बृहस्पतिवार, 31 दिसम्बर 2009
मंगलवार, 29 दिसम्बर 2009
“बैठकर के धूप में सुस्ताइए” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| कव्वाली |
| आ गई हैं सर्दियाँ सुस्ताइए। बैठकर के धूप में मस्ताइए।। पड़ गई हैं छुट्टियाँ स्कूल की. बर्फबारी देखने को जाइए। बैठकर के धूप में मस्ताइए।। रोज दादा जी जलाते हैं अलाव, गर्म पानी से हमेशा न्हायिए। बैठकर के धूप में मस्ताइए।। रात लम्वी, दिन हुए छोटे बहुत, अब रजाई तानकर सो जाइए। बैठकर के धूप में मस्ताइए।। खूब खाओ सब हजम हो जाएगा, शकरकन्दी भूनकर के खाइए। बैठकर के धूप में मस्ताइए।। |
“आशा पर संसार टिका है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
"आशा" का चमत्कार
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सोमवार, 28 दिसम्बर 2009
पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।
ग़म की रखवाली करते-करते ही उम्र तमाम हुई। पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। सुख आये थे संग में रहने. डाँट-डपट कर भगा दिया, जाने अनजाने में हमने, घर में ताला लगा लिया, पवन-बसन्ती दरवाजों में, आने में नाकाम हुई। पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। मन के सुमन चहकने में है, अभी बहुत है देर पड़ी, गुलशन महकाने को कलियाँ, कोसों-मीलों दूर खड़ीं, हठधर्मी के कारण सारी आशाएँ हलकान हुई। पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। चाल-ढाल है वही पुरानी, हम तो उसी हाल में हैं, जैसे गये साल में थे, वैसे ही नये साल में हैं, गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई। पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।। |
शनिवार, 26 दिसम्बर 2009
"अब न फीकी रहेगी दिवाली कभी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शुक्रवार, 25 दिसम्बर 2009
"कष्ट-क्लेश का होगा नाश।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बृहस्पतिवार, 24 दिसम्बर 2009
"जी हाँ मैं नारी हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बुधवार, 23 दिसम्बर 2009
"450वाँ पुष्प" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मित्रों!
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)
मंगलवार, 22 दिसम्बर 2009
"कुछ दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सोमवार, 21 दिसम्बर 2009
"मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
अपकर्ष है इस वर्ष का, उस वर्ष का उत्कर्ष है. दे रहा दस्तक हमारे द्वार पर नव-वर्ष है। लायेगा आनन्द खुशियों से भरे होंगे सदन, इसलिए सबके दिलों में भर गया नव-हर्ष है।। |
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रविवार, 20 दिसम्बर 2009
"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मुस्कराते रहो, गीत गाते रहो, फूल बगिया में नूतन खिलाते रहो। जाने वाला ही है अब यह साल तो, प्रेम के दीप मन में जलाते रहो।। रंज इस साल के साथ कर दो विदा, मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा। आने वाला है नव-वर्ष खुशियों भरा, कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।। |
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शनिवार, 19 दिसम्बर 2009
"सुखी जीवन का मन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बे- मन का तन
तोते का जीवन
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फाके मस्ती में भी
रहता था परिवार के संग
हमेशा ही लड़ता था
मेहनत की जंग
उड़ता था
ऊँची-ऊँची उड़ान
कभी नही होती थी
थकान
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जाता था
कभी रेगिस्तानी रेत में
आता था
कभी धान के खेत में
चखता था
कभी खट्टे मीठे आम
यही था मेरा
रोजमर्रा का काम
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एक दिन मैं
बहेलिए को भा गया
लालचवश्
उसके जाल मे आ गया
उसने मुझे बेच दिया
एक धनी साहुकार को
अब मैं तरसता था
परिवार के प्यार को
चाँदी का घर था
सोने का आसन था
बिना श्रम के
बढ़िया भोजन था
खाने को
दुर्लभ व्यञ्जन थे
रुचिकर पकवान थे
लेकिन
आजादी न थी
सभी मुझे
करते थे प्यार
हमेशा करते थे
मेरी मनुहार
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अगर कुछ नही था
तो वह था
अपनों का निश्छल प्यार
सुख का जीवन भी
बन गया था भार
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अब में हो गया हूँ
कृश्-काय
दुर्बल
बहुत ही असहाय
देता हूँ
यह सन्देश
यही है मेरा
अन्तिम उपदेश
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कभी भी नही होना
परतन्त्र!
