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रविवार, 31 जनवरी 2010

“आया मधुमास!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

फागुन की फागुनिया लेकर, आया मधुमास!

फागुन की फागुनिया लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!

धूल उड़ाती पछुआ चलती, जिउरा लेत हिलोर,
देख खेत में सरसों खिलती, नाचे मन का मोर,
फूलों में पंखुड़िया लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!

निर्मल नभ है मन चञ्चल है, सुधरा है परिवेश,
माटी के कण-कण में, अभिनव उभरा है सन्देश,
गीतों में लावणियाँ लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!

छम-छम कानों में बजती हैं गोरी की पायलियाँ,
चहक उठी हैं, महक उठी हैं, सारी सूनी गलियाँ,
होली की रागनियाँ लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!! 
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, 30 जनवरी 2010

“गांधी जी कहते हे राम!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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राम नाम है सुख का धाम।
राम सँवारे बिगड़े काम।।

असुर विनाशक, जगत नियन्ता,
मर्यादापालक अभियन्ता,
आराधक तुलसी के राम।
राम सँवारे बिगड़े काम।।

मात-पिता के थे अनुगामी,,
चौदह वर्ष रहे वनगामी,
किया भूमितल पर विश्राम।
राम सँवारे बिगड़े काम।।

कपटी रावण मार दिया था
लंका का उद्धार किया था,
राम नाम में है आराम।
राम सँवारे बिगड़े काम।।

जब भी अन्त समय आता है,
मुख पर राम नाम आता है,
गांधी जी कहते हे राम!
राम सँवारे बिगड़े काम।।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

“बादल घने हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कभी कुहरा, कभी सूरज, कभी आकाश में बादल घने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

आसमां पर चल रहे हैं, पाँव के नीचे धरा है,
कल्पना में पल रहे हैं, सामने भोजन धरा है,
पा लिया सब कुछ मगर, फिर भी बने हम अनमने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

आयेंगे तो जायेंगे भी, जो कमाया खायेंगें भी,
हाट मे सब कुछ सजा है, लायेंगे तो पायेंगे भी,
धार निर्मल सामने है, किन्तु हम मल में सने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।

देख कर करतूत अपनी, चाँद-सूरज हँस रहे हैं,
आदमी को बस्तियों में, लोभ-लालच डस रहे हैं,
काल की गोदी में, बैठे ही हुए सारे चने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।।
pillu
“पिल्लू”

जब तुम थे प्यारे से बच्चे,
मुझको लगते कितने अच्छे.


मैं गोदी में तुम्हें खिलाता,
ब्रेड डालकर दूध पिलाता,


दस वर्षों तक साथ निभाया,
आज छोड़ दी तुमने काया,


विपदाओं से नही डरे तुम,
कुत्ते की नही मौत मरे तुम,


पीड़ा देती बहुत जुदाई,
पिल्लू-राजा तुम्हें विदाई,



सदा-सदा के लिए आज तुम सुप्त हो गये!
संसारी झंझट से बिल्कुल मुक्त हो गये!!

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

“लगता है बसन्त आया है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

palash
टेसू की डालियाँ फूलतीं,
खेतों में बालियाँ झूलतीं,
लगता है बसन्त आया है!

केसर की क्यारियाँ महकतीं,
बेरों की झाड़ियाँ चहकती,
लगता है बसन्त आया है!


आम-नीम पर बौर छा रहा,
प्रीत-रीत का दौर आ रहा,
लगता है बसन्त आया है!
sun
सूरज फिर से है मुस्काया ,
कोयलिया ने गान सुनाया,
लगता है बसन्त आया है!
जय हो जय, शिव-शंकर की जय!
(यह चित्र सरस पायस से साभार)

शिव का होता घर-घर वन्दन,
उपवन में छाया स्पन्दन,
लगता है बसन्त आया है!


