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मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

एक निवेदन

ब्लॉगर मित्रों!

बहुत दिनों से मैं एक नया ब्लाग बनाने का विचार बना रहा था। परन्तु आलस कर जाता था। फिर ऐसा संयोग बना कि मेरे कुछ शुभचिन्तकों ने अपनी टिप्पणियों से मुझे प्रेरणा दी कि इस काम को जल्दी अंजाम दे दो। अतः उन्हीं की कृपा से एक नया ब्लॉग शब्दों का दंगल बना पाया हूँ।

आशा है कि उच्चारण की भाँति इसे भी अपना प्यार देंगे।

यह शब्दों का दंगल है। इसे आप लड़ाई का अखाड़ा न समझें। यदि विद्वानों में बहस हो भी जाती हैं तो मेरा तो मानना हैं कि-

‘‘ज्ञानी से ज्ञानी लड़े, तो ज्ञान सवाया होय।

मूरख से मूरख लडे, तो तुरत लड़ाई होय।।’’

आप सब अपने-अपने क्षेत्र के महारथी हैं, विद्वान हैं। मैं दंगल का मास्टर नही हूँ, सिर्फ इसका एक अदना सा सेवक हूँ। मैं इस लड़ाई में कभी आपसे जीत नही पाऊँगा। क्योंकि सेवक कभी जीतता नही है।

चलते-चलते इतना अवश्य निवेदन करना चाहता हूँ कि यदि शब्दों की लड़ाई से आपके ज्ञान में बढ़ोतरी होती है तो आप पीछे कदापि न हटें। लेकिन यदि ये मतभेद मनभेद बन जायें। इसलिए अपनी भावनाओं नियन्त्रण अवश्य कर लें। स्वस्थ लेखन करें । शिष्ट शब्दों का प्रयोग करें।

मैं अपने दोनों ब्लॉगो का प्रयोग काव्य और गद्य को अलग-अलग लिखने में करना चाहता हूँ। शब्दों का दंगल भविष्य में भाई अजित वडनेकर जी के ‘शब्दों के सफर’ का अनुगामी बन कर कुछ साहित्य सेवा करना चाहता है।आपके शुभाशीष का अभिलाषी हूँ।

अन्त में श्रीमती वन्दना गुप्ता जी का (जो मेरी प्रत्येक पोस्ट को बड़े उत्साह व प्यार के साथ टिपियाती हैं) आभार व्यक्त करना चाहता हूँ।

छोटी बहिन जैसी रचना सिंह जी के साथ हुए तल्ख वार्तालाप के लिए खेद प्रकट करता हूँ। आशा है कि वो मुझे बड़ा भाई समझ कर क्षमा कर देंगी।

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त छोटे भाई समान रावेंद्रकुमार रवि जी से विनय पूर्वक आग्रह-अनुग्रह करता हूँ कि मनरूपी सागर में आये ज्वार को भाटा में परिवर्तित करने की कृपा करें।

भाई समीर लाल जी, ताऊ रामपुरिया, कम्प्यूटरविद् आशीष् खण्डेलवाल, अजित वडनेकर, अविनाश वाचस्पति जैसे वरिष्ठ ब्लागर्स को नमन करता हूँ।

अन्तर्-जाल पर ब्लॉगिंग में आज मुझे 100 दिन ही तो हुए हैं।

इस अवधि में केवल 195 पोस्ट ही उच्चारण को दे पाया हूँ।

मैं तो सभी ब्लौगिंग के महारथियों में अभी बहुत कनिष्ठ हूँ।

विनयावनत- आपका सद्भावी।

"बाबा नागार्जुन अक्सर याद आते हैं।" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

उत्तर-प्रदेश के नैनीताल जिले के काशीपुर शहर (यह अब उत्तराखण्ड में है) से धुमक्कड़ प्रकृति के बाबा नागार्जुन का काफी लगाव था।


सन् 1985 से 1998 तक बाबा प्रति वर्ष एक सप्ताह के लिए काशीपुर आते थे। वहाँ वे अपने पुत्र तुल्य हिन्दी के प्रोफेसर वाचस्पति जी के यहाँ ही रहते थे। मेरा भी बाबा से परिचय वाचस्पति जी के सौजन्य से ही हुआ था। फिर तो इतनी घनिष्ठता बढ़ गयी कि बाबा मुझे भी अपने पुत्र के समान ही मानने लगे और कई बार मेरे घर में प्रवास किया।


प्रो0 वाचस्पति का स्थानानतरण जब जयहरिखाल (लैन्सडाउन) से काशीपुर हो गया तो बाबा ने उन्हें एक पत्र भी लिखा। जो उस समय अमर उजाला बरेली संस्करण में छपा था। इसके साथ बाबा नागार्जुन का एक दुर्लभ बिना दाढ़ी वाला चित्र भी है। जिसमें बाबा के साथ प्रो0 वाचस्पति भी हैं। बाबा ने 15 अक्टूबर,1998 को अपना मुण्डन कराया था। उसी समय का यह दुर्लभ चित्र प्रो0 वाचस्पति और अमर उजाला के सौजन्य से प्रकाशित कर रहा हूँ।


बाबा अक्सर अपनी इस रचना को सुनाते थे-



खड़ी हो गयी चाँपकर कंगालों की हूक


नभ में विपुल विराट सी शासन की बन्दूक


उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं मूक


जिसमें कानी हो गयी शासन की बन्दूक


बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक


धन्य-धन्य, वह धन्य है, शासन की बन्दूक


सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक


जहाँ-तहाँ ठगने लगी, शासन की बन्दूक


जले ठूँठ पर बैठ कर, गयी कोकिला कूक


बाल न बाँका कर सकी, शासन की बन्दूक


"दंगल अब तैयार हो गया।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

यह कविता मेरे नये ब्लॉग ‘‘शब्दों का दंगल’’ पर भी उपलब्ध है।

शब्दों के हथियार संभालो, सपना अब साकार हो गया।

ब्लागर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।।

करो वन्दना सरस्वती की, रवि ने उजियारा फैलाया,

नई-पुरानी रचना लाओ, रात गयी अब दिन है आया,

गद्य-पद्य लेखनकारी में शामिल यह परिवार हो गया।

ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।।

देश-प्रान्त का भेद नही है, भाषा का तकरार नही है,

ज्ञानी-ज्ञान, विचार मंच है, दुराचार-व्यभिचार नही है,

स्वस्थ विचारों को रखने का, माध्यम ये दरबार हो गया।

ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।।

सावधान हो कर के अपने, तरकश में से तर्क निकालो,

मस्तक की मिक्सी में मथकर, सुधा-सरीखा अर्क निकालो,

हार न मानो रार न ठानो, दंगल अब परिवार हो गया।

ब्लॉगर मित्रों के लड़ने को, दंगल अब तैयार हो गया।।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

शब्दों का अखाड़ा (दंगल)


रचनाकारी गौण हुई, लिखना-पढ़ना भी भूल गये,

ब्लागिंग के झूले में टिप्पणी करने वाले झूल गये।


तरकश में से तीर नही, अब शब्द निकलते हैं,

दूर-दूर हैं, दूर-दूर से, आग उगलते हैं।


शब्दों की कुश्ती लड़ने को, व्याकुल लगते है,

शब्द-शब्द से अड़ने को, अब आकुल लगते हैं।


पहले रचना आयी, अब वन्दना मचलती है,

उच्चारण के दंगल में, आँधी सी चलती है।


मुझे अलग से दंगल का अब, ब्लॉग बनाना होगा,

दाँव-पेंच के साथ, चुटीले शब्दों को लाना होगा।


नयी विधा के साथ सभी को खुला निमन्त्रण है,

आओ लड़ो ब्लॉगरों, मेरा यह आमन्त्रण है।

‘‘एक पल में सभी बिखरता है, दूजे पल वही निखरता है।’’




