"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

"आसमान में बादल छाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मौसम ने है बहुत रुलाया।
आसमान में बादल छाया।।
 
सूरज ने अवकाश लिया है,
सर्दी फिर से वापिस आयी।
पीछा नहीं छोड़ती अब भी,
कम्बल-लोई और रजायी।
ऊनी कपड़ें में भी अब तो,  
काँप रही ठिठुरन से काया।
आसमान में बादल छाया।।
बिजली करती आँख-मिचौली,
हीटर पड़े हुए हैं ठण्डे।
बाजारों से लकड़ी गायब,
नहीं सुलभ हैं उपले-कण्डे।
चमक-चमककर, कड़क-कड़ककर,  
घनचपला ने बहुत डराया।
आसमान में बादल छाया।।
 
अभी बहुत कुहरा आता है,
वासन्ती परिवेश नहीं है।
गर्मी नहीं अभी धूप में पूरी,
यौवन चढ़ा दिनेश नहीं है।  
मजबूरी में दादा जी ने,
तसले में अलाव सुलगाया।
आसमान में बादल छाया।।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

"मधुमास आ गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

टेसू के पेड़ पर अब,
कलियाँ दहक रहीं हैं।
मधुमास आ गया है,
चिड़ियाँ चहक रहीं हैं।
 
सरसों के खेत में भी,
पीले सुमन खिले हैं।
आने लगे चमन में,
भँवरों के काफिले हैं।
मादक सुगन्ध से अब,
गलियाँ महक रहीं है।
 
सेमल की शाख पर भी,
फूलों में लालियाँ हैं।
गेहूँ ने धार ली अब,
 गहनों की बालियाँ हैं।
मस्ती में झूमकर ये,
कैसे लहक रही हैं।
 
जोड़े नये नवेले,
अनुराग से भरे हैं।
मौसम बसन्त का है,
मन फाग से भरे हैं।
पथ हैं वही पुराने,
मंजिल बहक रही हैं।
 
तिनके बटोरने में,
तल्लीन हैं परिन्दे।
खुशियों को रौंदते हैं,
लेकिन कुटिल दरिन्दे।
आहत बहुत चिरैया,
लेकिन चहक रही हैं। 

बुधवार, 29 जनवरी 2014

"कैसे नवअंकुर उपजाऊँ..?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पेड़ पुराना हुआ नीम का,
कैसे इसमें यौवन लाऊँ?
सूखी शाखाओं में कैसे
कैसे नवअंकुर उपजाऊँ?

पात हो गये अब तो पीले,
अंग हो गये सारे ठीले,
तेज हवाओं से झोंखो से,
कैसे निज अस्तित्व बचाऊँ

पोर-पोर में पीर समायी,
हिलना-डुलना अब दुखदायी,
वासन्ती इस मौसम में अब,
कैसे सुखद समीर बहाऊँ?

लोग तने को काट रहे हैं
अंग-अंग को छाँ रहे हैं,
आदम-हव्वा के ज़ुल्मों से,
कैसे अब छुटकारा पाऊँ?

पहले था ये बदन सलोना
“रूप” हो गया अब तो बौना,
बोलो अब कैसे बौराऊँ?
किस-किस को अब व्यथा सुनाऊँ??

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

"अपना गणतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अंग्रेजी से ओत-प्रोत,
अपने भारत का तन्त्र,
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।

बिगुल बजा कर आजादी का,
मौन हो गई भाषा,
देवनागरी के सपनों की,
गौण हो गई परिभाषा,
सब सुप्त हो गये छंद-शास्त्र,
अभिलुप्त हो गये मन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कहाँ गया गौरव अतीत,
अमृत गागर क्यों गई रीत,
सूख गई उरबसी प्रीत, 
खो गया कहाँ संगीत-गीत,
इस शान्त बाटिका में, 
किसने बोया ऐसा षडयन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कभी थे जो जग में वाचाल,
हुए क्यों गूँगे माँ के लाल,
विदेशों में जाकर सरदार,
हुए क्यों भाषा से कंगाल,
कर रहे माँ का दूध हराम,
यही है क्या अपना जनतन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

"फुरसत नहीं मिलती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुहाने गीत गाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।
नये पौधे लगाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।।

बहारों में नहीं है दम, फिजाओं में भरा है ग़म
नज़ारे हो गये हैं नम, सितारों में भरा है तम
हसीं दुनिया बनाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं आभास रिश्तों का, नहीं एहसास नातों का
हमें तो आदमी की है, नहीं विश्वास बातों का
घरौदों को बसाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

लुभाती शहर की छोरी, सिसकता प्यार भगिनी का
सुहाती अब नहीं लोरी, मिटा उपकार जननी का
सरस उपहार पाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं गुणवान बनने की, ललक धनवान बनने की
बुजुर्गों की हिदायत को, जरूरत क्या समझने की
वतन में अमन लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
सभी रिश्ते निभाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

रविवार, 26 जनवरी 2014

"गणतन्त्र महान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥
ज्ञान गंग की बहती धारा ,
चन्दा , सूरज से उजियारा ।
आन -बान और शान हमारी -
संविधान हम सबको प्यारा ।
प्रजातंत्र पर भारत वाले करते हैं अभिमान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

शीश मुकुट हिमवान अचल है ,
सुंदर -सुंदर ताजमहल है ।
गंगा - यमुना और सरयू का -
पग पखारता पावन जल है ।
प्राणों से भी मूल्यवान है हमको हिन्दुस्तान । 
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

स्वर भर कर इतिहास सुनाता ,
महापुरुषों से इसका नाता ।
गौतम , गांधी , दयानंद की ,
प्यारी धरती भारतमाता ।
यहाँ हुए हैं पैदा नानक , राम , कृष्ण , भगवान् ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥
You might also like:

शनिवार, 25 जनवरी 2014

"गणतन्त्रदिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गणतन्त्रदिवस की शुभवेला में,
आओ तिरंगा फहरायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।
गांधी बाबा ने सिखलाई,
हमें पहननी खादी है,
बलिदानों के बदले में,
पाई हमने आजादी है,
मोह छोड़कर परदेशों का,
उन्नत अपना देश बनायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।

नया साल-छब्बीस जनवरी,
खुशियाँ लेकर आता है,
बासन्ती परिधान पहन कर,
टेसू फूल खिलाता है,
सरसों के बिरुए खेतों में,
झूम-झूमकर लहरायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।

पेड़ों की शाखाएँ सारी,
नयी-नयी कोपल पायेंगी,
अपने आँगन के अम्बुआ की,
डाली-डाली बौरायेंगी,
मुस्कानों से सुमन सलोने,
धरा-गगन को महकायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

"बदल रहा है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हर रोज रंग अपना, मौसम बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

सूरज नियम से उगता,
चन्दा नियम से आता।
कल-कल निनाद करता,
झरना ग़ज़ल सुनाता।
पतझड़ के बाद अपना, उपवन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

उड़ उड़के आ रहे हैं,
पंछी खुले गगन में।
परदेशियों ने डेरा,
डाला हुआ चमन में।
आसन वही पुराना, शासन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

महफिल में आ गये हैं,
नर्तक नये-नवेले।
बेजान हैं तराने,
शब्दों के हैं झमेले।
हैरत में है ज़माना, दामन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

"आज मेरे देश को सुभाष चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।
मीराबाई,सूर, तुलसीदास चाहिए।
आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।।

मोटे मगर गंग-औ-जमन घूँट रहे हैं,
जल के जन्तुओं का अमन लूट रहे हैं,
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।
आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।।


चूहे और बिल्ली जैसा खेल हो रहा,
सर्प और छछूंदर जैसा मेल हो रहा,
जहरभरी हमको ना मिठास चाहिए।
आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।।


कहीं है दिवाला और दिवाली कहीं है,
कहीं है खुशहाली और बेहाली कहीं है,
जनता को रोजी और लिबास चाहिए।
आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।।

मँहगाई की मार लोग झेल रहे हैं,
कोठियों में नेता दण्ड पेल रहे हैं,
सिंहासन पर बैठी नही लाश चाहिए।
आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।। 

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails