"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 31 मई 2009

‘‘जलद जल धाम ले आये।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


चमकती बिजुरिया चपला,

गगन में मेघ है छाये।

मिटाने प्यास धरती की,

जलद जल धाम ले आये।


धरा की घास थी सूखी,

त्वचा थी राख सी रूखी,

हुई घनघोर जब बारिस,

नदी-नाले उफन आये।

मिटाने प्यास धरती की,

जलद जल धाम ले आये।।


दिवस में छिप गया सूरज,

दबा माटी का उड़ता रज,

किसानों के लिए बादल,

सुधा का जाम ले आये।

मिटाने प्यास धरती की,

जलद जल धाम ले आये।।


लगी है झड़ी सावन की,

जगी है आग विरहिन की,

मिलन की आस में उनके,

हृदय के कुसुम मुरझाये।

मिटाने प्यास धरती की,

जलद जल धाम ले आये।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

‘‘तितली रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

मन को बहुत लुभाने वाली,

तितली रानी कितनी सुन्दर।


भरा हुआ इसके पंखों में,


रंगों का है एक समन्दर।।


उपवन में मंडराती रहती,


फूलों का रस पी जाती है।


अपना मोहक रूप दिखाने,


यह मेरे घर भी आती है।।


भोली-भाली और सलोनी,


यह जब लगती है सुस्ताने।


इसे देख कर एक छिपकली,


आ जाती है इसको खाने।।


आहट पाते ही यह उड़ कर,


बैठ गयी है चौखट के ऊपर।


मेरा मन भी ललचाया है,


मैं भी देखूँ इसको छूकर।।


इसके रंग-बिरंगे कपड़े,


होली की हैं याद दिलाते।


सजी धजी दुल्हन को पाकर,


बच्चे फूले नही समाते।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, 30 मई 2009

‘‘सेल-फोन (मोबाइल)’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


पापा ने दिलवाया मुझको,

सेल-फोन इक प्यारा सा।

मन-भावन रंगों वाला,

यह एक खिलौना न्यारा सा।।

रोज सुबह को मुझे जगाता,

मोबाइल कहलाता है।

दूर-दूर तक बात कराता,

सही समय बतलाता है।।

नम्बर डायल करो कहीं भी,

पता-ठिकाना बतलाओ।

मुट्ठी में इसको पकड़ो और,

संग कही भी ले जाओ।।

इससे नेट चलाओ चाहे,

बात करो दुनिया भर में।

यह सबके मन को भाता है,

लोकलुभावन घर-घर में।।

बटन दबाते ही मोबाइल,

काम टार्च का देता है।

पलक झपकते ही यह सारा,

अंधियारा हर लेता है।।

सेल-फोन इस युग का,

इक छोटा सा है कम्प्यूटर।

गुणा-भाग करने वाला,

बन जाता कैल-कुलेटर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शुक्रवार, 29 मई 2009

‘‘बालक की इच्छा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



मैं अपनी मम्मी-पापा के,


नयनों का हूँ नन्हा-तारा।


मुझको लाकर देते हैं वो,


रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।


मुझे कार में बैठाकर,


वो रोज घुमाने जाते हैं।


पापा जी मेरी खातिर,


कुछ नये खिलौने लाते हैं।।


मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,


वो फूले नही समाते हैं।


जग के स्वप्न सलोने,


उनकी आँखों में छा जाते हैं।।


ममता की मूरत मम्मी-जी,


पापा-जी प्यारे-प्यारे।


मेरे दादा-दादी जी भी,


हैं सारे जग से न्यारे।।


सपनों में सबके ही,


सुख-संसार समाया रहता है।


हँसने-मुस्काने वाला,


परिवार समाया रहता है।।


मुझको पाकर सबने पाली हैं,


नूतन अभिलाषाएँ।


क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,


उनकी सारी आशाएँ।।


मुझको दो वरदान प्रभू!