एक पल में सभी बिखरता है।


दूजे पल वही निखरता है।।



जिसको चन्दा ने तपन संग में दी हो,


जिसको चन्दन ने जलन अंग मे दी हो,


दिल का घाव नही भरता है।


एक पल में सभी बिखरता है।


दूजे पल वही निखरता है।।



जिसका जीवन बड़ा निराला हो,


काँटों ने ही जिसको पाला हो,


बदन में दर्द उभरता है।


एक पल में सभी बिखरता है।


दूजे पल वही निखरता है।।




मिला प्यार फूलों की एक महक से,


खिला चमन कोयल की एक चहक से ही,


रोगी का सुमन सँवरता है।


एक पल में सभी बिखरता है।


दूजे पल वही निखरता है।।


मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

‘‘घर पर मान, तो बाहर भी सम्मान’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


आज कबाड़ी को बेचने के लिए रद्दी छाँट रहा था।

उसमें न जाने कितने दशक पुरानी कापी का एक पन्ना मिला।

उसमें मेरी यह रचना लिखी हुई थी। आप भी पढें-


यदि

‘‘घर पर मान,

तो बाहर भी सम्मान’’

बहुत पुरानी है

यह उक्ति,

परन्तु

मुझे लगती है,

वेद जैसी ही एक सूक्ति,


घर पर दाल,

तो बाहर भी दाल,

और

यदि घर पर कंगाल,

तो बाहर भी

हर वस्तु का अकाल,


हमारी राष्ट्र-भाषा हिन्दी,

भारत-माता के माथे की बिन्दी,

जब अपने ही घर में उपेक्षित है,

तो बाहर वालों से,क्या अपेक्षित है?

"कितना अन्तर है?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

इस छोटी सी कथा के माध्यम से दो परिवेशों का अन्तर स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ।

किसी बस्ती में एक भँवरा रहता था। उसने अपना घर गोबर की माँद में बनाया हुआ था। वह इसमें बड़ा खुश था।

एक दिन जंगल में रहने वाला भँवरा रास्ता भटक गया और इसकी बस्ती में आ गया।

बस्ती वाले भँवरे ने अपने बिरादर को देखा तो उसे बड़ा अच्छा लगा। खुशी-खुशी वह उसे अपने घर में ले गया।

जब जंगल के भँवरे ने बस्ती वाले भँवरे का घर देखा तो उसे यह घर बिल्कुल भी अच्छा नही लगा।

वह बोला- ‘‘भैया! तुम इस अंधेरे बदबूदार घर में कैसे रहते हो? मेरा तो यहाँ दम घुट रहा है।’’

बस्ती वाला भँवरा बोला- ‘‘मित्र! तुम तो जंगली हो। तुम गाँव-बस्ती की संस्कृति को नही समझ पाओगे।’’

खैर, जैसे-तैसे इस जंगली भँवरे ने एक रात काट ली।

सुबह होने पर वह बस्ती वाले भँवरे से बोला- ‘‘मित्र कभी मेरे घर भी आना। मेरा घर दूर जंगल में है।’’

कुछ दिन बीत जाने पर बस्ती वाले भँवरे ने सोचा कि जंगल की आबो-हवा भी देख आता हूँ। अतः वह जंगल के भवरे के घर जा पँहुचा।

जंगल वाला भँवरा अपने इस मित्र को देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ।

वह गाँव से आये इस भँवरे को कभी एक फूल के पास ले जाता। कभी दूसरे फूल के पास ले जाता और बार-बार कहता कि मित्र देखो कितनी अच्छी खुशबू आ रही है। लेकिन बस्ती वाला भँवरा कोई जवाब नही दे रहा था।

अब तो जंगल में रहने वाले भँवरे को चिन्ता हुई कि आखिर यह मेरी बात का जवाब क्यों नही दे रहा है?

उसने कहा - ‘‘मित्र! क्या तुम्हें किसी भी फूल में से सुगन्ध नही आयी।’’

बस्ती वाला भँवरा बोला- ‘‘नही मित्र! मुझे किसी भी फूल में खुशबू नही आयी।’’

इसकी बात सुन कर जंगल में रहने वाला बड़ा हैरान हुआ।

वह इसे एक झरने के किनारे ले गया और बोला- ‘‘मित्र! अब मुँह धोला और कुल्ला कर लो।"

जब बस्ती वाले भँवरे ने ने कुल्ला किया तो उसके मुँह से गोबर का एक टुकड़ा निकला।

जंगली भँवरे की समझ में अब सारी बात आ गयी।

वह पुनः जब अपने मित्र को फूल के पास ले गया तो-

बस्ती वाले भँवरे के मुँह से शब्द निकल ही पड़े- ‘‘मित्र! तुम वाकई स्वर्ग में रहते हो।"

कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हम अपने दिमाग को स्वच्छ नही रक्खेगे, तब तक हम अच्छाई का आनन्द नही उठा सकेंगे।

बस दो परिवेशों में यही तो अन्तर होता है।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

"मैं तब-तब पागल होता हूँ।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जब मन्दिर-मस्जिद जलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।


त्योहारों की परम्परा में, दीन-धर्म को लाये,

दंगों के शोलों में, जम कर पैट्रोल छिड़काये,

जब भाषण आग उगलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।


कूड़ा-कचरा बीन-बीन जो, रोजी कमा रहे हैं,

पढ़ने-लिखने की आयु में, जीवन गँवा रहे हैं,

जब भोले बचपन ढलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।


दर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,

जिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,

जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।

जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

‘‘अपनी पुरानी डायरी से।’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

नभ में मयंक हँस रहा,

चाँदनी बिखरी है भूतल पर,

कितना सुहावना मौसम है।


मन से मन का मिलन हो रहा,

बजती तारों की शहनाई,

प्रेमी ने प्रेयसी को माला,

अपनी बाहों की पहनाई,

हरी घास मखमल के जैसी,

कमल तैरते निर्मल जल पर,

कितना सुहावना मौसम है।

प्रेम-प्रीत से सिंचित पौधों की,

डाली का पात हरा है,

पल्लव कुसुमों से बतियाते,

उपवन में मधुमास भरा है,

बहती सरिता स्वर भर कल-कल।

कितना सुहावना मौसम है।


तन-मन में उल्लास भरा है,

प्रेमांकुर गहरा पैंठा है,

आदर्शों के सिंहासन पर,

अन्तस में सपना बैठा है,

सभी स्वर्ग लाना चाहते है,

जीवन में, अपने बल पर।

कितना सुहावना मौसम है।


दुनिया सबको लगती प्यारी,

कोई इसको समझ न पाया,

सबकी उलझन न्यारी-न्यारी,

उलझन जग की समझ न पाया,

दिन में तारे देख रहे हैं,

आशाओं से , अम्बर तल पर।

कितना सुहावना मौसम है।

रविवार, 26 अप्रैल 2009

‘‘वन्दना’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

श्यामल ‘सुमन’ जी के ब्लॉग की प्रार्थना पोस्ट पर मैंने अपनी इस कविता की कुछ पंक्तियों से टिप्पणी की थी। लेकिन टिपियाने वालों ने उनकी कविता के बदले में मेरी टिप्पणी को ही वाह-वाही से टिपियाना शुरू कर दिया। बस इसी प्रेरणा से अभिभूत होकर यह पूरी कविता अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूँ।