(चित्र गूगल सर्च से साभार)


बुधवार, 27 जनवरी 2010

“मौसम डूबा प्यार में” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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कल तक था ऋतुराज पड़ा, कुहरे के कारागार में।
आज गुनगुनी धूप सेंककर, मौसम डूबा प्यार में।।

भँवरे गुन-गुन करते आते,
कलियों को संगीत सुनाते,
कंगाली गुलशन से भागी,
पौधों की किस्मत है जागी.
प्रेमी मग्न हुए हैं फिर से, प्रेम-प्रीत मनुहार में।
आज गुनगुनी धूप सेंककर, मौसम डूबा प्यार में।।
Flowers-Wallpaper-e9
सुबह-सवेरे चिड़ियाँ बोली,
कानों में मिश्री सी घोली,
गेहूँ पर बालियाँ झूलतीं,
सरसों की डालियाँ फूलतीं,
नई-नई कोंपलें आ गईं, सेंमल और कचनार में।
आज गुनगुनी धूप सेंककर, मौसम डूबा प्यार में।।

शीतकाल का अन्त हो गया,
कितना सुखद बसन्त हो गया,
कोयल ने आवाज लगाई,
कौए ने पाँखें खुजलाई.
गीतों ने कुण्डी खटकाई, उर मन्दिर के द्वार में।
आज गुनगुनी धूप सेंककर, मौसम डूबा प्यार में।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

“वरिष्ठ गणतन्त्र-दिवस” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)



आज हमने मनाया
इकसठवाँ गणतन्त्र
फूँक दिया जन-मानस में
वरिष्ठता का मन्त्र
यह तन्त्र हो गया
सेवा निवृत्त
बाहर कर दिया
परिधि से वृत्त
नही कह पा रहे खुलकर
शब्द हो रहे मौन हैं
क्योंकि आज
बुजुर्ग की
मानता ही कौन है??
( चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 25 जनवरी 2010

“अपना गणतन्त्र महान!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

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चन्दा , सूरज से उजियारा,

संविधान हम सबको प्यारा ।

आन -बान और शान हमारी ,

झण्डा ऊँचा रहे हमारा ।

प्रजातंत्र पर भारत वाले करते हैं अभिमान ।

सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥


शीश मुकुट हिमवान अचल है ,

सुंदर -सुंदर ताजमहल है ।

गंगा - यमुना और सरयू का -

पग पखारता पावन जल है ।

प्राणों से भी मूल्यवान है हमको हिन्दुस्तान ।

सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥


स्वर भर कर इतिहास सुनाता ,

महापुरुषों से इसका नाता ।

गौतम , गांधी , दयानन्द की ,

प्यारी धरती भारतमाता ।

यहाँ हुए हैं पैदा नानक , राम , कृष्ण , भगवान् ।

सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

रविवार, 24 जनवरी 2010

“… …सूरज ने मुँहकी खाई!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सूरज और कुहरा


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कुहरे और सूरज में,जमकर हुई लड़ाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।



ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता,


लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता,


बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।



साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा,


कभी सूर्य और कभी कुहासा क्रुद्ध हो रहा,


निर्धन की ठिठुरन से होती हाड़-कँपाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।



कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,


ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,


सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

“नवगीत” (ड़ॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

छा रहा मधुमास में,


कुहरा घना है।



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दिन दुपहरी में दिवाकर अनमना है।
छा रहा मधुमास में कुहरा घना है।।

नीड़ में अब भी परिन्दे सो रहे,
फाग का शृंगार कितना है अधूरा,
शीत से हलकान बालक हो रहे,
चमचमाती रौशनी का रूप भूरा



रश्मियों के शाल की आराधना है।


छा रहा मधुमास में कुहरा घना है।।



सेंकता है आग फागुन में बुढ़ापा,
चन्द्रमा ने ओढ़ ली मोटी रजाई,
खिल नही पाया चमन ऋतुराज में,
टेसुओं ने भी नही रंगत सजाई,

कोप सर्दी का हवाओं में बना है।
छा रहा मधुमास में कुहरा घना है।।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

"सच्चे दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरे कुछ दोहे-

रफा-दफा जब कर दिया, चोरी का सामान।
वापिस फिर से चाहता, बेईमान सम्मान।।

धमका रहा समुद्र को, खारा बिन्दु एक।
ज्वार जगाता सिऩ्धु में,किंकुड़िया को फेंक।।

सज्जनता की आड़ ले, शठ् करता आखेट।
कोतवाल को जाल में, डाकू रहा लपेट।।

कल तक जो मासूम था, आज हुआ बदनाम।
हया-शर्म रख ताक पर, बन बैठा शैतान।।

मन में भर कर छल-कपट, खूब उड़ाया माल।
एक मीन ने कर दिया, गन्दा सारा ताल।।

बुधवार, 20 जनवरी 2010

""शारदे जग का करो उद्धार!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बन्द ना हो जायें माँ के द्वार!

वर दे वीणा वादिनी, वर दे ...


बसन्त पञ्चमी की हार्दिक बधाई !

बन्द ना हो जायें माँ के द्वार!
वन्दना करता हूँ मैं शत् बार!!

मन में मेरे ज्ञान का प्रकाश कर दो,
हृदय में मेरे नवल विश्वास भर दो,
पुष्प-अक्षत माँ करो स्वीकार!
वन्दना करता हूँ मैं शत् बार!!

लेखनी में रम रहा माता तुम्हारा नाम है,
शब्द-रचना और स्रजन माता तुम्हारा काम है,
गीत में भर दो विमल रसधार!
वन्दना करता हूँ मैं शत् बार!!

विश्व से अज्ञान, जड़ता दूर हो,
मन्दिरों में रौशनी भरपूर हो,
शारदे जग का करो उद्धार!
वन्दना करता हूँ मैं शत् बार!!

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

“वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा!” (ड़ॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।
राह सुनसान थी, आगे बढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
धन के आगे कभी माथा टेका नही,
शब्द कमजोर थे, शेर गढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

भावनाओं में जीता रहा रात-दिन,
वेदनाओं को पीता रहा रात-दिन,
जिन्दगी की सलीबों पे चढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

मैंने हँसकर लिया, आपने जो दिया,
मैंने अमृत समझकर, गरल को पिया,
बेसुरी फूटी ढपली को मढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

कुछ ने सनकी कहा, कुछ ने पागल कहा,
कुछ ने छागल कहा, कुछ ने बादल कहा,
रीतियों और रिवाजों से लड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

आपने जो लिखाया, वही लिख दिया,
शब्द जो भी सुझाया, वही रख दिया,
मंजु-माला में कंकड़ ही जड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

“बूढ़ा हो रहा बचपन है?” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कुहासे की सफेद चादर
मौसम ने ओढ़ ली
ठिठुरन से मित्रता
भास्कर ने जोड़़ ली
निर्धनता
खोज रही है
आग के अलाव
किन्तु
लकड़ियों के
ऊँचे हैं भाव
ठण्ड से काँप रहा है
कोमल तन
कूड़े में से पन्नियाँ
बीन रहा है बचपन
इसके बाद
वो इन्हें
बाजार में बेचेगा
फिर जंगल में जाकर
लकड़िया बीनेगा
तब कहीं
उसके घर में
चूल्हा जलेगा
पेट की आग तो
बुझ जायेगी
मगर बदन तो
ठण्डा ही रहेगा
थोड़े दिन में
कुहरा छँट जायेगा
सूरज अपने
असली रूप में आयेगा
फिर छायेगी
होली की मस्ती
दिन मे आयेगी
तन में सुस्ती
सर्दी में कम्पन
गर्मी में पसीना
सहना मजबूरी है
क्योंकि
दाल-रोटी का
जुगाड़ भी तो
जरूरी है
क्या इसी का नाम जीवन है?
क्या बूढ़ा हो रहा बचपन है?

रविवार, 17 जनवरी 2010

“विदेश-यात्रा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज अचानक
बन गया एक संयोग
घर में आ गये
कुछ परिचित लोग
विदेश-यात्रा का
बन गया कार्यक्रम
कार में बैठ गये
उनके साथ हम
कुछ रुपये
जेब में लिए डाल
आनन-फानन में
पहुँच गये नेपाल
सामने दिखाई दिया
एक शहर
नाम था उसका
महेन्द्रनगर
वहाँ बहुत थे
आलीशान मकान
एक खोके में थी
चाय की दुकान
दुकान में
अजीब नजारा था
रंगीन बोतलों का
शरारा था
गर्म चाय थी
लिबासों में
ठण्डी चाय थी
गिलासों में
हर दूकान पर थी
एक बाला
उडेल रही थी
रूप की हाला
यह देखकर
मन में हुआ मलाल
और अपने देश का
आया ख्याल
पश्चिम की
होड़ में
सभ्यता की
दौड़ में
हम भले ही
पिछड़े हैं
लेकिन चरित्र में
हम आज भी
अगड़े हैं।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

“मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आइना छल और कपट को जानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

झूठ, मक्कारी, फरेबी फल रही,
भेड़ियों को भेड़ बूढ़ी छल रही,
जुल्म कब इंसानियत को मानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

पिस रहा खुद्दार है, सुख भोगता गद्दार है,
बदले हुए हालात में गुम हो गया किरदार है,
बाप पर बेटा दुनाली तानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

बेसुरा सुर साज से आने लगा,
पेड़ अपने फल स्वयं खाने लगा,
भाई से तकरार भाई ठानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

"सब्जी-मण्डी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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देखो-देखो सब्जी-मण्डी,


बिकते आलू,बैंगन,भिण्डी।


कच्चे केले, पक्के केले,


मटर, टमाटर के हैं ठेले।


गोभी,पालक,मिर्च हरी है,


धनिये से टोकरी भरी है।


लौकी, तोरी और परबल हैं,


पीले-पीले सीताफल हैं।


अचरज में है जनता सारी,


सब्जी पर महँगाई भारी।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

सुरेन्द्र "मुल्हिद" की एक ग़ज़ल (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

surender chawla मुझे
शास्त्री जी,
आपके चरणों में सादर प्रणाम अर्पण करता हूँ, जब से मालूम चला है की आपकी रचनाएँ कोई चोरी कर के अपने ब्लॉग पर लगा रहा है, तब से ही मैं सोच रहा हूँ की कैसे शब्दों को कागज़ पे उतार के अपनी वेदना का व्याख्यान करूँ!

My Photoसुरेन्द्र "मुल्हिद"

  • Age: 30
  • Gender: Male
  • Astrological Sign: Virgo
  • Zodiac Year: Sheep
  • Industry: Telecommunications
  • Occupation: head-change management
  • Location: gurgaon : haryana : India
  • Blog: my own creation
  • शास्त्री जी,

    ब्लॉग चोरी के खिलाफ मुहिम में मैं आपके साथ हूँ, और इसी लिए अपनी एक तुच्छ रचना आपके उच्चारण के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ!

    आशा करता हूँ आपके सभी प्रशंसकों को पसंद आएगी!


    आभार!


    सुरेन्द्र "मुल्हिद"


    पेश है:


    "ये कोई क्या कर के चलता बना"


    कितनी शिद्दत से मैंने कुछ आफ्रीनिशें(१) लिखीं,


    कोई और उन्हें अपना बना के चलता बना,


    गम्माज्गिरी(२) मेरे सीने में कर के वो,


    गोया ही अपना बना के चलता बना,


    न जाने कितने गहरे सोच के पुलिंदे बांधे,


    कोई डाकिया बने उन्हें समेट चलता बना,


    उसकी रूह को भी ख़याल-इ-पारसाई(३) न रहा,


    बे-गैरती में अपना ब्लॉग सजा के चलता बना,


    मेरी नज्में जो मेरे सजदों की हर पल जानिब हैं,


    वो बे-परवाह खुदा से दीगर(४) कर चलता बना,


    दुआ करता हूँ उसकी ईमाँ से वस्ल(५) मुक़र्रर हो,


    जो खुद को ही दग़ा दे के यूँ चलता बना!


    **************************************


      (१) रचनाएँ (२) छुरा भोंकना (३) आत्म सम्मान का ख्याल (४) दूर (५) मुलाकात


      **************************************


      शुक्रिया!

बुधवार, 13 जनवरी 2010

“गजल के उदगार ढो रहे हैं।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"चुरा लीजिए नटवरलाल!
लाया हूँ मैं ताजा माल!!"

ऊसर जमीन में हम, उपहार बो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
बन कर सजग सिपाही, हम दे रहे हैं पहरे,
हम मेट देंगे अपने, पर्वत के दाग गहरे,
उनको जगा रहे हैं, जो हार सो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
तूफान आँधियों में, हमने दिये जलाये,
फानूस बन गये हम, जब दीप झिलमिलाये,
हम प्रीत के सुजल से, अंगार धो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
मनके सभी पिरोये, टूठे सुजन मिलाये.
वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

“ठहर गया जन-जीवन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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कुहरे की फुहार से
ठहर गया जन-जीवन
शीत की मार से
काँप रहा मन और तन
माता जी लेटी हैं
ओढ़कर रजाई
काका ने तसले में
लकड़ियाँ सुलगाई
गलियाँ हैं सूनी
सड़कें वीरान हैं
टोपों से ढके हुए
लोगों के कान हैं
खाने में खिचड़ी
मटर का पुलाव है
जगह-जगह जल रहे
आग के अलाव है
राजनीतिक भिक्षुओं के
भरे हुए पेट हैं
जमाखोरी करके लोग
बन गये सेठ हैं
विलम्बित उड़ाने हैं
ट्रेन सभी लेट हैं
ठण्डक से दिनचर्या
हुई मटियामेट है
मँहगाई की आग में
सेंकते रहो बदन
कुहरे की फुहार से
ठहर गया जन-जीवन

रविवार, 10 जनवरी 2010

“अब बसन्त आयेगा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

खिल जायेंगे नव सुमन,

उपवन मुस्कायेगा!!


कुहासे की चादर,

धरा पर बिछी हुई।

नभ ने ढाँप ली है,

अमल-धवल रुई।।

दिवस हैं छोटे,

रोशनी मऩ्द है।

शीत की मार है,

विद्यालय बन्द है।।

जल रहे हैं अलाव,

आँगन चौराहों पर।

चहल-पहल कम है,

पगदण्डी-राहों पर।।

सूरज अदृश्य है,

पड़ रहा पाला है।।

पर्वत ने ओढ़ लिया,

बर्फ का दुशाला है।।

मन में एक आशा है,

अब बसन्त आयेगा!

खिल जायेंगे नव सुमन,

उपवन मुस्कायेगा!!

शनिवार, 9 जनवरी 2010

"हो गया क्यों देश ऐसा ?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज एक पुराना गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ-
कल्पनाएँ डर गयी हैं ,
भावनाएँ मर गयीं हैं,

देख कर परिवेश ऐसा।

हो गया क्यों देश ऐसा ??


पक्षियों का चह-चहाना ,

लग रहा चीत्कार सा है।

षट्पदों का गीत गाना ,

आज हा-हा कार सा है।

गीत उर में रो रहे हैं,

शब्द सारे सो रहे हैं,

देख कर परिवेश ऐसा।

हो गया क्यों देश ऐसा ??


एकता की गन्ध देता था,

सुमन हर एक प्यारा,

विश्व सारा एक स्वर से,

गीत गाता था हमारा,

कट गये सम्बन्ध प्यारे,

मिट गये अनुबन्ध सारे ,

देख कर परिवेश ऐसा।

हो गया क्यों देश ऐसा ??


आज क्यों पागल,

स्वदेशी हो गया है ?

रक्त क्यों अपना,

विदेशी हो गया है ?

पन्थ है कितना घिनौना,

हो गया इन्सान बौना,

देख कर परिवेश ऐसा।

हो गया क्यों देश ऐसा ??


आज भी लोगों को,

पावस लग रही है ,

चाँदनी फिर क्यों,

अमावस लग रही है ?

शस्त्र लेकर सन्त आया,

प्रीत का बस अन्त आया,

देख कर परिवेश ऐसा।

हो गया क्यों देश ऐसा ??


शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

"हम हृदय में प्यार लेकर आ रहे हैं।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

प्रीत और मनुहार लेकर आ रहे हैं।
हम हृदय में प्यार लेकर आ रहे हैं।।

गाँव का होने लगा शहरीकरण,
सब लुटे किरदार लेकर आ रहे हैं।
हम हृदय में प्यार लेकर आ रहे हैं।।

मत प्रदूषित ताल में गोता लगाना,
हम नवल जल धार लेकर आ रहे है।
हम हृदय में प्यार लेकर आ रहे हैं।।

जिन्दगी में फिर बहारें आयेंगी,
हम सुमन के हार लेकर आ रहे हैं।
हम हृदय में प्यार लेकर आ रहे हैं।।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

“कुछ छन्द” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

खार छाँटे, खार काटें, खार भूतल से हटायें।
प्यार बोएँ, प्यार बाँटें, प्यार के पौधे उगायें।
भूलकर मत-भेद सारे लोग मिल-जुलकर रहें,
रौशनी के दीप लेकर हम धरा को जगमगायें।।
बात हो मत भेद की तो ठीक है.
पर नही मन-भेद होना चाहिए।
ज्ञान की गंगा बहे तो ठीक है,
गल्तियों पर खेद होना चाहिए।।
राम जग में रम रहा है,
राम ही रहमान है।
चार दिन की जिन्दगी है,
सब यहाँ मेहमान हैं।।
दर्द-ओ-गम में जी रहा है आदमी,
बस कलेवर सी रहा है आदमी।
हँसी के बदले खुशी मिलती नही,
वेदना को पी रहा है आदमी।

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