मैं सबका ऊँचा नाम करूँ।


मानवता के लिए जगत में,


अच्छे-अच्छे काम करूँ।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


गुरुवार, 28 मई 2009

‘‘मदारी का खेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



देखो एक मदारी आया।

अपने संग लाठी भी लाया।।

डम-डम डमरू बजा रहा है।

भालू, बन्दर नचा रहा है।।

लम्बे काले बालों वाला।

भालू का अन्दाज निराला।।

खेल अनोखे दिखलाता है।

बच्चों के मन को भाता है।।

वानर है कितना शैतान।


पकड़ रहा भालू के कान।।

यह अपनी धुन में ऐँठा है।

भालू के ऊपर बैठा है।।

लिए कटोरा पेट दिखाता।

माँग-माँग कर पैसे लाता।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 27 मई 2009

‘‘कौआ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कौआ बहुत सयाना होता।

कर्कश इसका गाना होता।।

पेड़ों की डाली पर रहता।

सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।

कीड़े और मकोड़े खाता।

सूखी रोटी भी खा जाता।।

सड़े मांस पर यह ललचाता।

काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।

साफ सफाई करता बेहतर।

काला-कौआ होता मेहतर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 26 मई 2009

‘‘भँवरा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


गुन-गुन करता भँवरा आया।

कलियों-पुष्पों पर मंडराया।।

यह गुंजन करता उपवन में।

गीत सुनाता है कानन में।।

कितना काला इसका तन है।

किन्तु बड़ा ही उजला मन है।।

जामुन जैसी शोभा न्यारी।

खुशबू इसको लगती प्यारी।।

यह फूलों का रस पीता है।

मीठा रस पीकर जीता है।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 25 मई 2009

‘‘चिड़िया रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,

मीठा राग सुनाती हो।

आनन-फानन में उड़ करके,

आसमान तक जाती हो।।


मेरे अगर पंख होते तो,

मैं भी नभ तक हो आता।

पेड़ो के ऊपर जा करके,

ताजे-मीठे फल खाता।।


जब मन करता मैं उड़ कर के,

नानी जी के घर जाता।

आसमान में कलाबाजियाँ कर के,

सबको दिखलाता।।


सूरज उगने से पहले तुम,

नित्य-प्रति उठ जाती हो।

चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,

मुझको रोज जगाती हो।।


तुम मुझको सन्देशा देती,

रोज सवेरे उठा करो।

अपनी पुस्तक को ले करके,

पढ़ने में नित जुटा करो।।


चिड़िया रानी बड़ी सयानी,

कितनी मेहनत करती हो।

एक-एक दाना बीन-बीन कर,

पेट हमेशा भरती हो।।


अपने कामों से मेहनत का,

पथ
हमको दिखलाती हो।।

जीवन श्रम के लिए बना है,

सीख यही सिखलाती हो।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

रविवार, 24 मई 2009

आशा का दीप जलाया क्यों? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आज मेरे एक मित्र ने मुझे फोन करके मेरी आज की पोस्ट के बारे में कहा-
‘‘शास्त्री जी! आप इतना अच्छा लिखते हैं, आपकी यह पोस्ट स्तरीय नही है।’’
बस उन्हीं के अनुरोध पर उसी तर्ज पर यह गीत रचा है,
आशा है कि उन्हें पसन्द आ जायेगा।

मन के सूने से मन्दिर में, आशा का दीप जलाया क्यों?

वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?


प्यार, प्यार है पाप नही है, इसका कोई माप नही है,

यह तो है वरदान ईश का, यह कोई अभिशाप नही है,

दो नयनों के प्यालों में, सागर सा नीर बहाया क्यों?

वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?


मुस्काओ स्वर भर कर गाओ, नगमों को और तरानों को,

गुंजायमान करदो फिर से, इन खाली पड़े ठिकानों को,

शीशे से भी नाजुक दिल मे, गम का अम्बार समाया क्यों?

वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?


स्वप्न सलोने जो छाये हैं, उनको आज धरातल दे दो,

पीत पड़े प्यारे पादप को, गंगा का निर्मल जल दे दो,

रस्म-रिवाजों के कचरे से, यह घर-द्वार सजाया क्यों?

वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

‘‘अभिनव संसार बसाया क्यों?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जब मन में विश्वास नहीं था, मुझको यार बनाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों??

दुनियादारी में पड़ करके, कुछ रीत निभाई जाती हैं,
मन्दिर में मूरत गढ़ करके ही, प्रीत दिखाई जाती है,
छल-छद्म,प्रपंच चला करके, गन्दा व्यापार रचाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों?

मैंने स्वर भर-भर कर गाया, तुमको अपने सब गानों में,
लेकिन तुम उलझे थे केवल, सुख के ही मधुर तरानों मे,
नौसिखिये नाविक के हाथों मे, फिर पतवार थमाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों??

झूठे वादे, मलिन इरादे, झूठा सब अपनापन था,
स्वार्थसिद्ध करने भर को ही, प्रेम तुम्हारा अनुपम था,
आगा-पीछा बिन सोचे ही, अपना घर-द्वार सजाया क्यों?
अपने नयनों के प्यालों में, अभिनव संसार बसाया क्यों??

शनिवार, 23 मई 2009

‘‘पतंग का खेल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लाल और काले रंग वाली,

मेरी पतंग बड़ी मतवाली।


मैं जब विद्यालय से आता,


खाना खा झट छत पर जाता।

पतंग उड़ाना मुझको भाता,

बड़े चाव से पेंच लड़ाता।


पापा-मम्मी मुझे रोकते,


बात-बात पर मुझे टोकते।


लेकिन मैं था नही मानता,


इसका नही परिणाम जानता।


वही हुआ था, जिसका डर था,


अब मैं काँप रहा थर-थर था।


लेकिन मैं था ऐसा हीरो,


सब विषयों लाया जीरो।


अब नही खेलूँगा यह खेल,


कभी नही हूँगा मैं फेल।


आसमान में उड़ने वाली,


जो करती थी सैर निराली।


मैंने उसे फाड़ डाला है,


छत पर लगा दिया ताला है।

मित्रों! मेरी बात मान लो,


अपने मन में आज ठान लो।

पुस्तक लेकर ज्ञान बढ़ाओ।

थोड़ा-थोड़ा पतंग उड़ाओ।।


(चित्र गूगल खोज से साभार)

शुक्रवार, 22 मई 2009

‘‘टिप्पणी या कविता्’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिसने कभी नही पाया, ममता का गहरा सागर।

सूनी होगी चादर, सूखी सी होगी उसकी गागर।।

मधुवन में मधुमास नही, पतझड़ उसको मिलते होंगे।

उसके जीवन में खुशियों के, फूल कहाँ खिलते होंगे।।

ममता की जब छाँव नही, अमृत भी गरल सने होंगे।

आशाएँ सब सूनी होंगी, पथ सब विरल घने होंगे।।

कृष्ण-कन्हैया को द्वापर में, मिला यशोदा का आँचल।

कलयुग में क्या मिल पायेगा, ऐसी माता का आँचल।।

हे प्रभो! बालक दो तो उसको, माता की छाया देना।

माँ को पास बुलाते हो तो, शिशु को मत काया देना।।

गुरुवार, 21 मई 2009

"टोपी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गंजापन ढकने को टोपी, मेरे सिर पर रहती है।
ठिठुरन से रक्षा करती हूँ , बार-बार यह कहती है।।



देखो अपनी गाँधी टोपी,
सारे जग से न्यारी है।
आन-बान भारत की है ये,
हमको लगती प्यारी है।।






लालबहादुर और जवाहर जी ने,
इसको धार लिया।
भारत का सिंहासन इनको,
टोपी ने उपहार दिया।।






टोपी पहिन सुभाषचन्द्र,
लाखों में पहचाना जाता।
टोपी वाले नेता का कद,
ऊँचा है माना जाता।।






खादी की टोपी, धोती,
कुर्ते, की शान निराली है।
बिना पढ़े ही ये पण्डित,
का मान दिलाने वाली है।।


