"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 30 नवंबर 2009

"वीराना जैसा अपना चमन हो नही सकता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



वीराना जैसा अपना चमन हो नही सकता।
इतना उदास फूलों का मन हो नही सकता।।


वीरों  ने इसे सींचा है शोणित की धार से,
सन्तों ने सँवारा है बहुत लाड़-प्यार से,
मुर्झाया हुआ इसका सुमन हो नही सकता।
इतना उदास फूलों का मन हो नही सकता।।


इसमें ही पल रहा है, अमन-चैन हमारा,
इसमें ही चल रहा है, धर्म-कर्म हमारा,
अब और खण्ड-खण्ड वतन हो नही सकता।
इतना उदास फूलों का मन हो नही सकता।।


गुंचों की हिफाजत को हैं कुछ खार जरूरी,
फौजों के साथ होते हैं हथियार जरूरी,
साकार शत्रुओं का सपन हो नही सकता।
इतना उदास फूलों का मन हो नही सकता।।

रविवार, 29 नवंबर 2009

"हमें संस्कार प्यारे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

उजाला ले के आये हो तो अपने मुल्क में छाँटो,
हमें अँधियार प्यारे हैं।
निवाला ले के आये हो तो अपने मुल्क में चाटो.
हमें किरदार प्यारे हैं।

नही जाती हलक के पार, भारी भीख की रोटी,
नही होगी यहाँ पर फिट, तुम्हारी सीख की गोटी,
बबाला ले के आये हो तो, अपने मुल्क में काटो,
हमें सरदार प्यारे हैं।

फिजाँ कैसी भी हो हर हाल में हम मस्त रहते हैं,
यहाँ के नागरिक हँसते हुए हर कष्ट सहते हैं.
गज़ाला ले के आये हो तो अपने मुल्क में बाँटो,
हमें दस्तार प्यारे हैं।

तुम अपने पास ही रक्खो, ये नंगी सभ्यता गन्दी,
हमारे पास है अपनी, हुनर वाली  अक्लमन्दी,
हमें संस्कार प्यारे हैं

शनिवार, 28 नवंबर 2009

"ईदुल-जुहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

समस्त  भाई-बहनों को
"ईदुल-जुहा" 
की 
!! मुबारकवाद !!



वतन में अमन की, जागर जगाने की जरूरत है,
जहाँ में प्यार का सागर, बहाने की जरूरत है।
मिलन मोहताज कब है,ईद,होली और क्रिसमस का-
दिलों में प्रीत की गागर, सजाने की जरूरत है।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

"मेरे देश के नेता! सचमुच महान हैं!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



रोटी है, 
बेटी है, 
बँगला है, 
खेती है,


सभी जगह 
घोटाले हैं, 
कपड़े उजले हैं,
दिल काले हैं,


उनके भइया हैं,
इनके साले हैं,
जाल में फँस रहे, 
कबूतर भोले-भाले हैं,


गुण से विहीन हैं
अवगुण की खान हैं
जेबों में रहते
इनके भगवान हैं


इनकी दुनिया का
नया विज्ञान है
दिन में इन्सान हैं
रात को शैतान हैं


न कोई धर्म है
न ही ईमान है
मुफ्त में करते
नही अहसान हैं


हर रात को बदलते
नये मेहमान है
मेरे देश के नेता
सचमुच महान हैं!

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

"कोटि-कोटि नमन!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


ऐ शहीदों तुम्हें कोटि-कोटि नमन,
प्राण देकर बचाया तुम्हीं ने चमन।

देश-रक्षा की खातिर जो ली थी कसम,
कारगिल हो या पंजाब या हो असम,
तुमने लौटा दिया वादियों का अमन।
ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।

वीरता से लड़े, धीरता से लड़े,
तुम समर में सदा आगे-आगे बढ़े,
मातृ-भू पर निछावर किया जान-औ-तन।
ऐ शहीदों तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।

धन्य माता हुई, धन्य है यह धरा,
हो गया वो अमर, जो वतन पर मरा,
हैं समर्पित तुम्हें, वाटिका के सुमन।
ऐ शहीदों तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।

