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शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

‘‘वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जिन्दगी है तो उलझन-झमेले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


जिन्दगानी बिना कुछ धरा ही नही,

आसमाँ भी नही और धरा भी नही,

जिन्दगी में भरे खेल-खेले भी है।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


हमको जीवन मिला तो वतन भी मिला,

एक तन भी मिला एक मन भी मिला,

शुद्ध भी है बहुत और मैले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


प्रेम का रोग है, योग है भोग है,

दान है पुण्य है साथ में लोभ है,

सद्-गुरू, ज्ञान है और चेले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


बस्तियाँ हैं घनी और जंगल भी है,

प्रीत है मीत है और दंगल भी हैं,

कुछ शहद से भरे कुछ विषैले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


गुरुवार, 30 जुलाई 2009

‘‘वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



रंग भी रूप भी छाँव भी धूप भी,

देखते-देखते ही तो ढल जायेंगे।

देश भी भेष भी और परिवेश भी,

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


ढंग जीने के सबके ही होते अलग,

जग में आकर सभी हैं जगाते अलख,

प्रीत भी रीत भी, शब्द भी गीत भी,

एक न एक दिन तो मचल जायेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


आप चाहे भुला दो भले ही हमें,

याद रक्खेंगे हम तो सदा ही तुम्हें,

तंग दिल मत बनो, संगे दिल मत बनो,

पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


हर समस्या का होता समाधान है,

याद आता दुखों में ही भगवान है,

दो कदम तुम बढ़ो, दो कदम हम बढ़ें,

रास्ते मंजिलों से ही मिल जायेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


गम की दुनिया से वाहर तो निकलो जरा,

पथ बुलाता तुम्हें रोशनी से भरा,

हार को छोड़ दो, जीत को ओढ़ लो,

फूल फिर से बगीचे में खिल जायेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


बुधवार, 29 जुलाई 2009

‘‘आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





झुक गईं शाखाएँ स्वागत में तुम्हारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


बुझ गई प्यासी धरा की है पिपासा,

छँट गई व्याकुल हृदय से अब निराशा,

एक अरसे बाद आयी हैं फुहारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


धान के पौधों को जीवन मिल गया है,

धूप से झुलसा चमन अब खिल गया है,

पर्वतों पर गा रहे हैं गान धारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


पंचमी पर नाग-पूजा रंग लाई,

आसमानों में घटा घनघोर छाई,

बह रही पुरवाई की शीतल बयारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


मंगलवार, 28 जुलाई 2009

‘‘हसीन ख्वाब’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


इक हादसे में उनसे मुलाकात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

देखा उन्हें मगर न कोई बात कर सके,
केवल नजर मिली, नजर में बात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

वो भी थे बेकरार और हम भी थे गरजमन्द,
दोनो के लिए प्रेम की सौगात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

इक दूजे के जज्बात दोनो तोलते रहे,
हम डाल-डाल थे वो पात-पात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

खाई थी खेल में उन्होंने शह हजार बार,
जब अन्त आ गया तो मेरी मात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

धूप-छाँव के चले थे सिलसिले बहुत,
मंजिल के बीच में ही तो बरसात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

साया तलाशते रहे हम तो तमाम दिन,
केवल इसी उधेड़-बुन में रात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

आँखें खुली हसीन ख्वाब टूट गया था,
सूरज चढ़ा हुआ था और प्रात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।


‘‘काले बादल बरस रहे हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



गरज रहे हैं, लरज रहे हैं,
काले बादल बरस रहे हैं।

कल तक तो सावन सूखा था,
धरती का तन-मन रूखा था,
आज झमा-झम बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

भीग रहे हैं आँगन-उपवन,
तृप्त हो रहे खेत, बाग, वन,
उमड़-घुमड़ घन बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

मुन्ना भीगा, मुन्नी भीगी,
गोरी की है चुन्नी भीगी,
जोर-शोर से बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

श्याम घटाएँ घिर-घिर आयी,
रिम-झिम की बजती शहनाई,
जी भर कर अब बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