मुझको वर दे तू भगवान,

मेरा कर दे तू उत्थान।


जो मानवता के भक्षक हैं,

उनका मत करना सम्मान।


नेता बने हुए अभिनेता,

ढोंग दिखावा जिनका काम।


वोट माँगने तेरे घर में,

आयेंगे पाजी शैतान।


लोकतन्त्र के मक्कारों को,

देना मत कोई ईनाम।।


नोटों के बदले में अपना,

नही बेचना तू ईमान।


माला के बदले में इनके,

सिर पर करना जूते दान।


विनती सुन ले दयानिधान,

इनका मत करना कल्याण।

‘‘निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


शिष्ट मधुर
व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



फूहड़पन के वस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,

जंग लगे से शस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,

स्वाभाविक श्रंगार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



वचनों से कंगाल, बुरे सबको लगते हैं,

जीवन के जंजाल, बुरे सबको लगते हैं,

सजा हुआ घर-बार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



चुगलखोर इन्सान, बुरे सबको लगते हैं,

सूदखोर शैतान, बुरे सबको लगते हैं,

सज्जन का सत्कार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



लुटे-पिटे दरबार, बुरे सबको लगते हैं,

दुःखों के अम्बार, बुरे सबको लगते हैं,

हरा-भरा परिवार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।



मतलब वाले यार, बुरे सबको लगते हैं,

चुभने वाले खार, बुरे सबको लगते हैं,

निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।

सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

"ममता बिन मातृत्व अधूरा लगता है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')




करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।

रचना बिन अस्तित्व अधूरा लगता है।।


प्रेम-रोग में गम का होना,

जीवन का ये ही है रोना,

प्रियतम बिन अपनत्व अधूरा लगता है।

करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।।


नालों का जहरीला पानी,

लील रहा मासूम जवानी,

जीवन बिन दायित्व अधूरा लगता है।

करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।।


बचपन बहुत सुहाना लगता,

सुख का ठौर ठिकाना लगता,

ममता बिन मातृत्व अधूरा लगता है।

करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।।


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

एक खुली बहस- "क्या ब्लागर साहित्यकार नही होता है?" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

क्या ब्लागर साहित्यकार नही होता है?

क्या साहित्यकार का सामान्य-ज्ञान शून्य होना चाहिए?

बीस अप्रैल को मैंने एक पोस्ट लगाई थी। जिसमें जरा बताइए तो शीर्षक से एक माथापच्ची थी।

चित्र उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध दरगाह पीरान कलियर शरीफ का था।

साहित्य शारदा मंच, खटीमा की कार्यसमिति ने इसका उत्तर सबसे पहले देने वाले तीन विजेताओं को साहित्य शारदा मंच, के सर्वोच्च सम्मान ‘‘साहित्य-श्री’’ से पुरस्कृत करने का निर्णय किया।

एक बेनामी ने टिप्पणीकार ने इस पर अपना कमेंट निम्न रूप में किया-

बेनामी ने कहा…
श्रीमान जी, साहित्य श्री साम्मान का स्तर इतना मत गिराईये कि

एक पहेली के जवाब मे बंटने लग जाये। आगे आपकी मर्जी।

April 24, 2009 12:31 PM

उसका उत्तर मैंने निम्नवत् दिया-

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
बेनामी जी।

इतना भी बता दें कि क्या ये तीन लोग आपकी नजर में साहित्यकार नहीं हैं।

भइया!

मेरी लिस्ट में तो ये साहित्यकार ही हैं। सोच-समझकर ही यह निर्णय किया गया है।

फिर रचना जी के निम्न दो कमेंट आये-

रचना ने कहा…
"इतना भी बता दें कि क्या ये तीन लोग आपकी नजर में साहित्यकार नहीं हैं।

"jee haan yae teen log saahitykaar nahin haen blogger haen

blog aur saahity do alag alag vidha haen ।
April 24, 2009 1:47

रचना ने कहा…
anaam kaemnt mera nahin haen yae bhi kehddena jaruri haen
April 24, 2009 1:53 PM

जिनका उत्तर मैंने रचना जी को इस रूप में दिया।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
वाह वाह रचना जी!

आपकी टिप्पणी पर तो आपको साहित्य-श्री के अतिरिक्त जो भी सम्मान हो वह दे देना चाहिए।

मैं इस व्यर्थ की चर्चा को आगे बढ़ाना नही चाहता था।

परन्तु आपने प्रेरित किया है या यों कहिए कि स्वाभिमान को ललकारा है,

तो मुझे अलग से इस पर एक पोस्ट लगानी पड़ेगी।

हर्ज ही क्या है ? एक खुली बहस तो हो ही जायेगी।

अरे, आप तो Comment की वर्तनी भी अशुद्ध लिखती हैं।

फिर आप ब्लागर को साहित्यकार कब स्वीकार करने वाली हैं

एक बार फिर बता दीजिए कि हिन्दी के धुरन्धर लिखाड़ क्या साहित्यकार नही होते हैं?

आशीष खण्डेलवाल एक कम्प्यूटरविद् हैं।

क्या आप कम्प्यूटर विज्ञान को साहित्य नही मानती है?

वन्दना अवस्थी दूबे जो इतना अच्छा लिख रही हैं।

आपकी दृष्टि में वो भी साहित्यकार नही हैं।

सबसे पुराने हिन्दी चिट्ठाकारों के रूप में आदरणीय समीरलाल को भी

आप साहित्यकार क्यों स्वीकार करेंगी?

जिनका साहित्य ब्लॉग-जगत से निकलकर अब पुस्तकों के रूप में आ चुका है।

इन सभी को आप साहित्यकार भले ही न मानें।

मैं तो इन्हें साहित्यकार मान कर इनका सम्मान करना अपना धर्म समझता हूँ।
April 24, 2009 3:42 PM


अब मैं ब्लाग जगत के सभी चिट्ठाकारों से निवेदन करना चाहता हूँ -

कि निम्न दो बिन्दुओं पर अपने-अपने विचार मुझे दिशा-निर्देश के रूप में देने की कृपा करें।

क्या ब्लागर साहित्यकार नही होता है?

क्या साहित्यकार का सामान्य-ज्ञान शून्य होना चाहिए?

"राष्ट्र-संघ में हिन्दी मे भाषण करना होगा।" प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

श्री मदन ‘विरक्त’ के साथ वार्ता करते हुए डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार, कवि व सम्पादक श्री मदन ‘विरक्त’ लोक-सभा के प्रत्याशियों और मतदाताओं से मिलने के लिए 20 अप्रैल से 26 अप्रैल तक पीलीभीत, खटीमा, सितारगंज, किच्छा, टनकपुर के प्रवास पर हैं।


इनकी प्रवास यात्रा एक मात्र उद्देश्य है कि केवल उसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करना है। जो यह संकल्प ले कि संसद में जाकर वह राष्ट्र-भाषा हिन्दी को उसका उचित स्थान दिलवायेगा। इसके लिए श्री मदन ‘विरक्त’ प्रत्याशियों से जन सम्पर्क मे संलग्न हैं।


इस अभियान में वह मतदाताओं से भी संकल्पपत्र भरवा रहे हैं। मैं साहित्य शारदा मंच का अध्यक्ष होने और माँ-भारती का सेवक होने के नाते इस अभियान में इनके पूरी तरह से साथ हूँ।


मूल मन्त्र यह है कि भारत की राष्ट्र-भाषा हिन्दी जिस दिन जन-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो जायेगी। उस दिन भारत स्वतः ही विश्व में अपना गौरवशाली स्थान प्राप्त कर लेगा। इसके लिए राष्ट्र-संघ में हमारे नेताओं को हिन्दी मे भाषण करना होगा।


यह तभी सम्भव है जबकि संसद में ऐसे प्रत्याशी जीत कर जायें। जो हिन्दी के प्रबल समर्थक हों।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

