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शनिवार, 30 जून 2012

"हमारे घर में रहते हैं, हमें चूना लगाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिन्हें पाला था नाज़ों से, वही आँखें दिखाते हैं।
हमारे दिल में घुसकर वो, हमें नश्तर चुभाते हैं।।

जिन्हें अँगुली पकड़ हमने, कभी चलना सिखाया था,
जरा सा ज्ञान क्या सीखा, हमें पढ़ना सिखाते हैं।

भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था,
मगर अहसान के बदले, हमें चूना लगाते हैं।

हमें अहसास होता है, बड़ी है मतलबी दुनिया,
गधे को बाप भी अपना, समय पर वो बनाते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
अगर चांदी के जूते हो, तो सिर पर वो बिठाते हैं।

शुक्रवार, 29 जून 2012

"एक दिन चुनाव प्रचार के नामं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उत्तराखण्ड के मा. मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा जी खटीमा से लगती हुई सितारगंज विधानसभा से विधायक का उपचुनाव लड़ रहे हैं। उनका उपचुनाव आगामी 8 जुलाई को होगा।
इन दिनों विकासनगर (देहरादून) से प्रकाशित होने वाले "हिमालय टाइम्स" समाचारपत्र के प्रधान सम्पादक आदरणीय द्वारिका प्रसाद उनियाल जी ने मुझे सम्पादक मण्डल में शामिल कर लिया गया है और वो मा. मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा का विशेष परिशिष्ट प्रकाशित करने जा रहे हैं। इसलिए मैंने अपना नैतिक दायित्व समझते हुए एक दिन बहुगुणा जी के परिवार के साथ बिताया।
सितारगंज से 10किमी दूर सितारगंज जेलकैम्प की भूमि पर बने औद्योगिक परिसर (सिडकुल) में एस.एन. होटल में इन दिनों मुख्यमन्त्री जी का काफिला अपना डेरा डाले हुए है। इसलिए मैं भी श्रीमती जी को साथ लेकर यहाँ आ धमका।
यहाँ सबसे पहले हमारी मुलाकात कान्ता प्रसाद सागर जी से हुई। ये सन् 2007 में सितार गंज विधानसभा से काँग्रेस के प्रत्याशी थे।
होटल में कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों का हुजूम था
जो चुनावप्रचार में भाग लेने के लिए यहाँ पधारे थे।
उत्तर प्रदेश से भी बहुत से लोग यहाँ आये हुए थे।
इसके बाद हमें मा. बहुगुणा जी के दोनों पुत्र दिखाई पड़े
जो बहुत विनम्रता से लोगों का अभिवादन कर रहे थे।
इनके छोटे पुत्र ने तो बहुत देर तक
मेरे साथ चुनाव के बारे में बातें की।
इसके बाद मा. मुख्यमन्त्री जी की धर्मपत्नी तैयार होकर
कमरे से बाहर निकलीं और लोगों से मिलीं।
उन्हें पास की न्यायपंचायत रघुलिया में
जनसम्पर्क के लिए जाना था
इसलिए वो अपनी कार में बैठकर
वहाँ के लिए प्रस्थान करने लगीं।
अब होटल के कमरे से तैयार होकर बाहर निकलीं
उ.प्र.काँग्रेस की अध्यक्ष
और विजय बहुगुणा की बहिन श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी।
ये हमारी श्रीमती अमर भारती काफी घुलमिल गयीं थी।
ऐसा लगा ही नहीं कि ये पहली बार आपस में मिल रहीं हैं।
इसके बाद मैंने और श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी ने
चुनाव को लेकर काफी देर तक माथापच्ची की
यहाँ पर उत्तराखण्ड के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
मा.यशपाल आर्य भी ठहरे हुए थे।
अब वे भी तैयार होकर अपने रूम से बाहर आ चुके थे।
मा.यशपाल आर्य का और मेरा लगभग 25 साल पुराना साथ है।
आज भी वे मुझे अपना बड़ा भाई मानते हैं।
संयोग से मेरी कार में एक पुरानी फोटो एलबम पड़ी थी।
जिसमें यशपाल आर्य और उनकी श्रीमती पुष्पा आर्या
और माननीय पं. नारायण दत्त तिवारी जी के फोटो थे।
मा.यशपाल आर्य ने बड़ी उत्सुकता से
अपने 25 साल पुराने फोटो देखे।
उनकी खुशी देखते ही बनती थी।
इस प्रकार हमारा आज का दिन
बहुगुणा जी के परिवार के साथ बीता।

गुरुवार, 28 जून 2012

"अन्तरजाल हुआ है तन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी, अन्तरजाल हुआ है तन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

जंगल लगता बहुत सुहाना, पर्वत लगते हैं अच्छे,
सीधी-सादी बातें करते, बच्चे लगते हैं अच्छे,
सुन्दर-सुन्दर सुमनों वाला, लगता प्यारा ये उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

सुख की बातें-दुख की बातें, बेबाकी से देते हैं,
भावनाओं के सम्प्रेषण से, अपना मन भर लेते हैं.
आभासी दुनिया में मिलता, हमको सुख और चैन-अमन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

ग़ाफ़िल, रविकर, भ्रमर, यहाँ पर सुरभिसुमन खिलाते हैं,
उल्लू और मयंक निशा में, विचरण करने आते हैं,
पंकहीन से कमल सुशोभित करते, बगिया और चमन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

उड़नतश्तरी दिख जाती है, ताऊ नजर नहीं आता,
अदा-सदा, वन्दना-कनेरी, महकाती जातीं उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

बुधवार, 27 जून 2012

"जकड़ा हुआ है आदमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


फालतू की ऐँठ में, अकड़ा हुआ है आदमी।
वानरों की कैद में, जकड़ा हुआ है आदमी।।

सभ्यता की आँधियाँ, जाने कहाँ ले जायेंगी,
काम के उद्वेग ने, पकड़ा हुआ है आदमी।

छिप गयी है अब हकीकत, कलयुगी परिवेश में,
रोटियों के देश में, टुकड़ा हुआ है आदमी।

हम चले जब खोजने, उसको गली-मैदान में
ज़िन्दग़ी के खेत में, उजड़ा हुआ है आदमी।

बिक रही है कौड़ियों में, देख लो इंसानियत,
आदमी की पैठ में, बिगड़ा हुआ है आदमी।

रूप तो है इक छलावा, रंग पर मत जाइए,
नगमगी परिवेश में, पिछड़ा हुआ है आदमी।

मंगलवार, 26 जून 2012

"कविवर राकेश "चक्र" के सम्मान में गोष्ठी " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

साहित्य शारदा मंच, खटीमा के तत्वावधान में लगभग 55 पुस्तकों के रचयिता तथा पं.सुमित्रानन्दन पन्त पुरस्कार से सम्मानित, अभिसूचना अधिकारी के पद पर कार्यरत कविवर राकेश "चक्र" के सम्मान में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता साहित्य शारदा मंच, खटीमा के अध्यक्ष डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने की तथा संचालन पीलीभीत से पधारे कवि देवदत्त "प्रसून" ने किया।
सर्वप्रथम माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने माँ की वन्दना प्रस्तुत की।
मेरी गंगा भी तुम, और यमुना भी तुम,
तुम ही मेरे सकल काव्य की धार हो।
जिन्दगी भी हो तुम, बन्दगी भी हो तुम,
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।
इसके पश्चात रूमानियत के शायर गुरूसहाय भटनागर बदनाम ने अपना काव्यपाठ करते हुए कहा-
तुम क्या गये चमन से, बहारें चलीं गयीं।
हर शाख़-ए-गुल से, गुल की कतारें चलीं गयीं।।
खटीमा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष के
पद पर कार्यरत डॉ.सिद्धेश्वर सिंह ने अपना काव्यपाठ करते हुए कहा-
दो दिन के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली


डर लागे , लागे डर
काँपे जिया थर - थर
झोले में सामान रखा
गिन कर , चुन कर

सहेजे हैं कागज पत्तर
मानो सोने की सिल्ली।
दो दिन के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली ।


कविवर देवदत्त प्रसून ने इस अवसर पर कहा-
यदि तुमको अर्पन हो जाए।
मन मेरा दर्पन हो जाए।।
हास्य व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर गेन्दालाल शर्मा "निर्जन" ने
इस अवसर पर अपने हास्य व्यंग्यों से गोष्ठी में समां बाध दिया।
गोष्टी में मुख्यअतिथि के रूप में पधारे कविवर राकेश "चक्र" ने अपने काव्यपाठ में एक सन्देश देते हुए कहा-
दो ऐसा उपहार कि मैं, हर ओर उजाला कर दूँ।
निर्बल-निर्धन के अधरों पर भी मुस्कानें भर दूँ।।
वाणी मधुर करा दो मेरी, दो हाथों में फूल,
फूलों की खुशबू से जग को खुशबू वाला कर दूँ।।
अन्त में गोष्ठी के आयोजक डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने अपनी निम्न रचना का पाठ किया 

"वर्षा का जल सबको भाया।
पेड़ों ने नवजीवन पाया।।
श्रम करने खेतों में जाएँ।
आओ धान की पौध लगाएँ।।"

और अपना आभार दर्शन प्रदर्शित किया।
इस अवसर पर कविवर राकेश "चक्र" जी का
माल्यार्पण करके कवि "मयंक" द्वारा
अपनी चार पुस्तके भी "चक्र" जी को स्मृतिचिह्न के रूप में भेंट की।
"चक्र" जी ने भी अपनी एक पुस्तक
"एकता के साथ हम" डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" को सादर भेंट की।

"आशा का दीप जलाया क्यों" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मन के सूने से मन्दिर में, आशा का दीप जलाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

प्यार, प्यार है पाप नही है, इसका कोई माप नही है,
यह तो है वरदान ईश का, यह कोई अभिशाप नही है,
दो नयनों के प्यालों में, सागर सा नीर बहाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

मुस्काओ स्वर भर कर गाओ, नगमों को और तरानों को,
गुंजायमान करदो फिर से, इन खाली पड़े ठिकानों को,
शीशे से भी नाजुक दिल मे, ग़म का गुब्बार समाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

स्वप्न सलोने जो छाये हैं, उनको आज धरातल दे दो,
पीत पड़े प्यारे पादप को, गंगा का निर्मल जल दे दो,
रस्म-रिवाजों के कचरे से, यह घर-द्वार सजाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

सोमवार, 25 जून 2012

"तुम भारत के वीर हो-राकेश चक्र"

नौजवान तुम बढ़ो देश के,
इस युग की तस्वीर हो।
कदम से कदम मिलाओ प्यारे,
तुम भारत के वीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

हुआ सुशोभित प्यारा सारा,
ऊँचा आज हिमालय भाल,
भारत माँ की रक्षा कर लो,
तुम ही हो अनमोल सुलाल।
कार्य करो तुम और भी अच्छे,
फाग खिले और उड़े गुलाल
जग में मान बढ़ाओ प्यारे,
तुम ही तो रणधीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

मिटे अंधेरा इस भारत का,
तुमको दीप जलाना है।
मन उजियारे सबके होंगे,
गीत प्रीति का गाना है।
भय भागे घर-घर का अब तो,
सुदृढ़ लक्ष्य बनाना है।
सबकी प्यास बुझाओ प्यारे
तुम ही मीठा नीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

तुम ही हो सुभाष राष्ट्र के,
भगत सरीखे तारे हो।
लाल-बाल और पाल बनो,
शेखर से उजियारे हो।
तुम ही बिस्मिल, तुम ही अब्दुल
तुम ही गाँधी सारे हो।
तुम ही मशाल जलाओ प्यारे
बहती हुई समीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

तुम ही भ्रष्टाचार मिटाओ,
तुम ही पापाचार को।
सब पंथों का भेद मिटाओ,
और बढ़ाओ प्यार को।
ग्रन्थों का सब ज्ञान पढ़ाकर,
दे दो सारे सार को।
सत् के वृक्ष उगाओ प्यारे,
तुम ही कर्म सुवीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

माता तुम से मांग रही है,
अब बलिदानी जत्थों को।
तुमको ही रक्षा करना है,
दुश्मन हनें निहत्थों को।
संस्कृति तुम ही बचा सकोगे,
ज्ञान सिखा मनु पुत्रों को।
रक्षा करो आज भाषा की,
ज्ञानवान तदवीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!
राकेश "चक्र"

रविवार, 24 जून 2012

‘‘कैसी रही यह परिभाषा?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कैसी रही यह परिभाषा?

      आंग्ल-भाषा का पहला शब्द-कोष बनाने वाले डॉ. जॉनसन ने शब्दों को अकारादि क्रम से जोड़ा। लेकिन शब्दों के अर्थ लिखने की बजाय उनकी परिभाषाएँ लिख दीं।
     ऐसा करने की वजह शायद यह रही होगी कि शब्द का अर्थ ठीक से समझ में आ जाये।
उदाहरण के तौर पर-
‘सिगरेट’ का अर्थ उन्होंने लिखा-
‘‘सिगरेट कागज में लिपटा हुआ तम्बाकू है। जिसके एक तरफ धुँआ होता है और दूसरी तरफ एक बेवकूफ।’’

शनिवार, 23 जून 2012

"आओ धान की पौध लगाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बादल आये जोर-शोर से।
बारिश बरसी खूब जोर से।।

आँधी आयी, बिजली चमकी।
पहली बारिश है मौसम की।।

भीग गया धरती का आँचल।
झूम रहे खुश होकर जंगल।।

मानसून का मौसम आया।
लू-गर्मी का हुआ सफाया।।

वर्षा का जल सबको भाया।
पेड़ों ने नवजीवन पाया।।

श्रम करने खेतों में जाएँ।
आओ धान की पौध लगाएँ।।

शुक्रवार, 22 जून 2012

"खोलो मन का द्वार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
करके पूजा जाप को, लो बुहार घर-बार।१।

सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास।
मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२।

श्रम से अर्जित आय से, पूरी होती आस।
सागर के जल से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।३।

चलना ही है ज़िन्दग़ी, रुकना तो हैं मौत।
सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत।४।

गुरुवार, 21 जून 2012

"आज विनीत चाचा का जन्मदिन है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चाचा जी खा लेओ मिठाई,
जन्मदिवस है आज तुम्हारा।
महके-चहके जीवन बगिया,
आलोकित हो जीवन सारा।।

बाबा-दादी, पापा-मम्मी,
सब देंगे उपहार आपको।
लेकिन हम बच्चे मिल करके,
देंगे अपना प्यार आपको।।

बूढ़ीदादी-दादा जी भी,
अपने आशीषों को देंगे।
बदले में अपनें बच्चों की,
मुस्कानों से मन भर लेंगे।।