बुधवार, 25 नवंबर 2009

"बद्-दुआएँ सर गयीं है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कामनाओं के नगर में भावनाएँ मर गयीं हैं।
वासनाओं की डगर में साधनाएँ डर गयीं हैं।।


सभ्यता सोई हुई है, नग्नता जागी हुई,
नौनिहालों ने हया और शर्म है त्यागी हुई,
चेतनाओं के उदर में जल्पनाएँ भर गयीं हैं। 
वासनाओं की डगर में साधनाएँ डर गयीं हैं।।


शुष्क हैं सरिताएँ, नाले गन्दगी के बढ़ रहे, 
कैद में तम की पड़े, उजले-उजाले सड़ रहे हैं,
प्रेरणाओं की लहर में मान्यताएँ उड़ गयीं हैं।
वासनाओं की डगर में साधनाएँ डर गयीं हैं।।


मन्द है मनुहार की महकी समीरण,
स्वार्थ की आँधी ने तोड़े द्वार तोरण,
प्रार्थनाओं के सफर मे बद्-दुआएँ सर  गयीं है।
वासनाओं की डगर में साधनाएँ डर गयीं हैं।।

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

"दिखा कहीं श्रम-स्वेद नही" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



देश-वेश और जाति, धर्म  का , मन में कुछ भी भेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।


सरदी की ठण्डक में ठिठुरा, गर्मी की लू झेली हैं,
बरसातों की रिम-झिम से जी भर कर होली खेली है,
चप्पू दोनों सही-सलामत, पर नौका में  छेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।


सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया,
दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।


आशा और निराशा का संगम है,  एक परिभाषा है,
कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है,
गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।




सोमवार, 23 नवंबर 2009

"तुकबन्दी हो ही गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

स्वाइन-फ्लू का प्रकोप तो नगर में है ही,
आज दिन में 2 बजे से तेज बुखार भी चढ़ आया।


अब कुछ ठीक अनुभव कर रहा हूँ तो 


ये तुकबन्दी हो ही गई!


तुम मनुहार दिखाओगे तो जाना मुश्किल हो जायेगा।
मेरा प्यार भुलाना साथी, तुमको मुश्किल हो जायेगा।।


जब-जब मुझको ज्वर आया, तुम हिले नही सिरहाने से,
बेटे दायें-बाये बैठे , हटे नही समझाने से,
जब आयेगा दूत उठाने, उसको मुश्किल हो जायेगा।
मेरा प्यार भुलाना साथी, तुमको मुश्किल हो जायेगा।।


माता और पिता जी चिन्तित, पोता-पोती चिन्ता में,
सभी प्रार्थनारत बैठे हैं, मन है जगत नियन्ता में,
जन्नत -सुख से बहलाना, यम को मुश्किल हो जायेगा।
मेरा प्यार भुलाना साथी, तुमको मुश्किल हो जायेगा।।


संगी-साथी नगर-ग्राम के, बारी-बारी से आये,
बिना बुलाए टीम साथ में, चिकित्सकों की ले आये,
स्नेह-सिक्त परिवार देखकर, जा्ना मुश्किल हो जायेगा।
मेरा प्यार भुलाना साथी, तुमको मुश्किल हो जायेगा।।

रविवार, 22 नवंबर 2009

"चाक दामन सी रही है जिन्दगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

-: एक मुक्तक :-
गम में अपने जी रही है जिन्दगी।
अश्क अपने पी रही है जिन्दगी।।
दिल के सारे जख़्म अब तक हैं हरे,
चाक दामन सी रही है जिन्दगी।।

"खटीमा में स्वाइन-फ्लू तथा बाघ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज कुछ भी लिखने का मन नही है।
भारत के उत्तराखण्ड प्राऩ्त के खटीमा कस्बे में
स्वाइन-फ्लू ने दस्तक दे दी है 
और समीपवर्ती जंगल में बाघ (शेर) का आतंक है

उत्तराखण्ड सरकार चिन्तित!
स्वास्थ्य-विभाग में हड़कम्प मचा!!

शनिवार, 21 नवंबर 2009

"नीड़ में ज़र तलाश करते हो!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



छल-फरेबी के हाट में जाकर,
भीड़ में नर तलाश करते हो!


ऊँचे महलों से खौफ खाते हो,
नीड़ में ज़र तलाश करते हो!


दौर-ए-मँहगाई के ज़माने में,
खीर में गुड़ तलाश करते हो!


ज़ाम दहशत के ढालने वालो,
पीड़ में सुर तलाश करते हो!




शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

"अनुशासन, दूर-दृष्टि और पक्का-इरादा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! शत्-शत् प्रणाम !!


कमला और जवाहर के घर,
       दुर्गा ने अवतार लिया।
गांधी जी से प्रेरित होकर,
खद्दर तन पे धार लिया।।
नेहरू जी ने बिटिया रानी 
को "इन्दु" उपनाम दिया।
"प्रियदर्शिनी इन्दिरा नेहरू"
माता जी ने नाम दिया।।
वीर जवाहर की बिटिया का,
बचपन बहुत निराला था।
क्रान्तिकारियों की सेवा में,
इनका मन मतवाला था।।
शासन और सत्ता पाई तो,
 ऐसा कठिन समय आया।
पाक पड़ोसी ने दल-बल से,
हमला हम पर करवाया।।
दुर्गारूप धरा इन्दिरा ने,
तोपों का मुँह खोल दिया।
करुणा की भोली सूरत ने,
धावा अरि पर बोल दिया।।
किया पराजित रण-भूमि में,
मन्सूबे रह गये धरे।
बंगला देश बनाकर,
दुश्मन को सन्ताप दिये गहरे।।
इन्दिरा जी के जन्म-दिवस पर,
हम लेते हैं संकल्प सभी।
अनुशासन और दूरदृष्टि से,
विमुख न होंगे कदम कभी।।







लोकतन्त्र की बलिवेदी पर,
इन्दिरा ने बलिदान दिया।
महायज्ञ की आहुति बनकर,
अपना जीवन दान दिया।। 

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

"जन्म-दिवस पर शत्-शत् नमन!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



दुर्गा की अवतार
श्रीमती इन्दिरा गांधी
को
जन्म-दिवस पर
शत्-शत् नमन!

न्दिरा प्रियदर्शिनी फिर से आओ मेरे भारत में।
दूर-दृष्टि के मन्तव्यों को लाओ मेरे भारत में।।


मंगलवार, 17 नवंबर 2009

"आस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



प्रियतम जब तुम आओगे तो,
संग बहारें लाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।


तुमको पाकर मन के उपवन,
बाग-बाग हो जायेंगे,
वीराने गुलशन में फिर से,
कली-सुमन मुस्कायेंगे,
जीवनरूपी बगिया में तुम,
ढंग निराले लाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।


अमराई में कोयल फिर से,
कुहुँक-कुहुँक कर गायेगी,
मुर्झाई अमियों में फिर से,
मस्त जवानी छायेगी,
अमलतास के पेड़ों पर,
पचरंगी फूल खिलाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।


आशा है आकर तुम मेरे,
कानों में रस घोलोगे,
सदियों का तुम मौन तोड़कर,
मीठे स्वर में बोलोगे,
अपनी साँसो के सम्बल से,
मुझको तुम सहलाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।


सोमवार, 16 नवंबर 2009

"देश का दूषित हुआ वातावरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


सभ्यता, शालीनता के गाँव में,
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
देश का दूषित हुआ वातावरण।


सुर हुए गायब, मृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान की, सम्मान में,
आब खोता जा रहा है आभरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?


शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?


लग रहे घट हैं भरे, पर रिक्त हैं,
लूटने में राज को, सब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ सब आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?

रविवार, 15 नवंबर 2009

"वो तो कुत्ते की मौत मरता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



जो परिन्दे के पर कतरता है।
वो इबादत का ढोंग करता है।।


जो कभी बन नही सका अपना,
दम वही दोस्ती का भरता है।


दीन-ईमान को जो छोड़ रहा,
कब्र में पाँव खुद ही धरता है।


पार उसका लगा सफीना है,
जो नही ज़लज़लों से डरता है।


इन्तहा जिसने जुल्म की की है,
वो तो कुत्ते की मौत मरता है।


शनिवार, 14 नवंबर 2009

"बाल-दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

राष्ट्र-नायक पं. नेहरू को शत्-शत् नमन!!