‘जरा बताइए तो’ माथापच्ची के विजेता।


उच्चारण पर ‘जरा बताइए तो’ शीर्षक से माथापच्ची पोस्ट लगाई थी।

इसमें एक चित्र प्रकाशित किया था।

जिसके बारे में स्थान बताते हुए उसका नाम बताना था।

इसका सही उत्तर था-

पीरान कलियर शरीफ दरगाह, रुड़की, उत्तराखण्ड।

इस पर 5 ब्लॉगर्स के सही उत्तर प्राप्त हुए थे।

सबसे पहले स्थान पर रहे-


सर्व श्री आशीष खण्डेलवाल जी।

दूसरे स्थान पर रहीं



माननीया वन्दना अवस्थी दूबे।

तृतीय स्थान पर रहे जाने माने ब्लॉगर




सर्व श्री समीर लाल (उड़न-तश्तरी)।

उपरोक्त को साक्षात्कार के प्रश्न शीघ्र ही प्रेषित किये जायेंगे।

आशा है कि आप सब मेरा

यह निमन्त्रण स्वीकार करने की कृपा करेंगे।

प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने

वालों को साहित्य शारदा मंच,खटीमा की ओर से

साहित्य-श्री

की सर्वोच्च उपाधि से अलंकृत किया जायेगा।

सही उत्तर देने वाले चौथे और पाँचवें ब्लॉगर्स

सर्व श्री ताऊ रामपुरिया

और श्री रावेंद्रकुमार रवि रहे।

उच्चारण की ओर से मैं डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

सही उत्तर देने वाले इन सब ब्लॉगर्स को

हार्दिक बधायी प्रेषित करता हूँ ।

"लब्ध प्रतिष्ठित कवि मदन ‘विरक्त’ का एक राष्ट्रीय गीत।" प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

लब्ध प्रतिष्ठित कवि मदन ‘विरक्त’

अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारः 15 सितम्बर, 1970, प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय कृषि पत्र प्रदर्शनी (इफ्जा) में कृषि पत्र के श्रेष्ठ सम्पादन के लिए सम्मानित।

श्रेष्ठ सहकारी सम्पादक सम्मानः भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ द्वारा 10 जनवरी 1986 को सम्मानित।

हिन्दी सेवी सम्मानः दिल्ली प्रादेशिकहिन्दी साहित्य सम्मेलन, महामना मण्डल द्वारा

26 दिसम्बर 1976 को सम्मानित।

राजधानी पत्रकार मंच द्वारा नई दिल्ली में हिन्दी सेवी सम्मान 14 सितम्बर 2008 को सम्मानित।

साहित्य-श्री सम्मान से उत्तराखण्ड साहित्य शारदा मंच द्वारा 2007 हिन्दी दिवस पर सम्मानित।

डा. अम्बेडकर मानद उपाधिः भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा हिमाचल भवन में

8 अगस्त 1987 को तत्कालीन केन्द्रीय सूचना मन्त्री श्री एच.के.एल. भगत द्वारा सम्मानित।

राष्ट्र नेता स्मृति इफ्जा राष्ट्रीय सम्मान वर्ष-2008

मध्य प्रदेश के राज्यपाल डा। बलराम जाखड़ द्वारा 14 नवम्बर 2009 को सम्मानित।

E-Mail: maharajaaagrasensamachar@gmail.com


वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।

पत्नी उस वीर की हूँ, शस्त्र जिसका गहना।


वीरों की माता के, रूप में जब आती,

गा-गा कर प्यार भरी, लोरियाँ सुनाती,

करती बलिदान पूत, केसरिया पहना।

वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।।


दौज का टीका और राखी के धागे,

भगिनी का प्यार लिए, वीर बढ़े आगे,

सुख-दुख में मुस्काना, धीरज से रहना,

वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।।


मैं वीर नारी हूँ, साहस की बेटी,

मातृ-भूमि रक्षा को, वीर सजा देती,

आकुल अन्तर की पीर, राष्ट्र हेतु सहना।

वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।।


मातृ-भूमि, जन्म-भूमि, राष्ट्र-भूमि मेरी,

कोटि-कोटि वीर पूत, द्वार-द्वार दे री,

जीवन भर मुस्काए, भारत का अंगना।

वीरों की माता हूँ, वीरों की बहना।।

पत्नी उस वीर की हूँ, शस्त्र जिसका गहना।।

"वो आये हैं मन के द्वारे, इक अरसे के बाद।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

वो आये हैं मन के द्वारे, इक अरसे के बाद।

महक उठे सूने गलियारे, इक अरसे के बाद।।

भटके होंगे कहाँ-कहाँ, जाने कैसी मजबूरी थी,

मैंने खोजा यहाँ-वहाँ, लेकिन किस्मत में दूरी थी,

दहक उठे सोये अंगारे, इक अरसे के बाद।

वो आये हैं मन के द्वारे, इक अरसे के बाद।।

जाड़ा बीता, गरमी बीती, रिम-झिम सावन बरस गये,

जल बिन मछली से वो तड़पे, नैन मेरे भी तरस गये,

दूर हुए हैं अब अंधियारे, इक अरसे के बाद।

वो आये हैं मन के द्वारे, इक अरसे के बाद।।

उनके आने से उपवन में, फिर हरियाली छायी है,

पतझड़ की मारी बगिया में, पवन बसन्ती आयी है,

चहक उठे आँगन चौबारे, इक अरसे के बाद।

वो आये हैं मन के द्वारे, इक अरसे के बाद।।

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

"अब छेड़ो कोई नया राग, अब गाओ कोई गीत नया।" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


अब छेड़ो कोई नया राग, अब गाओ कोई गीत नया।
सुलगाओ कोई नयी आग, लाओ कोई संगीत नया।

टूटी सी पतवार निशानी रह जायेगी,
दरिया की मानिन्द जवानी बह जायेगी,
फागुन में खेलो नया फाग, अब गाओ कोई गीत नया।

पीछे-पीछे आओ, समय अच्छा आयेगा,
सोया स्वप्न-सलोना, सच्चा हो जायेगा,
करवट बदलेगा नया भाग, अब गाओ कोई गीत नया।

मंजिल चल कर पास स्वयं ही आ जायेगी,
आशाओं की किरण, नयन में छा जायेंगी,
बालो चन्दा जैसा चिराग, अब गाओ कोई गीत नया।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

"मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




गीत पुराने, नये तराने अच्छे लगते हैं।

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।


जब भी मन ने आँखे खोली, उनका दर्शन पाया,

देखी जब-जब सूरत भोली, तब-तब मन हर्षाया,

स्वप्न सुहाने, सुर पहचाने अच्छे लगते हैं,

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।


रात-चाँदनी, हँसता-चन्दा, तारे बहुत रुलाते,

किसी पुराने साथी की वो, बरबस याद दिलाते,

गम के गाने, नये ठिकाने अच्छे लगते हैं।

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।


घाटी-पर्वत, झरने झर-झर, अभिनव राग सुनाते,

पवन-बसन्ती, रिम-झिम बून्दें, मन में आग लगाते,

देश अजाने, लोग बिराने अच्छे लगते हैं।

मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।


जरा बताइए तो -


माथापच्ची


उत्तराखंड में ये कौन सी जगह है?


सही उत्तर बताने वाले सर्व-प्रथम विजेता का विस्तृत इण्टर-व्यू ,


द्वितीय विजेता का व्यक्तित्व और कृतित्व


तथा तृतीय विजेता का जीवन-वृत्त


उच्चारण पर प्रकाशित किया जायेगा।


समय अवधि-23 अप्रैल, २००९


प्रातः 10 बजे तक।


सोमवार, 20 अप्रैल 2009

"सर्वेक्षण" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नैनीताल में नैनी-सरोवर में कमल तैरने का प्रयास कर रहा है।


हाथ उसे पकड़ने के प्रयास में लगा है।


लेकिन मैदानी क्षेत्र ऊधमसिंहनगर में हाथी मस्त चाल से चल रहा है।


इसकी पकड़ से पहाड़ भी अछूते नही हैं।


‘‘दिनचर्या’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे पड़ोस में शारदा की उपत्यिका में बसा एक सुन्दर नगर टनकपुर के नाम से जाना जाता है।

कई दशक पुरानी बात है। यहाँ एक सज्जन पान की दूकान चलाते थे। उनका नाम गंगाराम पनवाड़ी था। समाज के निचले दर्जे के आदमी थे। उनके 6 बच्चे थे। बड़ी मुश्किल से पान की दूकान से गुजर-बसर हो पाती थी। लेकिन दिनचर्या में उनका जवाब नही था।

रोज शाम को घर आते ही उनका सबसे पहला काम यह होता था कि अलग-अलग गोलकों में हर बच्चे की फीस के पैसे, दूध के पैसे, और आम खर्च के पैसे जरूर जमा करते थे। इसीलिए उनके बच्चों की कभी स्कूल की फीस लेट नही हुई। दूधवाले का पैसा कभी लेट नही हुआ।

आज उनके सभी बच्चे अच्छा पढ़-लिख कर उच्च पदों पर कार्यरत है। समाज में इस परिवार का आदर-मान है।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि लगन हो तो गरीब व्यक्ति भी समाज में अपना स्थान बना सकता है। लेकिन इसके लिए दिनचर्या तो निश्चित करनी ही होगी।

रविवार, 19 अप्रैल 2009

‘‘पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।‘‘ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।


इन गुस्सालों ने अपना गुलशन वीरान बना डाला।।


जागा सबका मन, और माटी का जागा है कण-कण,


जागी कलियाँ और चमन का जागा है हर एक सुमन,


आस्तीन में पलने नही देंगे, कोई विषधर काला।


पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।।



धन-बल से इन्सानों के, ईमान नही बिक पायेंगे,


असली के आगे, नकली भगवान नही टिक पायेंगे,


देश-भक्त इन शैतानों को याद दिला देंगे खाला।


पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।।



जमा विदेशों में सारा, अब काला-धन लाना होगा,


जन-गण-मन में, स्वाभिमान का अलख जगाना होगा,


उग्रवादियों की गरदन में, डालो फाँसी की माला।


पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।।


"कुछ तो बतलाओ?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मरुथल सुन्दर सा लगता है, उनके आने से।

घर भी मन्दिर सा लगता है, उनके आने से।।

मन में शहनाई सी बजती, उनके आने से।

गालों पर अरुणाई सजती, उनके आने से।।

बिन बादल वर्षा आ जाती, उनके आने से।

सूखी सरिता सरसा जाती, उनके आने से।।

पतझड़ में हरियाली आती, उनके आने से।

मौसम में खुशहाली आती, उनके आने से।।

कौन कहाँ के वासी हो कुछ तो जतलाओ?

एक शब्द में अपना परिचय तो बतलाओ ।।


शनिवार, 18 अप्रैल 2009

‘‘प्रश्न चिह्न ???’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो छन्द तलाश रहे इसमें, वो गहरे घावों को देखें।


जो बन्द तलाश रहे इसमें, वो केवल भावों को देखें।।



जब धर्म-मजहब की चक्की में, मानवता पिसती जाती है।


जब पत्थर पर दानवता, नकली चन्दन घिसती जाती है।।



क्यों शेर सभी बिल्ले बन जाते, जब निर्वाचन आता है।


क्यों खूनी पंजे बाहर आते, हो जब निर्वाचन जाता है।।



क्यों पूरी सजा नही मिलती, इन संसद के मतवालों को।


क्यों समयचक्र चलता जाता है, अपनी वक्र कुचालों को।।



जो रचना करती, पाठ-पढ़ाती, आदि-शक्ति ही नारी है।


फिर क्यों अबला जैसे शब्दों की, बनी हुई अधिकारी है।।



प्रश्न-चिह्न हैं बहुत, इन्हें अब हमको शीघ्र हटाना है।


नारी के खोये अस्तित्वों को, फिर भूतल पर लाना है।।


"गुरू सहाय भटनागर बदनाम की एक गजल" प्रस्तुति-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

शादमानी रहेगी



बहारों की महफिल सुहानी रहेगी,

खुदा की मगर मेहरबानी रहेगी।

आप यूँ ही अगर हम से मिलते रहोगे,

चमन में गुलों की निशानी रहेगी।

तेरा साथ है गर तो मंजिल है आसां,

ये हंसीन वादियों भी सुहानी रहेगीं।

दिल जो दिया है तो वादा निभाना,

तेरे इश्क की सादमानी रहेगी।

अगर तोड़ कर दिल कहीं चल दिये तो,

जुवां पर जहाँ की कहानी रहेगी।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

"अच्छा लगता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कभी मानना और कभी मनवाना, अच्छा लगता है।

बीती यादों से मन को बहलाना, अच्छा लगता है।।


छोटी बहनें और सहेली जब घर में आ जाती हैं,

गुड्डे-गुड़िया उन्हें खिलाना , अच्छा लगता है।


ठण्ड-गुलाबी, पवन-बसन्ती, जब बहने लगती है,

उछल-कूद कर पतंग उड़ाना, अच्छा लगता है।


उमड-घुमड़ कर जब बादल नभ में छा जाते हैं,

रिम-झिम में खुद को नहलाना, अच्छा लगता है।


बाल्यकाल की करतूतें जब मन पर छा जाती हैं,

बचपन की यादों में खो जाना, अच्छा लगता है।


बिना भूख के पकवानों में भी तो स्वाद नही है,

भूख पेट में हो तो रूखा खाना, अच्छा लगता है।


यौवन आने पर, संगी-साथी के साथ सुहाते है,

सुख का सुन्दर नीड़-बनाना, अच्छा लगता है।


पचपन में जब श्रीमती जी जम कर डाँट रही हों,

तब मिट्टी का माधौ बन जाना, अच्छा लगता है।


नाती-पोते जब घर भर में, ऊधम काट रहे हों,

बुड्ढों का कुढ़ कर रह जाना, अच्छा लगता है।

‘‘सावधान! जूते चप्पल बाहर ही उतार कर आयें।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं।

उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं।


रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घोषणाएँ हो रही हैं-


‘‘भाइयों और बहनों!

आज आपके नगर में माननीय..........................पधार रहे हैं।


आपसे पुरजोर अपील है कि उनके विचारों को सुनने के लिए अवश्य पधारें।’’


उद्घोषणा का असार हुआ और लोग सभा-स्थल पर पहुँचने लगे।


प्रवेश-द्वार पर दोनों ओर जूते-चप्पल जमा करने के लिए स्टाल लगे थे।


स्टालों पर बड़े-बड़े शब्दों में लिखा हुआ था-


‘‘लोक-तन्त्र के देवता के दर्शन करने और

उनको सुनने के लिए- कृपया जूते चप्पल यहाँ जमा करायें।’’

‘सभा में जूते-चप्पल पहिन कर जाना सख्त मना है।’


सच ही कहा कि भैया! जूते का रौब गालिब है।

जूतों से सब भयभीत हैं।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

एक मुक्तक (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

(चित्र- गूगल छवियाँ से साभार)

त्यागी और बलिदानी, अपना काम कर गये,



लेकिन उनका कोई, प्रतिदान नही पाया है।



भारत के विगत का, नही है इतिहास याद,



आज की कुशलता ने, कल को भुलाया है।



देश के विचारवान, सत्ता के दलालों ने,



वोट माँगने को, अभिनेता को बुलाया है।


‘‘स्वामी रामदेव बाबा का भारत स्वाभिमान आन्दोलन।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


स्वामी रामदेव बाबा के भारत स्वाभिमान आन्दोलन के पाँच लक्ष्यः-


1- 100 प्रतिशत मतदान।

2- 100 प्रतिशत राष्ट्रवादी चिन्तन।

3- 100 प्रतिशत विदेशी कम्पनियों का बहिष्कार।

4- 100 प्रतिशत देशभक्त लोगों को संगठित करना तथा

5- 100 प्रतिशत योगमय भारत का निर्माण।

बाबा रामदेव जी के उपरोक्त लक्ष्यों से मैं स्वयं भी 100 प्रतिशत सहमत हूँ।

परन्तु बाबा जी को एक विनम्र निवेदन के साथ निम्न

सुझाव भी देना चाहता हूँ

परम श्रद्धेय बाबा राम देव जी !

