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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

""मंगलमय नव-वर्ष 2010" " (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

इस नये वर्ष में आप हर्षित रहें,
ख्याति-यश में सदा आप चर्चित रहें।
मन के उपवन में महकें सुगन्धित सुमन,
राष्ट्र के यज्ञ में आप अर्पित रहें।।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

“बैठकर के धूप में सुस्ताइए” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कव्वाली
आ गई हैं सर्दियाँ सुस्ताइए।
बैठकर के धूप में मस्ताइए।।

पड़ गई हैं छुट्टियाँ स्कूल की.
बर्फबारी देखने को जाइए।
बैठकर के धूप में मस्ताइए।।

रोज दादा जी जलाते हैं अलाव,
गर्म पानी से हमेशा न्हायिए।
बैठकर के धूप में मस्ताइए।।

रात लम्वी, दिन हुए छोटे बहुत,
अब रजाई तानकर सो जाइए।
बैठकर के धूप में मस्ताइए।।

खूब खाओ सब हजम हो जाएगा,
शकरकन्दी भूनकर के खाइए।
बैठकर के धूप में मस्ताइए।।

“आशा पर संसार टिका है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"आशा" का चमत्कार
आशा पर संसार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ ही वृक्ष लगाती,
आशाएँ विश्वास जगाती,
आशा पर परिवार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ श्रमदान कराती,
पत्थर को भगवान बनाती,
आशा पर उपकार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशा यमुना, आशा गंगा,
आशाओं से चोला चंगा,
आशा पर उद्धार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं में बल ही बल है,
इनसे जीवन में हलचल है.
खान-पान आहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ हैं, तो सपने है,
सपनों में बसते अपने हैं,
आशा पर व्यवहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं के रूप बहुत हैं,
शीतल छाया धूप बहुत है,
प्रीत, रीत, मनुहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ जब उठ जायेंगी,
दुनियादारी लुट जायेंगी,
उड़नखटोला द्वार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

ग़म की रखवाली करते-करते ही उम्र तमाम हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।


सुख आये थे संग में रहने.


डाँट-डपट कर भगा दिया,


जाने अनजाने में हमने,


घर में ताला लगा लिया,


पवन-बसन्ती दरवाजों में, आने में नाकाम हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।


मन के सुमन चहकने में है,


अभी बहुत है देर पड़ी,


गुलशन महकाने को कलियाँ,


कोसों-मीलों दूर खड़ीं,


हठधर्मी के कारण सारी आशाएँ हलकान हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।


चाल-ढाल है वही पुरानी,


हम तो उसी हाल में हैं,


जैसे गये साल में थे,


वैसे ही नये साल में हैं,


गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

"अब न फीकी रहेगी दिवाली कभी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पड़ने वाले नये साल के हैं कदम!
स्वागतम्! स्वागतम्!! स्वागतम्!!!

अब तो मेहमान कुछ दिन का ये साल है,
कोई खुशहाल है. कोई बदहाल है,
ले के आयेगा नव-वर्ष चैनो-अमन!
स्वागतम्! स्वागतम्!! स्वागतम्!!!

रौशनी देगा अब अंशुमाली धवल,
ज़र्द चेहरों पे छायेगी लाली नवल,
मुस्कुरायेंगे गुलशन में सारे सुमन!
स्वागतम्! स्वागतम्!! स्वागतम्!!!

धन से मुट्ठी रहेंगी न खाली कभी,
अब न फीकी रहेगी दिवाली कभी.
मस्तियाँ साथ लायेगा चंचल पवन!
स्वागतम्! स्वागतम्!! स्वागतम्!!!

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

"कष्ट-क्लेश का होगा नाश।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कल तक तो तुम आस-पास थे,
कल को हो जाओगे खास।
कल तक तो तुम वर्तमान थे,
कल बन जाओगे इतिहास।।

जब तुम आये नये-नये थे,
हमने अभिनव गान किये थे,
तुम से आशाएँ जोड़ीं थीं,
अभिनन्दन शुभगान किये थे,
आज विदाई की वेला में,
मेरा मन है बहुत उदास।

कल तक तो तुम वर्तमान थे,
कल बन जाओगे इतिहास।।

आना है तो जाना होगा,
कुदरत का कानून अटल है,
निर्मल-नीर बहाना होगा,
जब तक सरिताओं में जल है,
विदा शब्द के उच्चारण से,
सुमन हुआ है बिना सुवास।

कल तक तो तुम वर्तमान थे,
कल बन जाओगे इतिहास।।

आशा है नव-वर्ष ढेर सी,
जीवन में खुशियाँ लायेगा,
मरुथल ओर वीरानें मे भी,
फिर से उपवन मुस्कायेगा.
सुख का बादल बरसायेगा,
कष्ट-क्लेश का होगा नाश।

कल तक तो तुम वर्तमान थे,
कल बन जाओगे इतिहास।।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

"जी हाँ मैं नारी हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

नारी की व्यथा

मैं
धरती माँ की बेटी हूँ
इसीलिए तो
सीता जैसी हूँ
मैं हूँ
कान्हा के अधरों से
गाने वाली मुरलिया,
इसीलिए तो
गीता जैसी हूँ।

मैं
मन्दालसा हूँ,
जीजाबाई हूँ
मैं
पन्ना हूँ,
मीराबाई हूँ।

जी हाँ
मैं नारी हूँ,
राख में दबी हुई
चिंगारी हूँ।

मैं पुत्री हूँ,
मैं पत्नी हूँ,
किसी की जननी हूँ
किसी की भगिनी हूँ।

किन्तु
आज लोगों की सोच
कितनी गिर गई है,
मानवता
कितनी मर गई है।

दुनिया ने मुझे
मात्र अबला मान लिया है,
और केवल
भोग-विलास की
वस्तु जान लिया है!

यही तो है मेरी कहानी,
आँचल में है दूध
और आँखों में पानी!

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

"450वाँ पुष्प" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों!
बाल-गीत के रूप में 450वाँ पुष्प
आप सबको समर्पित कर रहा हूँ!

प्राण-वायु को देने वाले.
जन-जीवन के हैं रखवाले।
धरती का श्रंगार सजाना,
नये-नये कुछ पेड़ लगाना।।

खट्टे-मीठे, रंग-रँगीले,
फल देते ये बहुत रसीले।
आँगन-बागों की शोभा हैं,
हरे-भरे हैं पेड़ सजीले।।

उपवन में हँसते मुस्काते,
सुंमन हमारे मन को भाते।
वातावरण सुगन्धित करते,
ये सबको पुलकित कर जाते।।

कलियों, फूलों पर मँडराते,
अपना अभिनव राग सुनाते।
सुन्दर पंखों वाली तितली,
भँवरे गुन-गुन करते आते,
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

"कुछ दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मानव बोता खेत में, कंकरीट और ईंट।
बिन चावल और दाल के, रहा खोपड़ा पीट।

बेटी के दुख-दर्द को, समझ न पाते लोग।
नारी को वस्तु समझ, लोग रहे हैं भोग।।

राजनीति है वोट की, खोट, नोट भरमार।
पढ़े-लिखों को हाँकते, अनपढ़, ढोल, गवाँर।।

छिपा खजाना ज्ञान का, पुस्तक हैं अनमोल।
इनको कूड़ा समझ कर, रद्दी में मत तोल।।

लालटेन जलती नहीं, गायब मिट्टी-तेल।
लालू जी आउट हुए, आयी ममता रेल।।

झगड़ा है सुख के लिए, जगवालों के बीच।
वैतरणी के मध्य में, डूब रहे हैं नीच।।

बन्द लिफाफों में भरा, शब्दों का सब सार।
खोलो ज्ञान कपाट को, भर लो नवल विचार।।

प्राणिमात्र कल्याण का, वेदों में सन्देश।
जीवन में धारण करो, ये अनुपम उपदेश।।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

"मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


अपकर्ष है इस वर्ष का, उस वर्ष का उत्कर्ष है.
दे रहा दस्तक हमारे द्वार पर नव-वर्ष है।
लायेगा आनन्द खुशियों से भरे होंगे सदन,
इसलिए सबके दिलों में भर गया नव-हर्ष है।।

रविवार, 20 दिसंबर 2009

"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मुस्कराते रहो, गीत गाते रहो,
फूल बगिया में नूतन खिलाते रहो।
जाने वाला ही है अब यह साल तो,
प्रेम के दीप मन में जलाते रहो।।

रंज इस साल के साथ कर दो विदा,
मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा।
आने वाला है नव-वर्ष खुशियों भरा,
कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

"सुखी जीवन का मन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बे- मन का तन
तोते का जीवन
---------------------------
फाके मस्ती में भी
रहता था परिवार के संग
हमेशा ही लड़ता था
मेहनत की जंग
उड़ता था 
ऊँची-ऊँची उड़ान
कभी नही होती थी
थकान
----------------------------
जाता था 
कभी रेगिस्तानी रेत में
आता था 
कभी धान के खेत में
चखता था
कभी खट्टे मीठे आम
यही था मेरा
रोजमर्रा का काम
----------------------------
एक दिन मैं
बहेलिए को भा गया
लालचवश्
उसके जाल  मे आ गया
उसने मुझे बेच दिया
एक धनी साहुकार को
अब मैं तरसता था
परिवार के प्यार को
चाँदी का घर था
सोने का आसन था
बिना श्रम के
बढ़िया भोजन था
खाने को
दुर्लभ व्यञ्जन  थे
रुचिकर पकवान थे
लेकिन
आजादी न थी
सभी मुझे 
करते थे प्यार
हमेशा करते थे
मेरी मनुहार
-----------------------------
अगर कुछ नही था
तो वह था
अपनों का निश्छल प्यार
सुख का जीवन भी 
बन गया था भार
------------------------------
अब में हो गया हूँ
कृश्-काय
दुर्बल
बहुत ही असहाय
देता हूँ
यह सन्देश
यही है मेरा 
अन्तिम उपदेश
------------------------------
कभी भी नही होना 
परतन्त्र!
यही है सुखी जीवन का
मन्त्र!
-------------------------------

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

"मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जंगलों में जब दरिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
आदमी महरूम क्यों है प्यार से?
क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?
हो गया नीलाम क्यों ईमान है?
हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


जुल्म की हम छाँव में हैं जी रहे,
जहर को अमृत समझकर पी रहे,
हमको भी कुछ दाँव-फन्दे आ गये।


मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

"अचरज में है हिन्दुस्तान!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

खादी और खाकी दोनों में बसते हैं शैतान।
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


तन भूखा है, मन रूखा है खादी वर्दी वालों का,
सुर तीखा है, उर सूखा है खाकी वर्दी वालों का,
डर से इनके सहमा-सहमा सा मजदूर-किसान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


खुले साँड संसद में चरते, करते हैं मक्कारी,
बेकसूर थानों  में मरते, जनता है दुखियारी,
कितना शानदार नारा है, भारत बहुत महान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


माली लूट रहे हैं बगिया को बन करके सरकारी,
आलू,दाल-भात महँगा है, महँगी हैं तरकारी,
जीने से मरना महँगा है, आफत में इन्सान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


मानवता-मर्यादा घुटती है खादी के बानों मे,
अबलाओं की लज्जा लुटती है सरकारी थानों में,
खादी, खाकी की केंचुलियाँ, सचमुच हैं वरदान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

"माता मुझको भी तो अपनी दुनिया में आने दो!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

माता मुझको भी तो,
अपनी दुनिया में आने दो!
सीता-सावित्री बन करके, 
जग में नाम कमाने दो!


अच्छी सी बेटी बनकर मैं,
अच्छे-अच्छे काम करूँगी,
अपने भारत का दुनिया में
सबसे ऊँचा नाम करूँगी,
माता मुझको भी तो अपना, 
घर-संसार सजाने दो!
माता मुझको भी तो
अपनी दुनिया में आने दो!


बेटे दारुण दुख देते हैं
फिर भी इतने प्यारे क्यों?
सुख देने वाली बेटी के
गर्दिश में हैं तारे क्यों?
माता मुझको भी तो अपना
सा अस्तित्व दिखाने दो!
माता मुझको भी तो
अपनी दुनिया में आने दो!


बेटों की चाहत में मैया!
क्यों बेटी को मार रही हो?
नारी होकर भी हे मैया!
नारी को दुत्कार रही हो,
माता मुझको भी तो अपना
जन-जीवन पनपाने दो!
माता मुझको भी तो
अपनी दुनिया में आने दो!


मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

"अग्नि शमन यन्त्र!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आग बुझाने का उपकरण

अग्नि शमन यह यऩ्त्र है सुन्दर, सुखद ललाम।
आग बुझाने में सदा यह आता है काम।।

पग-पग पर अपनाइए सुलभ सुरक्षा ढंग।
यन्त्र अनोखा राखिए कम्प्यूटर के संग।।


विद्युत मीटर-कक्ष में और किचन के साथ।
अग्नि-शमन उपकरण बिन नही सुरक्षा तात।।

छोटा सा यह उपकरण, छोटा सा यह तन्त्र।
सदा सुरक्षा के लिए अपनाओ यह यन्त्र।।


सोमवार, 14 दिसंबर 2009

"दे रहा मधुमास दस्तक है हृदय के द्वार पर!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सुमन पुलकित हो रहा अभिनव नवल शृंगार भर।
दे रहा मधुमास दस्तक है हृदय के द्वार पर।।


भ्रमर की गुञ्जार गुन-गुन गान है गाने लगी,
तितलियों की फड़फड़ाहट कान में आने लगी,
छा गया है रंग मधुवन में बसन्ती रूप धर।
दे रहा मधुमास दस्तक है हृदय के द्वार पर।।


फूलती खेतों में सरसों आम बौराने लगे,
जुगलबन्दी छेड़कर, प्रेमी युगल गाने लगे,
चहकते प्यारे परिन्दे, दुर्ग की दीवार पर।
दे रहा मधुमास दस्तक है हृदय के द्वार पर।।


दुःख की बदली छँटी,  सूरज उगा विश्वास का,
जल रहा दीपक दिलों मे स्नेह ले उल्लास का,
ज्वर चढ़ा, पारा बढ़ा है प्यार के संसार पर।
दे रहा मधुमास दस्तक है हृदय के द्वार पर।।


रविवार, 13 दिसंबर 2009

"अब तो मिलनें में भी लगे पहरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हले पाबन्दियाँ थीं हँसने में,
अब तो रोने में भी लगे पहरे।
पहले बदनामियाँ थीं कहने में,
अब तो सहने में भी लगे पहरे।


कितने पैबन्द हैं लिबासों में,
जिन्दगी बन्द चन्द साँसों मे,
पहले हदबन्दियाँ थीं चलने में,
अब ठहरने में भी लगे पहरे।


शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
नेक-नीयत नहीं निगाहों में
पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
अब उजड़ने में भी लगे पहरे।


अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।


शनिवार, 12 दिसंबर 2009

"उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

ज रद्दी छाँट रहा था तो उसमें 
यह एक पुरानी रचना मिल गई-


उन्हें गाना नहीं आता हमें रोना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


बहुत मजबूर हैं वो भी बहुत मजबूर हैं हम भी,
उन्हें जगना नहीं आता हमें सोना नहीं आता।
उन्हें चलना नही आता हमें ढोना नहीं आता।।


बहुत मगरूर हैं वो भी, बहुत मगरूर हैं हम भी,
उन्हें पाना नहीं आता हमें खोना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


बहुत मशहूर हैं वो भी, नशे में चूर हैं हम भी,
उन्हें जादू नहीं आता, हमें टोना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


खुदा का नूर हैं वो भी, नहीं बेनूर हैं हम भी,
उन्हें मरना नहीं आता, हमें जीना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


मिल नहीं सकती कभी भी रेल की दो पटरियाँ,
उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

"विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है,
हसीं पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है।
बहुत आभार है उसका, बहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले को, उसी ने प्राण प्यारा है।।


बहाई ज्ञान की गंगा, मधुरता ईख में कर दी,
कभी गर्मी, कभी वर्षा, कभी कम्पन भरी सरदी।
किया है रात को रोशन, दिये हैं चाँद और तारे,
अमावस को मिटाने को, दियों में रोशनी भर दी।।


दिया है दुःख का बादल, तो उसने ही दवा दी है,
कुहासे को मिटाने को, उसी ने तो हवा दी है।
जो रहते जंगलों में, भीगते बारिश के पानी में,
उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।


सुबह और शाम को मच्छर सदा गुणगान करते हैं,
जगत के उस नियन्ता को, सदा प्रणाम करते हैं।
मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।


गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

"कोई नही सुनता पुकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



मानवाधिकार
कोई नही सुनता पुकार
आयोग है
राजनीति का शिकार
कहने पर प्रतिबन्ध
सुनने पर प्रतिबन्ध
खाने पर प्रतिबन्ध
पीने पर प्रतिबन्ध
जाने पर प्रतिबऩ्ध
जीने पर प्रतिबऩ्ध
मँहगाई की मार
रिश्वत का बाजार
निर्धन की हार
दहेज की भरमार
नौकरशाही का रौब
पुलिस का खौफ
दलित की पुकार
बेरहम संसार
कानून का द्वार
बन्दी हैं अधिकार
सोई है सरकार
जागे हैं मक्कार
नालों का संगम
गंगा है बेदम
बढ़ता प्रदूषण
नारि का शोषण
शिक्षा का जनाजा
भिक्षा का खजाना
बस्ता है भारी
ढोना लाचारी
मानवाधिकार
कोई नही सुनता पुकार

