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सोमवार, 31 अगस्त 2009

‘‘खारों को हमने मान लिया सिर्फ फूल है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


हमने बनाए जिन्दगी में कुछ उसूल हैं।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

हमने तो पड़ोसी को अभय-दान दिया है,
दुश्मन को दोस्त जैसा सदा मान दिया है,
बस हमसे बार-बार हुई ये ही भूल है।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

साबुन से धोया हमने गधों को हजार बार,
लेकिन कभी न आया उनमें गाय सा निखार,
क्यों पथ में बार-बार बिछाते वो शूल हैं।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

हम जोर-जुल्म के कभी आगे न झुकेंगे,
जल-जलों तूफान से डर कर न रुकेंगे,
खारों को हमने मान लिया सिर्फ फूल है।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

’’अगर हो सके तो इशारे समझना’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


इशारों-इशारों में हम कह रहे हैं,
अगर हो सके तो इशारे समझना।


मेरे भाव अल्फाज बन बह रहे हैं,
नजाकत समझना नजारे समझना।
अगर हो सके तो इशारे समझना।।


शजर काट नंगा बदन कर रहे हैं,
मझधार को मत किनारे समझना।
अगर हो सके तो इशारे समझना।।


समाया दिमागों में दूषित प्रदूषण,
दरिया को गन्दे ही धारे समझना।
अगर हो सके तो इशारे समझना।।


कहर बो रहे हैं, जहर खा रहे हैं,
बशर सारे किस्मत के मारे समझना
अगर हो सके तो इशारे समझना।।


जो तूती की आवाज को मन्द कर दें,
उन्हें ढोल-ताशे , नगारे समझना
अगर हो सके तो इशारे समझना।।


जिसे पाक माना था नापाक निकला,
ये माथे का काजल हमारे समझना।
अगर हो सके तो इशारे समझना।।

’’बुज-दिली के मत निशान दो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जिन्दा हो गर, तो जिन्दादिली का प्रमाण दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

स्वाधीनता का पाठ पढ़ाया है राम ने,
क्यों गिड़िगिड़ा रहे हो शत्रुओं के सामने,
अपमान करने वालों को हरगिज न मान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

तन्द्रा में क्यों पड़े हो, हिन्द के निवासियों,
सहने का वक्त अब नही, भारत के वासियों,
सौदागरों की बात पर बिल्कुल न ध्यान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

कश्मीर का भू-भाग दुश्मनों से छीन लो,
कैलाश-मानसर को भी अपने अधीन लो,
चीन-पाक को नही रज-कण का दान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

‘‘आज जरूरत है प्रताप जैसे तेवर अपनाने की’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




माँ मुझको ताकत देना, कुछ अभिनव छन्द बनाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

आँखे करके बन्द चमन के माली अलसाये हैं,
नौनिहाल पादप जीवन बगिया में मुरझाये हैं,
आज जरूरत है धरती में, शौर्य बीज उपजाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

मँहगाई की चक्की में, निर्धन जन पिसते जाते हैं,
ढोंगी सन्त-महन्त मजे से, चन्दन घिसते जाते हैं,
आज जरूरत रावण से, सीता की लाज बचाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

राम-कृष्ण की मर्यादा का ध्यान हमें धरना है,
दानव और दुर्दान्त-द्रोहियों का मर्दन करना है,
आज जरूरत है प्रताप जैसे तेवर अपनाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

‘‘उल्लू और गधा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


उल्लू
तो
था ही उल्लू



और



गधा,
कल तक था
भार से लदा,

लेकिन
अब दोनों की,
किस्मत निखर गई है
सारे उल्लुओं
और
गधों की
जिन्दगी सँवर गई है
जंगल-राज में,
अब इनकी ही तो सरकार है!
संसद में
उल्लुओं
और
गधो की ही तो भरमार है!!
(चित्र गूगल सर्ज से साभार)

बुधवार, 26 अगस्त 2009

‘‘हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



काम कुछ करते नही बातें बनाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


मुफ्त का खाया है अब तक और खायेंगे सदा,

जोंक हैं हम तो बदन का खून पीना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


राम से रहमान को हमने लड़ाया है सदा,

हम मजहब की आड़ में रोटी पकाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


गाय की औकात क्या? हम दुह रहे हैं सांड भी,

रोजियाँ ताबूत में से हम कमाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


दाँत खाने के अलग हैं और दिखाने के अलग,

थूक आँखों में लगा आँसू बहाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

‘‘जलवे ही जलवे मेरे देश में हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



ठलवे ही ठलवे मेरे देश में हैं।
जलवे ही जलवे मेरे देश में हैं।।

भवन खोखला कर दिया है वतन का,
अमन-चैन छीना है अपने चमन का,
बलवे ही बलवे मेरे देश में हैं।
जलवे ही जलवे मेरे देश में हैं।।

नेताओं ने चाट ली सब मलाई,
बुराई के डर से छिपी है भलाई,
हलवे ही हलवे मेरे देश में हैं।
जलवे ही जलवे मेरे देश में हैं।।

चारों तरफ है अहिंसा का शोषण,
घर-घर में पैदा हुए हैं विभीषण,

मलवे ही मलवे मेरे देश में हैं।
जलवे ही जलवे मेरे देश में हैं।।

सोमवार, 24 अगस्त 2009

‘‘मन में फिर आनन्द समाया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


तुम आये तो जीवन आया,
मन में फिर आनन्द समाया।

गीत रचाया हमने पूरा,
लेकिन लगता हमें अधूरा,
तुम आये तो सावन आया,
शब्दों में फिर बन्द समाया।
मन में फिर आनन्द समाया।।

केशर-क्यारी महक रही थी,
श्वाँस हमारी बहक रही थी,
आकर तुमने गले लगाया,
सुन्दर सुर में छन्द सुनाया,
मन में फिर आनन्द समाया।

रविवार, 23 अगस्त 2009

‘‘बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

यदि अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

फूटी किस्मत हो तो, गम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

धूप-छाँव जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
खुशियाँ पा जाने पर ही अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

‘‘गुब्बारे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



बच्चों को लगते जो प्यारे।

वो कहलाते हैं गुब्बारे।।

गलियों, बाजारों, ठेलों में।

गुब्बारे बिकते मेलों में।।



काले, लाल, बैंगनी, पीले।

कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।


पापा थैली भर कर लाते।

जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।



गलियों, बाजारों, ठेलों में।

गुब्बारे बिकते मेलों में।।


फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।

हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।


सजे हुए हैं कुछ दुकान में।

कुछ उड़ते हैं आसमान में।।


मोहक छवि लगती है प्यारी।

गुब्बारों की महिमा न्यारी।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

‘क्षणिका’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कल तक
हनुमान कहाता था,
संकट-मोचन
कहलाता था,
अब रावण मुझे बनाया है,
तो युद्ध करो!
मैं भी देखता हूँ,
बिना हनुमान के,
श्री राम की
जय कौन बोलेगा?
विदेशों में
आतंकियों से
समझौता करने
कौन जायेगा?

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

‘‘काँटों को फूल मान, चमन में सजा लिया’’ (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





जीने का ढंग हमने, ज़माने में पा लिया।

सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।।


दुनिया में जुल्म-जोर के, देखें हैं रास्ते,

सदियाँ लगेंगी उनको, भुलाने के वास्ते,

जख्मों में हमने दर्द का, मरहम लगा लिया।

सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।।


हमने तो दुश्मनों की, हमेशा बड़ाई की,

पर दोस्तों ने बे-वजह, हमसे लड़ाई की,

हमने वफा निभाई, उन्होंने दगा किया।

सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।।


आया गमों का दौर तो, दिल तंग हो गये,

मित्रों में मित्रता के भाव, भंग हो गये,

काँटों को फूल मान, चमन में सजा लिया।

सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 19 अगस्त 2009

‘‘पड़ोसी से पड़ोसी का, हमें रिश्ता निभाना है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जमाना है तो हम-तुम हैं, जमाना तो जमाना है।
यहीं पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

कहीं रातें उजाली हैं, दिवस में भी अन्धेरा है,
खुले जब आँख तो समझो, तभी आया सवेरा है,
परिन्दे को बहुत प्यारा, उसी का आशियाना है।
यहीं पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

अगर है प्यार दोजख़ में, तो जन्नत की जरूरत क्या?
बिना माँगे मिले जब सब, तो मन्नत की जरूरत क्या?
मुहब्बत की नई राहों को, दुनिया को दिखाना है।
यही पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

जो अपने दिल की यादों को बगीचों में सजाते हैं,
नियम से पेड़-पौधों को जो उपवन में उगाते है,
खुशी से हर कली को फूल बनकर मुस्कराना है।
यहीं पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

कुटिलता की कहानी को हमें कहना नही आता,
हमें अन्याय-अत्याचार को सहना नही आता,
यही सन्देश दुनिया भर को गा करके सुनाना है।
यहीं पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

जिन्हें अपना फटा दामन कभी सीना नही आया,
सलीके से सुखी होकर जिन्हें जीना नही आया,
उन्हें सदभावना का मन्त्र हमको ही सिखाना है।
यहीं पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

जिन्हें बढ़ने की आदत है, उन्हे रुकना नही आता,
जिन्हें लड़ने की आदत है, उन्हें झुकना नही आता,
पड़ोसी से पड़ोसी का, हमें रिश्ता निभाना है।
यहीं पर हर बशर को, भाग्य अपना आजमाना है।।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

‘‘घर में पानी, बाहर पानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

खटीमा में बाढ़ के ताज़ा हालात के लिए लिंक
http://uchcharandangal.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html

http://uchcharandangal.blogspot.com/2009/08/blog-post_17.html


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।

बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


सोमवार, 17 अगस्त 2009

‘‘बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जिन्दगी चल रही चिमनियों की तरह।

बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।


लाडलों के लिए पूरे घर-बार हैं,

लाडली के लिए संकुचित द्वार हैं,

भाग्य इनको मिला कंघियों की तरह।

बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।


रंक माता पिता की हैं मुश्किल बढ़ी,

ताड़ सी पुत्रियों की हैं चिन्ता बड़ी,

भूख वर की बढ़ी भेड़ियों की तरह।

बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।


शादियों में बहुत माँग जर की बढ़ी,

नोट की गड्डियों पर नजर हैं गड़ी,

रोग है बढ़ रहा कोढ़ियों की तरह।

बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।


ये ही पीड़ा हृदय में रहेगी सदा,

लेखनी दर्द इनका लिखेगी सदा,

इनकी ससुराल है बेड़ियों की तरह।

बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

‘‘इस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आज का है पता और न कल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

हमने दुर्गम डगर पर बढ़ाये कदम,
हँसते-हँसते मिले, हर मुसीबत से हम,
हमको इन्सानियत के न छल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

हमने तूफान में रख दिया है दिया,
आँसुओं को सुधा सा समझकर पिया,
भव के सागर के कोई न तल का पता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

हम तो जिससे मिले, खोलकर दिल मिले,
किन्तु वो जब मिले, फासलों से मिले,
इस कदर बढ़ गई, व्यक्ति की व्यस्तता।
पाप और पुण्य के भी न फल का पता।।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

‘‘मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे प्यारे वतन, जग से न्यारे वतन।

मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

अपने पावों को रुकने न दूँगा कहीं,
मैं तिरंगे को झुकने न दूँगा कहीं,
तुझपे कुर्बान कर दूँगा मैं जानो तन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

जन्म पाया यहाँ, अन्न खाया यहाँ,
सुर सजाया यहाँ, गीत गाया यहाँ,
नेक-नीयत से जल से किया आचमन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

तेरी गोदी में पल कर बड़ा मैं हुआ,

तेरी माटी में चल कर खड़ा मैं हुआ,

मैं तो इक फूल हूँ तू है मेरा चमन।

मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।


स्वप्न स्वाधीनता का सजाये हुए,
लाखों बलिदान माता के जाये हुए,
कोटि-कोटि हैं उनको हमारे नमन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।


जश्ने आजादी आती रहे हर बरस,
कौम खुशियाँ मनाती रहे हर बरस,
देश-दुनिया में हो बस अमन ही अमन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

‘‘दुनिया में दहशत फैलाना, फितरत है शैतानों की’’(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


गल्ती करना और पछताना, आदत है इन्सानों की।
गल्ती पर गल्ती करना ही, आदत है हैवानों की।।

दर्द पराया अपने दिल में, जिस मानव ने पाला है,
उसके जीने का तो बिल्कुल ही अन्दाज निराला है,
शम्मा पर जल कर मर जाना, चाहत है परवानों की।
गल्ती पर गल्ती करना ही, आदत है हैवानों की।।

मित्र-पड़ोसी के अन्तर में, जब तक पलती दूरी हैं,
तब तक होगी मैत्री भावना की कल्पना अधूरी हैं,
बेदिल वालों की दुनिया में, दुर्गत है अरमानों की।
गल्ती पर गल्ती करना ही, आदत है हैवानों की।।

खाया नमक देश का लेकिन नमक हलाली भूल गया,
अन्धा होकर दहशतगर्दों के हाथों में झूल गया,
दुनिया में दहशत फैलाना, फितरत है शैतानों की।
गल्ती पर गल्ती करना ही, आदत है हैवानों की।।

बुधवार, 12 अगस्त 2009

‘‘तो मिलने श्याम आयेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


स्वयं मिट जायेगी दूरी, अगर है कामना सच्ची।
मिलेगी प्यार की नेमत, अगर है भावना अच्छी।।

जलेंगे दीप खुशियों के, अगर हो स्नेह की बाती।
बनेंगे गैर भी अपने, अगर हो नेह की पाती।।

इरादे नेक होंगे तो, समन्दर थाह दे देंगे।
अगर मजबूत जज्बा है, सिकन्दर राह दे देंगे।।

अगर तुलसी सी भक्ति है, तो मिलने राम आयेंगे।
जो है मीरा सी आसक्ति, तो मिलने श्याम आयेंगे।।

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

‘‘वो तो बेदिल रहे, हम तो बा-दिल हुए’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जीते जी मेरे घर वो ना दाखिल हुए।

मेरी मय्यत में ही वो तो शामिल हुए।।


बाट तकते रहे, ख्वाब बुनते रहे,

उनकी राहों से काँटे ही चुनते रहे,

जान बिस्मिल हुई, फूल कातिल हुए।

मेरी मय्यत में ही वो तो शामिल हुए।।


हम इधर से गये, वो उधर हो गये,

जिनके कारण जगे, वो मगर सो गये,

हमने उनको पुकारा, वो गाफिल हुए।

मेरी मय्यत में ही वो तो शामिल हुए।।


दिल धड़कता रहा, साँस चलती रही,

मन फड़कता रहा, आस पलती रही,

हम तो अव्वल रहे वो ही बातिल हुए।

मेरी मय्यत में ही वो तो शामिल हुए।।


अन्त में मिलने आये वो बा-कायदा,

अब तो आने से कोई नही फायदा,

वो तो बेदिल रहे, हम तो बा-दिल हुए।

मेरी मय्यत में ही वो तो शामिल हुए।।

सोमवार, 10 अगस्त 2009

‘‘बन्दी है आजादी अपनी, छल के कारागारों में’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बन्दी है आजादी अपनी, छल के कारागारों में।
मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।।

नीचे से लेकर ऊपर तक, भ्रष्ट-आवरण चढ़ा हुआ,
झूठे, बे-ईमानों से है, सत्य-आचरण डरा हुआ,
दाल और चीनी भरे पड़े हैं, तहखानों आगारों में।
मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।।

नेताओं की चीनी मिल हैं, नेता ही व्यापारी हैं,
खेतीहर-मजदूरों का, लुटना उनकी लाचारी हैं,
डाकू, चोर, लुटेरे बैठे, संसद और सरकारों में।
मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।।

आजादी पूँजीपतियों को, आजादी सामन्तवाद को,
आजादी ऊँची-खटियों को, आजादी आतंकवाद को,
निर्धन नारों में बिकता है, गली और बाजारों में।
मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

‘‘मैंने मदद को पुकारा नही’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे आँगन में उतरे सितारे बहुत,

किन्तु मैंने मदद को पुकारा नही।


तक रहे थे मुझे हसरतों से बहुत,

मैंने हाँ भी न की और नकारा नही।


मेरी खुद्दारियाँ आड़े आतीं रहीं,

मैंने माँगा किसी से सहारा नही।


बस इसी बात का ही तो अफसोस है,

जो हमारा था वो भी हमारा नही।


अपने गम आँसुओं में बहाते रहे,

हमने तन और मन को सँवारा नही।


बन्दगी में कहा मैंने कुछ भी नही,

इसलिए उसने सोचा विचारा नही।


बन गई टिप्पणी में गज़ल ये सजल,

बून्द छोटी सी है जल की धारा नही।

रविवार, 9 अगस्त 2009

राजकिशोर राज की कलम से-प्रस्तुति डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"


अच्छा नहीं होता।

शराफ़त का सियासत में, ’दखल’ अच्छा नहीं होता।
कि गंगा में खिले जैसे, ’कमल’ अच्छा नहीं होता।
नकल से पास होते हैं, अधिकतर आज के बच्चे,
कोई मेहनत करे फिर हो, ’सफल’ अच्छा नहीं होता।
लफंगा जब सड़क पर, छेड़ता हो एक अबला को,
पलट लो उस जगह कोई, ’सबल’ अच्छा नहीं होता।
पुलिस पीटे शरीफों को, ये कसरत रोज की उनकी,
पुलिस का यूँ बनाना क्या, ’मसल’ अच्छा नहीं होता।
जो मांगे घूस में बाबू, तो उसका हाफ झट देदो,
कहो उससे कि हक ये है, ’डबल’ अच्छा नहीं होता।
बिना शादी कोई जोड़ा, मिले कॉन्ट्रैक्ट पर रहता,
गलत क्या क्युँ करे शादी, ’अमल’ अच्छा नहीं होता।
मियाँ-बीबी जो पकड़े पार्क में, अदना पुलिस वाला,
सही है पार्क में मैरिड, ’कपल’ अच्छा नहीं होता।
गरीबों को बनाया रोज, शोषण के लिए रब ने,
कि शोषण पर करे कोई, ’टसल’ अच्छा नहीं होता।
पोएट्री हो चुकी बेतुक, कहो तुम ’राज’ बेतुक ही,
लगाना तुक मिलाने में, ’अकल’ अच्छा नहीं होता।

शनिवार, 8 अगस्त 2009

‘‘हूर कब लंगूर को पहचानती है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हूर कब लंगूर को पहचानती है।
चश्म केवल नूर को ही जानती है।।

गीत और मल्हार के स्वर गौण हैं,
गजल और कव्वालियाँ भी मौन हैं,
नयी पीढ़ी पॉप को ही मानती है।
चश्म केवल नूर को ही जानती है।।

ढंग जीने का हुआ बिल्कुल निराला,
दोस्त देता जहर का पल-पल निवाला,
वैर शाखाएँ शजर से ठानती है।
चश्म केवल नूर को ही जानती है।।

कल्पनाओं को नही आकार मिलता,
ढूँढने से भी नही बेगार मिलता,
खाक दर-दर की जवानी छानती है।
चश्म केवल नूर को ही जानती है।।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

कदर सूअर की.......(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

(सूअर का चित्र गूगल से साभार, बाकी ताऊ के ब्लॉग से साभार उड़ाए हैं)



बशर कब हश्र को पहचानता है।
कदर सूअर की सूअर जानता है।।

स्वाइन फ्लू आ रहा है....



‘‘मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आज फिर टिपियाने में गीत बन गया।


मखमली ख्वाब आखों में चलता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।


अश्क मोती से बन मुस्कुराने लगे,

मन में सोये सुमन खिलखिलाने लगे,

सुख सँवरता रहा, दर्द जलता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।


तुम जो ओझल हुए अटपटा सा लगा,

जब दिखाई दिये चटपटा सा लगा,

ताप बढ़ता रहा, तन सुलगता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।


उर के मन्दिर में ही प्रीत पलती सदा,

शैल-खिखरों से गंगा निकलती सदा,

स्वप्न मेरा हकीकत में ढलता रहा।

मन मृदुल मोम सा बन पिघलता रहा।।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

’’सूअर कौन?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मैं
गलियों
सड़कों
और
नालियों को
साफ करता हूँ,
गन्दगी को
चट कर जाता हूँ,
और
सूअर कहलाता हूँ,
परन्तु
आप तो
मुझको ही
चट कर जाते हो,
जी हाँ!
मैं सूअर हूँ,
और
आप..................?

बुधवार, 5 अगस्त 2009

"ताऊ बहुत महान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')




इस असार संसार में, ब्लाग बड़ी है चीज।

ताऊ बहुत महान है, बाकी सब नाचीज।।


एक समीरानन्द हैं, दूजे अनूप आनन्द।
कथा श्रवण हैं कर रहे, ताऊ घोंघानन्द।।

चौथे की गलती नही, ब्लाग-जगत में दाल।
क्योंकि लोग निकालते, यहाँ बाल की खाल।।

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

‘‘हाइकू’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जापानी छन्द ‘‘हाइकू’’ में बने तीन चित्र


भार से कैसा लदा है?
लेकिन चलता जा रहा है,
आदमी क्या गधा है?


-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-


लैला तो एक है,
पागल हुए घूम रहे,
मजनूँ अनेक हैं,


-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-


एक ही अनार है,
खाने को हो रहे उतावले,
सैकड़ों बीमार हैं,
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-



सोमवार, 3 अगस्त 2009

‘‘खाज में कोढ़ के दाखले मत करो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


दूरिया कम करो फासले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

दौलतें बढ़ गईं दिल हुए तंग है,
कालिमा चढ़ गई, नूर बे-रंग है,
आग के ढेर पर घोंसले मत धरो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

मन में बैठे कुटिल पाप को कम करो,
बनके बादल सघन ताप को कम करो,
फूट और लूट के हौंसले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

वो ही दैरो-हरम में समाया हुआ,
नूर दुनिया में उसका ही छाया हुआ,
दीन-ईमान के चोंचले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

भाई-चारा निभाना सदा प्यार से,
रोग हरना सदा श्रेष्ठ उपचार से,
मखमली ख्वाब हैं खोखले मत करो।
खाज में कोढ़ के दाखले मत करो।।

‘‘देवदत्त प्रसून की कलम से’’ प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’



छल की गागर छलकी रे।



छल की गागर छलकी रे।
हवा चली जहरीली,
हलकी-हलकी रे।।

कपट हाथ से विनाश ढपली,
बजा रही है तृणा पगली,
मिटा ‘आज’ को चिन्ता करती,
देखो कितनी ‘कलकी’ रे।
छल की गागर छलकी रे।।

अरे ततैया सुन्दर लगती,
नस में डसे तो आग सुलगती,
धोखा नजर न खाये देखो,
खबर रखो पल-पल की रे।
छल की गागर छलकी रे।।

उर के सारे भाव खोल कर,
मन के मोती सब टटोल कर,
भेद खोलतीं चुपके-चुपके,
नैन से बून्दें ढलकीं रे।
छल की गागर छलकी रे।।

‘रात’ रोशनी निगल चुकी है,
लिए कालिमा निकल चुकी है,
इन जलते-बुझते तारों की,
चमक दिखाती झलकी रे।
छल की गागर छलकी रे।।


रविवार, 2 अगस्त 2009

‘‘जिसको चाहो गले से लगा लीजिए‘‘ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



हार भी है यहीं, जीत भी है यहीं,
जिसको चाहो उसी का मजा लीजिए।

शत्रु भी हैं यहीं, मीत भी है यही,
जिसको चाहो गले से लगा लीजिए।।

दिल में बहने लगें भाव जब आपके,
गीत और छन्द को तब सजा लीजिए।
जिसको चाहो गले से लगा लीजिए।।

दोस्ती में बहुत बन्दिशें है भरी,
दुश्मनी एक पल में बजा लीजिए।
जिसको चाहो गले से लगा लीजिए।।

नेक कामों का फल देर से आयेगा,
देखना है मजा तो दगा कीजिए।
जिसको चाहो गले से लगा लीजिए।।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

‘‘जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।


पेड़ अभिमान में थे अकड़ कर खड़े,
एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े,
लोच वालो का होता नही है दमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

सख्त चट्टान पल में दरकने लगी,
जल की धारा के संग में लुढ़कने लगी,
छोड़ देना पड़ा कंकड़ों को वतन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।


घास कोमल है लहरा रही शान से,
सबको देती सलामी बड़े मान से,
आँधी तूफान में भी सलामत है तन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

‘‘राज किशोर सक्सेना ‘राज’ की कलम सेः प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’




तुम गद्य क्षेत्र के महारथी,
शब्दों के कुशल चितेरे थे।
हर मनोभावों के शब्द-चित्र,
गढ़-गढ़ कर तीव्र उकेरे थे।

जो लिखा वही इतिहास बना,
जो कहा वही प्रतिमान हुआ।
हर शब्द कलम से जो निकला,
नव-सूरज सा गतिमान हुआ।

जो कथा कही वह अमर हुई,
एक मापदण्ड का रूप बनी।
हर उपन्यास जनप्रिय बना,
गाथा जन का प्रतिरूप बनी।

जो लिखा गजब का लेखन था,
हर पात्र बोलता लगता था।
वह रोता था, सब रोते थे,
सब हँसते थे जब हँसता था।

है अतुल तुम्हारा योगदान,
भाषा का रूप सँवारा है।
हे गद्य विधा के प्रेमचन्द्र!
तुमको शत् नमन हमारा है।।

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