टोपी पहन सलामी,
अपने झण्डे को हम देते हैं।
राष्ट्र हेतु मर-मिटने का प्रण,
हम खुश होकर लेते है।।
(चित्र गूगल से साभार)

बुधवार, 20 मई 2009

"कम्प्यूटर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


यह मेरा कम्प्यूटर प्यारा,

इसमें ज्ञान भरा है सारा।


भइया इससे नेट चलाते,

नई-नई बातें बतलाते।


यह प्रश्नों का उत्तर देता,

पल भर में गणना कर लेता।





माउस, सी.पी.यू, मानीटर,


मिलकर बन जाता कम्प्यूटर।





इसमें ही की-बोर्ड लगाते,

जिससे भाषा को लिख पाते।

नया जमाना अब है आया,

हमने नया खजाना पाया।


बड़ा अनोखा है यह टीचर,

सभी सीख लो अब कम्प्यूटर।

मंगलवार, 19 मई 2009

‘‘मेरी गैया बड़ी निराली’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरी गैया बड़ी निराली,

सीधी-सादी, भोली-भाली।


सुबह हुई काली रम्भाई,

मेरा दूध निकालो भाई।

हरी घास खाने को लाना,

उसमें भूसा नही मिलाना।


उसका बछड़ा बड़ा सलोना,

वह प्यारा सा एक खिलौना।

मैं जब गाय दूहने जाता,

वह अम्मा कहकर चिल्लाता।

सारा दूध नही दुह लेना,

मुझको भी कुछ पीने देना।


थोड़ा ही ले जाना भैया,

सीधी-सादी मेरी मैया।
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 18 मई 2009

"शिक्षित-बेकारों का दामन, रोजगार से भरना होगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जो कमजोर वजीरे-आजम की, स्वर लहरी बोल रहे थे।

शासन स्वयं चलाने को, मुँह में रसगुल्ले घोल रहे थे।।


उनको भारत की जनता ने, सब औकात बता डाली है।

कितनों की संसद में जाने की, अभिलाष मिटा डाली है।।



मनसूबे सब धरे रह गये, सपने चकनाचूर हो गये।

आशा के विपरीत, मतों को पाने को मजबूर हो गये।।



फील-गुड्ड के नारे को तो, पहले ही ठुकरा डाला था।

अब भी नही निवाला खाया, जो चिकना-चुपड़ा डाला था।।



माया का लालच भी जन, गण, मन को, कोई रास न आया।

लालू-पासवान के जादू ने, कुछ भी नही असर दिखाया।।



जिसने जूता खाया, उसको हार, हार का हार मिला है।

पाँच साल तक घर रहने का, बदले में उपहार मिला है।।



लोकतन्त्र के महासमर में, असरदार सरदार हुआ है।

ई.वी.एम. के भवसागर में, फिर से बेड़ा पार हुआ है।।


जनता की उम्मीदों पर, अब इनको खरा उतरना होगा।

शिक्षित-बेकारों का दामन, रोजगार से भरना होगा।।

रविवार, 17 मई 2009

"सबका बस ये ही है रोना" डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


क्रम ऐसा ही चलता रहता,

जीवन यों ही ढलता रहता,

खारे आँसू का जल पीना,

हरदम सपनों में ही खोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


होली हो या हो दीवाली,

पतझड़ हो या हो हरियाली,

घुट-घुट कर पड़ता है जीना,

भार कठिन है अपना ढोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


कागा बोले कोयल बोले,

कड़ुआ बोले या रस घोले,

उनके बिन लगता सब सूना,

खाली है मन का हर कोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।


भूखी अँखिया प्यासी अँखिया,

चंचल शोख उदासी अँखिया,

अक्सर अक्स उभर आता है,

बनकर मीठा स्वप्न सलोना।

प्रेम-रोग में गम का होना,

सबका बस ये ही है रोना।

शनिवार, 16 मई 2009

"नाम अलग हैं, पन्थ भिन्न हैं, पर जग में भगवान एक है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे।
भक्तों को लगते हैं प्यारे।।