‘‘एक मुक्तक’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



दुर्बल पौधों को ही ज्यादा पानी-खाद मिला करती है।

चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है

सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है-

यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।


सोमवार, 27 जुलाई 2009

"बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरे बहुत से ब्लागर मित्र अपनी पोस्ट में केवल एक शेर ही लगाते हैं।

आज मैंने भी केवल कुछ शेर ही पोस्ट करने का मन बनाया है।

कुछ मित्रों की रचनाओं को टिपियाते-टिपियाते यह छन्द बन गये।


हमें लिखने की आदत है, मगर वो पढ़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


सफीना चलते-चलते ही, भँवर में फँस गया अपना,

उन्हें मिलने की आदत है, मगर हम बढ़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


समर में इश्क के हम तो, बिना हथियार के उतरे,

उन्हें भिड़ने की आदत है, मगर हम लड़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


जरा सी मय को पीकर, वो तो पहुँचे आसमानों में,

उन्हें उड़ने की आदत है, मगर हम चढ़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


‘‘जग के झंझावातों में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मानव दानव बन बैठा है, जग के झंझावातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


होड़ लगी आगे बढ़ने की, मची हुई आपा-धापी,

मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी,

दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


जीने का अन्दाज जगत में, कितना नया निराला है,

ठोकर पर ठोकर खाकर भी, खुद को नही संभाला है,

ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकर, लिपटा गन्दी बातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


मित्र, पड़ोसी, और भाई, भाई के शोणित का प्यासा,

भूल चुके हैं सीधी-सादी, सम्बन्धों की परिभाषा।

विष के पादप उगे बाग में, जहर भरा है नातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


एक चमन में रहते-सहते, जटिल-कुटिल मतभेद हुए,

बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए,

खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

रविवार, 26 जुलाई 2009

‘‘झूला झूलें सावन में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें, झूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

आँगन से कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।


शनिवार, 25 जुलाई 2009

‘‘अब तो जम करके बरसो, क्यों करते हो कल और परसों?’’(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।

चौमासे के मौसम में, सूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने को, धरती आज तरसती है।।

नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।।

दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।।

दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिम-झिम झड़ी लगा जाओ, क्यों करते हो कल और परसों?

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

‘‘मौत से सब बेखबर हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



ब्लॉगर मित्रों!
उच्चारण के 183 दिन के सफर में वैराग्य की यह

300वीं रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

आशा ही नही अपितु विश्वास भी है कि

आप सबका स्नेह मुझे आगे भी मिलता रहेगा।


देखते हैं रात दिन शमशान को,

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।

आयेंगे चौराहे और दोराहे कितने,

एक जैसी अन्त में सबकी डगर हैं।।

जिन्दगी में स्वप्न सुन्दर हैं सजाये,

गगनचुम्बी भवन सुन्दर हैं बनाये,

साथ तन नही जायेगा, तन्हा सफर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।।


बन्धु और बान्धव मिलाने खाक में ही जायेंगे,

देह कुन्दन कनक सी सब राख ही हो जायेंगे।

चाँद-सूरज फेर ही लेंगे, नजर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।।


धार में दरिया की सारी अस्थियाँ बह जायेंगी,

सब तमन्नाएँ धरी की धरी ही रह जायेंगी,

स्वर्ग की सरिता में, कितने ही भँवर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।।


"जीत की गन्ध आने लगी हार में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कितनी ताकत छिपी शब्द की धार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

वो तो बातों से नश्तर चुभोते रहे,
हम तो हँसते हुए, घाव ढोते रहे,
घात ही घात था उनके हर वार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

मेरे धीरज को वो आजमाते रहे,
हम भी दिल पर सभी जख्म खाते रहे,
पीठ हमने दिखाई नही प्यार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

दाँव-पेंचों को वो आजमा जब चुके,
हार थक कर के अब वार उनके रुके,
धार कुंठित हुई उनके हथियार मे।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

संग-ए-दिल बन गया मोम जैसा मृदुल,
नेह आया उमड़ सिन्धु जैसा विपुल,
हार कर जीत पाई थी उपहार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

"याद वो मंजर पुराने आ गये हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)"


फिर चली पुरवाई बादल छा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

पेड़ के नीचे अचानक बैठ जाना,
गीत लिखना और उनको गुनगुनाना,
शब्द बनकर छन्द लय को पा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

झूमते भौंरो का गुंजन-गान गाना,
मस्त होकर सुमन का सौरभ लुटाना,
फूल-पत्ते भी नजर को भा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

झाँक कर खिड़की से उनका मुस्कुराना,
नजर मिलते ही नजर अपनी झुकाना,
नयन में सपने सुहाने छा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

‘‘आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

भार हम जिन्दगी का ही ढोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

हाथ पर हाथ रख कर नही बैठे हम,

सुख में हँसते रहे, गम में रोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

कुछ भी आगे नही बढ़ सके राह में,

हादसे दिन-ब-दिन रोज होते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

हमने महफिल में उनके तराने पढ़े,

मखमली ख्वाब दिल में संजोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

आँखों-आखों में काटी थी राते बहुत,

वो तो खर्राटे भर-भर के सोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

सोमवार, 20 जुलाई 2009

‘‘क्यों यहाँ हिंसा बहाने पर तुले हो?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)






बुलबुलों का सदन है मेरा वतन,

क्यों इसे वीरां बनाने पर तुले हो?


खुशबुओं का चमन है मेरा वतन,

क्यों यहाँ दुर्गन्ध लाने पर तुले हो?


शान्त-सुन्दर भवन है मेरा वतन,

आग क्यों इसमें लगाने पर तुले हो?


प्यार की गंग-ओ-जमुन मेरा वतन,

क्यों यहाँ हिंसा बहाने पर तुले हो?


रोशनी में मगन है, नन्हा दिया,

इससे क्यों घर को जलाने पर तुले हो?

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

‘‘पाँच शेर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



हौसला रख कर जरा आगे बढ़ो,

फासले इतने तो मत पैदा करो।


चाँद तारों से भरी इस रात में,

मत अमावस से भरी बातें करो।


जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,

मत इसे जज्बात में रौंदा करो।


उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,

हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।


छोड़ दो शिकवों-गिलों की डगर को,

मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।


रविवार, 19 जुलाई 2009

रूमानी शायर गुरूसहाय भटनागर "बदनाम" की एक ग़ज़ल



वस्ल की शाम

महकी महकी सी है वादियों की सवा
शौक से आके इस का मज़ा लीजिऐ

बन गयी मैं गज़ल आप के सामने
जैसे चाहो मुझे आजमा लीजिऐ

मय को पी कर अगर दिल मचलने लगे
अपना दिल हमें फिर बना लीजिऐ

ये बहारों का रंग हुस्न की तश्नगी
प्यास नजरों की अपनी बुझा लीजिऐ

मैं बयाबां में हूँ खुशनुमा एक कली
मुझको जैसे जहाँ हो सजा लीजिऐ

कल तलक आरजूयें जो ‘बदनाम’ थीं
वस्ल को शाम है दिल लुटा लीजिऐ

वादियों-जंगल, कानन, वस्ल-मिलन, मुलाकात, सवा-हवा,
मय, शराब तश्नगी-प्यास, बयाबां-जंगल, आरजूयें-इच्छायें

‘‘जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

‘‘सुख की मुस्कान नही छाई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



आसमान में बादल छाये, इन्द्रधनुष भी दिया दिखाई।
मस्त झखोरे ले कर आयी, पुरवा पवन चली सुखदायी।


देख-देख जिउरा हरसे, रिम-झिम बून्दों को तरसे,
नभ में हैं घनश्याम घिरे, वर्षा अब तक क्यों नही आयी?


सावन सूखा निकल गया, अब भादो आने वाला है,
ताल-तलैया रूखे-भूखे, दिन-प्रतिदिन बढ़ती मँहगाई।


आल्हा की चौपाल, बिना बारिश के सूनी-सूनी हैं,
मेघ मल्हारों की गुन्जन भी, अब तो पडत़ी नही सुनाई।


त्रस्त हुए तन-मन गर्मी से जनता आकुल-व्याकुल है,
जन मानस में अब तक भी, सुख की मुस्कान नही छाई।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

‘‘रंग-बिरंगी, तितली आई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)






तितली आई! तितली आई!!

रंग-बिरंगी, तितली आई।।


कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।

आँखों को लगते हैं प्यारे।।


फूलों पर खुश हो मँडलाती।

अपनी धुन में हो इठलाती।।


जब आती बरसात सुहानी।

पुरवा चलती है मस्तानी।।


तब तुम अपनी चाल दिखाती।

लहरा कर उड़ती बलखाती।।


पर जल्दी ही थक जाती हो।

दीवारों पर सुस्ताती हो।।


बच्चों के मन को भाती हो।

इसीलिए पकड़ी जाती हो।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


गुरुवार, 16 जुलाई 2009

‘‘जरा ठहर जाओ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



अभी तो शाम है शब जल्द आने वाली है।

अभी चराग सजे हैं, जरा ठहर जाओ।।

तुम्हीं से ईद है, तुमसे मेरी दिवाली है।

मेरी ये अर्ज है, कुछ देर तो ठहर जाओ।।

तुम्हारे वास्ते दिल का मकान खाली है।

दिल-ए-चमन में मिरे, दो घड़ी ठहर जाओ।।

ज़फा-ए-दौर में, उम्मीद भी मवाली है,

गम-ए-दयार में आकर जरा ठहर जाओ।।


‘‘एक दिन स्वप्न साकार हो जायेगा’’ (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


तुम अगर रोज मिलते-मिलाते रहे,

एक दिन स्वप्न साकार हो जायेगा।

मद-भरे मय के प्याले पिलाते रहे,

प्यार का ज़ाम उपहार हो जायेगा।।



मौन हैं शब्द, लब मेरे खामोश हैं,

गन्ध से हो गये भाव मदहोश हैं,

तुम अगर लाज से मुँह छिपाते रहे,

मेरा जीना भी दुश्वार हो जायेगा।

एक दिन प्यार उपहार हो जायेगा।।


मेरा मन है चमन, फूल बन कर खिलो,

खिल-खिलाते हुए, मीत बन कर मिलो,

हुस्न से इश्क को गर रिझाते रहे,

प्रीत में भी, अलंकार हो जायेगा।

एक दिन प्यार उपहार हो जायेगा।।


मेरी नजरों तुम और नजारों में तुम,

हो खिजाओं में तुम और बहारों में तुम,

मेरे आँगन में गर आते-जाते रहे,

सुख का सागर ये परिवार हो जायेगा।

एक दिन प्यार उपहार हो जायेगा।।


बुधवार, 15 जुलाई 2009

‘‘पानी नदारत है, आने वाली कयामत है?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सावन का महीना
बादलों की
आँख-मिचौली
और
पानी नदारत है,
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
चारों ओर
सूखा और सिर्फ सूखा
प्यासे हैं बाग, तड़ाग,
व्यर्थ हो गई
सब प्रार्थना
और
इबादत हैं
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
खेतों में
उड़ रही है धूल
चमन में
मुरझा रहे हैं फूल
क्या
आने वाली
कयामत है?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

’’तुम ही मेरा सकल काव्य संसार हो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मेरी गंगा भी तुम, और यमुना भी तुम,
तुम ही मेरे सकल काव्य की धार हो।
जिन्दगी भी हो तुम, बन्दगी भी हो तुम,
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।

मुझको जब से मिला आपका साथ है,

शह मिली हैं बहुत, बच गईं मात है,
तुम ही मझधार हो, तुम ही पतवार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

बिन तुम्हारे था जीवन बड़ा अटपटा,

पेड़ आँगन का जैसे कोई हो कटा,
तुम हो अमृत घटा तुम ही बौछार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

तुम महकता हुआ शान्ति का कुंज हो,

जड़-जगत के लिए ज्ञान का पुंज हो,

मेरे जीवन का सुन्दर सा संसार हो।

गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

तुम ही हो वन्दना, तुम ही आराधना,

दीन साधक की तुम ही तो हो साधना,
तुम निराकार हो, तुम ही साकार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

आस में हो रची साँस में हो बसी,

गात में हो रची, साथ में हो बसी,
विश्व में ज्ञान का तुम ही भण्डार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 13 जुलाई 2009

‘‘तुम अगर मेरे जीवन में आते नही’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)


तुम अगर मेरे जीवन में आते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।


होती खेतों में तम्बू-कनाते गड़ी,
एक सुन्दर सा घर हम बनाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

प्यार करना न आता हमें उम्र भर,
गीत-कविताएँ हम गुन-गुनाते नही।।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

करनी पड़ती हमें एक दिन खुदकशी,
राह जीने की गर तुम दिखाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

डर गयीं थी सभी रोशनी की किरण,
आँख चन्दा व सूरज मिलाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

ले ही जाती भँवर में लहर खींच कर,
हाथ अपना अगर तुम थमाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

रविवार, 12 जुलाई 2009

‘‘चलो झूला झूलेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





सावन की आई बहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

बागों में कुहु-कुहु, बोले कोयलिया,
जियरा में अगन लगाये बदलिया,
गायेंगे मेघ-मल्हार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

मेंहदी रचाओ और गजरा सजाओ,
कजरारे नयनों में, कजरा लगाओ,
चूनर को लेना सँवार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

खेतों में धनवा की सोंधी महक है,
तालों में पनिया की चंचल चहक है,
शीतल चलत है बयार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

हरी-हरी धरती, हरी-हरी चुडियाँ,
महकी हैं कुड़ियाँ, चहकीं हैं बुढ़िया,
तीजो का आया त्योहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


शनिवार, 11 जुलाई 2009

"बिन डोर खिचें सब आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

इनके बिन बात अधूरी है,
नजदीकी में भी दूरी है,
दुनिया दारी में पड़ करके,
बतियाना बहुत जरूरी है,
मकड़ी के नाजुक जालों में,
बलवान सिंह फंद जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

पशु-पक्षी और संगी-साथी,
शब्दों से मन को भरमाते,
तीखे शब्दों से मीत सभी,
पल भर में दुश्मन बन जाते,
पहले तोलो, फिर कुछ बोलो,
स्वर मधुर छन्द बन जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

‘‘तप कर निखर गये हम तो’’ (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



डायरी से एक पुरानी गज़ल

इश्क की राह में चल कर बिखर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।


कल तलक ख्वाब था अब बनके हकीकत आया,
उनका इक वार मेरे दिल में नसीहत लाया,
अपने जज्बात में आकर सिहर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

बदले हालात में, किस्मत ने साथ छोड़ दिया,
बीती यादों ने मुकद्दर को गम से जोड़ दिया,
तुम जिधर को चले थे, बस उधर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

तुम कहाँ हो? मेरे हालात पर तरस खाओ,
चाँदनी रात में आकर के दरस दिखलाओ,
राह-ए -उल्फत में कुछ सुधर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

‘‘घन छाये हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




सागर से जल भर लाये हैं।

आसमान में घन छाये हैं।।


धरती की ये प्यास हरेंगे।

अब सूखे तालाब भरेंगे।।


खेतों में हल चल जायेंगे।

मेंढक टर-टर टर्रायेंगे।।


मेह झमा-झम अब बरसेगा।

बागों का तन-मन हर्षेगा।।


शीतल मन्द बयार चलेगी।

उपवन में अब कली खिलेगी।।


झींगुर अब गुंजार करेंगे।

प्यासे जलचर नही मरेंगे।।


अब हरियाली छा जायेगी।

गैया हरी-घास खायेगी।।


अन्न धरा अब उपजायेगी।

महँगाई कम हो जायेगी।।



बुधवार, 8 जुलाई 2009

‘‘गगन में छा गये बादल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बड़ी हसरत दिलों में थी, गगन में छा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

गरज के साथ आयें हैं, बरस कर आज जायेंगे,
सुहानी चल रही पुरवा, सभी को भा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

धरा में जो दरारें थी, मिटी बारिश की बून्दों से,
किसानों के मुखौटो पर, खुशी चमका गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

पवन में मस्त होकर, धान लहराते फुहारों में,
पहाड़ों से उतर कर, मेह को बरसा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

‘‘इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।

दिल में घुसा हुआ है,
दल-दल दलों का जमघट।
संसद में फिल्म जैसा,
होता है खूब झंझट।
फिर रात-रात भर में, आपस में गुल खिलेंगे। 
होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे।।

गुस्सा व प्यार इनका,
केवल दिखावटी है।
और देश-प्रेम इनका,
बिल्कुल बनावटी है।
बदमाश, माफिया सब इनके ही घर पलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।

खादी की केंचुली में,
रिश्वत भरा हुआ मन।
देंगे वहीं मदद ये,
होगा जहाँ कमीशन।
दिन-रात कोठियों में, घी के दिये जलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।

सोमवार, 6 जुलाई 2009

‘‘जंगल और जीव’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


रहता वन में और हमारे,
संग-साथ भी रहता है।
यह गजराज तस्करों के,
जालिम-जुल्मों को सहता है।।

समझदार है, सीधा भी है,
काम हमारे आता है।
सरकस के कोड़े खाकर,
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार) नूतन करतब दिखलाता है।।

मूक प्राणियों पर हमको तो,
तरस बहुत ही आता है।
इनकी देख दुर्दशा अपना,
सीना फटता जाता है।।



वन्य जीव जितने भी हैं,
सबका अस्तित्व बचाना है,
जंगल के जीवों के ऊपर,
दया हमें दिखलाना है।
वृक्ष अमूल्य धरोहर हैं,
इनकी रक्षा करना होगा।

जीवन जीने की खातिर,
वन को जीवित रखना होगा।
तनिक-क्षणिक लालच को,
अपने मन से दूर भगाना है।
धरती का सौन्दर्य धरा पर,
हमको वापिस लाना है।।

‘‘जोकर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जो काम नही कर पायें दूसरे,

वो जोकर कर जाये।
सरकस मे जोकर ही,
दर्शक-गण को खूब रिझाये।
नाक नुकीली, चड्ढी ढीली,
लम्बी टोपी पहने,
उछल-कूद कर जोकर राजा,
सबको खूब हँसाये।
चाँटा मारा साथी को,
खुद रोता जोर-शोर से,
हाव-भाव से, शैतानी से,
सबका मन भरमाये।
लम्बावाला तो सीधा है,
बौना बड़ा चतुर है,
उल्टी-सीधी हरकत करके,
बच्चों को ललचाये।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

रविवार, 5 जुलाई 2009

‘‘जग की यही कहानी है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जबरा मारे रोने ना दे, जग की यही कहानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।


मेड़ खेत को लगी निगलने, किसको दोषी ठहरायें,

रक्षक ही भक्षक बन बैठे, न्याय कहाँ से हम पायें,

अन्धा है कानून, न्याय की डगर बनी बेगानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।



दुर्जन कुर्सी पर, लेकिन सज्जन फिरते मारे-मारे,

सच्चों की अब खैर नही, झूठों के हैं वारे-न्यारे,

शौर्य-वीरता की तो मानों, थम सी गयी रवानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।


दुर्बल को बलवान लूटता, जनता को राजा लूटे,

निर्धन बिना मौत मरता, धन के बल से कातिल छूटे,

बे-ईमानों की इस कलयुग में, चमक रही पेशानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।

शनिवार, 4 जुलाई 2009

‘‘माता और पिता’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)






बचपन की धुँधली यादें, जब मानस पर छा जाती हैं।
माता और पिता की सूरत, आखों में आ जाती हैं।।



लालन-पालन में कितने, भरसक प्रयत्न किये होंगे।
अच्छी शिक्षा दिलवाने में, कितने यत्न किये होंगे।।

वृद्ध पिता-माता मुझको, अपने प्राणों से प्यारे हैं।
जीवन के आधार यही हैं, ये भगवान हमारे हैं।।

ये मेरे हैं महादेव, मैं इनको भोग लगाता हूँ।
मात-पिता के चरणों में, मैं स्वर्ग अलौकिक पाता हूँ।।

‘‘सुन्दर सुमन खिलाना होगा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मानवता मर गयी विश्व में, सूरज है पथराया।
डोल गये ईमान-धर्म, सारा जग है बौराया।।

नदियों में बहने वाले, तालाबों को क्या पहचाने।
महलों में रहने वाले, सर्दी-गर्मी को क्या जाने।।

जगत बँधा है, प्रीत-रीत के अभिनव बन्धन में।
ब्याल लिप्त रहता है, चन्दन के महके तन में।।

जीवन एक सफर, इसमें यादें आती जाती है।
रिश्तों की बुनियाद, राह में बनती जाती है।।

जितना जख्म कुरेदोगे, उतना ही दर्द बढ़ेगा।
जितनी धूल उड़ाओगे, उतना ही गर्द चढ़ेगा।।

जोड़-तोड़ करके अपना परिवार चलाना होगा।
वीराने गुलशन में सुन्दर सुमन खिलाना होगा।।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

‘‘जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



अन्तर रखने वालों से, मेरा अन्तर नही मिलता है।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।


जीवन कभी कठोर कठिन है, कभी सरल सा है,

भोजन अमृत-तुल्य कभी है, कभी गरल सा है,

माली बिना किसी उपवन में, फूल नही खिलता हैं।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।


सावन मे भी कभी-कभी सूखा भी होता है,

खाना खाकर कभी, उदर भूखा भी होता है,

काँटे जिनकी करें सुरक्षा उनका तन नही छिलता है।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।


नर्म-नर्म बिस्तर में, सुख की नींद नही आती है,

किन्तु श्रमिक को कंकड़ की ढेरी पर आ जाती है,

तप और श्रम से पत्थर का भी हृदय पिघलता है।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।

‘‘आओ तो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सब अंधियारे मिट जायेंगे, आशा का दीप जलाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

बागों में कोयल बोल रही,
मिश्री कानों में घोल रही,
हम साज बजाने आयेंगे, तुम अभिनव राग सुनाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

क्यों नील गगन को ताक रहे,
चितवन से क्यों हो झाँक रहे,
हम मर कर भी जी जायेंगे, अमृत की बून्द पिलाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

लहरों से कटते हैं कगार,
करते हो किसका इन्तजार,
हम चप्पू लेकर आयेंगे, तुम नौका बन कर आओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

‘‘जरा सी बात’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जरा सी बात में ही युद्ध होते हैं बहुत भारी।

जरा सी बात में ही क्रुद्ध होते हैं धनुर्धारी।।

जरा सी बात ही माहौल में विष घोल देती है।

जरा सी जीभ ही कड़ुए वचन को बोल देती है।।

मगर हमको नही इसका कभी आभास होता है।

अभी जो घट रहा कल को वही इतिहास होता है।।

बुधवार, 1 जुलाई 2009

‘‘सुमन से मन का नाता जोड़ो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बालक हो या फूल, कभी भी नन्हा मन मत तोड़ो।

देखो, सूँघो खूब, सुमन से मन का नाता जोड़ो।।


नाजुक होता फूल और पंखुड़ियाँ भोली-भाली सी।

सबको आकर्षित करती है, इनकी गन्ध निराली सी।।


काँटों की गोदी में रहना, इनको बहुत सुहाता है।

कोमल शैया पा कर इनका, तन और मन मुरझाता है।।


शिशु को उसकी माता की, गोदी में ही रहने दो।

खिलने दो, मुस्काने दो, सर्दी-गर्मी को सहने दो।।

‘‘वि़द्यालय से नाता जोड़ो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





सुस्ती, मस्ती, आलस छोडो़।

विद्यालय से नाता जोड़ो।


गरमी ने कितना झुलसाया।

अब बारिश का मौसम आया।।

पुस्तक, बस्ता, पेन सम्भालो।

छोटा छाता एक मँगा लो।।


नित्य-प्रति विद्यालय जाओ।

पढ़ने में मन खूब लगाओ।।


होम-वर्क करना मत भूलो।

फिर अपने झूले पर झूलो।।



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