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

"कवि त्रिलोचन को भाव-भीनी श्रद्धाञ्जलि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज दिग-दिगन्त के कवि त्रिलोचन की पुण्य-तिथि है!
कवि त्रिलोचन सिंह का जन्म 20 अगस्त 1917 को उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कठघरा चिरानी पट्टी में हुआ था। इनका वास्तविक नाम वासुदेव सिंह था! बाबा नागार्जुन के समकालीन 91 वर्षीय त्रिलोचन पिछले कई महीनों से बीमार चल रहे थे। कविता संग्रह  "ताप के ताए हुए दिन"  के लिए उन्हें 1981 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
जीवन के अन्तिम क्षणों मे  बाबा त्रिलोचन अपने पुत्र के वैशाली स्थित निवास पर गाजियाबाद में  ही थे। रविवार 9 दिसम्बर, 2007 को शाम साढ़े सात बजे इन्होंने अन्तिम साँस ली और प्रगतिशील हिन्दी कविता की अन्तिम कड़ी का सूर्य अस्त हो गया।




इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं:-
धरती, गुलाब बुलबुल, दिंगत, ताप के ताये हुए दिन, शब्द, उस जनपद का वासी हूं, तुम्हें सौंपता हूं, आत्मालोचन इत्यादि त्रिलोचन की प्रमुख रचनाएं हैं। वृहद हिन्दी कोष और हिन्दी-उर्दू कोष तैयार करने में बाबा के महत्वपूर्ण योगदान को तो कभी भुलाया ही नही जा सकता है। इसके साथ-साथ वे हिंदी दैनिक आज, जनवार्ता, साहित्यिक पत्रिका, हंस, कहानी, चित्रलेखा आदि से भी जुडे रहे। 

प्रस्तुत है काव्य के भास्कर कवि त्रिलोचन की एक कविता-
मित्रों, मैंने साथ तुम्हारा जब छोड़ा था
तब मैं हारा थका नहीं था, लेकिन मेरा



तन भूखा था मन भूखा था। तुम ने टेरा,
उत्तर मैं ने दिया नहीं तुम को : घोड़ा था


तेज़ तुम्हारा, तुम्हें ले उड़ा। मैं पैदल था,
विश्वासी था ‘‘सौरज धीरज तेहि रथ चाका।’’
जिस से विजयश्री मिलती है और पताका
ऊँचे फहराती है। मुझ में जितना बल था


अपनी राह चला। आँखों में रहे निराला,
मानदंड मानव के तन के मन के, तो भी
पीस परिस्थितियों ने डाला। सोचा, जो भी
हो, करुणा के मंचित स्वर का शीतल पाला


मन को हरा नहीं करता है। पहले खाना
मिला करे तो कठिन नहीं है बात बनाना।
कवि त्रिलोचन की पुण्य-तिथि पर 

न्हें भाव-भीनी श्रद्धाञ्जलि समर्पित करता हूँ। 



प्रख्यात  चित्रकार हरिपाल त्यागी मेरे अभिन्न मित्रों में से एक हैं। 
इनके बनाए हुए कवि त्रिलोचन के कुछ चित्र ये हैं-



आधारशिला प्रकाशन हल्द्वानी (नैनीताल) द्वारा सम्पादक दिवाकर भट्ट ने 
 "आधारशिला" का त्रिलोचन विशेषांक 2009 में प्रकाशित किया
इस अंक का सम्पादन हिन्दी के इंसाइक्लोपीडिया माने जाने वाले
श्री वाचस्पति ने किया और इस पत्रिका का आवरण व रेखांकन 
जाने-माने कवर-डिजाइनर श्री हरिपाल त्यागी ने किया है।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

"सभ्यता का फट गया क्यों आवरण?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



खो गया जाने कहाँ है आचरण?
देश का दूषित हुआ वातावरण।।


लूट, दंगा, दगाबाजी की कयामत पल रही,
जमाखोरी, जालसाजी की सियासत चल रही,
जुल्म से पोषित हुआ पर्यावरण।
देश का दूषित हुआ वातावरण।।


पाठ जिसने अमन का जग को पढ़ाया,
धर्म की निरपेक्षता का पथ दिखाया,
क्यों नजर आता नही वो व्याकरण।
देश का दूषित हुआ वातावरण।।


अस्त पूरब में हुआ है क्यों उजाला सीख का,
आज क्यों भाने लगा हमको निवाला भीख का,
सभ्यता का फट गया क्यों आवरण?
देश का दूषित हुआ वातावरण।।


"हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



बात करते हैं हम पत्थरों से सदा,
हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में।
प्यार करते हैं हम पत्थरों से सदा,
ये तो शामिल हमारे हैं संसार में।।


देवता हैं यही, ये ही भगवान हैं,
सभ्यता से भरी एक पहचान हैं,
हमने इनको सजाया है घर-द्वार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।


दर्द सहते हैं और आह भरते नही,
ये कभी सत्य कहने से डरते नही,
गर्जना है भरी इनकी हुंकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।


साथ करते नही सिरफिरों का कभी,
ध्यान धरते नही काफिरों का कभी,
ये तो रहते हैं भक्तों के अधिकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।


रविवार, 6 दिसंबर 2009

"गन्दी सियासत का दिन, 6-दिसम्बर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



!! इतिहास का काला अध्याय-6 दिसम्बर !!

इबादत और अकीदत पुराना सा ये मंज़र था,
यही तो राम का घर था, यही रहमान का दर था,

लगा रहता था पहरा रात-दिन, इस पर जवानों का,
हुआ फिर हश्र क्यों ऐसा? इबादत के ठिकानों का,

 दिवाने तोड़ने इसको, कहाँ से आ गये इतने?
खुदा को भी नही बक्शा, मवाली छा गये कितने?


गिराया एक ढाँचा था , मिटे ढाँचे हजारों थे,
मिटाया एक साँचा था, लुटे साँचे हजारों थे,


चमन वीरान करने को, चली गन्दी सियासत थी,
सुमन हलकान करने को, अमानत में खयानत थी,


हमारी प्यार की डाली, झटक कर तोड़ डाली है,
सलीकों से भरी थाली, पटक कर फोड़ डाली है,   
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

"सीख गये है कदम बढ़ाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


!! वैवाहिक जीवन की 36वीं वर्ष-गाँठ !!



-: कुछ-मुक्तक :-


जब करते थे नही बड़ाई,
तब होती थी बहुत लड़ाई।
प्रेम-प्रीत के घर-आँगन में,
अच्छी होती नही कड़ाई।।


जीवन का ताना और बाना,
हमको आता है  सुलझाना।
टेढ़ी-मेढ़ी पगदण्डी पर, 
सीख गये है कदम बढ़ाना।।


शान और शौकत तमीज है,
जो विपन्न है वो मरीज है।
आया है अब नया जमाना,
कुरते पर भारी कमीज है।।


चाटुकारिता एक गज़ल है,
स्वाभिमान की आँख सजल है।
सीधा-सादा भूखा मरता,
चालबाज़ हो रहा सफल है।।


सुरा-पान का पथ है ऐसा,
विष लगता है अमृत जैसा।
आय-आय जैसे भी आये,
सबसे प्यारा लगता पैसा।।


मन का कुछ आधार नही है,
ईश्वर का आकार नही है।
पथ पर जो चलता जाता है,
श्रम उसका बेकार नही है।।


तुम आये तो भार हुआ कम,
दूर हुए दुनिया के सब गम।
दिन में सूरज, चाँद रात में, 
बनकर हर लेना मन का तम।।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

"द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




जो भी मन में हो कह जाओ!
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!


दूर-दूर रह कर, क्यों हल को खोज रहे हो,
मरुथल में जाकर क्यों जल को खोज रहे हो,
गंगा तट पर प्यास बुझाने,
गड़वा लेकर आ भी जाओ।
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!


छलनी के छेदों मे तुम तो केवल अवगुण देख रहे हो,
 कूड़ा आँचल में रखते हो, सार-सार को फेंक रहे हो,
खुलकर के मन- सुमन मिलेंगे,
उपवन में अब आ भी जाओ।
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!


क्षमा-सरलता गुण हैं, हैं ये मानव के आभूषण भी,
वायु करती प्राण-प्रवाहित और जगाती है दूषण भी,
मत देखो पुतले में अवगुण,
जीवन भरने आ भी जाओ!
द्वार खुले हैं, आ भी जाओ!!


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