चाचा नेहरू तुमने प्यारे बच्चों को ईनाम दिया था।
अपने जन्म-दिवस को तुमने बाल-दिवस का नाम दिया था।


फूलों की मुस्कानों से महके उपवन।
बच्चों की किलकारी से गूँजे आँगन।।


एक साल में एक बार ही बाल दिवस आता है।
मास नवम्बर नेहरू जी की याद दिलाता है।।


लाल-जवाहर के सीने पर सजा सुमन।
अभिनव भारत के निर्माता तुम्हें नमन।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


(1)



धूप का आघात सहने के लिए सारी जमीं है।


गर्मियों में भी पहाड़ों मे जमी ठण्डी नमी है।


कट गई है गीत-गज़लों मे मेरी यह जिन्दगी,


किन्तु अब तक छन्द और लय में कमी है।।



(2)


दाल-आटा, शाक-फल से भी कुपोषण हो रहा।


कुछ नही मौलिक बचा है, पिष्ट-पेषण हो रहा।


क्या लिखें, किसको सुनाएँ, कौन छापेगा भला?


देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।।


बुधवार, 11 नवंबर 2009

"सजा मौत की दे दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



भारत में रहकर हिन्दी से जिनको प्यार नही है।
उनको इस धरती पर रहने का अधिकार नही है।।


जितनी भी भाषा-बोली हैं, सब हमको हैं प्यारी।
लेकिन देवनागरी भाषा पर, हम सब बलिहारी।।


राज ठाकरे के गुर्गों ने, ये कैसा पथ अपनाया?
वीर-शिवाजी की सूरत में काला दाग लगाया।।


कारा में डालो "मनमोहन" इन ज़ालिम मक्कारों को।
सजा मौत की दे दो, इन भारत-माँ के गद्दारों को।।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

"क्या तुम साथ निभाओगे?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




राह कठिन है, पथ दुर्गम है, क्या तुम साथ निभाओगे?
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


मेरे साथ नही मस्ती है, विपदाओं से कुश्ती है,
आँधी और तूफानों से तुम निश्चित ही डर जाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


तपन ग्रीष्म की, घन का गर्जन, बरसातों की बौछारें,
जाड़े की सिहरन-कम्पन को देख-देख रुक जाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


मैं उजड़ा-बिगड़ा गुलशन हूँ, तुम हो खिलता हुआ चमन,
बाँह पकड़कर मरुथल की, तुम वीराना कहलाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


तुम सुख में जीने वाले, मैं हूँ श्रम-साधक, मेहनतकश,
महलों को तजकर, तिनकों के घर में क्या रह पाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


मैं श्यामल पूरबवाला, तुम गोरे पश्चिमवाले हो,
मेरे साथ-साथ चलकर, तुम उजला रूप गँवाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।

सोमवार, 9 नवंबर 2009

"पुरानों को नमन और नयों को प्रणाम!!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सूर, कबीर, तुलसी, के गीत,
सभी में निहित है प्रीत।
आज
लिखे जा रहे हैं अगीत,
अतुकान्त
सुगीत, कुगीत
और नवगीत।
जी हाँ!
हम आ गये हैं
नयी सभ्यता में,
जीवन कट रहा है
व्यस्तता में।
सूर, कबीर, तुलसी की
नही थी कोई पूँछ,
मगर
आज अधिकांश ने
लगा ली है
छोटी या बड़ी
पूँछ या मूँछ।
क्योंकि इसी से है
उनकी पूछ 
या पहचान,
लेकिन
पुरातन साहित्यकारों को तो
बना दिया था
उनके साहित्य ने ही महान।
परिपूर्ण थी 
उनकी लेखनी
मर्यादाओं से,
मगर
आज तो लोगों को
सरोकार है
विविधताओं से।
लो हो गया काम,
पुरानों को नमन
और नयों को प्रणाम!!

शनिवार, 7 नवंबर 2009

"इश्क के काफिले नही होते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




आप आकर मिले नहीं होते।
तो शुरू सिलसिले नही होते।।


घर में होती चहल-पहल कैसे,
शाख पर घोंसले नहीं होते।
तो शुरू सिलसिले नही होते।।


गर न मिलती नदी समन्दर से,
मौज़ के मरहले नही होते। 
तो शुरू सिलसिले नही होते।।


सुख की बारिश अगर नही आती,
गुल चमन में खिले नहीं होते।।
तो शुरू सिलसिले नही होते।।



दिल मे उल्फत अगर नही होती,
प्यार के हौंसले नहीं होते।।
तो शुरू सिलसिले नही होते।।



हुस्न में गर कशिश नही होती,
इश्क के काफिले नही होते।
तो शुरू सिलसिले नही होते।।


शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

"अनदेखे परमेश्वर से वो कैसे प्यार करेंगा?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



घर के बडे़-बुजुर्गों से जो प्यार नही कर सकता,
अनदेखे परमेश्वर से वो कैसे प्यार करेगा?
जो सैनिक काँधे पर खुद हथियार नही धर सकता,
वह सीमा पर शत्रु का कैसे संहार करेगा?


विद्या से विनम्रता आती,
विनय पात्रता सिखलाती,
भोजन की थाली पाकर जो उदर नही भर सकता,
लालन-पालन वो कैसे पूरा परिवार करेगा?
अनदेखे परमेश्वर से वो कैसे प्यार करेंगा?


श्रेष्ठ वही है जो पढ़ता है,
ज्ञान बाँटने से बढ़ता है,
अभिमानी विद्वान भला कैसे उद्धार करेगा?
अनदेखे परमेश्वर से वो कैसे प्यार करेंगा?


धन पा जाना बहुत सुलभ है,
सज्जन बनपाना दुर्लभ है,
मूरख विद्या देवी की कैसे मनुहार करेगा?
अनदेखे परमेश्वर से वो कैसे प्यार करेंगा?


गुरुवार, 5 नवंबर 2009

"गधों को मिठाई नही घास चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



मीराबाई,सूर, तुलसीदास चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।

(यह चित्र "ताऊ श्री" के ब्लॉग से साभार चोरी किया है)


मोटे मगर गंग-औ-जमन घूँट रहे हैं,
जल के जन्तुओं का अमन लूट रहे हैं,
लोकतन्त्र में नेता सुभाष चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।



चूहे और बिल्ली जैसा खेल हो रहा,
सर्प और छछूंदर जैसा मेल हो रहा,
जहरभरी ऐसी ना मिठास चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।



कहीं है दिवाला और दीवाली कहीं है,
कहीं है खुशहाली और बेहाली कहीं है,
जनता को रोजी और लिबास चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।


मँहगाई की मार लोग झेल रहे हैं,
नेता घर में बैठे दण्ड पेल रहे हैं,
सिंहासन पर बैठी नही लाश चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।। 

बुधवार, 4 नवंबर 2009

"उजड़ा है प्यारा उपवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कलियाँ मसल रहे हैं डाकू, वीराना सा हुआ चमन।
सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।।


सोने की चिड़िया के कुन्दन पंख सलोने नोच लिए,
रत्न-जड़ित सिंहासन, धोखा देकर स्वयं दबोच लिए,
घर लगता सूना-सूना सा, मरुथल सा लगता आँगन।
सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।।


गोली - बारूदों को, भोली - भाली बस्ती झेल रही,
अवश-विवश से मौत अनर्गल पल-पल होली खेल रही,
पूजन-वन्दन है पिंजड़े में, घूम रहा आजाद दमन।
सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।।


केसर की क्यारी को कैसे, मिल पायेगा छुटकारा,
छल-बल के ताने-बाने का, कौन करेगा निबटारा,
गिद्ध-दृष्टि से कैसे बच पायेगा मेरा सरल सुमन।
सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails