"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

"कुछ शब्दचित्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


किसे अच्छी नहीं लगती!
-0-0-0-
(१)
सोने की चमक
चांदी की दमक
सिक्कों की खनक
किसे अच्छी नहीं लगती
--
(२)
खादी की ललक
श्यामल अलक
कुर्सी की झलक
किसे अच्छी नहीं लगती
--
(३)
अपनी मैया
चैन की शैया
सजी हुई नैया
किसे अच्छी नहीं लगती
--
(४)
घर में खुशहाली
धनतेरस और दिवाली
शाम मतवाली
किसे अच्छी नही लगती
--
(५)
सूरज की लाली
चाय की प्याली
सजी हुई घरवाली
किसे अच्छी नहीं लगती

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

"दोहे-नेता का श्रृंगार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अगवाड़ा भी मस्त है, पिछवाड़ा भी मस्त।
अपने नेता ने किये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।१।
--
जोड़-तोड़ के अंक से, चलती है सरकार।
मक्कारी-निर्लज्जता, नेता का श्रृंगार।२।
--
तन-मन में तो काम है, जिह्वा पर हरिनाम।
नैतिकता का शब्द तो, हुआ आज गुमनाम ।३।
--
सपनों की सुन्दर फसल, अरमानों का बीज।
कल्पनाओं पर हो रही, मन में कितनी खीझ।४।
--
किसका तगड़ा कमल है, किसका तगड़ा हाथ।
अपने ढंग से ठेलते, अपनी-अपनी बात।५।
--
अपनी रोटी सेंकते, राजनीति के रंक।
कैसे निर्मल नीर को, दे पायेगी पंक।६।
--
कहता जाओ हाट को, छोड़ो सारे काज।
अब कुछ सस्ती हो गयी, लेकर आओ प्याज।७।
--
मत पाने के वास्ते, होने लगे जुगाड़।
बहलाने फिर आ गये, मुद्दों की ले आड़।८।
--
तन तो बूढ़ा हो गया, मन है अभी जवान।
सत्तर के ही बाद में, मिलता उच्च मचान।९।
--
क्षीण हुआ पौरुष मगर, वाणी हुई बलिष्ठ।
सीधी-सच्ची बात को, समझा नहीं वरिष्ठ।१०।
--
खा-पी करके हो गया, ये तगड़ा मुस्तण्ड।
अब जन-गण को चाहिए, देना इसको दण्ड।११।

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

"रौशनी की हम कतारें ला रहे हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अब धरा पर रह न जाये तम कहीं,
रौशनी की हम कतारें ला रहे हैं।
इस दिवाली पर दियों के रूप में,
चाँद-सूरज और सितारे आ रहे हैं।।

दीपकों की बातियों को तेल का अवलेह दो,
जगमगाने के लिए भरपूर इनको नेह दो।
चहकती दीपावली हर द्वार पर हों
महकती लड़ियाँ सजीं दीवार पर हों।
शारदा-लक्ष्मी-गजानन देव को,
स्वच्छ-सुन्दर नीड़ ज्यादा भा रहे हैं।

धूप-चन्दन, दीप और अनुराग से,
भक्ति के रँग में रंगे शुभराग से,
देवगण की नित्य होनी चाहिए आराधना,
वन्दना से ही सफल होगी हमारी साधना,
हे प्रभो! आकाश को निर्मल करो,
दुःख के बादल घनेरे छा रहे हैं।

कर्तव्य की करता न कोई होड़ है,
अब मची अधिकार की ही दौड़ है।
सभ्यता का भाव बौना हो गया.
आवरण कितना घिनौना हो गया।
संक्रमण के इस भयानक दौर में,
दम्भ-लालच आदमी को खा रहे हैं।

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

"दोहे-उलझे हुए सवाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेमौसम की आँधियाँ, दिखा रही औकात।
कैसे डाली पर टिकें, मुरझाये से पात।।
--
झूम-झूम लहरा रहे, हरे-भरे सब पात।
संग-साथियों से करें, अपने मन की बात।।
--
बचपन होता है सरल, गरल बुढ़ापा होय।
मीठी गोली छोड़ कर, अब खा रहे गिलोय।।
--
आगे ही कुछ केश हैं, पीछे गंजी चाँद।
समयचक्र के केश को, आगे जाकर बाँध।।
--
जीवन एक पहाड़ है, कहीं चढ़ाई-ढाल।
परेशान करते बहुत, उलझे हुए सवाल।।

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

"दोहे-प्रीत मुक्त आभास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रेम शब्द में निहित है, दुनियाभर का सार।
ढाई आखर प्यार का, समझो मत व्यापार।१।
--
प्यार न बन्धन में बँधे, माने नहीं रिवाज।
प्रीत मुक्त आभास है, चाहत की परवाज।२।
--
दिल में सख्त पहाड़ के, पानी का है सोत।
कोने में दिल के कहीं, जलती इसकी जोत।३।
--
प्यार छलकता जाम है, खिलता हुआ पलाश।
चाहे जितना भी पियो, बुझती कभी न प्यास।४।
--
प्यार नहीं है वासना, ये है पूजा-जाप।
मक्कारों के वास्ते, प्यार एक अभिशाप।५।
--
बात-चीत से शीघ्र ही, मन की खाई पाट।
टूटा दिल जुड़ता नहीं, पड़ जाती है गाँठ।६।

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

"दोहे-अहोईअष्टमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज अहोई-अष्टमी, दिन है कितना खास।
जिसमें पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास।।

दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुत, जननी करती भेद।।

पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।।

बेटा-बेटी के लिए, हों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार से, पार लगाओ नाव।।

एक पर्व ऐसा रचो, जो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ में, करो स्वयं पर गर्व।।

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

"भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में।।

दया के द्वार पर, बैठे हुए हैं लोभ के पहरे, 
मिटी सम्वेदना सारी, मनुज के स्रोत है बहरे, 
सियासत के भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

जो सदियों से नही सी पाये, अपने चाकदामन को, 
छुरा ले चल पड़े हैं हाथ वो, अब काटने तन को, 
वो रहते भव्य भवनों में, कभी थे जो विराने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

युवक मजबूर होकर खींचते हैं रात-दिन रिक्शा, 
मगर कुत्ते और बिल्ले कर रहें हैं दूध की रक्षा, 
श्रमिक का हो रहा शोषण, धनिक के कारखाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।
You might also like:

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

"दोहे-फेसबुक और ब्लॉगिंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

फेसबुक्क पर आ गये, अब तो सारे मित्र।
हिन्दी ब्लॉगिंग की हुई, हालत बहुत विचित्र।।

लगा रहे हैं सब यहाँ, अपने मन के चित्र।
अच्छे-अच्छों का हुआ, दूषित यहाँ चरित्र।।

बेगाने भी कर रहे, अपनेपन से बात।
अपने-अपने ढंग से, मचा रहे उत्पात।।

लेकिन ब्लॉगिंग में नहीं, फेसबुकी आनन्द।
बतियाने के रास्ते, वहाँ सभी हैं बन्द।।

लिखते ही पाओ यहाँ, टिप्पणियाँ तत्काल।
टिप्पणियों को तरसते, ब्लॉग हुए बेहाल।।
--
ब्लॉक न होता है कभी, ब्लॉगिंग का संसार।
धैर्य और गम्भीरता, ब्लॉगिंग का आधार।।

ब्लगिंग देता वो मज़ा, जैसा दे सत्संग।
यहाँ डोर मजबूत है, ऊँची उड़े पतंग।।

इन्द्रधनुष से हैं यहाँ, प्यारे-प्यारे रंग।
ब्लॉगिंग में चलते नहीं, नंगे और निहंग।।

लेख और रचनाओं को, गूगल रहा सहेज।
समझदार करते नहीं, ब्ल़गिंग से परहेज।।

भले चलाओ फेसबुक, ओ ब्लॉगिंग के सन्त।
मगर ब्लॉग का क्षेत्र वो, जिसका आदि न अन्त।।

पहले लिक्खो ब्लॉग में, रचनाएँ-आलेख।
ब्लॉगिंग के पश्चात ही, फेसबुक्क को देख।।

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

"दिल की आग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सवाल पर सवाल हैं, कुछ नहीं जवाब है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

गीत भी डरे हुए, ताल-लय उदास हैं.
पात भी झरे हुए, शेष चन्द श्वास हैं,
दो नयन में पल रहा, नग़मग़ी सा ख्वाब है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

ज़िन्दगी है इक सफर, पथ नहीं सरल यहाँ,
मंजिलों को खोजता, पथिक यहाँ-कभी वहाँ,
रंग भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु नहीं फाग है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

बाट जोहती रहीं, डोलियाँ सजी हुई,
हाथ की हथेलियों में, मेंहदी रची हुई,
हैं सिंगार साथ में, पर नहीं सुहाग है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

इस अँधेरी रात में, जुगनुओं की भीड़ है,
अजनबी तलाशता, सिर्फ एक नीड़ है,
रौशनी के वास्ते, जल रहा च़िराग है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

"करवाचौथ-चार दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे माता-पिता जी, रहते मेरे साथ।
मेरे सिर पर सदा ही, रहता उनका हाथ।१।
माता जी सिखला रही, बहुओं को सब ढंग।
होते हर त्यौहार के, अपने-अपने रंग।२।
करवा पूजन की कथा, माता रहीं सुनाय।
वंशबेल को देखकर, फूली नहीं समाय।३।
जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग।
बेटों-बहुओं में रहे, प्रीत और अनुराग।४।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails