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गुरुवार, 31 मार्च 2011

"श्वाँसों की सरगम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कल-कल, छल-छल करती गंगा,
मस्त चाल से बहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

हो जाता निष्प्राण कलेवर,
जब धड़कन थम जाती हैं।
सड़ जाता जलधाम सरोवर,
जब लहरें थक जाती हैं।
चरैवेति के बीज मन्त्र को,
पुस्तक-पोथी कहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

हरे वृक्ष की शाखाएँ ही,
झूम-झूम लहरातीं हैं।
सूखी हुई डालियों से तो,
हवा नहीं आ पाती है।
जो हिलती-डुलती रहती है,
वही थपेड़े सहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

काम अधिक हैं थोड़ा जीवन,
झंझावात बहुत फैले हैं।
नहीं हमेशा खिलता गुलशन,
रोज नहीं लगते मेले हैं।
सुख-दुख की आवाजाही तो,
सदा संग में रहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।। 

बुधवार, 30 मार्च 2011

"शुभकामनाएँ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पाकिस्तान से सेमीफाईनल जीत कर 
भारत फाईनल में पहुँच गया है। 
आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
खोटे सिक्के चल गए, 
किस्मत मे थी जीत।
लेकिन वो भी अन्त तक, 
डटे रहे बन ढीठ।।
---------------
भारतीय क्रिकेट टीम को
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

मंगलवार, 29 मार्च 2011

"ताज़ा दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


"ताज़ा दोहे" 
माँ के कोमल हृदय को, सुत देते संताप।
एक राह चलते नहीं, भरते हैं अवसाद।१।

मेरे सपने में सजा, फिर से दिलकश चाँद।
है मेरे दिलदार की, चिकनी-चिकनी चाँद।२।

अब कैसे नव सृजन हो, मनवा है हैरान।
गहरे सागर पैंठ कर, खोज रहे हैं ज्ञान।३।

 तन-मन को गद-गद करे, अनुशंसा का भाव।
तारीफों के शब्द से, जल्दी भरते घाव।४।

स्वार्थ भरे इस जगत मेंजीवित है परमार्थ।
युगों-युगों के बाद ही, आता जग में पार्थ।५।

मुक्त नहीं हो पाओगेकर लो यत्न अनेक।
छोड़ ईर्ष्या-द्वेष को, काम करो कुछ नेक।६।

चमत्कार को देख कर, नतमस्तक हैं लोग।
खुश रहने के मन्त्र से, करें पलायन रोग।७।

बना लिया है फ़ासला, हमने चारों ओर।
बिन सूरज के जगत में, कभी न होती भोर।८।

सोमवार, 28 मार्च 2011

"रबड़ छंद भाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


गति-यति तालहीन,
रबड़ छंद भाया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

कथा और व्यथा वही,
कोई नयी बात नहीं,
छंदशास्त्र-शिल्पहीन,
गीत को बनाया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

उपवन में बौर नही,
साँझ नहीं-भोर नही,
पाश्चात्य दीन-हीन,
काव्य को दिखाया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

काया में प्राण नहीं.
पंक्तियाँ समान नहीं,
साधू है ब्रह्मलीन,
नवयुग की माया है।
नये-नये बिम्ब लिए,
नया छंद आया है।।

रविवार, 27 मार्च 2011

"ग़ज़ल-आशा शैली" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 ज़रा रुको तो कोई ज़िन्दगी की बात करें
फिर एक बार मुलाकात अपने साथ करें

तुम आसमां के हमें ख्वाब क्यों दिखाते हो
ज़मी के लोग हैं हम इस ज़मी की बात करें

उजाड़ जंगलों में क्या तलाशने निकले
चलो नदी पे नहीं तो नदी की बात करें

पिरामिडों में दफ़्न दौलतों को भूलो भी
किसी के ग़म की किसी की खुशी की बात करें

मुहब्बतों की बात यह जहान भूल गया
ये ज़िंदगी है तो ज़िन्दादिली की बात करें

कदम-कदम पे नफरतों के अन्धेरे हैं यहाँ
वफ़ाशआर किसी रौशनी की बात करें

ग़ज़ल का दौर है शैली कोई कलाम पढ़ो
इस अंजुमन में क्यों न ताज़गी की बात करें
श्रीमती आशा शैली "हिमाचली"

शनिवार, 26 मार्च 2011

"ठगते हैं ये सारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पीछे मुड़ कर कभी न देखें, अपना आज सँवारें।
औरों के गुण-दोष न देखें, अपना काज सुधारें।।

स्वर्ग यहीं और नर्क यहीं है, किसने देखी जन्नत,
चारों ओर सजे हैं अपने, सुन्दर-सुखद नज़ारे।।

मानव चोला पाकर हम, अपने को मनुज बनाएँ,
चंचल मन में प्रीत-रीत के, पीताम्बर को धारें।।

क्षमा-सरलता और धैर्य ही, सच्चे आभूषण हैं।
सोच-समझकर-नाप-तोलकर, ही हम शब्द उचारें।।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे, छाये दुनिया भर में।
जग को झोंक रहे लहरों में, खुद हैं खड़े किनारे।।

ऐसे ढोंगी सन्त-महन्तो से, बच करके रहना।
धार धर्म का धवल लबादा, ठगते हैं ये सारे।।

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

"आओ इसकी करें सवारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



मेरी साईकिल

दो चक्कों की प्यारी-प्यारी।
आओ इसकी करें सवारी।।

साईकिल की शान निराली।
इसकी चाल बहुत मतवाली।।

बस्ते का यह भार उठाती।
मुझको विद्यालय पहुँचाती।।

पैडल मारो जोर लगाओ।
मस्त चाल से इसे चलाओ।।

सड़क देख कर खूब मचलती।
पगडण्डी पर सरपट चलती।

हटो-बचो मत शब्द पुकारो।
भीड़ देखकर घण्टी मारो।।

अच्छे अंक क्लास में लाओ।
छुट्टी में इसको टहलाओ।।

यह पैट्रोल नहीं है खाती।
बिन ईंधन के चलती जाती।।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

""नजारे भारत और नेपाल के"" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सीमा की सैर
सीमा के हैं मस्त नजारे भारत और नेपाल के।
लेते हैं आनन्द पथिक घोड़े-ताँगे की चाल के।।
इस पार हमारा भारत है उस पार बसा नेपाल देश।
जलधारा नदी शारदा की, मध्यस्थ बन रही है विशेष।।
34 दर वाला सँकरा सा, आवाजाही का साधन है।
बैराज बहुत यह लम्बा सा, जीवित है मगर पुरातन है।।
भारत की सीमा पर प्रतिदिन, लहराता है झण्डा अपना।
आजादी का पल-पल प्रतिपल, साकार सजा अपना सपना।।
देकर नहर शारदा ने, भारत का रूप निखारा है।
नेपाल देश के सिंचन को, हमने दी छोटी धारा है।।
यदि सैर करो तुम कभी यहाँ, तो घोड़े-ताँगे से करना।
मोहक-कुदरती नजारों से, अपने मन का कोना भरना।।

बुधवार, 23 मार्च 2011

‘‘बहुत अच्छा लगता है।’’ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’


शिष्ट मधुर व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

फूहड़पन के वस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
जंग लगे से शस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
स्वाभाविक श्रंगार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

वचनों से कंगाल, बुरे सबको लगते हैं,
जीवन के जंजाल, बुरे सबको लगते हैं,
सजा हुआ घर-बार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

चुगलखोर इन्सान, बुरे सबको लगते हैं,
सूदखोर शैतान, बुरे सबको लगते हैं,
सज्जन का सत्कार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

लुटे-पिटे दरबार, बुरे सबको लगते हैं,
दुःखों के अम्बार, बुरे सबको लगते हैं,
हरा-भरा परिवार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

मतलब वाले यार, बुरे सबको लगते हैं,
चुभने वाले खार, बुरे सबको लगते हैं,
निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

"ग़ज़ल:गुरू सहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता:डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



गम-ए-पिन्हाँ

डूब कर तेरे ख्यालों में आके बैठा हूँ
कौन सा ग़म है जिसे मैं छुपा के बैठाहूँ

बदलते दौर में कोई बफ़ा नहीं करता
चाह की फिर में शम्मा जला के बैठा हूँ

कुसूर तेरा ही नहीं किस्मत का ही होगा अपनी
दाग दामन में खुद ही लगाके बैठा हूँ

मैं तेरे ख्याल से खाली कभी नहीं रहता
तुम्हारी याद को दिल में बसा के बैठा हूँ

करके ‘बदनाम’ हमसे दूर चले जाओगें
गमे-पिन्हाँ में मैं हरन्ती मिटा के बैठा हूँ

गुरू सहाय भटनागर "बदनाम" 

सोमवार, 21 मार्च 2011

"कुछ शब्द सरल भर दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

माँ मेरी रचना में, कुछ शब्द सरल भर दो।

गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।

 

दिन-रात तपस्या कर, मैंने पूजा तुमको,

जीवन भर का मेरा, संधान सफल कर दो।

गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।

 

कुछ भी तो नहीं मेरा, माँ सब कुछ है तेरा,

इस रीती गागर में,  निज स्नेह सबल भर दो।

गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।। 

 

लिखता हूँ जो कुछ मैं, वो धूमिल हो जाता,

मसि देकर माता तुम, छवि धवल-प्रबल कर दो।

गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।

 

जितना माँगा मैंने, उससे है अधिक दिया,

मनके मनकों को तुम, माता उज्जवल कर दो।

गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।


रविवार, 20 मार्च 2011

"बीत गया त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



होली अब होली हुई, बीत गया त्यौहार।
एक बरस के बाद फिर, बरसेगी रसधार।।
--
कृपा करो परमात्मा, सुखी रहें नर-नार।
हँसी-खुशी के साथ में, मनें सभी त्यौहार।।
--
होली में जिस तरह से, उमड़ा प्रेम अपार।
हर दिन ऐसा ही रहे, सबके दिल में प्यार।।
--
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

शनिवार, 19 मार्च 2011

"होली का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 होली में चेहरा हुआ, काला, पीला-लाल।
श्यामल-गोरे गाल भी, हो गये लालम-लाल।१।

महके-चहके अंग हैं, उलझे-उलझे बाल।
होली के त्यौहार पर, बहकी-बहकी चाल।२।

हुलियारे करतें फिरें, चारों ओर धमाल।
होली के इस दिवस पर, हो न कोई बबाल।३।

कीचड़-कालिख छोड़कर, खेलो रंग-गुलाल।
टेसू से महका हुआ, रंग बसन्ती डाल।४।

खुशियों की बौछार हों, घर-आँगन औ द्वार।
धान्य और धन लाएगा, होली का त्यौहार।५।

"देख तमाशा होली का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मित्रों !
आज किसी ने आकर बताया कि
कल होली के अवसर पर
एक समस्यापूर्ति (तरही-मिसरा) पर आधारित
कविगोष्ठी खटीमा में आयोजित की जा रही है।
जिसका शीर्षक रखा गया है-
"देख तमाशा होली का"
अचानक कुछ पंक्तियाँ बन गई हैं
आप भी इनका आनन्द लीजिए!
मस्त फुहारें लेकर आया,
मौसम हँसी-ठिठोली का।
देख तमाशा होली का।।

उड़ रहे पीले-हरे गुलाल,
हुआ है धरती-अम्बर लाल,
भरे गुझिया-मठरी के थाल,
चमकते रंग-बिरंगे गाल,
गोप-गोपियाँ खेल रहे हैं,
खेला आँख-मिचौली का।
देख तमाशा होली का।।

मस्त फुहारें लेकर आया,
मौसम हँसी-ठिठोली का।
देख तमाशा होली का।।

पिचकारी बच्चों के कर में,
हुल्लड़ मचा हुआ घर-घर में,
हुलियारे हैं गली-डगर में,
प्यार बसा हर जिगर-नजर में,
चारों ओर नजारा पसरा,
फागुन की रंगोली का।
देख तमाशा होली का।।

मस्त फुहारें लेकर आया,
मौसम हँसी-ठिठोली का।
देख तमाशा होली का।।

डाली-डाली है गदराई,
बागों में छाई अमराई,
गुलशन में कलियाँ मुस्काई,
रंग-बिरंगी तितली आई,
कानों को अच्छा लगता सुर,
कोयलिया की बोली का।
देख तमाशा होली का।।

मस्त फुहारें लेकर आया,
मौसम हँसी-ठिठोली का।
देख तमाशा होली का।।


गीत प्यार का आओ गाएँ,
मीत हमारे सब बन जाएँ,
बैर-भाव को दूर भगाएँ,
मिल-जुलकर त्यौहार मनाएँ,
साथ सुहाना मिले सभी को,
होली में हमजोली का।
देख तमाशा होली का।।

मस्त फुहारें लेकर आया,
मौसम हँसी-ठिठोली का।
देख तमाशा होली का।।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

"जरूरत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


वतन में अमन की, जागर जगाने की जरूरत है, 
जहाँ में प्यार का सागर, बहाने की जरूरत है।  
मिलन मोहताज कब है, ईद, होली और क्रिसमस का-
दिलों में प्रीत की गागर, सजाने की जरूरत है।। 

"फिर से आई होली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 गाँव-गली और बाजारों में घूम रहीं हैं टोली।
हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।।

कोई पीकर भंग नाचता, कोई सुरा चढ़ाए,
कोई राग-रागनी गाता, कोई ढोल बजाए,
मस्तक-चेहरों पर चित्रित है लाल-हरी रंगोली।
हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।।

पश्चिम से पछुवा चलती है, पूरब से पुरवाई,
जाड़े का अब अन्त हो गया, रुत गर्मी की आई,
अम्बुआ की गदराई डालों पर, कोयल है बोली।
हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।।
हरी बालियों ने गेहूँ की, धारा रूप सलोना,
दूर-दूर तक खेतों में, कंचन का बिछा बिछौना,
डर लगता है घन जब नभ में, करता आँखमिचौली।
हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।।
जन-गण-मन की है अभिलाषा, रूठे मिलें गले से,
होली लेकर आती आशा, रिश्ते बनें भले से, 
कल तक जो थे अलग-थलग, वो बन जाएँ हमजोली।
हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।।

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