हिन्दू मन्दिर में हैं जाते।

देवताओं को शीश नवाते।।

ईसाई गिरजाघर जाते।

दीन-दलित को गले लगाते।।


अल्लाह का फरमान जहाँ है।
मुस्लिम का कुर-आन वहाँ है।।

जहाँ इमाम नमाज पढ़ाता।

मस्जिद उसे पुकारा जाता।।


सिक्खों को प्यारे गुरूद्वारे,
मत्था वहाँ टिकाते सारे।।

राहें सबकी अलग-अलग हैं।

पर सबके अरमान नेक है।

नाम अलग हैं, पन्थ भिन्न हैं।

पर जग में भगवान एक है।।

(सभी चित्र गूगल से साभार)

शुक्रवार, 15 मई 2009

‘‘बस एक मुलाकात में, ही शेर गढ़ लिया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बस एक मुलाकात में, ही शेर गढ़ लिया।

आँखों में आँख डाल करके, प्यार पढ़ लिया।।


भावनाओं ने नयी भाषा निकाल ली,

कामनाओं ने भी दिलासा निकाल ली,

दुर्गम पहाड़ियों पे, तेरा यार चढ़ लिया।

आँखों में आँख डाल करके, प्यार पढ़ लिया।।


मैने गगन से एक आफताब पा लिया,

बदली से मैंने एक माहताब पा लिया,

रस्मो-रिवाज तोड़के, उस पार बढ़ लिया।

आँखों में आँख डाल करके, प्यार पढ़ लिया।।

गुरुवार, 14 मई 2009

"क्यों नाहक मन भरमाते हो?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


दर्पण साथ नही देगा, क्यों नाहक मन भरमाते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


मौसम के काले कुहरे को, जीवन में मत छाने दो,

सुख-सपनों में कभी नही, इसको कुहराम मचाने दो,

धरती पर बसने वालो, क्यों आसमान तक जाते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


नाम मुहब्बत है जिसका, वो जीवन भर तड़पाती हैं,

खुश-नसीब को हर्षाती यह, बाकी को भरमाती है,

सुमन चुनों उपवन में से, क्यों काँटे चुन कर लातें हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


मन को वश मे कर लो, देता सन्देशा है भव-सागर,

सलिल सुधा से भर जायेगी, प्रेम-प्रीत की ये गागर,

मंजिल पर जाना है तो, क्यों राहों से घबराते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?


खट्टी-मीठी यादों से ,खाली मन को मत भरमाना,

मुरझाये उपवन को फिर से, हरा-भरा करते जाना,

अपनेपन की बात करो, क्यों बे-मतलब लहराते हो?

हुस्न-इश्क के झण्डे को, क्यों डण्डे बिन फहराते हो?

बुधवार, 13 मई 2009

"कुटिल-चक्र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आज समय का, कुटिल - चक्र चल निकला है।

संस्कार का दुनिया भर में, दर्जा सबसे निचला है।।

नैतिकता के स्वर की लहरी मंद हो गयी।

इसीलिए नूतन पीढ़ी, स्वच्छन्द हो गयी।।

अपनी गल्ती को कोई स्वीकार नही करता है।

दोष स्वयं के, सदा दूसरों के माथे पर धरता है।।

सबके अपने नियम और सबका अन्दाज निराला है।

बिके हुए हर नेता के मुँह पर तो लटका ताला है।।

पत्रकार का मतलब था, निष्पक्ष और विद्वान-सुभट।

नये जमाने में इसकी, परिभाषाएँ सब गई पलट।।

नटवर लाल मीडिया पर, छा रहे बलात् बाहुबल से।

गाँव शहर का छँटा हुआ, अब जुड़ा हुआ है चैनल से।।

गन्दे नालों और नदियों की, बहती है अविरल धारा।

नहाने वाले पर निर्भर है, उसको क्या लगता प्यारा??

सोमवार, 11 मई 2009

‘‘राह खुशियों की आसान हो जायेगी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गम के दरिया से बाहर निकालो कदम,

राह खुशियों की आसान हो जायेगी।

रोने-धोने से होंगे न आँसू खतम,

उलझनें भारी पाषाण हो जायेगी।।


साँस को मत कुरेदो बहक जायेगी,

आग को मत कुरेदो चहक जायेगी,

भूल जाना जफा, याद करना वफा,

जिन्दगी एक वरदान हो जायेगी।

रोने-धोने से होंगे न आँसू खतम,

उलझनें भारी पाषाण हो जायेगी।।


फूल काँटों मे रहकर भी रोता नही,

दर्द सहता है, मुस्कान खोता नही,

बाँट लो प्यार और काट लो जिन्दगी,

सुख की घड़ियाँ मेहरबान हो जायेगी।

रोने-धोने से होंगे, न आँसू खतम,

उलझनें भारी पाषाण हो जायेगी।।


जिसने अमृत चखा, वो फकत देव है,

पी लिया जिसने विष, वो महादेव है,

दो कदम तुम चलो, दो कदम हम चलें,

एक दिन जान-पहचान हो जायेगी।

रोने-धोने से होंगे, न आँसू खतम,

उलझनें भारी पाषाण हो जायेगी।।

रविवार, 10 मई 2009

‘‘बाल-गीत’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हाथी दादा सूंड उठा कर,


चले देखने मेला।

बन्दर मामा साथ हो लिया,

बन करके उनका चेला।




चाट पकौड़ी खूब उड़ाई,

देख चाट का ठेला।


बड़े मजे से फिर दोनों ने,

जम करके खाया केला।

अब दोनों आपस में बोले,

अच्छा लगा बहुत मेला।



शनिवार, 9 मई 2009

"बाँध लो बिस्तर जहाँ से हो चुकी अब बन्दगी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


हर किसी की जिन्दगी है बस अधूरी जिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ से हो चुकी अब बन्दगी।।

इक अधूरी प्यास को सब साथ लेकर जायेंगे,
प्यार के बीते बरस अब लौट कर नही आयेंगे,
काम अच्छे कर चलो, होगी नही शरमिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ से हो चुकी अब बन्दगी।।

कण्टकों की राह पर, पत्थर गड़ेंगे पाँव में,
रात दिन चलना पड़ेगा धूप में और छाँव में,
स्वर्ग होगा भाग्य में या फिर नरक की गन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ से हो चुकी अब बन्दगी।।

जब चलेगी बात गाँवों, और गली में प्रीत की,
गुन-गुनायेगा कली, जब कोई मेरे गीत की,
फिर कोई गुलशन खिलेगा, जी उठेगी जिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ से हो चुकी अब बन्दगी।।

हर किसी की जिन्दगी है बस अधूरी जिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर जहाँ से हो चुकी अब बन्दगी।।

शुक्रवार, 8 मई 2009

‘‘प्रश्न जाल’’ ‘‘चम्पू छन्द’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कौन थे? क्या थे? कहाँ हम जा रहे?

व्योम में घश्याम क्यों छाया हुआ?

भूल कर तम में पुरातन डगर को,

कण्टकों में फँस गये असहाय हो,

वास करते थे कभी यहाँ पर करोड़ो देवता,

देवताओं के नगर का नाम आर्यावर्त था,

काल बदला, देव से मानव कहाये,

ठीक था, कुछ भी नही अवसाद था,

किन्तु अब मानव से दानव बन गये,

खो गयी जाने कहाँ? प्राचीनता,

मूल्य मानव के सभी तो मिट गये,

शारदा में पंक है आया हुआ,

हे प्रभो! इस आदमी को देख लो,

लिप्त है इसमे बहुत शैतानियत,

आज परिवर्तन हुआ कैसा घना,

हो गयी है लुप्त सब इन्सानियत।

निवेदन (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री‘मयंक’)

प्रिय ब्लागर मित्रों!

रिश्तेदारी निभाने के लिए एक सप्ताह के लिए सुदूर स्थान पर जा रहा हूँ।

इस अवधि में मेरी रचनाएँ तो मेरे ब्लाग पर प्रकाशित होती ही रहेंगी।

परन्तु चाह कर भी आपकी रचनाएँ पढ़ने को नही मिलेंगी।

आशा ही नही आप सबका स्नेह व प्यार मुझे पूर्ववत् मिलता रहेगा।

तुम्हारी याद को लेकर, बड़ी ही दूर आये हैं।

छिपाकर अपनी आँखों में तुम्हारा नूर लाये हैं।

लबों पर प्यास आयी तो, तुम्हारे जाम पाये हैं।

लिखाकर तन-बदन में, हम तुम्हारा नाम लाये हैं।

गुरुवार, 7 मई 2009

‘‘स्वागत-गीत’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लगभग 24 वर्ष पूर्व मैंने एक स्वागत गीत लिखा था।
इसकी लोक-प्रियता का आभास मुझे तब हुआ, जब खटीमा ही नही
इसके समीपवर्ती क्षेत्र के विद्यालयों में भी इसको विशेष अवसरों पर गाया जाने लगा।
आप भी देखे-
स्वागतम आपका कर रहा हर सुमन। 
आप आये यहाँ आपको शत नमन।। 

भक्त को मिल गये देव बिन जाप से, 
धन्य शिक्षा-सदन हो गया आपसे, 
आपके साथ आया सुगन्धित पवन। 
आप आये यहाँ आपको शत नमन।।

हमको सुर, तान, लय का नही ज्ञान है, 
गल्तियाँ हों क्षमा हम तो अज्ञान हैं, 
आपका आगमन, धन्य शुभ आगमन। 
आप आये यहाँ आपको शत नमन।। 

अपने आशीश से धन्य कर दो हमें, 
देश को दें दिशा ऐसा वर दो हमें, 
अपने कृत्यों से लायें, वतन में अमन। 
आप आये यहाँ आपको शत नमन।। 

दिल के तारों से गूँथे सुमन हार कुछ, 
मंजु-माला नही तुच्छ उपहार कुछ, 
आपको हैं समर्पित हमारे सुमन। 
आप आये यहाँ आपको शत नमन।। 

स्वागतम आपका कर रहा हर सुमन। 
आप आये यहाँ आपको शत नमन।। 
स्वागतम-स्वागतम, स्वागतम-स्वागतम!!

बुधवार, 6 मई 2009

‘‘धूप का संसार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

धूप के संसार में

लोग

मोम जैसे बन गये हैं,

हर चेहरा,

सुबह को कुछ और है,

जाना पहचाना सा लगता है,

परन्तु

शाम तक,

पिघल जाता है

और

बदसूरत हो जाता है,

वह

अपना रूप,

आकृति

सब कुछ बदल लेता है।

मंगलवार, 5 मई 2009

‘‘हमारा राजा भी तो, हमीं को खाकर, जीवित है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कहते हैं,

मनुष्य योनी,

श्रेष्ठ कहलाती है,

तभी तो, पतन की ओर,

उन्मुख होती चली जाती है,

श्रेष्ठता की

चरम सीमा,

मनुष्य,

जीव जन्तुओं का बना रहा है,

कीमा,

हे जीव-जन्तुओ!

तुम अपने राजा से

परिवाद क्यों नही करते?

न्याय की,

गुहार क्यों नही करते?

तभी इन निरीह जीवों की,

आवाज आती है,

जो,

हृदय को हिला जाती है,

हमारी,

शिकायत सुनेगा कौन?

अन्धेर नगरी में,

सभी तो हैं मौन,

हमारा तो,

अहित ही अहित है,

क्योंकि,

हमारा राजा भी तो,

हमीं को खाकर जीवित है।

सोमवार, 4 मई 2009

‘‘आज हो गयी 103 दिन में 200 पोस्ट पूरी’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


‘‘महाप्रयाण’’


आज मानव की स्थिति है

रेगिस्तान में

फँसे गधे की भाँति,

जिसमें मृग-मरीचिका के समान

उसे दिखाई देती है

पानी की पाँति,

जल की खोज में

इधर-उधर भागता रहता है,

रात में भी

जागता रहता है,

पानी का

होता तो है आभास,

परन्तु

बुझा नही पाता

अपनी प्यास,

वह चलता जाता है,

और चलता जाता है,

भवसागर से

अधूरी प्यास लिए

दुनिया से चला जाता है,

वह एक सन्देश,दे जाता है,

दुःख उठाते रहो,

जब तक देह में प्राण है,

शायद, जीवन का,

यही ‘‘महाप्रयाण’’ है।।

‘‘नियति’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


जहाँ न पहुँचे रवि,

वहाँ पहुँचे कवि,

इस उक्ति को

यदि सत्य मान लें,

तो इतना भी जान लें,

कवि ही

समाजरूपी भवन का

सुदृढ़ स्तम्भ है,

कवि ही

संस्कृति का आलम्ब है,

क्योंकि,

आज का समाज है

एक जर्जर समाज,

इसके अनोखे हैं ढंग,

इसीलिए तो बदरंग हैं

कविता के रंग,

विलुप्त हो गई है

गति और यति

शायद इसकी

यही है नियति।


रविवार, 3 मई 2009

"!पुकार!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


तुम्हीं वन्दना, तुम्ही साधना।

छन्दों को अब तुम्हीं बाँधना।


प्रेम सुधा सरसाने वाली,

मन को अति हर्षाने वाली,

सपनों में आ जाने वाली,

मेघा बन छा जाने वाली,

जीवन को महकाने वाली,

वाणी को चहकाने वाली,


तुम्हीं वन्दना, तुम्ही साधना।

छन्दों को अब तुम्हीं बाँधना।

सत्य बोलने का बल देना,

अपनी भक्ति अविरल देना,

दुष्ट-दलालों को दल देना,

शब्दों का मुझको हल देना,

मेहनत का मुझको फल देना,

अमृत सा मुझको जल देना,

तुम्हीं वन्दना, तुम्ही साधना।

छन्दों को अब तुम्हीं बांधना

शनिवार, 2 मई 2009

"मानवता से लड़ने वालो, दया-धर्म अपनालो।"


आसमान में उड़ने वालो, नजर धरा पर भी डालो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।


काँटों की चौकीदारी ही, सुमन खिलाती है,

दुनियादारी में निष्ठा ही, मीत मिलाती है,

कुण्ठाओं में कुढ़ने वालो, गीत प्रेम के गा लो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।



दुख-सुख में सच्चे मन से, शामिल होना भी सीखो,

अपने अन्तस् की गलियों की, जिद्दी पंक उलीचो,

बिना बात ही अड़ने वालो, दीप स्नेह के बालो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।



प्रीत मथानी लेकर ढूँढो, अमृत के कण-कण को,

झंझावातों के सागर में, मत उलझाओ सुमन को,

मानवता से लड़ने वालो, दया-धर्म अपनालो।

शोख नजारों, मूक इशारों, को भी तो देखो भालो।।

शुक्रवार, 1 मई 2009

"प्यार का दीपक, हवा में तेज जलता है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

इश्क का यह भूत, हर दिल में मचलता है।

गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।


रात हो, दिन हो, उजाला या अन्धेरा हो,

पुष्प के सौन्दर्य पर, षटपद मचलता है।

गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।


जेठ की दोपहर हो या माघ की शीतल पवन,

प्रेम का सूरज हृदय से ही निकलता है।

गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।


रास्ते होगें अलग, पर मंजिलें तो एक हैं,

लक्ष्य पाने को बशर राहो पे चलता है।

गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।


आँधियाँ हरगिज बुझा सकती नही नन्हा दिया,

प्यार का दीपक, हवा में तेज जलता है।

गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails