकुल में लेकर चल दिये। सुबह 10 बजे मैं और पिता जी गुरूकुल पहुँच गये।
संरक्षक जी ने पिता जी कहा- ‘‘इस बालक का पैर एक बार निकल गया है, यह फिर भाग जायेगा।’’ पिता जी ने संरक्षक जी से कहा- ‘‘ अब मैंने इसे समझा दिया है। यह अब नही भागेगा।’’
मेरे मन में क्या चल रहा था। यह तो सिर्फ मैं ही जानता था। दो बातें उस समय मन में थीं कि यदि मना करूँगा तो पिता जी सबके सामने पीटेंगे। यदि पिता जी ने पीटा तो साथियों के सामने मेरा अपमान हो जायेगा। इसलिए मैं अपने मन की बात अपनी जुबान पर नही लाया और ऊपर से ऐसी मुद्रा बना ली, जैसे मैं यहाँ आकर बहुत खुश हूँ। थोड़ी देर पिता जी मेरे साथ ही रहे। भण्डार में दोपहर का भोजन करके वो वापिस लौट गये।
शाम को 6 बजे की ट्रेन थी, लेकिन वो सीधी नजीबाबाद नही जाती थी। लक्सर बदली करनी पड़ती थी। वहाँ से रात को 10 बजे दूसरी ट्रेन मिलती थी।
इधर मैं गुरूकुल में अपने साथियों से घुलने-मिलने का नाटक करने लगा। संरक्षक जी को भी पूरा विश्वास हो गया कि ये बालक अब गुरूकुल से नही भागेगा।
शाम को जैसे ही साढ़े चार बजे कि मैं संरक्षक जी के पास गया और मैने उनसे कहा- ‘‘गुरू जी मैं कपड़े धोने ट्यूब-वैल पर जा रहा हूँ।’’
उन्होंने आज्ञा दे दी। मैंने गन्दे कपड़ों में एक झोला भी छिपाया हुआ था। अब तो जैसे ही ट्यूब-वैल पर गया तो वहाँ इक्का दुक्का ही लड्के थे, जो स्नान में मग्न थे। मैं फिर रेल की लाइन-लाइन हो लिया। कपड़े झोले मे रख ही लिए थे।
ज्वालापुर स्टेशन पर पहुँच कर देखा कि पिता जी एक बैंच पर बैठ कर रेलगाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे। मैं भी आस-पास ही छिप गया।
जैसे ही रेल आयी-पिता जी डिब्बे में चढ़ गये। अब मैं भी उनके आगे वाले डिब्बे में रेल में सवार हो गया। लक्सर स्टेशन पर मैं जल्दी से उतर कर छिप गया और पिता जी पर नजर रखने लगा। कुद देर बाद वो स्टेशन की बैंच पर लेट गये और सो गये।
अब मैं आराम से टिकट खिड़की पर गया और 30 नये पैसे का नजीबाबाद का टिकट ले लिया। रात को 10 बजे गाड़ी आयी। पिता जी तो लक्सर स्टेशन पर सो ही रहे थे। मैं रेल में बैठा और रात में साढ़े ग्यारह बजे नजीबाबाद आ गया। नजीबाबाद स्टेशन पर ही मैं भी प्लेटफार्म की एक बैंच पर सो गया। सुबह 6 बजे उठ कर मैं घर पहुँच गया।
माता जी और नानी जी ने पूछा कि तेरे पिता जी कहाँ हैं? मैं क्या उत्तर देता।
एक घण्टे बाद पिता जी जब घर आये तो नानी ने पूछा-‘‘रूपचन्द को गुरूकुल छोड़ आये।‘‘
पिता जी ने कहा-‘‘हाँ, बड़ा खुश था, अब उसका गुरूकुल में मन लग गया है।’’
तभी माता जी मेरा हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर लायीं और कहा-‘‘ये कौन है?’’
यह मेरी गुरूकुल की अन्तिम यात्रा रही।
बहिन कविता वाचक्नवी जी! बताना तो सही कि यह संस्मरण तो पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी की जीवनी में नही है। कहीं फिर संयोग न बन गया हो।

मेरी गुरूकुल यात्रा। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)





बात लगभग 45 वर्ष पुरानी है। मेरे मामा जी आर्य समाज के अनुयायी थे। उनके मन में एक ही लगन थी कि परिवार के सभी बच्चें पढ़-लिख जायें और उनमें आर्य समाज के संस्कार भी आ जायें।

मेरी माता जी अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं और मैं अपने घर का तो इकलौता पुत्र था ही साथ ही ननिहाल का भी दुलारा था। इसलिए मामाजी का निशाना भी मैं ही बना। अतः उन्होंने मेरी माता जी और नानी जी अपनी बातों से सन्तुष्ट कर दिया और मुझको गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर (हरद्वार) में दाखिल करा दिया गया।



घर में अत्यधिक लाड़-प्यार में पलने के कारण मुझे गुरूकुल का जीवन बिल्कुल भी अच्छा नही लगता था। मैं कक्षा में न जाने के लिए अक्सर नये-नये बहाने ढूँढ ही लेता था और गुरूकुल के संरक्षक से अवकाश माँग लेता था।