जायेंगें बाजार आज हम,
गुब्बारे लेकर आयेंगे।
खुशी-खुशी हम पूरे घर को,
चाचा आज सजायेंगे।।

आप काटकर केक सलोना,
हमें खिलाना, खुद भी खाना।
दीर्घ आयु पाओ चाचा जी,
जन्मदिवस हर साल मनाना।।
मैं प्राची और भाई प्राञ्जल,
देते तुमको आज बधाई।
इस पावन अवसर पर,
चाची ने भी खुशियाँ खूब मनाई।।

"अब कुमुद खिलने लगेंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज नभ पर बादलों का है ठिकाना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

कल तलक लू चल रही थी,
धूप से भू जल रही थी,
आज हैं रिमझिम फुहारें,
लौट आयी हैं बहारें,
बुन लिया है पंछियों ने आशियाना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

हल किसानों ने उठाया,
खेत में उसको चलाया,
धान की रोपाई होगी,
अन्न की भरपाई होगी,
गा उठेगा देश फिर, सुख का तराना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

ताल के नम हैं किनारे,
मिट गयीं सूखी दरारें,
अब कुमुद खिलने लगेंगे,
भाग्य धरती के जगेंगे,
आ गया है दादुरों को गीत गाना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

बुधवार, 20 जून 2012

"तिवारी नहीं हैं बलात्कारी" (पत्रकार दयानन्द पाण्डेय का एक सरगर्भित आलेख)

तिवारी नहीं हैं बलात्कारी
Posted On June 19, 2012 Tags :

महाभारत की बहुत सारी कथाएं हमारे समाज में आज भी कही सुनी जाती हैं। इस में एक किस्सा बहुत मशहूर है। दुर्योधन और अर्जुन का कृष्ण के पास समर्थन मांगने जाने का। जिस में अर्जुन का पैताने बैठना और दुर्योधन का सिरहाने बैठने और फिर कृष्ण द्वारा अर्जुन को पहले देखे जाने और बतियाने का किस्सा बहुत सुना सुनाया जाता है। पर इस पूरे घटनाक्रम में एक घटना और घटी थी जो ज़्यादा महत्वपूर्ण थी पर बहुत कही सुनी नहीं जाती। लोक मर्यादा कहिए या कुछ और। बहरहाल हुआ यह कि दुर्योधन जाहिर है कि पहले ही से पहुंचे हुए थे। और अर्जुन बाद में आए। कृष्ण जैसा कि कहा जाता है कि सोए हुए थे। तो दुर्योधन ने ही अर्जुन के आने पर अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘आइए इंद्र पुत्र ! कहिए कैसे आना हुआ?’ अर्जुन ने अपमानित महसूस तो किया पर मौके की नज़ाकत देख चुप रहे। बात खत्म हो गई। पर सचमुच खत्म कहां हुई थी भला? फिर हुआ यह कि जब कृष्ण ने अर्जुन से बात खत्म की और दुर्योधन की तरफ़ मुखातिब हुए तो उन्हों ने दुर्योधन को संबोधित कर पूछा, ‘अब बताइए व्यास नंदन आप का क्या कहना है?’ कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन कह कर दुर्योधन को उस की ज़मीन बताई और अर्जुन के अपमान का प्रतिकार भी किया। दुर्योधन को यह एहसास भी करवा दिया कि अगर अर्जुन अपने पिता पांडु की संतान नहीं हैं तो श्रीमान दुर्योधन आप भी ऋषि व्यास के ही वंशज हैं, संतान हैं, शांतनु के नहीं। गरज यह कि दोनों ही एक तराजू में हैं। इस लिए इस मसले पर चुप ही रहिए। और दुर्योधन चुप रह गए थे। यह विवाद बहुत लंबा है और टेढा भी। शायद इसी लिए याद कीजिए कि जब बी.आर. चोपडा ने महाभारत बनाई तो उस में इस विवाद पर पानी डालने में राही मासूम रज़ा ने अदभुत चतुराई से काम लिया। उन्हों ने पाडव में किसी भी को वायु पुत्र, इंद्र पुत्र आदि नहीं संबोधित किया। उन्हों ने सब को ही कुंती पुत्र कह कर बडी खूबसूरती से काम चला दिया। और यह कोई अनूठा काम राही मासूम रज़ा ने ही नहीं किया। यह शालीनता हमारी परंपरा में भी रही है। जो शायद अब विस्मृत होने लगी है। अब हम असली मुद्दे पर आते हैं। आज की बात पर आते हैं।

नारायणदत्त तिवारी जैसा सदाशय और विनम्र राजनीतिज्ञ व्यक्ति बडी मुश्किल से मिलता है। कम से कम राजनीतिज्ञ तो हर्गिज़ नहीं। और वह भी वह राजनीतिज्ञ जो सत्ता का स्वाद बार-बार किसिम-किसिम से ले चुका हो। लेकिन वही तिवारी जी आज एक व्यर्थ के विवाद में पड गए हैं तो कोई उन के साथ खड़ा नहीं दीखता। न राजनीति में, न मीडिया में, न समाज में। अभी-अभी, बिलकुल अभी खुशवंत सिंह जैसे उदारमना और खुलेपन के हामीदार लेखक और पत्रकार ने भी अपने कालम में इस घटना को ले कर तिवारी जी पर लगभग तंज किया है। यह देश और समाज का दुर्भाग्य है कुछ और नहीं। राजनीतिज्ञों में सहिष्णुता अब लगभग विलुप्त ही है। लेकिन अटल विहारी वाजपेयी और नारायणदत्त तिवारी जैसे राजनीतिज्ञों में यह सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी हुई है। सर्वदा से। कम से कम मेरा अनुभव तो यही है। इसी का लाभ ले कर लोग उन्हें बदनाम करने की हद से भी गुज़ार ही देते हैं। नतीज़ा सामने है। तिवारी जी अब बदनामी से भी आगे आरोपों के भंवर में भी घिर गए हैं। जैसे सारे कानूनी और सामाजिक सवाल और नैतिकता, शुचिता आदि की ज़िम्मेदारी तिवारी जी पर ही डाल दी गई है। इस हद तक कि लोग अब उन का मजाक भी उडाने लग गए हैं। यह बहुत ही चिंताजनक और शर्मनाक बात है। क्या व्यक्तिगत जीवन की बातें इस तरह सडक पर ले आई जानी चाहिए? फिर तो समाज नष्ट हो जाएगा। और जो इसी तरह लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लग गए तो समाज और जीवन की तमाम व्यक्तिगत बातें कहां से कहां चली जाएंगी क्या इस बात का अंदाज़ा है किसी को?
सीवन जो उघाड़ने पर जो लोग आमादा हो ही जाएंगे तो हमारे बहुत सारे भगवान भी इन सब चीज़ों से बच नहीं पाएंगे। न ही आज के या बहुत से पुराने राजनीतिज्ञ और अधिकारी आदि भी। सवाल और जवाब इतने और इतने किसिम के हो जाएंगे कि समाज रहने लायक नहीं रह जाएगा। आज भी ऐसी और इस किसिम की बहुत सी बातें परदे में हो कर भी बाहर हैं। चर्चा होती है उन बातों की भी जब-तब लेकिन आफ़ द रिकार्ड। निदा फ़ाज़ली ने लिखा ही है कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। सब का डी.एन.ए. लिया ही जाने लगेगा तो न त्रेता युग के लोग बचेंगे, न द्वापर युग के। और यह तो खैर कलियुग है ही। आंच कौरव-पांडव पर भी आएगी और कि भगवान राम भी नहीं बचेंगे। न कोई गली बचेगी न कोई गांव या कोई नगर या कोई कालोनी, कि जहां ऐसी दास्तानें और तथ्य न मिल जाएं। बरास्ता विश्वामित्र-मेनका ही शकुंतला-दुष्यंत की कहानी हमारे सामने है। और ऐसी न जाने कितनी कहानियां हमारे इतिहास से ले कर वर्तमान तक फैली पड़ी हैं। यह और ऐसी कहानियां छुपती नहीं हैं लेकिन मुकुट की तरह सिर पर सजा कर घूमी भी नहीं जातीं। जैसे कि हमारी उज्जवला शर्मा जी और उन के सुपुत्र सर पर मुकुट सजा कर घूम रहे हैं। उज्जवला जी और उन के सुपुत्र तो अब कुछ बीते दिनों से यह कहानी लिए घूम रहे हैं पर हकीकत यह है कि यह कहानी रोहित शेखर के पैदा होते ही लोगों की जुबान पर आ गई थी। राजनीतिक हलकों से होती हुई यह कहानी प्रशासनिक हलकों और मीडिया में भी आई। पर सिर्फ़ चर्चा के स्तर पर। चुहुल के स्तर पर। ठीक वैसे ही जैसे कि अभी भी एक बहुत बडे अभिनेता का पिता अमरनाथ झा को बताया जाता रहा है, जैसे एक पूर्व प्रधानमंत्री का पिता राजा दिनेश सिंह को बताया जाता रहा है। जैसे जम्मू और कश्मीर के एक पूर्व मुख्यमंत्री का पिता जवाहरलाल नेहरु को बताया जाता रहा है। ग्वालियर में एक बंगाली परिवार के बच्चों को अटल बिहारी वाजपेयी का बताया जाता रहा है। विजया राजे सिंधिया तक का नाम लिया गया। लखनऊ में तो मंत्री रहीं एक मुस्लिम महिला जो अब स्वर्ग सिधार गई हैं अटल जी के लिए अविवाहित ही रह गईं। लोहिया के साथ भी ऐसे बहुतेरे किस्से संबंधों के हैं। नेहरु के किस्से एक नहीं अनेक हैं। लेडी डायना से लगायत तारकेश्वरी सिनहा तक के। महात्मा गांधी की भी एक लंबी सूची है। तमाम विदेशी औरतों से लगायत राजकुमारी अमृता कौर, जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती, सरोजनी नायडू, आभा तक तमाम नाम हैं। इंदिरा गांधी तक के रिश्ते नेहरु के पी.ए. रहे मथाई, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, दिनेश सिंह, बेज्ज़नेव, फ़ीदेल कास्त्रो आदि तक से बताए जाते रहे हैं। अमरीका के एक राष्ट्रपति ने तो उन्हें एक बार गोद में उठा ही लिया था। सोनिया गांधी के भी कई रिश्ते खबरों में तैरते रहे हैं। माधव राव सिंधिया से लगायत अरुण सिंह तक कई सारे नाम हैं। राजीव गांधी के भी तमाम औरतों से नाम जुडे हुए हैं। मार्ग्रेट अल्वा, सोनलमान सिंह, शैलजा, अरुण सिंह की पत्नी आदि बहुतेरे नाम हैं। संजय गांधी की सूची तो बहुत ही लंबी है। अंबिका सोनी से लगायत रुखसाना सुल्ताना तक के। प्रियंका गांधी का भी यही हाल है। शाहरुख खान तक से उन का नाम जुडा हुआ है। राहुल गांधी का भी नाम अछूता नहीं है। देशी-विदेशी लडकियों के नाम हैं। मुलायम सिंह यादव के साथ भी यह किस्सा रहा है। अब उन के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव को ही लीजिए। साधना गुप्ता जी से से उन का विवाह कब हुआ यह कोई नहीं जानता। पर प्रतीक पैदा कब हुए, यह बात बहुत लोग जानते हैं। और स्पष्ट है कि प्रतीक के पैदा होने के बहुत बाद मुलायम सिंह यादव ने उन को अपने साथ रखा। और वह भी पहली पत्नी के निधन के बाद ही। नहीं एक समय तो यही अखिलेश यादव इस मसले पर मुलायम से बगावत पर आमादा हो गए थे। लेकिन यह सब बातें सड़क पर फिर भी नहीं आईं। और मज़ा यह कि साधना जी ने भी पूरी शालीनता बनाए रखी। साध्वी उमा भारती तक नहीं बचीं। उमा भारती और गोविंदाचार्य का रिश्ता सब को मालूम है। यह दोनों विवाह तक के लिए तैयार थे। पर आर.एस.एस. बीच में आ गया। कई उद्योगपतियों और फ़िल्मी सितारों की बात भी जग जाहिर है। अभी नीरा राडिया और टाटा के प्रेम वार्तालाप का टेप आ ही चुका है। तमाम आई.ए.एस. अफ़सरों और तमाम राजनयिक भी ऐसे किस्सों में शुमार हैं। रोमेश भंडारी का स्त्री प्रेम भी हमेशा सुर्खियों में रहा है। कुछ नामी लेखकों-लेखिकाओं की भी बात सुनने को मिलती ही रहती है। लगभग सभी भाषाओं में। हिंदी में भी। खुशवंत सिंह अब तिवारी जी को ले कर चाहे जो लिखें-पढें पर उन के किस्से भी खूब हैं। कई तो उन्हों ने खुद बयान किए हैं। वैसे भी पत्रकारों में तो ऐसे संबंधों की जैसे बरसात है। बिलकुल फ़िल्मी लोगों वाला हाल है। फ़िल्म वालों की बात इस मामले में वैसे भी बहुत मशहूर है। सैकडों नहीं हज़ारो किस्से हैं। कुछ वैसे ही जैसे इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारो हैं ! वैसे चुंबन के लिए मशहूर एक अभिनेता का पिता महेश भट्ट को बताया जाता रहा है। और तो और महेश भट्ट की यातना देखिए कि वह खुद को भी हरामी कहते हैं। उन के पिता भी मशहूर निर्देशक विजय भट्ट हैं। पर चूंकि महेश भट्ट की मां मुस्लिम थीं सो वह चाह कर भी उन से शादी नहीं कर सके। दंगे-फ़साद की नौबत आ गई थी। अपनी इन सारी स्थितियों को ले कर महेश भट्ट ने एक बहुत खूबसूरत फ़िल्म ही बनाई है जन्म ! जिस के नायक कुमार गौरव हैं। पर महेश भट्ट या उन की मां कभी विजय भट्ट की छिछालेदर करने नहीं गईं। खामोशी से स्थितियों को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि प्रेम में जो आदर और गरिमा होती है, उसे अब तक निभा भी रहे हैं। बहुत दूर जाने की ज़रुरत नहीं है। फ़िल्म अभिनेत्री नीना गुप्ता ने विवाह नहीं किया है पर एक बेटी की मां हैं। नीना की इस बेटी के पिता मशहूर क्रिकेटर विवियन रिचर्ड हैं। यह सब लोग जानते हैं। नीना गुप्ता भी इस बात को स्वीकार करती हैं। पर वह कभी अपनी या विवियन रिचर्ड की छीछालेदर करने पर उतारु नहीं हुईं। न ही हको-हुकूक मांगने पर आमादा हुईं। फिर यह और ऐसी कहानियों और संबंधों की फ़ेहरिस्त अनंत है। क्या भूलूं, क्या याद करूं? वाली स्थिति है। वैसे भी अब ज़माना लिव-इन-रिलेशनशिप का आ गया है।
हां, जो आप के साथ कहीं छल-छंद हुआ हो तो बात और है। शोषण हुआ हो, आप के साथ कोई धोखा हुआ हो, झांसा दिया गया हो, आप नाबालिग हों तो भी बात समझ में आती है। पर अगर यह सब आप की अपनी सहमति से हुआ हो तो फिर? आप शादीशुदा भी हैं, बच्चे के पिता का नाम स्कूली प्रमाण-पत्रों में आप बी.पी.शर्मा जो आप के आधिकारिक पति रहे हैं, जिन से भी आप ने प्रेम विवाह ही किया था के बावजूद आप को कुछ लोग भडका देते हैं तो आप को याद आता है कि आप के बेटे का पिता तो फला व्यक्ति है । और यह बेटा आप के गर्भ में तब आया जब आप ने कुछ रातें दिल्ली स्थित उत्तर प्रदेश निवास में उस व्यक्ति के साथ हम-बिस्तर हो कर गुज़ारीं। आप यह बताना भूल जाती हैं कि उस व्यक्ति से आप के पहले ही से रागात्मक संबंध रहे हैं। यही नहीं और भी लोगों से आप के रागात्मक संबंध रहे हैं। आप यह भी नहीं बतातीं कि उस आदमी के आवंटित सरकारी बंगले में आप और आप के पिता रहने के लिए जगह मांगते हैं। और वह आदमी शराफ़त में शरण दे देता है। संबंधों में भी आप ही की पहल होती है। नारायणदत्त तिवारी जैसा व्यक्ति बलात्कार तो कर नहीं सकता। यह तो उन के विरोधी भी मानेंगे। हकीकत यह है कि एक समय राज्य मंत्री रहे शेर सिंह तुगलक लेन के एक बंगले में रहते थे। जब नारायणदत्त तिवारी उद्योग मंत्री बने तो उन्हें शेर सिंह का यही बंगला आवंटित हो गया। शेर सिंह और उज्वला शर्मा ने तिवारी जी से उस मकान में बने रहने की इच्छा जताई। तब उज्वला का अपने पति से विवाद शुरु हो गया था। शेर सिंह ने तिवारी जी से यह भी बताया तो तिवारी जी मान गए। यह उन की सहिष्णुता थी। अब उन की इस कृपा पर आप ने उन से खुद संबंध भी बना लिए और उन की सहृदयता का इतना बेजा लाभ लिया। तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा जब तक नरसिंहा राव के हित नारायणदत्त तिवारी से नहीं टकराए। तिवारी जी ने अर्जुन सिंह के साथ मिल कर तिवारी कांग्रेस बना ली। तब। और जब नरसिंहा राव और उन की मंडली ने आप को अपने स्वार्थ में भड़काया तो आप भड़क गईं। स्वार्थ में अंधी हो गईं। तिवारी जी को ब्लैक-मेल करने पर लग गईं।
एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। अब उन का यहां नाम क्या लूं? पर जब रोहित शेखर पैदा नहीं हुए थे उस के पहले ही उन्हों ने किसी तरह आप की तिवारी जी से बात-चीत को टेप कर लिया। कहते हैं कि एक समय उन पत्रकार महोदय ने भी आप के मसले पर तिवारी जी को बहुत तंग किया। ब्लैक-मेल किया। पर तिवारी जी ने किसी तरह उस मसले को संभाला। अपनी और आप की इज़्ज़त सड़क पर नहीं आने दी। लेकिन नरसिंहा राव और उन की मंडली आप पर इतनी हावी हो गई कि तिवारी जी दिल्ली से चले लखनऊ। एयरपोर्ट तक आए। पर आप ने जहाज पर चढ़ने नहीं दिया। पता चला बाई रोड आप उन को ले कर चलीं लखनऊ के लिए। बीच में गजरौला रुक गईं। तिवारी जी खबर बन गए। खबर आई कि राव सरकार ने तिवारी जी को गायब करवा दिया। यह आप की नरसिंहा राव से दुरभि-संधि थी। दूसरे दिन खबर आ गई कि वह आप के साथ गजरौला में थे।
माफ़ कीजिए उज्वला जी, आप किसी से अपने बेटे का पितृत्व भी मांगेंगी और उस की पगडी भी उछालेंगी? यह दोनों काम एक साथ तो हो नहीं सकता। लेकिन जैसे इंतिहा यही भर नहीं थी। तिवारी जी की पत्नी सुशीला जी को भी आप ने बार-बार अपमानित किया। बांझ तक कहने से नहीं चूकीं। आप को पता ही रहा होगा कि सुशीला जी कितनी लोकप्रिय डाक्टर थीं। बतौर गाइनाकालोजिस्ट उन्हों ने कितनी ही माताओं और शिशुओं को जीवन दिया है। यह आप क्या जानें भला? रही बात उन के मातृत्व की तो यह तो प्रकृति की बात है। ठीक वैसे ही जैसे आप को आप के पति बी.पी. शर्मा मां बनने का सुख नहीं दे पाए और आप को मां बनने के लिए तिवारी जी की मदद लेनी पड़ी।
खैर, हद तो तब हो गई कि जब आप एक बार लखनऊ पधारीं। तिवारी जी की पत्नी सुशीला जी का निधन हुआ था। तेरही का कार्यक्रम चल रहा था। आप भरी सभा में हंगामा काटने लगीं। कि पूजा में तिवारी जी के बगल में उन के साथ-साथ आप भी बैठेंगी। बतौर पत्नी। और पूजा करेंगी। अब इस का क्या औचित्य था भला? सिवाय तिवारी जी को बदनाम करने, उन पर लांछन लगाने, उन को अपमानित और प्रताणित करने के अलावा और भी कोई मकसद हो सकता था क्या? क्या तो आप अपना हक चाहती थीं? ऐसे और इस तरह हक मिलता है भला? कि एक आदमी अपनी पत्नी का श्राद्ध करने में लगा हो और आप कहें कि पूजा में बतौर पत्नी हम भी साथ में बैठेंगे !
