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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

“जन्मदिवस पर तुम्हें बधाई!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जन्मदिन को मनाते बहुत लाड़ से, 
साड़ी लाते हमेशा ही बाज़ार से।
किन्तु इस बार उपहार है कुछ अलग,
गाड़ी लाये तुम्हारे लिए प्यार से।।
श्रीमती अमर भारती जी!
यह रहा आपका जन्मदिन का तोहफा!
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बुधवार, 29 सितंबर 2010

“विदा हुई बरसात” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

विदा हुई बरसात, महीना अब असौज का आया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।
श्राद्ध गये, नवरात्र आ गये,
मंचन करते, पात्र भा गये,
रामचन्द्र की लीलाओं ने, सबका मन भरमाया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।
विजयादशमी आने वाली,
दस्तक देने लगी दिवाली,
खेत और खलिहानों ने, कंचन सा रूप दिखाया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।
मूँगफली के होले भाये,
हरे सिंघाड़े बिकने आये,
नया-नया गुड़ खाने को, अब मेरा मन ललचाया।
जल्दी ढलने लगा सूर्य, जाड़े ने शीश उठाया।।

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

"पुराना राग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

"एक बहुत पुरानी रचना"
कितनी ताकत छिपी शब्द की धार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

वो तो बातों से नश्तर चुभोते रहे,
हम तो हँसते हुए, घाव ढोते रहे,
घात ही घात था उनके हर वार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

मेरे धीरज को वो आजमाते रहे,
हम भी दिल पर सभी जख्म खाते रहे,
पीठ हमने दिखाई नही प्यार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

दाँव-पेंचों को वो आजमा जब चुके,
हार थक कर के अब वार उनके रुके,
धार कुंठित हुई उनके हथियार मे।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

संग-ए-दिल बन गया मोम जैसा मृदुल,
नेह आया उमड़ सिन्धु जैसा विपुल,
हार कर जीत पाई थी उपहार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।। 

सोमवार, 27 सितंबर 2010

"छोड़ नगर का मोह" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


छोड़ नगर का मोह,
आओ चलें गाँव की ओर!
मन से त्यागें ऊहापोह,
आओ चलें गाँव की ओर!
ताल-तलैय्या, नदिया-नाले,
गाय चराये बनकर ग्वाले,
जगायें अपनापन व्यामोह,
आओ चलें गाँव की ओर!
खेतों में हल लेकर जायें,
भाभी भोजन लेकर आयें,
मट्ठा बाट रहा है जोह!
आओ चलें गाँव की ओर!
चौमासे में आल्हा गायें,
बैठ डाल पर जामुन खायें,
रक्खें नही बैर और द्रोह!
आओ चलें गाँव की ओर!
(चित्र गूगल सर्च से साभार)


रविवार, 26 सितंबर 2010

"नारी की व्यथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मैं धरती माँ की बेटी हूँ
इसीलिए तो
सीता जैसी हूँ
मैं हूँ
कान्हा के अधरों से
गाने वाली मुरलिया,
इसीलिए तो
गीता जैसी हूँ।

मैं
मन्दालसा हूँ,
जीजाबाई हूँ
मैं
पन्ना हूँ,
मीराबाई हूँ।

जी हाँ
मैं नारी हूँ,
राख में दबी हुई
चिंगारी हूँ।

मैं पुत्री हूँ,
मैं पत्नी हूँ,
किसी की जननी हूँ
किसी की भगिनी हूँ।

किन्तु
आज लोगों की सोच
कितनी गिर गई है,
मानवता
कितनी मर गई है।

दुनिया ने मुझे
मात्र अबला मान लिया है,
और केवल
भोग-विलास की
वस्तु जान लिया है!

यही तो है मेरी कहानी,
आँचल में है दूध
और आँखों में पानी!

(आँचल में है दूध
और आँखों में पानी! ये पंक्तियाँ
राष्ट्र कवि मैंथिली शरण गुप्त जी की हैं)

शनिवार, 25 सितंबर 2010

"मख़मली परिवेश को क्या हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


आज मेरे देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

पुष्प-कलिकाओं पे भँवरे, रात-दिन मँडरा रहे,
बागवाँ बनकर लुटेरे, वाटिका को खा रहे,
सत्य के उपदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने दो, यही तो कुदरती फरमान है,
आज इस आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

खोजते दैर-ओ-हरम में राम और रहमान को,
एकदेशी समझते हैं, लोग अब भगवान को,
धार्मिक सन्देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

“समय-चक्र” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सत्ता के रास्तों से,
वो दूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

अब ठाठ-बाट सारे,
सब हो गये किनारे,
मशहूर थे कभी जो,
मजबूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

लगते थे जो गरल से,
अब हो गये सरल से,
जागीरदार भी अब,
मजदूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

छल-छद्म के बहाने,
जग को लगे डराने,
सच्चाइयों के आगे,
बेनूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

“आँसू का अस्तित्व… ..” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 जब आता है दुःख तभी,
लोचन तन-मन धोता है।
आँसू का अस्तित्व,
नहीं सागर से कम होता है।।

हार नही मानी जिसने,
बहती नदियों-नहरों से,
जल को लिया समेट स्वयं,
गिरती-उठती लहरों से,
रत्न वही पाता है जो, 
मंथक सक्षम होता है।
आँसू का अस्तित्व,
नहीं सागर से कम होता है।। 


