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बुधवार, 30 नवंबर 2011

"दोहे-साझा ब्लॉग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


किया आपने था जिसे, मन से अंगीकार।
अब करते क्यों उसी से, सौतेला व्यवहार।१।

जिस चिट्ठे के साथ में, जुड़ा आपका नाम।
उस पर भी तो कीजिए, निष्ठा से कुछ काम।२।

लेखन के संसार में, चलना नहीं कुचाल।
जो सीधा-सीधा चले, होता वो खुशहाल।३।

सोच-समझ कर ही सदा, यहाँ बनाओ मित्र।
मन के मन्दिर में सदा, रक्खो उनके चित्र।४।

बिना नम्रता के सभी, होते दुष्कर काम।
अहमभाव से कभी भी, मिलता नहीं इनाम।५।

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

"दल उभरता नहीं, संगठन के बिना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


स्वर सँवरता नहीं, आचमन के बिना।
पग ठहरता नहीं, आगमन के बिना।।

देश-दुनिया की चिन्ता, किसी को नहीं,
मन सुधरता नहीं, अंजुमन के बिना।

मोह माया तो, दुनिया का दस्तूर है,
सुख पसरता नहीं, संगमन के बिना।

खोखली देह में, प्राण कैसे पले,
बल निखरता नहीं, संयमन के बिना।

क्या करेगा यहाँ, अब अकेला चना,
दल उभरता नहीं, संगठन के बिना।

रूप कैसे खिले, धूप कैसे मिले?
रवि ठहरता नहीं है, गगन के बिना।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

"आसमान में कुहरा छाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

शीत बढ़ा, सूरज शर्माया।
आसमान में कुहरा छाया।।

चिड़िया चहकी, मुर्गा बोला,
हमने भी दरवाजा खोला,
लेकिन घना धुँधलका पाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

जाड़ा बहुत सताता तन को,
कैसे जाएँ सुबह भ्रमण को,
सर्दी ने है रंग जमाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

गज़क-रेवड़ी बहुत सुहाती,
मूँगफली सबके मन भाती,
दादी ने अलाव सुलगाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

शीतल तुहिन कणों को खाते,
गेंहूँ झूम-झूम लहराते,
हरियाली ने रूप दिखाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

रविवार, 27 नवंबर 2011

"आ गये फकीर हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


रोटियों को बीनने को, आ गये फकीर हैं।
अमन-चैन छीनने को, आ गये हकीर हैं।।

तिजारतों के वास्ते, बना रहे हैं रास्ते,
हरी घास छीलने को, आ गये अमीर हैं।

दे रहे हैं मुफ्त में, सुझाव भी-सलाह भी,
बादशाह लीलने को, आ गये वज़ीर हैं।

ज़िन्दगी के हाट में, बेचते हैं मौत को,
धीरता को जीमने को, आ गये अधीर हैं।

रूप वानरों सा है, दिल तो है लँगूर का,
मनुजना को पीसने को, आ गये कदीर हैं।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

"खार पर निखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



है नशा चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
राम के ही देश में, राम बेकरार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

‘‘बचा लो पर्यावरण’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

घटते वन,
बढ़ता प्रदूषण,
गाँव से पलायन
शहरों का आकर्षण।
जंगली जन्तु कहाँ जायें?
कंकरीटों के जंगल में
क्या खायें?
मजबूरी में वे भी
बस्तियों में घुस आये!
--

क्या हाथी,
क्या शेर?
क्या चीतल,
क्या वानर?
त्रस्त हैं,
सभी जानवर।
खोज रहे हैं सब
अपना आहार,
हो रहे हैं नर
अपनी भूलों का शिकार।
--
अभी भी समय है,
लगाओ पेड़, 
उगाओ वन,
हो सके तो 
बचा लो,
पर्यावरण!
○ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
खटीमा (उत्तराखण्ड)

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

"हमारे नेता महान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



रोटी है,
बेटी है,
बँगला है,
खेती है,

घपलों में 
घपले हैं,
दिल काले हैं
कपड़े उजले हैं,

उनके भइया हैं,
इनके साले हैं,
जाल में फँस रहे,
कबूतर भोले-भाले हैं,

गुण से विहीन हैं
अवगुण की खान हैं
जेबों में रहते
इनके भगवान हैं

इनकी दुनिया का
नया विज्ञान है
दिन में इन्सान हैं
रात को शैतान हैं

परदा डालते हैं
भाषण से घोटालों पर
तमाचे भी पड़ते हैं
कभी-कभी गालों पर

आदत हो गई है
लातों के भूतों को
खाते हैं यदा-कदा
जनता के जूतों को

न कोई धर्म है
न ही ईमान है
मुफ्त में करते
नही अहसान हैं

हर रात को बदलते
नये मेहमान है
हमारे देश के नेता
सचमुच महान हैं!

बुधवार, 23 नवंबर 2011

‘‘हमसफर बनाइए’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


ज़िन्दगी के रास्तों पे कदम तो बढ़ाइए।
इस सफर को नापने को हमसफर बनाइए।।

राह है कठिन मगर लक्ष्य है पुकारता,
रौशनी से आफताब मंजिलें निखारता,
हाथ थामकर डगर में साथ-साथ जाइए।

ज्वार का बुखार आज सिंधु को सता रहा,
प्रबल वेग के प्रवाह को हमें बता रहा,
कोप से कभी किसी को इतना मत डराइए।

काट लो हँसी-खुशी से, कुछ पलों का साथ है,
चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है,
इन लम्हों को रार में, व्यर्थ मत गँवाइए।

पुंज है सुवास का, अब समय विकास का,
वाटिका में खिल रहा, सुमन हमारी आस का,
सुख का राग, आज साथ-साथ गुनगुनाइए।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

"हाँ यही मौत का लक्षण है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

हाँ यही मौत का लक्षण है!!
उठकर बैठो आँखें खोलो
अपने मुख से कुछ तो बोलो
हिलना-डुलना क्यों बन्द हुआ
तन-मन क्यों ब्रह्मानन्द हुआ
सब ढला आज सिंगार-साज
चलती धारा क्यों रुकी आज
क्या यही मौत का लक्षण है?

मातम पसरा सारे घर में
आँसू नयनों के कोटर में
सब सजा रहे अन्तिम डोली
देंगे काँधा सब हमजोली
फिर चिता सजाई जाएगी
कंचन काया जल जाएगी
क्या यही मौत का लक्षण है?

जब याद तुम्हारी आयेगी
तब यादें ही रह जाएँगी
जीवन की रीत निराली है
पर मौत बहुत बलशाली है
जिन्दगी चार दिन का खेला
फिर उजड़ जायेगा ये मेला
क्या यही मौत का लक्षण है?
हाँ यही मौत का लक्षण है!!

रविवार, 20 नवंबर 2011

"यह क्षण माता जी के जीवन में अब कभी नहीं आयेंगे।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अपने बाल सखा
डॉ. धर्मवीर को
शत्-शत् नमन!

जन्मः 01-01-1947
मृत्युः 19-11-2011
साथ-साथ में खेले-कूदे,
साथ-साथ ही हुए बड़े।
हरिद्वार की पुण्यभूमि में,
गुरुकुल में हम साथ पढ़े।।

वैद्यराज बनकर दोनों ने,
यश-धन को भी खूब कमाया।
जीवन पथ पर चलते-चलते,
सीमित सा परिवार बढ़ाया।।

आज अचानक इस दुनिया से,
तुमने नाता तोड़ लिया हैं।
इष्ट-मित्र, पुत्री-पुत्रों को,
आज बिलखता छोड़ दिया है।।

मेरी माता के भइया को,
श्रद्धा-सुमन समर्पित हैं।
तुमको भारी मन से मामा,
आँसूमाला अर्पित हैं।।
22 जून, 1973 को
डॉ. धर्मवीर का विवाह
दिल्ली निवासिनी प्रभा जी के साथ हुआ।
जो 4 मार्च, 1998 में इनका साथ छोड़ गईं।
डॉ. धर्मवीर की गोद में बैठी
इनकी छः मास की बिटिया अमिता,
जिसका विवाह काशीपुर में
श्री अजय वर्मा के साथ सम्पन्न हुआ था।
लेकिन 10 माह पहले अजय वर्मा की
एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
इस हादसे ने डॉ. धर्मवीर को तोड़ कर रख दिया
और 19-11-2011 को उनकी हृदयगति रुक जाने के कारण
चम्पावत के सिप्टी गाँव में
उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
जीवन के अन्तिम क्षणों में
वे सिप्टी के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में
संविदा पर चिकित्साधिकारी के पद पर कार्यरत थे।
यह हैं मेरी 85 वर्षीया माता जी
श्रीमती श्यामवती देवी!
इस वर्ष रक्षाबन्धन के अवसर पर
माता जी अपने छोटे भाई
डॉ. धर्मवीर को राखी बाँधती हुई।
यह क्षण माता जी के जीवन में
अब कभी नहीं आयेंगे।

शनिवार, 19 नवंबर 2011

"जन्म दिवस पर शत्-शत् नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

दुर्गा की अवतार
श्रीमती इन्दिरा गांधी को
उनके 97वें जन्म दिवस पर
शत्-शत् नमन।
इन्दिरा प्रियदर्शिनी फिर से, आओ मेरे भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

आज वतन की बागडोर है, चंगुल में मक्कारों के,
वारे न्यारे हैं शासन में, आज कुटिल गद्दारों के,
फिर से लो अवतार, पुनःचण्डी बन आओ भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

मतवाला हो गया तन्त्र, घोटालों की लग गई झड़ी,
सत का पथ दिखलाने वाली, गाँधी की खो गई छड़ी,
स्वाभिमान की चिंगारी, सुलगाओ मेरे भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

बनकर श्वान चाटते तलवे, परदेशो में जाते हैं,
आन-बान को गिरवी रखकर, व्यंजन खूब उड़ाते हैं,
मानवता के पौधों को, फिर से उपजाओ भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के
जन्मदिवस पर नमन करते हुए
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की

यह पूरी अमर कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।
-0-0-
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी।
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी।
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार।
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में।
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई।
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया।
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया।
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नब्वाबों के भी उसने पैरों को ठुकराया।
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात.
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात।
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात।
बंगाले-मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने।कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार।
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार।
यों परदे की इज्जत पर। देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान।
नाना धुंधुंपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरमन से आई थी।
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम।
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में।
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में।
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार।
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी।
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार।काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार।
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।
अभी उम्र थी कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी।
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

♥ सुभद्रा कुमारी चौहान ♥

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