"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 30 जून 2009

‘‘भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बचपन बीता गयी जवानी, कठिन बुढ़ापा आया।

कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।


अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है।

आशाएँ और अभिलाषाएँ, बढ़ती जाती प्रति-पल हैं।।


धीरज और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में।

रंग-बिरंगे सुमन खिलेंगे, घर, आंगन, उपवन में।।


यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है।

नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।।


मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना।

वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।।


देख-भालकर, सोच-समझकर, ही सारे निर्णय लेना।

भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना।।

सोमवार, 29 जून 2009

इसी का नाम दुनिया है। (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

हर रोज

सुबह आयेगी,

शाम ढलेगी,

रात जायेगी

और

फिर सुबह होगी,

पर

इन्तजार

खत्म न होगा।

संसार की

यही तो नियति है

और

शायद

इसी का नाम

दुनिया है।

रविवार, 28 जून 2009

‘‘फ्रिज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


















बाबा जी का रेफ्रीजेटर,

लाल रंग का बड़ा सलोना।


किन्तु हमारा है छोटा सा,


लगता जैसे एक खिलौना।।



सब्जी, दूध, दही, मक्खन,


फ्रिज में आरक्षित रहता।


पानी रखो बर्फ जमाओ,


मैं दादी-अम्माँ से कहता।।



ठण्डी-ठण्डी आइस-क्रीम भी,


इसमें है जम जाती।


गर्मी के मौसम में कुल्फी,


बच्चों के मन को भाती।।



आम, सेब, अंगूर आदि फल,


फ्रिज में रखे जाते हैं।


ठण्डे पानी की बोतल,


हम इसमें से ही लाते हैं।।



इस अल्मारी को लाने की,


इच्छा है जन-जन में।


फ्रिज को पाने की जिज्ञासा,


हर नारी के मन में।।



घड़े और मटकी का इसने,

तो कर दिया सफाया है।

समय पुराना बीत गया,

अब नया जमाना आया है।।


‘‘बादल आये हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



सागर में से भर कर निर्मल जल को लाये हैं।

झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।


गरमी ने लोगों के तन-मन को झुलसाया है,

बहुत दिनों के बाद मेघ ने दरस दिखाया है,

जग की प्यास बुझाने को ये छागल लाये हैं।

झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।


नाच रहे पेड़ों के पत्ते, पुरवैया के झोंको से,

शीतल पवन दे रही दस्तक, खिड़की और झरोखों से,

खेत-बाग के व्याकुल-मन हर्षित हो मुस्काये हैं।

झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।


धरती की भर गयी दरारें, वर्षा के आने से,

खिले किसानों के चेहरे, नभ पर बादल छाने से,

अब हरियाली छा जायेगी, ये आस लगाये हैं।

झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।


शनिवार, 27 जून 2009

‘‘आशा के दीप जलाओ तो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जलने को परवाने आतुर, आशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

मधुवन में महक समाई है, कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर, भँवरा उपवन में मँडराया,
वह झूम रहा होकर व्याकुल, तुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

मधुमक्खी भीने-भीने स्वर में, सुन्दर गीत सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भी, आस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती है, कलियों खुलकर मुस्काओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।

मधु का
कण भर इनको मत दो, पर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करके, इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं में, बिजली बन कर आ जाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