जो फूलों के संग काँटों को,
सहन किये जाता है,
जो अमृत के साथ गरल का,
घूँट पिये जाता है,
शीत, ग्रीष्म और वर्षा में,
वो नहीं असम होता है।
आँसू का अस्तित्व,
नहीं सागर से कम होता है।।

बुधवार, 22 सितंबर 2010

"घिर-घिर बादल आये रे..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गीत : मेरा
स्वर : अर्चना चावजी का



चौमासे में आसमान में,
घिर-घिर बादल आये रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

उनके लिए सुखद चौमासा,
पास बसे जिनके प्रियतम,
कुण्ठित है उनकी अभिलाषा,
दूर बसे जिनके साजन ,
वैरिन बदली खारे जल को,
नयनों से बरसाए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

पुरवा की जब पड़ीं फुहारें,
ताप धरा का बहुत बढ़ा,
मस्त हवाओं के आने से ,
मन का पारा बहुत चढ़ा,
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी,
मन को नहीं सुहाए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

जिनके घर पक्के-पक्के हैं,
बारिश उनका ताप हरे,
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं,
उनके आँगन पंक भरे,
कंगाली में आटा गीला,
हर-पल भूख सताए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

"ऐसा पागलपन अच्छा है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रचना बाँच सुवासित मन हो!
पागलपन में भोलापन हो!
ऐसा पागलपन अच्छा है!!

घर जैसा ही बना भवन हो
!
महका-चहका हुआ वतन हो!
ऐसा अपनापन अच्छा है!!

प्यारा सा अपना आँगन हो!
निर्भय
खेल रहा बचपन हो!
ऐसा बालकपन अच्छा है!!

निर्मल सारा नील-गगन हो!
खुशियाँ बरसाता सा घन हो!
ऐसा ही सावन अच्छा है!!

खिला हुआ अपना उपवन हो!
प्यार बाँटता हुआ सुमन हो!
ऐसा ही तो मन अच्छा है!!

मस्ती में लहराता वन हो!

हरा-भरा सुन्दर कानन हो!

ऐसा ही कानन अच्छा है!!

ऐसे
बगिया-बाग-चमन हों!
जिसमें आम-नीम-जामुन हों!
ऐसा ही उपवन अच्छा है!!

छाया चारों ओर अमन हो!
शब्दों से सज्जित आनन हो!
ऐसा जन-गण-मन अच्छा है!!
ऐसा पागलपन अच्छा है!!

सोमवार, 20 सितंबर 2010

"संकर नस्लों को अब कैसे, गीता पाठ पढ़ाऊँ मैं?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पतझड़ के मौसम में,
सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

बीज वही हैं, वही धरा है,
ताल-मेल अनुबन्ध नही,
हर बिरुअे पर
धान
लदे हैं,
लेकिन उनमें गन्ध नही,
खाद रसायन वाले देकर,
महक कहाँ से पाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

उड़ा ले गई पश्चिम वाली,
आँधी सब लज्जा-आभूषण,
गाँवों के अंचल में उभरा,
नगरों का चारित्रिक दूषण,
पककर हुए कठोर पात्र अब,
क्या आकार बनाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

गुरुवर से भयभीत छात्र,
अब नहीं दिखाई देते हैं,
शिष्यों से अध्यापक अब तो,
डरे-डरे से रहते हैं,
संकर नस्लों को अब कैसे,
गीता ज्ञान कराऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?
पतझड़ के मौसम में,
सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

रविवार, 19 सितंबर 2010

“आसमान के आँसू” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आषाढ़ से आकाश अब तक रो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

आज पानी बन गया जंजाल है,

भूख से पंछी हुए बेहाल हैं,

रश्मियों को सूर्य अपनी खो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

कब तलक नौका चलाएँ मेह में,

भर गया पानी गली और गेह में,

इन्द्र जल-कल खोल बेसुध सो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

बिन चुगे दाना गगन में उड़ चले,

घोंसलों की ओर पंछी मुड़ चले,

दिन-दुपहरी दिवस तम को ढो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

धान खेतों में लरजकर पक गया है,

घन गरजकर और बरसकर थक गया है,

किन्तु क्यों नगराज छागल  ढो रहा है?

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है? 

देखकर अतिवृष्टि क्यों हैरान इतना हो रहा,

पुण्य सलिला में निरन्तर पाप अपने धो रहा,  

उग रही वैसी फसल जैसी धरा में बो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?  

शनिवार, 18 सितंबर 2010

"अतीत के झरोखे से" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

शिष्ट मधुर व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

फूहड़पन के वस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
जंग लगे से शस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
स्वाभाविक श्रंगार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

वचनों से कंगाल, बुरे सबको लगते हैं,
जीवन के जंजाल, बुरे सबको लगते हैं,
सजा हुआ घर-बार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

चुगलखोर इन्सान, बुरे सबको लगते हैं,
सूदखोर शैतान, बुरे सबको लगते हैं,
सज्जन का सत्कार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

लुटे-पिटे दरबार, बुरे सबको लगते हैं,
दुःखों के अम्बार, बुरे सबको लगते हैं,
हरा-भरा परिवार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

मतलब वाले यार, बुरे सबको लगते हैं,
चुभने वाले खार, बुरे सबको लगते हैं,
निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

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