यही है सुखी जीवन का
मन्त्र!
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शुक्रवार, 18 दिसम्बर 2009
"मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?
जुल्म की हम छाँव में हैं जी रहे,
बृहस्पतिवार, 17 दिसम्बर 2009
"अचरज में है हिन्दुस्तान!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बुधवार, 16 दिसम्बर 2009
"माता मुझको भी तो अपनी दुनिया में आने दो!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मंगलवार, 15 दिसम्बर 2009
"अग्नि शमन यन्त्र!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
यन्त्र अनोखा राखिए कम्प्यूटर के संग।।
अग्नि-शमन उपकरण बिन नही सुरक्षा तात।।
सोमवार, 14 दिसम्बर 2009
"दे रहा मधुमास दस्तक है हृदय के द्वार पर!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
भ्रमर की गुञ्जार गुन-गुन गान है गाने लगी,
फूलती खेतों में सरसों आम बौराने लगे,
दुःख की बदली छँटी, सूरज उगा विश्वास का,
रविवार, 13 दिसम्बर 2009
"अब तो मिलनें में भी लगे पहरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
पहले पाबन्दियाँ थीं हँसने में,
अब तो रोने में भी लगे पहरे।
पहले बदनामियाँ थीं कहने में,
अब तो सहने में भी लगे पहरे।
कितने पैबन्द हैं लिबासों में,
जिन्दगी बन्द चन्द साँसों मे,
पहले हदबन्दियाँ थीं चलने में,
अब ठहरने में भी लगे पहरे।
शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
नेक-नीयत नहीं निगाहों में
पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
अब उजड़ने में भी लगे पहरे।
अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।
शनिवार, 12 दिसम्बर 2009
"उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शुक्रवार, 11 दिसम्बर 2009
"विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बृहस्पतिवार, 10 दिसम्बर 2009
"कोई नही सुनता पुकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मानवाधिकार
कोई नही सुनता पुकार
आयोग है
राजनीति का शिकार
कहने पर प्रतिबन्ध
सुनने पर प्रतिबन्ध
खाने पर प्रतिबन्ध
पीने पर प्रतिबन्ध
जाने पर प्रतिबऩ्ध
जीने पर प्रतिबऩ्ध
मँहगाई की मार
रिश्वत का बाजार
निर्धन की हार
दहेज की भरमार
नौकरशाही का रौब
पुलिस का खौफ
दलित की पुकार
बेरहम संसार
कानून का द्वार
बन्दी हैं अधिकार
सोई है सरकार
जागे हैं मक्कार
नालों का संगम
गंगा है बेदम
बढ़ता प्रदूषण
नारि का शोषण
शिक्षा का जनाजा
भिक्षा का खजाना
बस्ता है भारी
ढोना लाचारी
मानवाधिकार
कोई नही सुनता पुकार
बुधवार, 9 दिसम्बर 2009
"कवि त्रिलोचन को भाव-भीनी श्रद्धाञ्जलि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
तब मैं हारा थका नहीं था, लेकिन मेरा
मंगलवार, 8 दिसम्बर 2009
"सभ्यता का फट गया क्यों आवरण?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
"हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
रविवार, 6 दिसम्बर 2009
"गन्दी सियासत का दिन, 6-दिसम्बर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
!! इतिहास का काला अध्याय-6 दिसम्बर !!
शनिवार, 5 दिसम्बर 2009
"सीख गये है कदम बढ़ाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शुक्रवार, 4 दिसम्बर 2009
"द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
जो भी मन में हो कह जाओ!