‘‘काले अक्षर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

काले अक्षर कभी-कभी, तो बहुत सताते है।

कभी-कभी सुख का, सन्देशा भी दे जाते हैं।।


इनका गहरा दर्द मुझे, अपना सा ही लगता है।

कभी बेरुखी कभी प्यार से, मीठी बातें करता है।।


अक्षर में ही राज भरे हैं, छिपे बहुत से रूप।

जख्म जिन्दगी में दे जाता, अक्षर बड़ा अनूप।।


जीवन के दोराहे पर, पूरा घर-बार पड़ा है।

किसी-किसी का तो, अभिनव संसार खड़ा है।।


पग-पग पर मिलते हैं, ऐसे दोराहे और चौराहें।

केवल समय दिखा सकता है, सीधी-सच्ची राहें।।


चूहा-बिल्ली, पिल्ला-पिल्ली से लगते हैं काले अक्षर।

इसी लिए तो कहते हैं जी काला अक्षर भैंस बराबर।।


‘‘गुटका फाँक रहे हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



आन-बान भारत की, वो मिट्टी में मिला रहे हैं।


भ्रष्टाचार-अनैतिकता गुलशन में खिला रहे हैं।।


सन्त-महन्त, विनोबा, तस्वीरों से झाँक रहे हैं।


उनके वंशज सुरा-सुन्दरी, गुटका फाँक रहे हैं।।


सन्त कबीर, महात्मा गांधी, अब सपने से लगते हैं।


हिंसा के परिवेश सभी को, अब अपने से लगते हैं।।


दोष किसी का नही, देश की चारपाई टूटी है।


आने वाली पीढ़ी की, लगता है किस्मत फूटी है।।


बुधवार, 24 जून 2009

‘‘शत्रुता से भरे फासले कम करो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



देश में द्वेष के दाखले कम करो।

शत्रुता से भरे फासले कम करो।।


रोशनी के लिए दीप रोशन करो,

प्रीत की गन्ध को मन-सुमन में भरो,

क्रूरता से भरे काफिले कम करो।

शत्रुता से भरे फासले कम करो।।


मत उलझना जमाने के जंजाल में,

रंग में ढंग में, चाल में-ढाल में,

सिरफिरे कम करो, दिलजले कम करो।

शत्रुता से भरे फासले कम करो।।

(मुखड़े के लिए श्री यू.आर.मीत का आभार)

मंगलवार, 23 जून 2009

‘‘दिल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



दिल है शीशे सा नाजुक हमारा प्रिये!


ठेस लगते ही यह तो चटक जायेगा।


प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे,


प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।।



फूल सा खिल रहा यह तुम्हारे लिए,


दीप सा जल रहा यह तुम्हारे लिए,


झूठी तारीफ से यह भटक जायेगा।


प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे,


प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।।



मन जरूरत से ज्यादा सरल है प्रिये,


दुर्जनों के लिए ये गरल है प्रिये,


नेह के गेह में ये अटक जायेगा।


प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे,


प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।।



मस्त रहता भ्रमर पुष्प की गन्ध में,


मन बंधा भावनाओं के सम्बन्ध में,


प्यार में यह हलाहल गटक जायेगा।


प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे,

प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 22 जून 2009

‘‘उदगार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बस में जाने में मुझको,
आनन्द बहुत आता है।
खिड़की के नजदीक बैठना,
मुझको बहुत सुहाता है।।

(चित्र गूगल से साभार)
पहले मैं विद्यालय में,

रिक्शा से आता-जाता था।

रिक्शे-वाले की हालत पर,
तरस मुझे आता था।।

(चित्र गूगल से साभार)

लेकिन अब विद्यालय में,
इक नयी-नवेली बस आयी।
पीले रंग वाली सुन्दर सी,
गाड़ी बच्चों ने पायी।।

आगे हैं दो काले टायर,
पीछे लगे चार चक्के।
बड़े जोर से हार्न बजाती,
हो जाते हम भौंचक्के।।

पढ़-लिख कर मैं खोलूँगा,
छोटे बच्चों का विद्यालय।
अलख जगाऊँगा शिक्षा की,
पाऊँगा जीवन की लय।।

रविवार, 21 जून 2009

‘‘वफादार है बड़े काम का’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



आज अपने प्यारे कुत्ते "टॉम" पर

एक बाल कविता लिखी तो

मेरी पोती "फिरंगी" पर भी

एक बाल-कविता लिखने की जिद करने लगी।

उसी की फरमाइश पर प्रस्तुत है यह बाल-कविता-

यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।

बिल्ली का दुश्मन है भारी।।


बन्दर अगर इसे दिख जाता।

भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।


उछल-उछल कर दौड़ लगाता।

बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।।


यह सीधा-सच्चा लगता है।

बच्चों को अच्छा लगता है।।


धवल दूध सा तन है सारा।

इसका नाम फिरंगी प्यारा।।


आँखें इसकी चमकीली हैं।

भूरी सी हैं और नीली हैं।।


जग जाता है यह आहट से।

साथ-साथ चल पड़ता झट से।।


प्यारा सा पिल्ला ले आना।

सुवह शाम इसको टहलाना।।


नौकर है यह बिना दाम का।

वफादार है बड़े काम का।।

‘‘मेरा कुत्ता बड़ा निराला’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



लम्बे-लम्बे कानों वाला।

मेरा कुत्ता बड़ा निराला।।


घर की रखवाली करता है।

नही किसी से यह डरता है।।


प्यारा सा है इसका नाम।

सब कहते हैं इसको टाम।।


खीरा, आम चाव से खाता।

सेव, टमाटर चट कर जाता।।


नित्य नियम से हमें जगाता।

भौं-भौं कर आवाज लगाता।।


प्राची को लगता यह प्यारा।

घर भर का यह राज-दुलारा।।

शनिवार, 20 जून 2009

‘‘डस्टर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


विद्यालय अच्छा लगता,

पर डस्टर
कष्ट बहुत देता है।

पढ़ना तो अच्छा लगता,

पर लिखना
कष्ट बहुत देता है।।


दीदी जी तो अच्छी लगतीं,

पर वो काम बहुत देती हैं।

छोटी से छोटी गल्ती पर,

डस्टर कई जमा देतीं हैं।।


कोई तो उनसे यह पूछे,

क्या डस्टर का काम यही है?

कोमल हाथों पर चटकाना,

क्या इसका अपमान नही है??

दीदी हम छोटे बच्चे हैं,

कुछ तो रहम दिखाओ ना।

डाँटो भी, फटकारो भी,

पर हमको मार लगाओ ना।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

’’खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



पुरानी डायरी से


मन हुआ अनमना बात ही बात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।


दिल की दौलत लुटाई बड़े चाव से,

उसने लूटा खजाना मुलाकात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।


जाल पर जाल वो फेंकते ही गये,

कितना जादू था उनके खयालात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।


देर से ही सही सच उजागर हुआ,

सिर्फ छल-छद्म था उनकी सौगात में।

खो गया मैं कहाँ जाने जज्बात में।।

शुक्रवार, 19 जून 2009

‘‘नानी का घर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जून महीना आता है और, जब गर्मी बढ़ जाती है।

नानी जी के घर की मुझको, बेहद याद सताती है।।

तब मैं मम्मी से कहती हूँ, नानी के घर जाना है।

नानी के प्यारे हाथों से, हलवा मुझको खाना है।।

कथा-कहानी मम्मी तुम तो, मुझको नही सुनाती हो।

नानी जैसे मीठे स्वर में, गीत कभी नही गाती हो।।

मेरी नानी मेरे संग में, दिन भर खेल खेलतीं है।

मेरी नादानी-शैतानी, हँस-हँस रोज झेलतीं हैं।।

मास-दिवस गिनती हैं नानी, आस लगाये रहती हैं।

रानी-बिटिया को ले आओ, वो नाना से कहती हैं।।

रोज-रोज छोटे मामा जी, आम ढेर से लाते हैं।

उन्हें काटकर प्यारे नाना, हमको खूब खिलाते हैं।।

मस्ती-करना, खेल-खेलना, करना सारा दिन आराम।

अपने घर में बहुत काम है, नानी का घर सुख का धाम।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

गुरुवार, 18 जून 2009

‘‘बलिदान-दिवस पर विशेष’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान-दिवस पर उन्हें अपनी श्रद्धांजलिसमर्पित करते हुए श्रीमती सुभद्राकुमारी चैहान की यह अमर कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।




सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नब्वाबों के भी उसने पैरों को ठुकराया,
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों।
बात,कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र।निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने।कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार,
यों परदे की इज्जत पर। देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधुंपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आवहान,
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरमन से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास।गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार।काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र थी कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

‘‘अमलताश के झूमर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




अमलताश के झूमर की, आभा-शोभा न्यारी है।

मनमोहक मुस्कान तुम्हारी, सबको लगती प्यारी है।।

लू के गरम थपेड़े खाकर, रंग बसन्ती पाया है।

पीले फूलों के गजरों से, सबका मन भरमाया है।।

तपती गरमी में तुमने, अपना सौन्दर्य निखारा है।

किसके इन्तजार में तुमने, अपना रूप संवारा है।।

दूर गगन से सूरज, यह सुन्दरता झाँक रहा है।

बिना पलक झपकाये, इन फूलों को ताक रहा है।।

अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।

तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)


