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सोमवार, 31 मार्च 2014

"आज तो मूर्ख भी दिवस है न!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मूर्खता की भी हद होती है।
विगत वर्ष मेरे कक्षा संगी देवद्त्त "प्रसून"
मेरे पास आये थे। 
फोटो खिंचवाने की जिद करने लगे।
मैंने आखिर उनकी फोटो खींच ही ली
और फोटोशॉप के कमाल से उनको यह दिखा भी दी।
तब वे बोले "आज मूर्ख दिवस नहीं है।"
मगर मित्रवर "आज तो मूर्ख दिवस है न!"
"मेरी मूर्खता.."  
बुद्धिमान बुद्धू बनें, मूर्ख दिवस है आज।
देवदत्त प्रसून भी, नाच रहे बिन साज।।
 अब मेरी एक और मूर्खता भी देख लीजिए!
विगत वर्ष जब नेट खोला तो
मेरी मुँहबोली भतीजी अर्चना चावजी 
की चैट दिखाई दी।
उसमें उन्होने लिखा था कि 
आपका गीत 

मैंने  गा दिया है। 
मगर मैंने इसे मूर्खता दिवस का उपहार समझकर
उनको कह दिया 
"भतीजी! आज मैं..... बनने वाला नहीं हूँ!"
कल-कल, छल-छल करती गंगा,
मस्त चाल से बहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

हो जाता निष्प्राण कलेवर,
जब धड़कन थम जाती हैं।
सड़ जाता जलधाम सरोवर,
जब लहरें थक जाती हैं।
चरैवेति के बीज मन्त्र को,
पुस्तक-पोथी कहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

हरे वृक्ष की शाखाएँ ही,
झूम-झूम लहरातीं हैं।
सूखी हुई डालियों से तो,
हवा नहीं आ पाती है।
जो हिलती-डुलती रहती है,
वही थपेड़े सहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।।

काम अधिक हैं थोड़ा जीवन,
झंझावात बहुत फैले हैं।
नहीं हमेशा खिलता गुलशन,
रोज नहीं लगते मेले हैं।
सुख-दुख की आवाजाही तो,
सदा संग में रहती है।
श्वाँसों की सरगम की धारा,
यही कहानी कहती है।। 

"मंगलमय नववर्ष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


नवसम्वत्सर सभी का, करे अमंगल दूर।
देश-वेश परिवेश में, खुशियाँ हों भरपूर।।

शंकाएँ सब दूर हों, हो आपस में मेल।
मन के उपवन में सदा, बढ़े प्रेम की बेल।।

एक मंच पर बैठकर, करें विचार-विमर्श।
अपने प्यारे देश का, कैसे हो उत्कर्ष।।

मर्यादा के साथ में, खूब मनाएँ हर्ष।
बालक-वृद्ध-जवान को, मंगलमय नववर्ष।। 

रविवार, 30 मार्च 2014

"नवसम्वत्सर आया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फिर से उपवन के सुमनों में
देखो यौवन मुस्काया है।
उपहार हमें कुछ देने को,
नूतन सम्वत्सर आया है।।

उजली-उजली ले धूप सुखद,
फिर सुख का सूरज सरसेगा,
चौमासे में बादल आकर,
फिर उमड़-घुमड़ कर बरसेगा,
फिर नई ऊर्जा देने को,
नूतन सम्वत्सर आया है।।

क्रिसमस-दीवाली-ईद,
दिलों में खुशियाँ लेकर आयेगी,
भूले-बिछुड़ों को अपनों से,
आ कर फिर गले मिलायेगी,
प्रगति के खुलते द्वार लिए,
नूतन सम्वत्सर आया है।।

पागलपन का उन्माद न हो,
हो और न कोई बँटवारा,
शस्त्रों की भूख मिटे मन से,
फैले जग में भाईचारा,
भू का अभिनव शृंगार लिए,
नूतन सम्वत्सर आया है।।

शिक्षा में हो विज्ञान भरा,
गुरुओं का आदर-मान रहे,
प्राचीन धरोहर बनी रहे,
मर्यादा का भी ध्यान रहे,
नवल-अमल सुविचार लिए,
नूतन सम्वत्सर आया है।।

शासक अपने खुद्दार बनें,
गद्दार न गद्दी को पाये,
सारे जग में सबसे अच्छा,
गणतन्त्र हमारा कहलाए,
झंकृत वीणा के तार लिए,
नूतन सम्वत्सर आया है।।


शनिवार, 29 मार्च 2014

"गीत-मखमल जैसा, टाट बन गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सुन्दर पैबन्दों को पाकर,
मखमल जैसा, टाट बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।

गया अँधेरा-हुआ सवेरा,
उखड़ गया है तम का डेरा,
सूरज की किरणों को पाकर,
कितना सुन्दर प्रात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।
शाखों पर कलिकाएँ महकीं,
तितली सी बालाएँ चहकीं,
मुस्काते उपवन में आकर,
चन्दन जैसा गात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,

लोहा भी इस्पात बन गया।।

भँवरों में आ गई जवानी,
करते हैं गुंजार सुहानी,
फूलों की महफिल में जाकर,
डाकू भी विख्यात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,

लोहा भी इस्पात बन गया।।

सुस्ती भागी-मस्ती जागी,
त्यागी बन बैठे अनुरागी,
माया और मेनका पाकर,
अपराधी-कुख्यात बन गया।
चाँदी की संगत में आकर,
लोहा भी इस्पात बन गया।।

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

"ग़ज़ल-स्वदेश का परवाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पुरानी डायरी से एक ग़ज़ल


कोई फूलों का प्रेमी है, कोई कलियों का दीवाना
हम तो उसके आशिक हैं, जो हो स्वदेश का परवाना

है जवाँमर्द वो ही जग में, जिसके मजबूत इरादे हों
हमारी देश का गौरव था, ऊधम सिंह मरदाना  

नही मुमताज की हसरत, नहीं अकबर की चाहत है
शिवा की अब जरूरत है, हमें देना महाराणा

वीणा की चाह नहीं माता, धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन
दुश्मन के दाँत करूँ खट्टे, मुझको वो कौशल सिखलाना

अब नहीं चाहिए “रूप” रंग, दे देना मुझको वज्र अंग
भारत की सीमाओं पर अब, अपना जौहर है दिखलाना

गुरुवार, 27 मार्च 2014

"ग़ज़ल-शासन चलाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
वर्तमान परिपेक्ष्य में
एक पुरानी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ।
हम गधे इस देश के हैंघास खाना जानते हैं।
लात भूतों के सहजता सेनहीं कुछ मानते हैं।।

मुफ्त का खाया हमॆशाकोठियों में बैठकर.
भाषणों से खेत मेंफसलें उगाना जानते हैं।

कृष्ण की मुरली चुराईगोपियों के वास्ते,
रात-दिन हमरासलीला को रचाना जानते हैं।

राम से रहमान कोहमने लड़ाया आजतक,
हम मज़हव की आड़ मेंरोटी पकाना जानते हैं।

देशभक्तों को किया हैबन्द हमने जेल में,
गीदड़ों की फौज सेशासन चलाना जानते हैं।

सभ्यता की ओढ़ चादरआ गये बहुरूपिये,
छद्मरूपी रूप” सेदौलत कमाना जानते हैं।

बुधवार, 26 मार्च 2014

"गीत-आशाएँ मुस्काती हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खेतों में बिरुओं पर जब, बालियाँ सुहानी आती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

सोंधी-सोंधी महक उड़ रही गाँवों के गलियारों में,
रंगों की बौछार हो रही आँगन में, चौबारों में,
बैशाखी-होली की खुशियाँ घर-घर में छा जाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

सूरज पर यौवन आया है, शीतलता का अन्त हुआ,
उपवन-कानन खिला हुआ है, चारों ओर बसन्त हुआ,
झूम-झूमकर नवकोपलियाँ मन्द समीर बहाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

हँसतीं हैं बुराँश की कलियाँ, काफल “रूप” दिखाता है,
सुन्दर पंख हिलाती तितली, भँवरा राग सुनाता है
शुक-कोकिल मस्ती में भरकर, अपने सुर में गाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

आम-नीम बौराये फिर से, जामुन भी बौराया है,
मधुमक्खी ने अपना छत्ता, फिर से नया बनाया है,
नीड़ बनाने को चिड़ियाएँ, तिनके चुन-चुन लाती हैं।
जनमानस के अन्तस में तब, आशाएँ मुस्काती हैं।।

मंगलवार, 25 मार्च 2014

"नोक लेखनी की भाला बन जाया करती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 मित्रों!
आज मेरी एक पुरानी रचना देखिए।
जब कोई श्यामल सी बदली,
सपनों में छाया करती है!
तब होता है जन्म गीत का,
रचना बन जाया करती है!!

निर्धारित कुछ समय नही है,
कोई अर्चना विनय नही है,
जब-जब निद्रा में होता हूँ,
तब-तब यह आया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

शोला बनकर आग उगलते,
कहाँ-कहाँ से  शब्द निकलते,
अक्षर-अक्षर मिल करके ही,
माला बन जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
धनवानों की कथा देखकर,
दर्पण दिखलाने को मेरी,
कलम मचल जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

भँवरे ने जब राग सुनाया,
कोयल ने जब गाना गाया,
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

वैरी ने  हुँकार भरी जब,
धनवा ने टंकार करी तब,
नोक लेखनी की तब मेरी,
भाला बन जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

सोमवार, 24 मार्च 2014

"ग़ज़ल-हमको अपना बना गया कोई" (गुरूसहाय भटनागर बदनाम)

आज एक ग़ज़ल
गुरूसहाय भटनागर बदनाम की कलम से
अपना बना गया कोई
 
अपना ज़लवा दिखा गया कोई
दिल को हँसकर जला गया कोई

दर्दे ग़म फिर बढ़ा गया कोई
हम को अपना बना गया कोई

कल जो करता था प्यार के वादे
आज नज़रें चुरा गया कोई

वो जो रुकता तो बात कर लेते
बिन बताए चला गया कोई

याद उल्फ़त की अब सताती है
मेरे आँसू बहा गया कोई

उनका बदनामजिक्र अब छोड़ो
बेवफ़ा था रुला गया कोई
(गुरूसहाय भटनागर बदनाम)

रविवार, 23 मार्च 2014

"ग़ज़ल-गुलशन मुस्काया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



अदब को भुलाया है, मन को भटकाया है!
धुंधलका छाया है, नया गीत आया है!!

बिम्ब नये व्यथा वही, पात्र नये कथा वही,
रबड़-छन्द भाया है! नया गीत आया है!!

सुबह वही शाम वही, श्याम वही राम वही,
माथा चकराया है! नया गीत आया है!!

महकी सुगन्ध वही, माटी की गन्ध वही,
थाल नव सजाया है! नया गीत आया है!!

सूखा आषाढ़ है, बेमौसम बाढ़ है,
बादल गहराया है!, नया गीत आया है!!

छाँव वही धूप वही, दुल्हिन का “रूप” वही,
गुलशन मुस्काया है! नया गीत आया है!!

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