उज्वला जी, आप से यह पूछते हुए थोड़ी झिझक होती है। फिर भी पूछ रहा हूं कि क्या आप ने नारायणदत्त तिवारी नाम के व्यक्ति से सचमुच कभी प्रेम किया भी था? या सिर्फ़ देह जी थी, स्वार्थ ही जिया था? सच मानिए अगर आप ने एक क्षण भी प्रेम किया होता तिवारी जी से तो तिवारी जी के साथ यह सारी नौटंकी तो हर्गिज़ नहीं करतीं जो आप कर रही हैं। जो लोगों के उकसावे पर आप कर रही हैं। पहले नरसिंहा राव और उन की मंडली की शह थी आप को। अब हरीश रावत और अहमद पटेल जैसे लोगों की शह पर आप तिवारी जी की इज़्ज़त के साथ खेल रही हैं। बताइए कि आप कहती हैं और ताल ठोंक कर कहती हैं कि आप तिवारी जी से प्रेम करती थीं। और जब डाक्टरों की टीम के साथ दल-बल ले कर आप तिवारी जी के घर पहुंचती हैं तो इतना सब हो जाने के बाद भी सदाशयतावश आप और आप के बेटे को भी जलपान के लिए तिवारी जी आग्रह करते हैं। आप मां बेटे जलपान तो नहीं ही लेते, बाहर आ कर मीडिया को बयान देते हैं और पूरी बेशर्मी से देते हैं कि जलपान इस लिए नहीं लिया कि उस में जहर था। बताइए टीम के बाकी लोगों ने भी जलपान किया। उन के जलपान में जहर नहीं था, और आप दोनों के जलपान में जहर था? नहीं करना था जलपान तो नहीं करतीं पर यह बयान भी ज़रुरी था?
क्या इस को ही प्रेम कहते हैं?
लगभग इसी पृष्ठभूमि पर गौरा पंत शिवानी की एक कहानी है करिए छिमा। उस कहानी का नायक श्रीधर भी उत्तराखंड का है। और राजनीतिक है। इस कहानी में पिरभावती की बहन हीरावती का जो चरित्र बुना है शिवानी ने वह अदभुत है। अहर्निष संघर्ष, प्रेम और त्याग की ऐसी दुर्लभ प्रतिमूर्ति हिंदी कहानी में क्या दुनिया की किसी भी कहानी में दुर्लभ है। जाने क्यों आलोचकों ने इस कहानी का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था से कहीं कमतर कहानी नहीं है, यह करिए छिमा। बल्कि उस से आगे की कहानी है। कि कहीं प्रेमी की पहचान न हो जाए इस लिए वह अपने नवजात बेटे की हत्या कर बैठती है। और उस का यह करुण गायन: ‘कइया नी कइया, करिया नी करिया करिए छिमा, छिमा मेरे परभू !’ दिल दहला देता है। वस्तुत: कहानी का नायक कहिए या प्रतिनायक श्रीधर उस का प्रेमी भी नहीं है, बल्कि श्रीधर ने तो उसे चरित्रहीनता का आरोप लगा कर गांव से बाहर करवा देता है, पंचायत के एक फ़ैसले से। पर बाद के दिनों में यही श्रीधर एक दिन जंगल से गुज़र रहा होता है कि ज़ोर की बर्फ़बारी शुरु हो जाती है। विवशता में उसे गांव से बाहर जंगल में एक छोटा सा घर बना कर रह रही हीरावती के घर में शरण लेनी पड्ती है। बर्फ़बारी से सारे रास्ते बंद हैं। यहां तक कि हीरावती के घर का दरवाज़ा भी बर्फ़ से बंद हो जाता है। दोनों अकेले ही घर में होते हैं। और कई दिनों तक। बर्फ़ जब छंटती है तब श्रीधर गांव वापस लौटता है। लेकिन इस बीच वह हीरावती के साथ लगातार हमविस्तर हो चुका होता है। उसे पता नहीं चलता पर हीरावती गर्भवती हो जाती है। श्रीधर गांव से चला जाता है। इधर चरित्रहीनता और गर्भ दोनों का बोझ लिए हीरावती मारी-मारी फिरती रहती है। लगभग विक्षिप्त। लेकिन वह किस का गर्भ ले कर घूम रही है, किसी को नहीं बताती। बाद के दिनों में जब उसे बेटा होता है तो वह उसे पैदा होते ही बर्फ़ की नदी में डुबो कर मार डालती है। इस ज़ुर्म में वह जेल भी जाती है। वर्षों बाद जब जेल की कैद से छूट कर आती है, तब तक श्रीधर बड़ा राजनीतिज्ञ हो कर सत्ता के शीर्ष पर आ चुका होता है। हीरावती उस से मिलने जाती है। बडी मुश्किल से वह उस से मिल पाती है। श्रीधर उस से बड़ी नफ़रत से देखता है। और पूछता है कि, ‘तुम ने अपने ही बेटे की हत्या कर दी?’ तो हीरावती कहती है, ‘तो क्या करती भला? आंख, नाक, शकल सब कुछ तो तेरा ही था। सब जान जाते तब? कि तेरा ही है तब?’ श्रीधर ठगा सा रह जाता है, हीरावती की यह बात सुन कर। लेकिन हीरावती यह कर चल देती है। अपने लिए कुछ मांगती या कहती भी नहीं है।
तो एक वह शिवानी की हीरावती है और अब कभी नरसिंहा राव और अब हरीश रावत, अहमद पटेल आदि द्वारा भड़काई गई उज्वला शर्मा हैं। उज्वला प्यार करना बताती हैं और हीरावती तो खैर कुछ जताना या पाना ही नहीं चाहती। न प्यार न अधिकार।
और यह उज्वला जी?
बताइए कि तिवारी जी अपनी पत्नी के श्राद्ध में हैं और उज्वला जी उन के बगल में बैठ कर बतौर पत्नी सारी पूजा करवाने के हठ में पड़ जाती हैं, हंगामा मचा देती हैं। अब कहा जा सकता है कि कहानी और हकीकत में दूरी होती है। हम भी मानते हैं। पर यह भी जानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है। और फिर शिवानी की इस कहानी का ज़िक्र यहां इस लिए भी किया कि जब यह कहानी छपी थी तो कहानी के नायक श्रीधर में उत्तराखंड के कुछ राजनीतिज्ञों की छवि इस कहानी के दर्पण में भी देखी गई थी। उस में नारायणदत्त तिवारी का भी एक नाम था।
ब्लड टेस्ट के मार्फ़त डी.एन.ए. रिपोर्ट का नतीज़ा अभी आना बाकी है। जाने क्या रिपोर्ट आएगी। लेकिन जो सामाजिक दर्पण की रिपोर्ट है, उस में तिवारी जी को रोहित शेखर का पिता मान लिया गया है। बहुत पहले से। इस बारे में मुकदमा दायर होने के पहले से। बावजूद इस सब के तिवारी जी की जो फ़ज़ीहत उज्वला शर्मा और उन के बेटे ने की है, और अपनी फ़ज़ीहत की चिंता किए बिना की है, वह एक शकुनि चाल के सिवा कुछ नहीं है। यह एक तरह का लाक्षागृह ही है तिवारी जी के लिए। और मुझे जाने क्यों सब कुछ के बावजूद बार-बार लगता है कि नारायणदत्त तिवारी इस लाक्षागृह से सही सलामत निकल आएंगे। निकल आएंगे ही। इसे आप उन के प्रति मेरा आदर भाव मान लें या कुछ और। यह आप पर मुन:सर है।
इस लिए भी कि तिवारी जी ने जाने-अनजाने असंख्य लोगों का उपकार किया है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि मेरा भी कई बार उन्हों ने उपकार किया है। बिना किसी आग्रह या निवेदन के। मुझे याद है कि वर्ष १९९८ में मुलायम सिंह यादव के चुनाव कवरेज में संभल जाते समय एक एक्सीडेंट में मैं गंभीर रुप से घायल हो गया था। हमारे साथी जयप्रकाश शाही इसी दुर्घटना में हम सब से बिछड़ गए थे। तिवारी जी तब नैनीताल से चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव के बाद वह मुझ से मिलने लखनऊ के मेडिकल कालेज में आए थे, जहां मैं इलाज के लिए भर्ती था। वह बड़ी देर तक मेरा हाथ अपने हाथ में लिए बैठे रहे थे। मेरी तकलीफ देख कर वह बीच-बीच में रोते रहे थे। जब वह चले गए तो वहां उपस्थित कुछ लोगों ने तंज़ किया कि वह मेरे लिए नहीं, अपनी हार के लिए रो रहे थे। मुझे चुनाव परिणाम की भी जानकारी नहीं थी। तो भी मैं ने उन लोगों से सिर्फ़ इतना भर कहा कि आप लोग चुप रहिए। आप लोग तिवारी जी को अभी नहीं जानते। बताइए भला कि अमूमन लोग जब चुनाव हार जाते हैं तब कुछ दिनों ही के लिए सही सार्वजनिक जीवन से छुट्टी ले लेते हैं। लेकिन तिवारी जी नैनीताल से चल कर मुझे देखने आए थे। बहुत सारे राजनीतिज्ञ तब मुझे देखने आए थे, अटल विहारी वाजपेयी, कल्याण सिंह से लगायत मुलायम सिंह यादव और जगदंबिका पाल तक अनेक राजनीतिज्ञ, अफ़सर, पत्रकार, मित्र, परिवारीजन आदि। पर तिवारी जी की वह आत्मीयता और भाऊकता मेरी धरोहर है। ऐसी अनेक घटनाएं हैं तिवारी जी को ले कर। फ़रवरी, १९८५ में मैं लखनऊ आया था स्वतंत्र भारत में रिपोर्टर हो कर। दो महीने बाद ही अप्रैल, १९८५ में मुझे पीलिया हो गया। मेरे पास छुट्टियां भी नहीं थीं। एक महीने की छुट्टी लेनी ही थी। ली भी। कहीं गया नहीं। तिवारी जी तब मुख्यमंत्री थे। उन्हें मेरी बीमारी का शायद जयप्रकाश शाही से पता चला। उन्हों ने बिना कुछ कहे-सुने मुझे विवेकाधीन कोष से ढाई हज़ार रुपए का चेक भिजवाया। तब मेरा वेतन ११०० रुपए था। एक महीने लीव विदाऊट पे हो गया था। कहीं से पैसे का कोई जुगाड़ नहीं था। तिवारी जी ने यह दिक्कत बिना कहे समझी। और चेक भिजवा दिया। जब यह चेक ले कर एक प्रशासनिक अधिकारी मुझ से मिले तो मैं ने उन से पूछा कि यह कैसा चेक है? तो उन्हों ने बताया कि माननीय मुख्यमंत्री जी के आदेश पर विवेकाधीन कोष का चेक है आप के इलाज के लिए। तब तक मैं विवेकाधीन कोष के बारे में नहीं जानता था। बाद में तो यह विवेकाधीन कोष बहुत बदनाम हुआ पत्रकारों के बीच। मुलायम राज में लोगों ने दस-दस लाख रुपए फ़र्जी स्कूलों के नाम पर बार-बार लिए। खैर बाद में मिलने पर मैं ने तिवारी जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की तो वह लजा गए। बोले कुछ नहीं। बस मुसकुरा कर रह गए।
ऐसे जैसे कुछ उन्हों ने किया ही न हो। यह उन की सहृदयता थी, सहिष्णुता थी। ऐसे अनेक अवसर, अनेक घटनाएं हैं, जो उन की सदाशयता और सहिष्णुता की कहानी से रंगे पड़े हैं। मेरे ही नहीं अनेक के। बहुतेरे पत्रकार लापरवाही में मकान का किराया नहीं जमा कर पाते तो लंबा बकाया हो जाता या फिर बिजली के बिल का लंबा बकाया हो जाता तो तिवारी जी बडी शालीनता से यह व्यवस्था करवा देते। तब पत्रकारों का वेतन बहुत कम होता था और कि आज के दिनों जैसी दलाली भी अधिकतर पत्रकार नहीं करते थे। उन दिनों वह मुख्यमंत्री थे। सड़क पर कभी-कभार हम या हमारे जैसे लोग पैदल या स्कूटर पर भी दिख जाते तो वह काफिला रोक कर मिलते। और हाल-चाल पूछ कर ही गुज़रते। और ऐसा वह बार-बार करते। बाद के दिनों में जब वह उद्योग मंत्री हुए तो बजाज स्कूटर की तब बुकिंग चलती थी। लखनऊ के जिस भी पत्रकार ने उन को चिट्ठी लिखी उस को स्कूटर का आवंटन पत्र आ गया। कई लोगों ने इस का दुरुपयोग भी किया। बार-बार आवंटन मंगाया और स्कूटर ब्लैक किया। धंधा सा बना लिया। लेकिन तिवारी जी की सदाशयता नहीं चूकी।
एक समय वह प्रतिपक्ष में थे। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री। भाजपा के समर्थन से। आडवाणी जी की रथयात्रा और फिर गिरफ़्तारी के बाद भाजपा ने केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया साथ ही उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार से भी। राजीव गांधी से समर्थन के लिए मुलायम मिले। राजीव ने उन का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए उन से कहा कि लखनऊ में वह तिवारी जी से भी औपचारिक रुप से ज़रुर मिल लें। तिवारी जी समर्थन के मूड में नहीं थे, यह बात मुलायम जानते थे। सो वह राजीव से सीधे मिले। लेकिन राजीव के कहने पर मुलायम को लखनऊ में तिवारी जी के घर औपचारिक रुप से जाना पड़ा। लेकिन वह खड़े-खड़े गए और खड़े-खड़े ही लौट आए। घर में बैठे भी नहीं। तिवारी जी बहुत अनुनय-विनय करते रहे। अंतत: तिवारी जी ने मुलायम की पहलवानी छवि के मद्देनज़र कहा दूध तो पी लीजिए। संयोग से उस दिन नागपंचमी भी थी। मुलायम समझ गए तिवारी जी के इस तंज़ को। बोले, ‘अब दूध विधानसभा में ही पिलाना।’ और चले गए।
सचमुच मुलायम को विधानसभा में तब का दूध पिलाना कांग्रेस आज तक भुगत रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस तब जो साफ हुई फिर खड़ी हो नहीं पाई। तिवारी जी असल में दूरदर्शी राजनीतिज्ञ हैं। योजनाकार भी विरल हैं। तमाम-तमाम योजनाएं और परियोजनाएं उन्हों ने न सिर्फ़ बनाई हैं, उन्हें साकार भी किया है। मुझे याद है उत्तर प्रदेश में वर्ड बैंक की मदद से रोड कांग्रेस उन्हों ने ही शुरु किया था। नोएडा जैसी तमाम योजनाएं उन्हीं की बनाई योजनाएं है। ऐसी तमाम योजनाओं को उन्हों ने फलीभूत किया है। उत्तर प्रदेश में भी और उत्तराखंड में भी। पर लोग अब उन के इन सारे गुणों को, इन पक्षों को भूल गए हैं। उन की छवि एक औरतबाज़ राजनीतिज्ञ की बना दी गई है। इस से तकलीफ़ होती है। अरे, आप ही लोग बताएं कि ऐसा कौन सा पुरुष है जिसे औरतों से गुरेज हो भला? और ऐसा कौन सा राजनीतिज्ञ है जिस की सूची में दस-पांच औरतों का नाम न जुडा हो? कल्याण सिंह तो कुसुम राय के चक्कर में बरबाद हो गए। तो क्या कल्याण सिंह के पास सिर्फ़ कुसुम राय भर ही हैं या थीं? और कि कुसुम राय के नाम पर कल्याण सिंह और भाजपा दोनों को ही किनारे लगवाने वाले राजनाथ सिंह के नाम के साथ क्या औरतों की सूची नत्थी नहीं है? बात तो बस फिसल गए तो हर गंगे की ही है।
अब बात उठती है नैतिक-अनैतिक की। लोहिया कहते थे कि अगर ज़ोर-ज़बरदस्ती न हो, शोषण न हो, आपसी सहमति हो तो कोई संबंध अनैतिक नहीं होता। और लोहिया सही कहते थे। तिवारी जी ने उज्वला शर्मा के साथ न कोई ज़बरदस्ती की, न शोषण किया। सारी बात आपसी सहमति की थी। उज्वला जी नादान नहीं थीं। गरीब मजलूम नहीं थीं। एक मंत्री की बेटी थीं, विवाहित थीं। उन को कोई हक नहीं कि इस तरह की बात करें। हां जो शेखर के पैदा होते ही जो उन्हों ने यह आवाज़ उठाई होतीं तो उन की बात में दम होता। अच्छा कितने लोग यह बात जानते हैं कि तलाक के बाद अब भी वह अपने पति बी.पी. शर्मा के साथ ही नई दिल्ली की डिफ़ेंस कालोनी में रहती हैं। फ़र्क बस इतना है कि दोनों के फ़्लैट दिखावे के लिए ऊपर-नीचे के हैं। और फिर इस पूरी कवायद में बी.पी. शर्मा का पक्ष नदारद है।
तो क्या उज्वला शर्मा या रोहित शर्मा ने यह सारी जंग नारायणदत्त तिवारी की संपत्ति प्राप्त करने के लिए की है? यह एक अनुत्तरित सवाल है।
इस लिए भी कि नारायणदत्त तिवारी कोई ज़मीदार नहीं रहे हैं। खांटी समाजवादी स्वभाव के हैं और रहे हैं। एक औरतों वाले दाग को छोड दीजिए तो तिवारी जी पर कोई ऐसा-वैसा दाग नहीं है। तब जब कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के वह एक नहीं चार बार मुख्यमंत्री रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे हैं। केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री, वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री आदि कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। नैनीताल की जनता ने १९९१ में जो उन्हें विजयी बनाया होता तो तय मानिए वह देश के प्रधान मंत्री भी हुए ही हुए होते। और शायद देश की दशा और दिशा कुछ और ही होती। खैर अभी तक भूल कर भी उन पर भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोप नहीं लगे हैं। न ही सचमुच उन्हों ने दाएं बाएं से पैसा कमाया है। अभी भी वह सरकारी मकान में रहते हैं। जो बतौर पूर्व मुख्य मंत्री उन्हें औपचारिक रुप से मिला हुआ है। उन के छोटे भाई अभी भी लखनऊ में स्कूटर पर चलते दिख जाते हैं। तो तिवारी जी के पास अकूत संपत्ति तो छोड़िए मामूली संपत्ति भी नहीं है। नारायणदत्त तिवारी कोई मुलायम सिंह यादव या मायावती परंपरा के मुख्यमंत्री भी नहीं रहे। न ही ए. राजा आदि की परंपरा के केंद्रीय मंत्री। तो उन के पास पैतृक संपत्ति के सिवाय कोई अतिरिक्त संपत्ति मेरी जानकारी में तो नहीं है। किसी के पास हो इस की जानकारी तो ज़रुर बताए। तिवारी जो तो अब की चुनाव में अपने भतीजे मनीष तिवारी तक को जितवा नहीं पाए। अभी सोचिए कि यही उज्वला शर्मा का पाला अगर प्रमोद महाजन, मुलायम या अमरमणि त्रिपाठी टाइप किसी राजनीतिज्ञ से पडा होता तब परिदृष्य क्या होता भला?
तो तिवारी जी की भलमनसाहत और उन की सहिष्णुता का, उन के सहृदय होने का इतना लाभ तो मत लीजिए उज्वला जी और रोहित शेखर जी। उन के शिष्ट और सभ्य होने का इम्तहान-दर-इम्तहान लेना ठीक नहीं है। कि लोग उन का मजाक उड़ाने लग जाएं। जानिए कि नारायणदत्त तिवारी जैसे राजनीतिज्ञ बड़े सौभाग्य से किसी समाज और देश को मिलते हैं। वह हमारी साझी धरोहर हैं। उन्हें सम्मान और उन की गरिमा देना अब से ही सही सीखिए उज्वला जी और रोहित जी ! यह आप के हित में भी है और समाज के भी हित में। हो सके तो यह मामला मिल बैठ कर सुलटा लीजिए। तिवारी जी की टोपी उछाल कर नहीं। फ़िल्म की ही जो चर्चा एक बार फिर करें तो एक फ़िल्म है ‘एकलव्य’। राजस्थानी पृष्ठभूमि पर आधारित इस फ़िल्म में एक रजवाड़े की कहानी में अमिताभ बच्चन एक राज परिवार में नौकर हैं। पर राजकुमार के पिता भी हो जाते हैं। फ़िल्म की कहानी तमाम उठा-पटक और ह्त्या दर हत्या में घूमती है। पर आखिर में राजकुमार बने सैफ़ अली खान उन्हें पूरे सम्मान से सार्वजनिक रुप से पिता कुबूल करते हैं, आप की तरह अपमान दर अपमान की कई इबारतें लिख कर नहीं। किसी को पिता कुबूल करना ही है तो उसे पिता जैसा सम्मान दे कर कुबूल कीजिए। पर आप लोग तो अपमानित करने पर तुले हैं। खैर।
सोचिए उज्वला जी कि अगर तिवारी जी भी आप की तरह आप की ईटें उखाडने लग जाएंगे तो आप क्या कर लेंगी? अभी तो वह शालीनतावश अपने खून का सैंपल देने से बचते रहे हैं, जो अब दे भी दिया है। लेकिन कहीं वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देने पर आ जाते या आ ही जाएं तो आप का क्या होगा? अदालती धूर्तई तो यह कहती है कि तिवारी जी भी सवाल खड़े कर दें कि क्या आप शेर सिंह की बेटी हैं भी कि नहीं? आप के पति बी.पी. शर्मा भी अपने पिता के हैं कि नहीं। आदि-आदि। और जब ईंट खुदने ही लगेगी हर किसी की तो कहीं न कही बहुत नहीं तो कुछ लोग तो ज़रुर ही व्यास नंदन की राह पर आ जाएंगे। फिर क्या होगा इस समाज और इस समाज की शालीनता का? तब तो और जब आप का शोषण न हुआ हो, आप के साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती-बलात्कार न हुआ हो।
मेरा मानना है कि इस पूरे मामले को इस दर्पण में भी देखा जाना चाहिए। एकतरफ़ा तिवारी जी को दोषी बता देना ठीक नहीं है। वह चाहे समाज दोषी ठहराए या कोई अदालत। यह व्यक्तिगत मामला है, इसे व्यक्तिगत ही रहने देना चाहिए। इस लिए भी कि नारायणदत्त तिवारी कोई बलात्कारी नहीं हैं। एक सभ्य और शिष्ट व्यक्ति हैं। उन को उन का सम्मान दिया जाना चाहिए। जिस के कि वह हकदार हैं। ध्यान रखिए कि तिवारी जी हमारी साझी धरोहर हैं। राष्ट्रपति चुनाव के शोर में तिवारी जी का यह पक्ष भी बहुत ज़रुरी है। इस लिए भी कि, ‘पूछा कली से कुछ कुंवारपन की सुनाओ, हज़ार संभली खुशबू बिखर जाती है।’ आमीन !
दयानंद पांडेय

दयानंद पाण्डेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है


तिवारी नहीं हैं बलात्कारी

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