उस समय मेरी बाल-बुद्धि थी और मुझे ज्यादा बीमारियों के नाम भी याद नही थे। एक दो बार तो गुरू जी से ज्वर आदि का बहाना बना कर छुट्टी ले ली। परन्तु हर रोज एक ही बहाना तो बनाया नही जा सकता था।



अगले दिन भी कक्षा में जाने का मन नही हुआ, मैंने गुरू जी से कहा कि-‘‘गुरू जी मैं बीमार हूँ, मुझे प्रदर रोग हुआ है।’’ गुरू जी चौंके - हँसे भी बहुत और मेरी जम कर मार लगाई।



अब तो मैंने निश्चय कर ही लिया कि मुझे गुरूकुल में नही रहना है। अगले दिन रात के अन्तिम पहर में 4 बजे जैसे ही उठने की घण्टी लगी। मैंने शौच जाने के लिए अपना लोटा उठाया और रेल की पटरी-पटरी स्टेशन की ओर बढ़ने लगा। रास्ते में एक झाड़ी में लोटा भी छिपा दिया।



3 कि.मी. तक पैदल चल कर ज्वालापुर स्टेशन पर पहँचा तो देखा कि रेलगाड़ी खड़ी है। मैं उसमें चढ़ गया। 2 घण्टे बाद जैसे ही नजीबाबाद स्टेशन आया मैं रेलगाड़ी से उतर गया और सुबह आठ बजे अपने घर आ गया। मुझे देखकर मेरी छोटी बहन बहुत खुश हुई।



माता जी ने पिता जी के सामने तो मुझ पर बहुत गुस्सा किया लेकिन बाद में मुझे बहुत प्यार किया।



यही थी मेरी गुरूकुल यात्रा।

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

आभार के दो-शब्द।






ब्लॉगर मित्रों
!

पिछले 3 वर्षों से मैं उत्तराखण्ड सरकार के राज-काज में काफी व्यस्त रहा। कुछ माह पूर्व आयोग में अपना तीन वर्षों का कार्यकाल पूरा कर लिया। कुछ फुरसत मिल गयी। मैं अब तक इण्टर-नेट से अनभिज्ञ था। ब्लॉग क्या होता है, यह जानता तक नही था। हाँ कभी टीवी. पर सुना था कि अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में यह.........लिखा है।

बाल-साहित्यकार रावेन्द्रकुमार रवि की प्रेरणा से 21 जनवरी, 2009 को अन्तर्-जाल में कदम रखा था। आज मेरा इण्टर-नेट और ब्लॉग-जगत में 60वाँ दिन है। न जाने कैसे ये 60 दिन गुजर गये और 100 प्रविष्ठियाँ लगा दी। इसका मुझे पता ही नही चला। रवि जी ने टिप्पणी द्वारा ही याद दिलाया कि आज आपकी 100 पोस्ट पूरी हो गयी हैं। खैर....

यह भी एक संयोग ही है कि मेरे ब्लॉग को टिपियानेवालों की संख्या भी 100 ही है। जिसकी शरूआत डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने की थी। रावेंद्रकुमार रवि, CABRI , अनिलकान्त, निर्मला कपिला, The Pink Orchid , संगीता पुरी, रंजना (रंजू) भाटिया, अनुनाद सिंह, विनय, श्याम कोरी उदय, अनुज, और परमजीत सिंह बाली, संजय, बदनाम, आकांक्षा, अजित वडनेकर, लाल और बवाल (जुगलबन्दी) मेरे प्रारम्भिक दौर के टिप्पणीकार कहे जा सकते हैं। इसके बाद फरवरी में जिन ब्लॉगर्स का मुझे प्रसाद मिला उनमें किशोर चौधरी, चिराग जैन, स्वप्न, अनिलकान्त सिंह, संदीप शर्मा, अभिषेक, इलेश, अमिताभ श्रीवास्तव, इष्टदेव सांकृत्यायन, अतुल शर्मा, अल्पना वर्मा, मोहिन्दर कुमार, रंजना, मोहन वशिष्ट, मुँहफट,महक, दुर्गा, उड़न-तश्तरी (समीर लाल), योगेन्द्र मौदगिल, आशा जोगलेकर, के.के.यादव, डॉ. प्रेमसागर सिंह, डॉ. चन्द्रकुमार जैन, गिरीश बिल्लौरे मुकुल, हेम पाण्डेय, नीरज गोस्वामी, Mired Mirage, सफात आलम, हरकीरत हकीर, पी.एन.सक्सेना,ताऊ रामपुरिया, बेनाम रामपुरी चाकू , अशोक मधुप, संजीव , प्रेम फर्रूखाबादी, शोभा, सैयद,डॉ.डी.वी.सिंह, डॉ.इन्द्रदेव माहर, अंकित, अंकित शेखर, CREATIVE CONA (हेमन्त कुमार), पी.एन.सुब्रमन्यन, कमलेश जोशी, कामन मैन, हिमांशु, शिखा दीपक, प्राची आदि हैं।

1 मार्च से श्रीमती वन्दना गुप्ता मेरी प्रत्येक प्रविष्टि को टिपियाती रही हैं। इसके बाद से आज तक द्विज, महक, पारुल, नीशू, रंजना, आवारा प्रेमी, पंकज व्यास, शारदा अरोरा, निन्दक प्यारा, हंगामा देव, महेन्द्र मिश्र, भारतीय नागरिक, सुमित प्रताप सिंह, युवा, केशव, मनविन्दर भिम्बर, सुधीर चौधरी , गगन शर्मा-कुछ अलग सा, प्रवीण त्रिवेदी, योगेश समदर्शी, मुफलिस, स्मार्ट इण्डियन, भूतनाथ, गेंदालाल शर्मा निर्जन, अरविन्द कुमार, प्रकाश बादल, विक्रान्त बेशर्मा, चन्दन चौहान, सतपाल बत्रा, देवदत्त प्रसून, डॉ. भावना, सरिता, पी.डी.शर्मा वत्स आदि ने मेरा समय-समय पर उत्साह-वर्धन किया है। दो माह के छोटे से इस सफर में आप सभी ने मुझे भरपूर प्रोत्साहन दिया।

आप सभी का मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

मानवता के वत्स रचो,

अब एक नया संसार।

पार करें भवसागर को,

ले प्रेम-प्रीत पतवार।।

करो सुधा का पान,

किन्तु विष भी पीना ही होगा,

चन्दन तरु को सदा,

ब्याल के संग जीना ही होगा,

वैर-वितण्डा मत करना,

जीवन के दिन हैं चार।

पार करें भवसागर को,

ले प्रेम-प्रीत पतवार।।

सुमन तुम्हें कुछ चुभन,

कण्टकों की भी सहनी होगी,

जल की धारा पाषाणों के,

उर से ही बहनी होगी।

मिल-जुल कर ही रहें प्रेम से,

करें मधुर व्यवहार।

पार करें भवसागर को,

ले प्रेम-प्रीत पतवार।।

गुलशन में गुड़हल, गेन्दा,

और लाल गुलाब खिले हैं।

मनमोहक छवि न्यारी सबकी,

फिर भी हिले-मिले हैं।

सदा चलें हम साथ सभी के,

ले आदर्श विचार।

पार करें भवसागर को

ले प्रेम-प्रीत पतवार।।

मौसम के काले कुहरे को,

जीवन में मत छाने दो।

सुख-सपनों में कभी नही,

इसको कुहराम मचाने दो।

ज्ञान-दीप को कर में लेकर,

करें दूर अंधकार।

पार करें भवसागर को,

ले प्रेम-प्रीत पतवार।।



गुरुवार, 19 मार्च 2009

आप माने या न मानें: ब्लॉगर मित्रों को मेरा सुझाव (डॉ.रुपचन्द्र शास्त्री मयंक)



कई मित्र टिप्पणी अक्सर,

सब रचनाओं पर कर देते हैं,

सुन्दर, बढ़िया लिख करके,

निज जान छुड़ा भर लेते है।

कुछ तो बिना पढ़े ही,

केवल कापी-पेस्ट किया करते हैं,

सबको खुश करने को,

वे प्रतिदान दिया करते है।

भाई मेरे, रचना के बारे में,

भी लिख दिया करो।

आँख मूँद कर, एक तरह की,

नही टिप्पणी किया करो।



युगदृष्टाओं स्वीकार करो, मेरा वन्दन। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


हे नेताओं! स्वीकार करो, मेरा वन्दन।

युगदृष्टाओं स्वीकार करो, मेरा वन्दन।।

कभी बने तुम पुरुषोत्तम,

और कभी बन गये योगिराज,

कभी बने तुम ही गांधी,

और कभी बने जनताधिराज,

शत्-शत् तुम्हें प्रणाम, तुम्हारा अभिनन्दन।

युगदृष्टाओं स्वीकार करो, मेरा वन्दन।।

कभी बने ईसूमसीह,

और कभी बने सुकरात, मुहम्मद,

कभी बने गुरूनानक तुम,

और कभी बने गुरूदेव, दयानन्द,

किया दूर अज्ञान, तुम्हारा अभिनन्दन।

युगदृष्टाओं स्वीकार करो, मेरा वन्दन।।

कभी तो सन्त-कबीर बने,

और कभी बन गये तुलसीदास,

कभी बने तुम परमहंस,

और दिया विश्व को नव-प्रकाश,

किया विश्व-कल्याण, तुम्हारा अभिनन्दन।

युगदृष्टाओं स्वीकार करो, मेरा वन्दन।।

कभी बने तुम वीर धनुर्धर,

और कभी बन गये वीर शिवाजी,

कभी बनें झाँसी की रानी,

और कभी दुर्गा, इन्दिरा जी,

हर युग के जीवन-प्राण, तुम्हारा अभिनन्दन।

युगदृष्टाओं स्वीकार करो, मेरा वन्दन।।




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