"सुमन हमें सिखलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


काँटों में पलना जिनकी,

किस्मत का लेखा है।

फिर भी उनको खिलते,

मुस्काते हमने देखा है।।


कड़ी घूप हो सरदी या,

बारिस से मौसम गीला हो।

पर गुलाब हँसता ही रहता,

चाहे काला, पीला हो।।

ये उपवन में हँसकर,

भँवरों के मन को बहलाते हैं।

दुख में कभी न विचलित होना,

सुमन हमें सिखलाते हैं।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 17 जून 2009

‘‘वर्षा ऋतु’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।

श्वेत-श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल।
कही छाँव है कहीं घूप है,इन्द्रधनुष कितना अनूप है,

मनभावन रंग-रूप बदलता जाता पल-पल।
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
मम्मी भीगी , मुन्नी भीगी, दीदी जी की चुन्नी भीगी,
मोटी बून्दें बरसाती, निर्मल-पावन जल।
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
हरी-हरी उग गई घास है, धरती की बुझ गई प्यास है,
नदियाँ-नाले नाद सुनाते जाते कल-कल।
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
बिजली नभ में चमक रही है, अपनी धुन में दमक रही है,

वर्षा ऋतु में कृषक चलाते खेतो में हल।

आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)
गद्य पढ़ने के लिए मेरे निम्न चिट्ठे भी देखें-
http://uchcharandangal.blogspot.com/
http://powerofhydro.blogspot.com/

मंगलवार, 16 जून 2009

"गैस सिलेण्डर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उच्चारण पर 250वीं प्रविष्टी के रूप में प्रकाशितः-

गैस सिलेण्डर कितना प्यारा।

मम्मी की आँखों का तारा।।

रेगूलेटर अच्छा लाना।

सही ढंग से इसे लगाना।।


गैस सिलेण्डर है वरदान।

यह रसोई-घर की है शान।।


दूघ पकाओ, चाय बनाओ।

मनचाहे पकवान बनाओ।।


बिजली अगर नही है घर में।

यह प्रकाश देता पल भर में।।

बाथरूम में इसे लगाओ।

गर्म-गर्म पानी से न्हाओ।।

बीत गया है वक्त पुराना।

अब आया है नया जमाना।।

कण्डे, लकड़ी अब नही लाना।

बड़ा सहज है गैस जलाना।।

किन्तु सुरक्षा को अपनाना।

इसे कार में नही लगाना।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 15 जून 2009

‘‘ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मन सुमन से पूछता है,

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?
कण्टकों में जी रहे हो,

कष्ट अपना पी रहे हो,

हँस रहे फिर भी मगन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?


देवता होते तुम्हीं से है सुशोभित,

तितलियाँ मन-प्राण से हैं बहुत मोहित,

क्योंकि तुम मधु के सदन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?


तुम बसे हो भ्रमर के चंचल नयन में,

गन्ध पाकर वो चला आया चमन में,

तुम मधुप के प्राण-धन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?


एक दिन ऐसा समय भी आयेगा,

तोड़ कर माली तुम्हें ले जायेगा,

क्योंकि तुम सुन्दर सुमन हो।

ऐ सुमन! तुम क्यों सुमन हो?

बिटिया की महिमा अनन्त है,


किलकारी की गूँज सुनाती,
परिवारों को यही बसाती।
नारी नर की खान रही है,
जन-जन का अरमान रही है।
बिटिया की महिमा अनन्त है,
इससे ही घर में बसन्त है।

रविवार, 14 जून 2009

‘‘प्यारी प्राची’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

इतनी जल्दी क्या है बिटिया,

सिर पर पल्लू लाने की।



अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,

समय बिताने की।।


मम्मी-पापा तुम्हें देख कर,

मन ही मन हर्षाते हैं।

जब वो नन्ही सी बेटी की,

छवि आखों में पाते है।।

(चित्र गूगल से साभार)

जब आयेगा समय सुहाना,

देंगे हम उपहार तुम्हें।

तन मन धन से सब सौगातें,

देंगे बारम्बार तुम्हें।।


दादी-बाबा की प्यारी,

तुम सबकी राजदुलारी हो।

घर आंगन की बगिया की,

तुम मनमोहक फुलवारी हो।।


सबकी आँखों में बसती हो,

इस घर की तुम दुनिया हो।

प्राची तुम हो बड़ी सलोनी,

इक प्यारी सी मुनिया हो।।

ब्लॉगर्स मित्रों!

गद्य पढ़ने के लिए मेरे निम्न चिट्ठे भी देखें-

http://uchcharandsngal।blogspot.com/

http://powerofhydro।blogspot.com/

शनिवार, 13 जून 2009

मच्छर-दानी (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जिसमें नींद चैन की आती।

वो मच्छर-दानी कहलाती।।

लाल-गुलाबी और हैं धानी।

नीली-पीली बड़ी सुहानी।।

छोटी, बड़ी और दरम्यानी।

कई तरह की मच्छर-दानी।।

इसको खोलो और लगाओ।

बिस्तर पर सुख से सो जाओ।।

जब ठण्डक कम हो जाती है।

गरमी और बारिश आती है।।

तब मच्छर हैं बहुत सताते।

भिन-भिन करके शोर मचाते।।

खून चूस कर दम लेते हैं।

डेंगू-फीवर कर देते हैं।।

मच्छर से छुटकारा पाओ।

मच्छरदानी को अपनाओ।।

शुक्रवार, 12 जून 2009

‘‘चलना संभल-संभल कर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


एक पुरानी कविता

मौसम ने करवट बदली है, ली समीर ने अँगड़ाई।


कविता के उपवन-कानन की, हैं कलियाँ मुस्काई।।



जालिम दुनिया ने तो दिल को, समझा एक खिलौना।


खा-पीकर के फेंक दिया है, समझ चाट का दौना।।



गागर के मुख पर अमृत है, भीतर भरा हलाहल है।


नदियों के गीले तटबन्धों पर, फैला होता दलदल है।।



भँवर जाल में फँस मत जाना, सागर के समतल तल पर।


देख-भाल कर कदम बढ़ाना, चलना संभल-संभल कर।।



गुरुवार, 11 जून 2009

‘‘गंगा-मइया बहुत महान’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कहीं सरल है, कहीं विरल है।

बहता जिसमें पावन जल है।।


जन-जन जिससे है सुख पाता।


वो कहलाती गंगा माता।।


पर्वत से निकली लघु धारा।


मैदानों में रूप सवाँरा।।

बम-बम भोले की पुकार है।

शिव की नगरी हरिद्वार है।।


जो हर की पौढ़ी पर न्हाते।


उनके पाप सभी धुल जाते।।


कष्टों को हर लेने वाली।


यह सबको सुख देने वाली।।


काशी की महिमा अनूप है।

गंगा का मोहक स्वरूप है।।


घाटों की शोभा है न्यारी।


जय-जय-जय भोले भण्डारी।।


हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग।


नासिक के जागे हैं भाग।।
बारह वर्ष बाद जो आता।


महाकुम्भ है वो कहलाता।।


भक्त बहुत इसमें जाते हैं।


साधू-सन्यासी आते हैं।।


जन-मन को हर्षाने वाला।


श्रद्धा का यह पर्व निराला।।

तीनों सरिताओं का संगम।

शुद्ध जहाँ होता है तन-मन।।


जप-तप, दान-पुण्य का घर है।


यह प्रयाग प्राचीन नगर है।।


हरित-क्रांति की तुम हो खान।


गंगा-मइया बहुत महान।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 10 जून 2009

‘‘कुछ मित्रों की टिप्पणियों का उत्तर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नही जानता कैसे बन जाते हैं, मुझसे गीत-गजल।
जाने कब मन के नभ पर, छा जाते हैं गहरे बादल।।

ना कोई कापी या कागज, ना ही कलम चलाता हूँ।
खोल पेज-मेकर को, हिन्दी टंकण करता जाता हूँ।।

देख छटा बारिश की, अंगुलियाँ चलने लगतीं है।
कम्प्यूटर देखा तो उस पर, शब्द उगलने लगतीं हैं।।

नजर पड़ी टीवी पर तो, अपनी हरकत कर जातीं हैं।
चिड़िया का स्वर सुन कर, अपने करतब को दिखलातीं है।।

बस्ता और पेंसिल पर, उल्लू बन क्या-क्या रचतीं हैं।
सेल-फोन, तितली-रानी, इनके नयनों में सजतीं है।।

कौआ, भँवरा और पतंग भी इनको बहुत सुहाती हैं।
नेता जी की टोपी, श्यामल गैया, बहुत लुभाती है।।

सावन का झूला हो, चाहे होली की हों मस्त फुहारें।
जाने कैसे दिखलातीं ये, बाल-गीत के मस्त नजारे।।

मैं तो केवल जाल-जगत पर, इन्हें लगाता जाता हूँ।
क्या कुछ लिख मारा है, मुड़कर नही देख ये पाता हूँ।।

जिन देवी की कृपा हुई है, उनका करता हूँ वन्दन।
सरस्वती माता का करता, कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।


‘‘तरु देने लगता मीठे फल है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


मेरे आस-पास में अब भी, हरे-भरे सुन्दर वन हैं।

इन्सानों की फितरत देखो, काट रहे इनके तन हैं।।

चारों ओर साल के जंगल, लगते कितने शानदार हैं।

सीधे-सादे नभ को छूते, वृक्ष बड़े ही जानदार हैं।।

इक टिड्ढा पत्तों पर बैठा, इनके रस को चाट रहा है।

कुतर-कुतर कर बेरहमी से, डण्ठल-पत्ती काट रहा है।।

किसी सिरफिरे ने इस वन में आग अचानक सुलगा दी है।


जिसने पेड़ों की कोमल-कोमल शाखाएँ झुलसा दी हैं।।


पानी बरसा शान्त हो गयी ज्वाल, शेष रह गयी निशानी।

मिटा हृदय का शूल, वनों मे पलने-फलने लगी जवानी।।


धरती में सोया नन्हा सा बीज, अंकुरित हो आया है।


फूटे उसमें से कुछ कल्ले, पौधा बन जीवन पाया है।।


कुछ वर्षों के बाद यही यौवन को पाकर फूल गया है।


अग्नि की झुलसाने वाली लपटों को यह भूल गया है।।

कुदरत की अन्तर्शक्ति का रहता नियम अटल है।


तन झुलसा कर भी तरु देने लगता मीठे फल है।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 9 जून 2009

‘‘टेली-विजन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरा टी0वी0 है अनमोल।

खोल रहा दुनिया की पोल।।


इसमें चैनल एक हजार।

इसके बिन जीवन बेकार।।


कितना प्यारा और सलोना।

बच्चों का ये एक खिलौना।।


समाचार इसमें हैं आते।

कार्टून हैं खूब हँसाते।।


गीत और संगीत सुनाता।

पल-पल की घटना बतलाता।।




बस रिमोट का बटन दबाओ।

मनचाहा चैनल पा जाओ।।


यह सबके मन को भाता है।
क्रि-केट, कुश्ती दिखलाता है।।



नृत्य सिखाता, मन बहलाता।

नये-नये पकवान बताता।।


नई-नई कारों को देखो।

जगमग त्योहारों को देखो।।


नये-नये देखो परिधान।

टेली-विजन बहुत महान।।

(रिमोट, कार और त्योहार के चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 8 जून 2009

‘‘इण्टर-नेट’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


करता है हर बात उजागर।

इण्टर-नेट ज्ञान का सागर।।


इससे मेल मुफ्त हो जाता।

दूर देश में बात कराता।।


कहती है प्यारी सी मुनिया।

टेबिल पर है सारी दुनिया।।


लन्दन हो या हो अमरीका।

आबूधाबी या अफ्रीका।।


गली, शहर हर गाँव देख लो।

बादल, घूप और छाँव देख लो।।


यह थाली है भरी खीर की।।

जग भर की जितनी हैं भाषा।

सबकी है इसमें परिभाषा।।

पल में नैनीताल घूम लो।

पर्वत की हर शिखर चूम लो।।


चाहे शोख नजारे देखो।

सजे-धजे गलियारे देखो।।


अन्तर्-जाल बड़े मनवाला।

कर देता है यह मतवाला।।


छोटा सा कम्प्यूटर लेलो।

फिर इससे जी भरकर खेलो।।


आओ इण्टर-नेट पढ़ाएँ।

मौज मनाएँ, ज्ञान बढ़ाएँ।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails