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शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

"दरवाजों की दस्तक को, पढ़ पाना बहुत जरूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों !
नौ माह और दस दिन में पूरी हो गयीं हैं,
आज 400 पोस्ट !


जीवन के कवि सम्मेलन में, गाना तो मजबूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।


जाने कितने स्वप्न संजोए,
जाने कितने रंग भरे।
ख्वाब अधूरे, हुए न पूरे,
ठाठ-बाट रह गये धरे।
सरदी-गरमी, धूप-छाँव को, पाना तो मजबूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।

जितना आगे कदम बढ़ाया,
मंजिल उतनी दूर हो गयीं।
समरसता की कल्पनाएँ सब,
थककर चकनाचूर हो गयीं।
घिसी-पिटी सी रीत निभाना, जन-जन की मजबूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।


बचपन बीता, गयी जवानी,
सूरज ढलने वाला है।
चिर यौवन को लिए हुए, 
मन सबका ही मतवाला है।
दरवाजों की दस्तक को, पढ़ पाना बहुत जरूरी है।
आये हैं तो कुछ कह-सुनकर, जाना बहुत जरूरी है।।

"इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

राष्ट्र-नायिका श्रीमती इन्दिरा गांधी को 
!! शत्-शत् नमन !!




मैंने 31 अक्टूबर, 1984 को लिखी थी यह कविता।
!! श्रद्धाञ्जलि़ !!
रोयें सारे नगर और गाम।

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
तेरी हत्या पर नभ रोया,
रोये चाँद सितारे।
सारे तेरे विरोधी रोये,
रोये अपने सारे।
सब जन करते हैं तेरो गुणगान।

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!


तुलसी की मानस रोई और 
जायसी की अखरावट,
श्रीमति शिवा बावनी रोई
रोई है पद्मावत,
रोये नानक की वाणी,
सबह-औ-शाम।

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!


सूर कबीर के पद रोये
और रोईं हैं कुण्डलिया.
नरोत्तम के कृष्ण रोये थे,
रोईं बहुत मुरलिया,
रोये रसिक बिहारी के श्याम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!


स्वर्ग-लोक के सुर और दानव
करते क्रन्दन-क्रन्दन,
भारत के सब नर और नारी
करते तेरा वन्दन.
करते तुझको हैं शत्-शत् प्रणाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!

भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

"एक मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



ये आँखे कुछ बोल रही हैं?




आँखें कभी छला करती हैं,

आँखे कभी खला करती हैं।

गैरों को अपना कर लेती-

जब भी चश्म मिला करती हैं।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

"प्रीत की होती सजा कुछ और है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")






अन्धे कुएँ में पैंठकर, ऐसे न तुम ऐंठा करो,
झील-तालाबों की दुनिया और है।


बन्द कमरों में न तुम, हर-वक्त यूँ बैठा करो,
बाग की ताजा फिजाँ कुछ और है।


स्वर्ण-पिंजड़े में कभी शुक को सुकूँ मिलता नही,
सैर करने का मज़ा कुछ और है।


जुल्म से और जोर से अपना नहीं बनता कोई
प्यार करने की रज़ा कुछ और है।


गाँव में रहकर रिवाजों-रस्म को मत तोड़ना,
प्रीत की होती सज़ा कुछ और है।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

"प्यार माँगता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मै प्यार का हूँ राही और प्यार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।

सूनी सी ये डगर हैं,
अनजान सा नगर हैं,
चन्दा से चाँदनी का आधार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।

सूरज चमक रहा है,
जग-मग दमक रहा है,
किरणों से रोशनी का संसार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।
यह प्रीत की है डोरी,
ममता की मीठी लोरी.
मैं स्नेहसिक्त पावन परिवार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

"मजबूर हो गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



रहते थे पास में जो, वो दूर हो गये हैं।
मगरूर थे कभी जो, मजबूर हो गये हैं।।


श्रृंगार-ठाठ सारे, करने लगे किनारे,
महलों में रहने वाले, मजदूर हो गये हैं।
मगरूर थे कभी जो, मजबूर हो गये हैं।।


थे जो कभी सरल से, अब बन गये गरल से,
जो थे कभी सलोने, बे-नूर हो गये हैं।
मगरूर थे कभी जो, मजबूर हो गये हैं।।


रहते गुमान में थे. बैठे जो शान से थे,
पर्वत से टूटकर कर वो,सब चूर हो गये हैं।
मगरूर थे कभी जो, मजबूर हो गये हैं।।


सपने हुए सयाने, सच को लगे चिढ़ाने,
अब देखकर हकीकत, काफूर हो गये हैं।
मगरूर थे कभी जो, मजबूर हो गये हैं।।

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

"भारत-माता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मैं हिमगिरि हूँ सच्चा प्रहरी,
रक्षा करने वाला हूँ।
शीश-मुकुट हिमवान अचल हूँ,
सीमा का रखवाला हूँ।।
मैं अभेद्य दुर्ग का,
 उन्नत बलशाली परकोटा हूँ।
मैं हूँ वज्र समान हिमालय,
कोई न छोटा-मोटा हूँ।।
माँ की आन-बान की खातिर,
सजग हमेशा खड़ा हुआ हूँ,
दुश्मन को ललकार रहा हूँ,
मुस्तैदी से अड़ा हुआ हूँ,

प्राणों से प्यारी माता के लिए,
वीर बलिदान हो गये।
संगीनों पर माथा रखके,
सरहद पर कुर्बान हो गये।।

मैं सागर हूँ देव-भूमि को,
दिन और रात सवाँर रहा हूँ।
मैं गंगा के पावन जल से,
माँ के चरण पखार रहा हूँ।।
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

"कुछ गीत मचल जाते है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

समय चक्र में घूम रहे जब मीत बदल जाते हैं।
उर अलिन्द में झूम रहे नवगीत मचल जाते है।।

जब मौसम अंगड़ाई लेकर झाँक रहा होता है,
नये सुरों के साथ सभी संगीत बदल जाते हैं।
उर अलिन्द में झूम रहे कुछ गीत मचल जाते है।।

उपवन में जब नये पुष्प अवतरित हुआ करते हैं,
पल्लव और परिधानों के उपवीत बदल जाते हैं।
उर अलिन्द में झूम रहे कुछ गीत मचल जाते है।।

रात अमावस में "मयंक" जब कारा में रहता है,
कृष्ण-कन्हैया के माखन नवनीत बदल जाते हैं।
उर अलिन्द में झूम रहे कुछ गीत मचल जाते है।।

चलते-चलते भुवन-भास्कर जब कुछ थक जाता है,
मुल्ला-पण्डित के पावन उद्-गीथ बदल जाते है।
उर अलिन्द में झूम रहे कुछ गीत मचल जाते है।।

जीवन का अवसान देख जब यौवन ढल जाता है,
रंग-ढंग, आचरण, रीत और प्रीत बदल जाते हैं।।
उर अलिन्द में झूम रहे कुछ गीत मचल जाते है।।


गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

"हरा नही हो सकता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




पागल तो हो सकता हूँ, 
पर डरा हुआ नही हो सकता।
निद्रा में हो सकता हूँ, 
पर मरा हुआ नही हो सकता।।


जो परिवेशों में घटता है,
उसको ही मैं गाता हूँ।
गूँगे-बहरे से समाज को,
लिख-लिखकर समझाता हूँ।।
अच्छा तो हो सकता हूँ,
पर बहुत बुरा नही हो सकता।।


मैं दरख़्त का पीला पत्रक,
मद्धम सुर में गाता हूँ।
भोजन का अम्बार लगा है,
फिर भी मैं नही खाता हूँ।।
सूखा तो हो सकता हूँ,
पर पुनः हरा नही हो सकता।।

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

"यह धरती का है भगवान।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! किसान !!

सूरज चमका नील-गगन में।
फैला उजियारा आँगन में।।


काँधे पर हल धरे किसान।
करता खेतों को प्रस्थान।।


मेहनत से अनाज उपजाता।
यह जग का है जीवन दाता।।


खून-पसीना बहा रहा है।
स्वेद-कणों से नहा रहा है।।


जीवन भर करता है काम।
लेता नही कभी विश्राम।।


चाहे सूर्य अगन बरसाये।
चाहे घटा गगन में छाये।।


यह श्रम में संलग्न हो रहा।
अपनी धुन में मग्न हो रहा।।


मत कहना इसको इन्सान।
यह धरती का है भगवान।।

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

"सब बच्चों का प्यारा मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! चन्दा-मामा !!

नभ में कैसा दमक रहा है।
चन्दा मामा चमक रहा है।।



कभी बड़ा मोटा हो जाता।
और कभी छोटा हो जाता।।



करवा-चौथ पर्व जब आता।
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।
महिलाएँ छत पर जाकर के।
इसको तकती हैं जी-भर के।।
यह सुहाग का शुभ दाता है।
इसीलिए पूजा जाता है।।


जब भी वादल छा जाता है।
तब मयंक शरमा जाता है।।
लुका-छिपी का खेल दिखाता। 
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।


धवल चाँदनी लेकर आता।
आँखों को शीतल कर जाता।।
सारे जग से न्यारा मामा।
सब बच्चों का प्यारा मामा।।

(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

"दूज के इस तिलक में यही भावना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मेरे भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर,
कर रही हूँ प्रभू से यही कामना।
लग जाये किसी की न तुमको नजर,
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति के शिखर पर हमेशा चढ़ो,
कष्ट और क्लेश से हो नही सामना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


थालियाँ रोली चन्दन की सजती रहें,
सुख की शहनाइयाँ रोज बजती रहें,
पूर्ण हों भाइयों की सभी साधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


रोशनी से भरे दीप जलते रहें,
नेह के सिन्धु नयनों में पलते रहें,
आज बहनों की हैं ये ही आराधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

"सूर्य तो अज्ञान का, ढलता रहेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")






युग सदा विज्ञान का, चलता रहेगा।
यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।।


आँधियाँ भीषण चलें, और जलजले आते रहें,
यज्ञ तो परित्राण का, फलता रहेगा। 

यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।।


कर्म का नही चक्र रुकना चाहिए,
नेह तो इन्सान का, पलता रहेगा।
यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।।

धर्म की राहें, कुटिल सी हो गयीं,
ह्रास तो भगवान का, खलता रहेगा। 
यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।।


सत्य का झण्डा कभी झुकता नही,
सूर्य तो अज्ञान का, ढलता रहेगा।
यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।।


शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

"आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! शुभ-दीपावली !!


दूर करने को अन्धेरा दीप झिलमिल जल रहे। 
स्नेह पाकर प्यार का दीपक खुशी से खिल रहे।।


दीन की कुटिया-भवन जगमग हुए आलोक से।
लग रहा मानों सितारे आ गये द्यु-लोक से।।


प्रेम से करना "गजानन-लक्ष्मी" आराधना।
आज होनी चाहिए "माँ शारदे" की साधना।।


अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।


आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

"नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


!! शुभ-दीपावली !!

रोशनी का पर्व है, दीपक जलायें।
नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।।


बातियाँ नन्हें दियों की कह रहीं,
इसलिए हम वेदना को सह रहीं,
तम मिटाकर, हम उजाले को दिखायें।
नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।।


डूबते को एक तृण का है सहारा,
जीवनों को अन्न के कण ने उबारा,
धरा में धन-धान्य को जम कर उगायें।
नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।।


जेब में ज़र है नही तो क्या दिवाली,
मालखाना माल बिन होता है खाली,
किस तरह दावा उदर की वो बुझायें। 
नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।।


आज सब मिल-बाँटकर खाना मिठाई, 
दीप घर-घर में जलाना आज भाई,
रोज सब घर रोशनी में झिलमिलायें।
नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

"दिवाली आ गयी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! शुभ-दीपावली !!

तम अमावस का मिटाने को दिवाली आ गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


जगमगाते खूबसूरत लग रहे नन्हें दिये,
लग रहा जैसे सितारे हों धरा पर आ गये,
झोंपड़ी महलों के जैसी मुस्कराहट पा गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


भवन की दीवार को बेनूर बारिश ने करा था,
गाँव के कच्चे घरों का नूर भी इसने हरा था,
रंग-लेपन से सभी में अब सजावट छा गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


छँट गया सारा अन्धेरा पास और परिवेश का,
किन्तु भीतरघात से बदहाल भारत देश का,
प्यार जैसे शब्द को भी तो दिखावट खा गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

"धड़ाधड़ ओले पड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



ब भी सिर को है मुंडाया, धड़ाधड़ ओले पड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


माँ ने दी थी सीख, मिलकर साथ में रहना सभी,
बोल कड़वे तुम कभी भी, किसी से कहना नही,
शोध पर प्रतिशोध छाया, क्रोध के शोले बढ़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
जहर से सींचा हुआ,  पादप नही होगा हरा,
रंग में भँग आजकल के दोस्त हैं घोले खड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


झूठ की पाकर गवाही, सत्यता है जेल में,
हो गयी भीषण लड़ाई, दम्भ के है खेल में,
होश है अपना गँवाया, बे-वजह भोले अड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


दुर-नीति से हारी विदुर की नीति है,
छल-कपट भारी, कुटिल सब रीति है,
शस्त्र लेकर सन्त आया, ज्ञान गठरी में सड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

"चलता-फिरता हास्य" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गुड्डी के आगे-पीछे है, गुड्डा हिन्दुस्तान में।
गुड़िया बसी विदेशों में, और बुड्ढा ब्लॉगिस्तान में।।

पहले दोनों साथ-साथ में गाते मधुर तराने थे,
सुर से सुर मिल जाते थे दोनों के सुन्दर गाने थे,
सपना चकनाचूर हुआ, जब आया जूस उफान में।
गुड़िया बसी विदेशों में, और बुड्ढा ब्लॉगिस्तान में।।

जैसे ही सुर बिगड़ा, तबले का बन गया नगाड़ा है,
चोटी खींच रहा है कोई, कोई खींचता नाड़ा है,
कुश्तम-कुश्ता शुरू हो गयी,  दोनों हैं मैदान में।
गुड़िया बसी विदेशों में, और बुड्ढा ब्लॉगिस्तान में।।

(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

"चाँद और निशा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



विरह की अग्नि में दग्ध क्यों हो निशा, 
क्यों सँवारे हुए अपना श्रृंगार हो।
क्यों सजाए हैं नयनों में सुन्दर सपन, 
किसको देने चली आज उपहार हो।


क्यों अमावस में आशा लगाए हो तुम,
चन्द्रमा बन्द है आज तो जेल में।
तुम सितारों से अपना सजा लो चमन,
आ न पायेगा वो आज तो खेल में।


एक दिन तो महीने में धीरज धरो,
कल मैं कारा से उन्मुक्त हो जाऊँगा।
चाँदनी फिर से चमकाउँगा रात में,
प्यार में प्रीत में मस्त हो जाउँगा।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

"अपना विद्यालय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


विद्या का भण्डार भरा है जिसमें सारा।
हमको अपना विद्यालय प्राणों से प्यारा।।
नित्य नियम से विद्यालय में हम पढ़ने को जाते हैं।।
इण्टरवल जब होता है हम टिफन खोल कर खाते हैं।
खेल-खेल में दीदी जी विज्ञान गणित सिखलाती हैं।
हिन्दी और सामान्य-ज्ञान भी ढंग से हमें पढ़ाती हैं।।
कम्प्यूटर में सर जी हमको रोज लैब ले जाते है।
माउस और कर्सर का हमको सारा भेद बताते हैं।।
कम्प्यूटर में गेम खेलना सबसे ज्यादा भाता है।
इण्टरनेट चलाना भी हमको थोड़ा सा आता है।।
जिनका घर है दूर वही बालक रिक्शा से आते हैं।
अपना घर है बहुत पास हम पैदल-पैदल जाते हैं।।
पढ़-लिख कर हम अच्छे-अच्छे काम करेंगे।
दुनिया में अपने भारत का सबसे ऊँचा नाम करेंगें।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

"एक पाती सजनी के नाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

:शरद कोकास जी को समर्पित:
!! करवा-चौथ की शुभकामनाएँ !!

जब भी दीप जलाया तुमने अक्स हमारा देखा।
चन्दा की गोलाई में भी नक्स हमारा देखा।।

मैंने जब दर्पण देखा प्रतिरूप तुम्हारा पाया।
मेरे साथ तुम्हारा हरदम रूप उभर कर आया।।
बाहर की दौलत का क्या है, केवल आनी-जानी है।
अन्तरतम की प्यारभरी दौलत जग ने मानी है।।
जब तक सूरज-चाँद रहेंगे, प्यार करूँगा मन से।
मोह कभी नही भंग करूँगा मैं अपने प्रियतम से।।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

"सलामत रहो साजना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




कर रही हूँ प्रभू से यही प्रार्थना।
जिन्दगी भर सलामत रहो साजना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति की सदा सीढ़ियाँ तुम चढ़ो,
आपकी सहचरी की यही कामना।
जिन्दगी भर सलामत रहो साजना।।


आभा-शोभा तुम्हारी दमकती रहे,
मेरे माथे पे बिन्दिया चमकती रहे,
मुझपे रखना पिया प्यार की भावना।
जिन्दगी भर सलामत रहो साजना।।


तीर्थ और व्रत सभी हैं तुम्हारे लिए,
चाँद-करवा का पूजन तुम्हारे लिए,
मेरे प्रियतम तुम्ही मेरी आराधना।
जिन्दगी भर सलामत रहो साजना।।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

"क्यों ये सज़ा दे रहे??" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


धूप थी कल कड़ी, और थी गर्मी बड़ी,
ठण्डी कुल्फी का सब थे मज़ा ले रहे।
आज छाये हैं घन, है अन्धेरा सघन,
किस जनम की ये बादल सज़ा दे रहे।।

कैसी बे-वक्त में है ये बारिश पड़ी,
बिन बुलाए ही सर्दी बहुत है बढ़ी,
खेत जल से भरे, धान सब गिर पड़े,
किस जनम की प्रभू, ये सज़ा दे रहे।।
प्यास थी जब लगी, तब नदारद था जल,
आस थी जब जगी, तब हृदय था विकल,
तब तो थे बस डरे, किन्तु अब हैं मरे,
मेरी माटी को, क्यों ये सज़ा दे रहे।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

"आजादी बेड़ा-गड़क बन गई है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



पतली गली अब सड़क बन गई है।
नाजुक लता अब कड़क बन गई है।।


समय को बदलते नही देर लगती,
हैवानियत अब हड़क बन गई है।
नाजुक लता अब कड़क बन गई है।।


दिखाई नही दे रही सादगी अब,
पौशाक में अब भड़क बन गई है।
नाजुक लता अब कड़क बन गई है।।


जुगाड़ों में गुम हो गई प्राञ्जलता,
सिफारिस भी सीधे मड़क बन गई है।
नाजुक लता अब कड़क बन गई है।।


जहाँ न्याय, अन्याय पर ही टिका हो,
वो आजादी बेड़ा-गड़क बन गई है।
नाजुक लता अब कड़क बन गई है।।

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

"लाल हमारा, ताशकन्द ने छीना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



दो अक्टूबर के दिन जन्मा भारत भाग्य विधाता।
इसी दिवस से पण्डित लालबहादुर का है नाता।।


धन्य हो गई भारत की धरती इन वीर सपूतों से।
मस्तक ऊँचा हुआ देश का अमन-शान्ति के दूतों से।।


दो अक्टूबर के दिन उपवन जी भर करके मुस्काया।
गांधी जी के बाद बहादुर लाल चमन में आया।।


जय-जवान और जय किसान का नारा लगा दिया था।
दुष्ट पाक की सेना को सीमा से भगा दिया था।।


कारयरता का समझौता तुमको था रास न आया।
ये गहरा आघात हृदय को सहन नही हो पाया।।


सीखा नही कभी था तुमने, घुट-घुट करके जीना।
सबसे प्यारा लाल हमारा, ताशकन्द ने छीना।। 

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

"सबका बापू कहलाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! श्रद्धापूर्वक नमन !!




राष्ट्रीय वैदिक पूर्व-माध्यमिक विद्यालय,खटीमा में इन्ही दो महान चित्रों पर माल्यार्पण किया गया।


सत्य, अहिंसा का पथ जिसने, दुनिया को दिखलाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।।

भाले-बरछी, तोप-तमञ्चे, हथियारों को छोड़ दिया,
देश-भक्ति के नारों से, जनता का मानस जोड़ दिया,

स्वतन्त्रता का मन्त्र अनोखा, तुमने ही बतलाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।।

गंगा, यमुना,सरस्वती की, भारत में बहती धारा,
राम, कृष्ण,गौतम,गांधी का देश यही प्यारा-प्यारा,

इसीलिए तो देवताओं ने, इसी भूमि को अपनाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।।

दो अक्टूबर को भारत में,गांधी ने अवतार लिया,
लालबहादुर ने भी इस पावन माटी से प्यार किया,

जय-जवान और जय-किसान का नारा सबको सिखलाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।।

लोकतन्त्र की आहुति बनकर, दोनों ने बलिदान दिया,
महायज्ञ की बलिवेदी पर, अपना जीवन दान किया,

धन्य-धन्य हे पुण्य प्रसूनों! तुमने उपवन महकाया।
सारे जग से न्यारा गांधी, सबका बापू कहलाया।।

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