आपके पास जनता का प्रबल समर्थन है।

आप यदि चाहें तो सरकार को निम्न सुझाव मानने को बाध्य कर सकते हैं।

यदि ऐसा सम्भव हो जाता है तो आपके भारत स्वाभिमान के उपरोक्त लक्ष्य

सरलता से पूर्ण हों सकते हैं।

चुनाव कराना सरकार का कार्य है।

इसमें प्रत्याशी की भूमिका अपना नामांकन कराना या

उसे वापिस लेने भर की ही होनी चाहिए ।

लेकिन आज नामांकन के बाद से ही प्रत्याशी की भूमिका मुख्य हो जाती है।

एक-एक प्रत्याशी करोड़ों रुपये इसमें व्यय कर देता है।

इससे मतदाता दिग्भ्रमित तो होते ही हैं, साथ ही कुछ लोभवश भी भ्रष्ट राजनीतिज्ञों

को वोट करने को मजबूर हो जाते हैं।

चुनाव आयोग चाहे कितनी ही सख्ती करे लेकिन उसका तोड़ प्रत्याशी निकाल ही लेता है।

मेरा सुझाव है कि -

क- सरकार/चुनाव आयोग निर्वाचन के लिए प्रत्येक प्रत्याशी से एक निश्चित धनराशि

जमा करा ले और अपने स्तर पर सभी प्रत्याशियों का एक समान प्रचार करे।

ख- जैसे ही प्रत्याशी अपना नामांकन कराये उसे सरकार तब तक अपना मेहमान बनाये,

जब तक कि चुनाव परिणाम घोषित न हों।

क्योंकि चुनाव कराना सरकार का कार्य है। आज भारत की जनता त्रस्त है कि

देश में चुनाव निष्पक्ष नही सम्पन्न हो रहे हैं।

आदरणीय स्वामी जी!

केवल आप ही नही बल्कि देश की 99 प्रतिशत जनता यही चाहती है कि

देश में चुनाव निष्पक्ष हों। सभी की कामना है कि देश की सत्ता ईमानदार लोगों

के हाथों में हो। आप इस दिशा में प्रयास ही नही अपितु आदेश करें।

देश का 100 प्रतिशत मतदाता आपके साथ है।

"वो छन्द सुनाना ना भूली, मैं गीत बनाना भूल गया।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।

वो छन्द सुनाना ना भूली,

मैं गीत बनाना भूल गया।।


शब्दों से जब बतियाता हूँ,

अनजाने में लिख जाता हूँ,

वो स्वप्न सजाना ना भूली,

मैं मीत बनाना भूल गया।

वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।।


मन जब पागल हो जाता है,

उलझन में जब खो जाता है,

वो पथ दिखलाना ना भूली,

मैं दीप जलाना भूल गया।

वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।।


वो संग सुमेधा सी रहती,

मस्तक में मेधा सी रहती,

वो हार बनाना ना भूली,

मैं जीत मनाना भूल गया।

वो प्रीत निभाना ना भूली,

मैं रीत निभाना भूल गया।।

लघु-कथा (एक बहिन ऐसी भी) डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

मैं उस समय ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था। जीवविज्ञान विषय की क्लास में मेरे साथ कुछ लड़कियाँ भी पढ़तीं थीं। परन्तु मैं बेहद शर्मीला था। इसी लिए कक्षाध्यापक ने मेरी सीट लड़कियों की बिल्कुल बगल में निश्चित कर दी थी।

कक्षा में सिर्फ एक ही लड़का मेरा दोस्त था। उसका नाम राम सिंह था। था तो वह काला-कलूटा ही परन्तु लड़कियाँ उसे बहुत पसन्द करती थी। क्योंकि राम सिंह की आर्ट बहुत अच्छी थी। वह यदा-कदा जीव-विज्ञान के चित्र उनको बना कर दे देता था।

मेरे बिल्कुल बगल में ही एक लड़की बैठती थी। उसका नाम मधु था। भोली सी सूरत, साधारण रूप-रेखा। मैं उससे कभी बात नही करता था। लेकिन वो मुझसे बात करने को उतावली रहती थी। बहुत दिनों तक यही दिनचर्या चलती रही।

एक दिन मैं रात को 8 बजे के लगभग रेलवे स्टेशन पर किसी सगे सम्बन्धी को रेल-गाड़ी में बैठा कर आ रहा था।

थोड़ी दूर ही चला था कि मैंने देखा कि- राम सिंह इस लड़की से बदतमीजी कर रहा था। वैसे तो मैं बड़ा शर्मीला था और एकाकी था। परन्तु न जाने कहाँ से मुझमें इतना साहस आ गया कि मैंने राम सिंह की अच्छी तरह से धुलाई कर दी।

बात आई-गयी हो गयी।

दो दिन बाद मैं क्या देखता हूँ कि मधु और उसकी माँ अचानक मेरे घर पर आ गयीं। मेरी माता जी को उन्होंने सारा वाकया सुनाया और मेरी प्रशंसा करने लगे।

माता जी को यह सुन कर बड़ा आश्चर्य भी हुआ कि मेरा लड़का इतना शान्त और सीधा है फिर इसमें इतना साहस कहाँ से आ गया। लेकिन उन्हें मेरी यह करतूत अच्छी लगी। फिर तो मधु के परिवार से हमारे रिश्ते ज्यादा गहरे हो गये।

तब से रक्षाबन्धन पर प्रति वर्ष मधु मुझे राखी बाँधने लगी।

कुछ समय के बाद उसकी शादी धामपुर में एक सम्भ्रान्त परिवार में हो गयी।

आज उसकी आयु 58 - 59 वर्ष की तो जरूर हो गयी है। घर-परिवार में नाती-पोते भी हैं। परन्तु रक्षाबन्धन पर्व पर उसकी राखी आज भी मुझे डाक से अवश्य आती है।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

"तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


झूठे-वादे, कोरे-नारे, झूठा सब अपना-पन है।


तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।



रंग-बिरंगे झण्डे फहराने की, सब में होड़ लगी है,


खुजली वाले नेताओं के, मन में कोढ़ लगी है,


रूखा-सूखा मत का भूखा, बिन पानी का ये घन है।


तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।।



पाँच साल जम कर लूटा, अब लुट जाने के दिन हैं,


वोट बैंक की खातिर, जूतों से पिट जाने के दिन हैं,


कुर्सी की खातिर ये करता, पूजा, हवन, भजन है।


तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

‘सेवा मिशन की बैठक सम्पन्न’’ एक-रपट

"सेवा मिशन की बैठक सम्पन्न"

उत्तराखण्ड के खटीमा में भारती भवन में

राष्ट्रीय वैदिक पूर्व माध्यमिक विद्यालय के सभागार में सेवा मिशन की एक
बैठक आज दिनांक 14-04-2009 को अम्बेदकर जयन्ती के अवसर पर सम्पन्न हुई।

इस अवसर पर सुप्रसिद्ध लकड़ी व्यवसायी बाबू हंस राज सुनेजा ने

अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा- ‘‘आज हर जगह बुजुर्गों की अवहेलना की जा रही है।

इस संस्था के माध्यम से हम उनके परिवार में उनके पुत्रों और पौत्रों को प्रेरणा देगे

कि वह अपने परिवार के वृद्ध जनों को उचित आदर दें।’’

राइस मिलर्स एशोसियेसन के संरक्षक श्री मलिक राज बत्रा ने इस अवसर पर कहा-

‘‘बहुत से ऐसे वृद्ध दम्पति हैं, जिन्हें सहायता की आवश्यकता है। इस संस्था के
माध्यम से ऐसे लोगों को चयनित कर, उन्हें सरकार द्वारा मिलने वाली
वृद्धावस्था पेंशन का लाभ दिलवाने में उनकी सहायता कर सकेंगे।’’

प्रधानाचार्य पद से अवकाश प्राप्त श्री के0सी0 जोशी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा
कि समाज के उपेक्षित वृद्ध व्यक्तियों की सहायता के लिए संस्था आवश्यक कोष की व्यवस्था करेगी और इन जरूरतमन्दों की यथासम्भव सहायता करेगी।
वन निगम के काण्ट्रेक्टर और लकड़ी व्यवसायी श्री जोगेन्द्र सिंह सेठी ने कहा कि

गरीब परिवार की जवान लड़कियों के विवाह में संस्था की ओर से
आर्थिक सहयोग प्रदान किया जायेगा।
अन्त में बैठक के आयोजक डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि
जब हम लोग तीन-तीन कुत्ते पाल सकते हैं तो क्यों न नगर का सर्वेक्षण कर
ऐसे वृद्ध तलाश करें जिनके पास खाने के साधन नही हैं
और उनमें से कई को भरपेट खाना भी नसीब नही है।
ऐसे एक या दो व्यक्तियों को प्रतिदिन अपने घर खाना खिलायें।

बैठक की अध्यक्षता करते हुए उद्योगपति पी0एन0 सक्सेना ने कहा

कि हम दिखावे के लिए विभिन्न सम्मेलनों मे लाखों रुपया व्यय कर देते है।
तो क्यों न समाज के उपेक्षित लोगों की सेवा कर पुण्य के भागीदार बनें।


बैठक का संचालन करते हुए सुप्रसिद्ध समाजसेवी लायन सतपाल बत्रा ने कहा कि

शीघ्र ही इस संस्था की नियमावली बनाई जायेगी

और यह संस्था अपना सेवा का कार्य शुरू कर देगी।

"गीत सरस सरसेंगे।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कल्पनाओं में आओगे तो गीत सरस सरसेंगे।

बन कर बदली छाओगे तो, नीर सरस बरसेंगे।।


बुझे हुए अंगारों में तो, केवल राख मिलेगी।

शमशानों में ढूँढोगे तो, केवल खाक मिलेगी।।


मुझको पाओगे मेरी ही, रचना की परवाजों में।

मधुरिम शब्दों में पाओगे, गीतों की आवाजों में।।


जो बोया जाता है, उसको ही है काटा जाता।

कर्मों के अनुसार, पुण्य-फल को है बाँटा जाता।।


बेहोशी में पड़े रहे तो, प्राण निकल जायेंगे।

प्यार भरी मदहोशी में, अरमान फिसल जायेंगे।।


मौसम के काले कुहरे को, जीवन में मत छाने दो।

सुख-सपनों में कभी नही, इसको कुहराम मचाने दो।।


"चम्पू काव्य" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



आज गूँगा राष्ट्र क्यों अपना हुआ,


जबकि मन सैलाब बहना चाहता।


क्या कहें, किससे कहें, कैसे कहें?


एक वर्ग विशेष हमको रोकता।


बोलने वाले बने क्यों मूक हैं?


दासता में हम नही,


इतने कभी परतन्त्र थे।


क्योंकि वर्ग विशेष हमको,


बोलने को कह रहा था।


एक ही भाषा हमारी,


एक ही तो लक्ष्य था,


एकता के सुर सजा कर,


हम सभी धनवान थे।


सिन्ध से कन्याकुमारी तक,


यही आवाज थी,


तोड़ डालो दासता की बेड़ियाँ।



फिर हुआ आजाद अपना देश प्यारा,


राष्ट्र-भाषा एक घोषित हो गयी।


आज तक काले पुरुष,


गोरे मुखौटों को सजाये फिर रहे हैं,


है यह कैसी महान विडम्बना,


दासता के घन गगन पर घिर रहे हैं।


राज सिंहासन मिला,


हिन्दी के कारण।


किन्तु अब तक राष्ट्र की,


भाषा नही बन पाई है,


इसलिए यह कह रहा हूँ,


सो गया सन्तो का सपना।


आज गूँगा राष्ट्र अपना।।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

"ताज-महल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





चारु-चन्द्र की किरणों का, दुखदायी लगता है अवलोकन।

शीतल चमकीली रातों मे, बोझिल हो जाता सबका मन।।


पूनम की रातों में कैसे, देखूँ सुन्दर ताज महल को,

किया हुआ है दफ्न यहीं, उसने प्यारी मुमताज महल को।

सुख का साथी बिछुड़ गया, तो दोजख ही मानो जीवन।

शीतल चमकीली रातों मे, बोझिल हो जाता सबका मन।।



प्रेमी-युगल यहाँ मत आना, छाया यहाँ विरह का घेरा,

दूर-दूर तक नही सवेरा, यहाँ भरा घन-घोर अन्धेरा,

यहाँ प्रीत का अन्त छिपा है, लुप्त हो गया है अपनापन।

शीतल चमकीली रातों मे, बोझिल हो जाता सबका मन।।



‘‘हमने चाचा की चाची देख ली।’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)






कल ही की तो बात है।

मेरे छोटे पुत्र के लिए एक सज्जन अपनी पुत्री के विवाह का

प्रस्ताव लेकर आये।

मैंने उनसे पूछा-

‘‘अपनी बिटिया का फोटो और बायोडाटा तो लाये होंगे।’’

उन्होंने कहा- ‘‘ जी सर! आपके यहाँ नेट हो तो अभी दिखा देता हूँ।’’

मैं उन्हे अपने पी.सी. पर ले गया।

नेट पर उन्होंने बिटिया का फोटो और बायोडाटा दिखा दिया।

मैंने वो अपने कम्प्यूटर पर सेव कर लिया।

शाम को जब परिवार के लोगों को इसे दिखा रहा था तो मेरी

5 वर्षीया पोती प्राची ने मुझसे पूछा- ‘‘बाबा जी ये किसका फोटो है?’’

मैंने उत्तर दिया- ‘‘बेटा! ये तुम्हारी चाची जी का फोटो है।’’

मेरी 5 वर्षीया पोती उछल-उछल कर जोर-जोर से कहने लगी-


‘‘हमने चाचा की चाची देख ली।’’


"महान टिप्पणीकारों को प्रणाम करता हूँ।" (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



इस पोस्ट को क्या शीर्षक दूँ?

लघु-कथा, हादसा या संस्मरण या शब्द-चित्र।


यदि कोई ब्लागर मित्र सही शीर्षक सुझायें तो उनका बड़ा उपकार होगा।


हिन्दी साहित्य के जाज्वलयमान नक्षत्र महान साहित्यकार


श्री विष्णु प्रभाकर जी के अस्त हो जाने पर कल मैंने अपनी

एक पोस्ट में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए

उन्हें अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि समर्पित की थी।

मेरे एक ब्लागर मित्र ने इस पोस्ट को टिपियाते हुए लिखा था-


‘‘ ............................ शुक्रिया।’’

अब आप स्वयं ही विचार कर लें कि इतना महान साहित्यकार


इस दुनिया से चला गया है। तो उनके लिए श्रद्धांजलि लिखने में

कौन सी विपत्ति आ जाती।

मर जाने जैसे विषय पर "शुक्रिया!"


बहुत खूब।


-०-०--०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०

मेरे दूसरे ब्लागर मित्र ने तो कमाल ही कर दिया।


उन्होंने लिख मारा-


‘‘बहुत सुंदर .................. शास्त्री जी को मेरी भी श्रद्धांजलि।’’

इन्होंने तो मुझ जीते-जागते व्यक्ति को ही अपनी श्रद्धांजलि समर्पित कर दी।


खैर, मुझे "शुक्रिया" और "श्रद्धांजलि" दोनो ही स्वीकार हैं।


आशा है आप सभी टिप्पणीकार मुझ पर कृपादृष्टि बनाए रक्खेंगे।


कहिए जनाब!!


कैसी लगी आपको मेरी ये नई पोस्ट?


रविवार, 12 अप्रैल 2009

"गुरूसहाय भटनागर "बदनाम" का एक शेर" प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

आ के ख्वाबों में मेरे दिल को दुखा जाती है,


दूर से हँस-हँस के मेरी नींद उड़ा जाती है।


मैं रात भर तेरी यादों में खोया रहता हॅू,


दिन के उजाले में दिल का दर्द बढ़ा जाती है।

"टिपियाने में छन्द बन गये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मत ढूढों दर्पण लेकर, कविता अन्तस् में रहती है,

सरिता की धारा ही आँसू बन नयनों में बहती है।


भाव-भाव हैं, छन्द-शास्त्र के कभी रहे मुहताज नही,

सभी बादशाहों के दिल में, रह सकती मुमताज नही।


सागर की गहराई में जाकर ही मोती मिलते हैं,

काँटों की शैय्या पर ही, कोमल गुलाब खिलते हैं।


व्यंग बाण से घायल होकर, आह निकल जाती है,

गजल-गीत की रचना को, लेखनी फिसल जाती है।


दिलवालों की बातें दिलवाले ही जानें,

बे-दिलवाले पीर पराई क्या पहचानें?


अकस्मात् ही भाव बहे और बन्द बन गये,

टिपियाने के लिए अनोखे छन्द बन गये।

"श्री विष्णु प्रभाकर जी को भाव-भीनी श्रद्धांजलि" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



हिन्दी के शीर्षस्थ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी हिन्दी साहित्य को समृद्धशाली बना कर इस लौकिक संसार से हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गये हैं। परन्तु हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर के रूप में लाखों-करोड़ो हिन्दी साहित्य प्रेमियों के दिलों में अपनी कभी न मिटने वाली यादें छोड़ गये हैं।
निश्छल स्वभाव वाले, साहित्य के इस साधक को कौन भुला पायेगा। वे साहित्य को पूर्णतः समर्पित कालजयी साहित्यकार थे।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक छोटे कस्बे मीरापुर में 20 जुलाई 1912 को जन्मे इस साहित्यकार ने जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव झेले और साहित्य की साधना करते चले गये। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री प्रभाकर जी की साहित्यिक प्रतिभा भी बहुमुखी थी।
उन्होंने हिन्दी -साहित्य की विधाओं जैसे- उपन्यास, कहानी-लेखन, एकांकी-लेखन, नाटक, जीवनी, बालोपयोगी साहित्य आदि सभी में अपनी सशक्त लेखनी को चलाया। 1980 के दशक में मैंने रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के एम.ए. के पाठ्यक्रम में उनके नाटक ‘‘युगे-युगे क्रांन्ति’’ के द्वारा उनके गहन चिन्तन-मनन का परिचय पाया था। वह स्मृति आज भी मेरे मन पर उनकी विशेष छाप बनाये हुए है।
मैं इस महान साहित्यकार को प्रणाम करता हूँ।
अपने दिल की गहराइयों से उन्हें भाव-भीनी श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ।

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

"दूध की रखवाली बिल्ले ही करने में लगे हैं।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आज अधिकतर लोग भारत को कुतरने में करने में लगे हैं। जिसे भी देखता हूँ वही इसका कुछ न कुछ नोच ही लेता है और अपनी कर्तव्य परायणता पूरी कर लेता है। इसीलिए मेरा प्यारा देश! उपहास का पात्र बनता जा रहा है।

ताऊ रामपुरिया अक्सर इस पर अपनी कलम चलाते हैं तो मुझे अच्छा लगता है।

इस कड़ी को मैं एक कथानक के माध्यम से स्पष्ट कर रहा हूँ। जो बचपन में मेरे ताऊ जी मुझे सुनाया करते थे।

एक प्राईमरी स्कूल के मास्टर साहब थे। वे स्कूल परिसर में ही एक टीन शेड में रहते थे।

संयोग से दो दिन बाद स्कूल में डिप्टी साहब का दौरा होने वाला था।

मास्टर साहब ने तुरत-फुरत बाजार जाकर कुरते-पाजामे का कपड़ा लिया और दर्जी को सिलने के लिए दे आये। अगले ही दिन दर्जी ने उनका कुरता पाजामा सिल कर उनके घर पहुँचा दिया।

मास्टर साहब ने दर्जी के जाने के बाद इसे पहिन कर देखा तो कुर्ता तो ठीक था परन्तु पाजामा कुछ दो इंच लम्बा हो गया था।

मास्टर साहब ने अपनी पत्नी से कहा- ‘‘भगवान! कल स्कूल में डिप्टी साहब का मुआयना है। मेरा पाजामा 2 इंच काट कर फिर से तुरपाई कर दो।’’

मास्टर साहब की पत्नी ने कहा- ‘‘सुनो जी मेरी फुरसत नही है। बेकार के काम मुझे मत बताया करो।’’

अब मास्टर साहब अपनी बड़ी पुत्री के पास गये और उससे कहा- ‘‘बिटिया रानी! मेरा पाजामा दर्जी ने दो इंच बड़ा सिल दिया है। इसे दो-इंच काट कर तुरपाई कर दो।’’

बड़ी बेटी ने कहा- ‘‘पिता जी! मेरे कल से इम्तिहान होने वाले हैं। आप इसे दर्जी से ही ठीक करा लो।’’

कुछ इसी तरह का बहाना छोटी बेटी ने भी बना दिया।

अब मास्टर जी ने सोचा कि मैं ही इसे 2 इंच काट कर छोटा कर लेता हूँ और उन्होंने पाजामा ठीक करके खूँटी पर टाँग दिया।

इधर मास्टरनी जी को भी ख्याल आया तो उन्होंने भी पाजामामे पर कैंची चला कर ठीक करके फिर से उसी खूँटी पर टाँग दिया।

यही करामात दोनों बेटियों ने भी कर दी और पाजामे को ज्यों का त्यों खूँटी पर टाँग दिया।

अगले दिन जेसे ही डिप्टी साहब के स्कूल में आने की हल-चल हुई तो मास्टर साहब ने जल्दी से कुरता पाजामा पहना और बन-ठन कर कक्षा में आ गये।

छात्र-छात्राएँ मास्टर साहब को देख कर हँसने लगे तो मास्टर जी ने कहा-‘‘देखते नही, डिप्टी साहब मुआयने के लिए आये हैं और आप लोग हँस रहे हैं।"

अब डिप्टी साहब ने भी मास्टर जी की ओर ध्यान दिया तो वह भी हँसते हुए बोले- ‘‘मास्टर जी! पहले अपने को तो देखो। आपने यह जो पहन रखा है, ना तो यह पाजामा है और नही घुटन्ना है।’’

कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे देश की भी दशा मास्टर जी के पाजामे से कम नही है।

आज देश के कर्णधार नेता गण ही इसे सबसे ज्यादा कुतरने में लगे हैं।

दूध की रखवाली बिल्ले ही करने में लगे हैं।

सच्ची बात है भैया! राम नाम ....................है।

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