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शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

“महकता घर-बार ढूँढता हूँ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


परिवार ढूँढता हूँ और प्यार ढूँढता हूँ।
मैं बुलबुलों का प्यारा संसार ढूँढता हूँ।।

कल नींद में जो देखा, मैंने हसीन सपना,
जीवन में वो महकता घर-बार ढूँढता हूँ।

स्वाधीनता मिली तो, आशाएँ भी बढ़ी थीं,
इस भ्रष्ट आवरण में, आचार ढूँढता हूँ।

हैं देशभक्त सारे, मुहताज रोटियों को,
मैं भ्रष्ट अंजुमन में, सरकार ढूँढता हूँ।

कानून के दरों पर, इंसाफ बिक रहा है,
काजल की कोठरी में, दरबार ढूँढता हूँ।

दुनिया है बेदिलों की, ज़रदार पल रहे हैं,
बस्ती में बुज़दिलों की, दिलदार ढूँढता हूँ।

अब "रूप" आदमी का कितना हुआ घिनौना,
मैं राख में दहकता अंगार ढूँढता हूँ।

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

बालकविता "चन्दा मामा-सबका मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


शरदपूर्णिमा जब-जब आती।
चमक चाँद की है बढ़ जाती।।


नभ में कैसा दमक रहा है।
 
चन्दा कितना चमक रहा है।।
यह नभ से अमृतटपकाता।
इसका सबको “रूप” सुहाता।।
 

कभी बड़ा मोटा हो जाता।
और कभी छोटा हो जाता।।

करवा-चौथ पर्व जब आता।
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।
 
महिलाएँ छत पर जाकर के।
इसको तकती हैं जी-भर के।।

यह सुहाग का शुभ दाता है।
इसीलिए पूजा जाता है।।
 
जब भी बादल छा जाता है।
तब मयंक शरमा जाता है।।

लुका-छिपी का खेल दिखाता।
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।
 
धवल चाँदनी लेकर आता।
आँखों को शीतल कर जाता।।

सारे जग से न्यारा मामा।
सब बच्चों का प्यारा मामा।।

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

"करवाचौथ विशेष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करवाचौथ विशेष
 
कर रही हूँ प्रभू से यही प्रार्थना।
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति की सदा सीढ़ियाँ तुम चढ़ो,
आपकी सहचरी की यही कामना।
 
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।
आभा-शोभा तुम्हारी दमकती रहे,
मेरे माथे पे बिन्दिया चमकती रहे,
मुझपे रखना पिया प्यार की भावना।
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।
 
तीर्थ और व्रत सभी हैं तुम्हारे लिए,
चाँद-करवा का पूजन तुम्हारे लिए,
मेरे प्रियतम तुम्ही मेरी आराधना।
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।
 

बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

"तन्त्र अब खटक रहा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

कंस हो गये कृष्ण आज,
मक्कारी से चल रहा काज,
भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,
महिलाओं की लुट रही लाज,
सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

जहाँ कमाई हो हराम की
लूट वहाँ है राम नाम की,
महफिल सजती सिर्फ जाम की
बोली लगती जहाँ चाम की,
सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

जहरीली बह रही गन्ध है,
जनता की आवाज मन्द है,
कारा में सच्चाई बन्द है,
गीतों में अब नहीं छन्द है,
सुदामा भटक रहा है।
तन्त्र अब खटक रहा है।

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

दोहे "शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


शशि की किरणों में भरी, सबसे अधिक उजास।
शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास।।
--
आज धरा पर लक्ष्मी, आने को तैयार।
शरदपूर्णिमा पर्व पर, लेती हैं अवतार।।
--
पर्वों का पर्याय है, स्वयं कार्तिक मास।
सरदी का होने लगा, अब कुछ-कुछ आभास।।
--
दीपमालिका आ रही, लेकर अब उपहार।
देता शुभसन्देश यह, पावस का त्यौहार।।
--
चमक उठे हैं आज फिर, कोठी-महल-कुटीर।
नदियों में बहने लगा, निर्मल पावन नीर।।

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

दोहे "शरदपूर्णिमा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सुधा बिन्दु बरसा रही, शरदपूर्णिमा रात।
आज अनोखी दे रहा, शरदचन्द्र सौगात।।

खिला हुआ है गगन में, कितना धवल मयंक।
नवल-युगल मिलते गले, होकर आज निशंक।।

निर्मल हो बहने लगा, सरिताओं में नीर।
मन्द-मन्द चलने लगा, शीतल-सुखद समीर।।

शरदपूर्णिमा आ गयी, लेकर यह सन्देश।
तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।

फसल धान की आ गयी, खुशियाँ लेकर साथ।
नहीं रहेगा रिक्त अब, मजदूरों का हाथ।।

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

दोहे "मनके हुए उदास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भाषा-भूषा-प्रान्त का, लोग करें गुणगान।
जात-धर्म के जाल में, जकड़ा हिन्दुस्तान।।
--
लुप्त हो गये आज तो, आपस के सम्बन्ध।
सम्बन्धों के नाम पर, होते हैं अनुबन्ध।।
--
मर्यादा को सदा ही, मिलता है वनवास।
माला कैसे अब बने, मनके हुए उदास।।
--
लोकतन्त्र के नाम पर, पाया जंगलराज।
आजादी तो मिल गयी, आया नहीं सुराज।।
--
 उपवन में बढ़ने लगी, अब तो विष की बेल।
मतलब के ही वास्ते, आपस में है मेल।।
--
बलशाली की यातना, लोग रहे हैं झेल।
निर्वाचन में हो रहा, धन का खुल्ला खेल।।
--
भूल गये हैं अब सभी, गौरव और गुमान।
मात-पिता, आचार्य का, होता है अपमान।। 

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

मुक्तक "कभी भी लाचार हमको मत समझना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुटिलता के भाव को पहचानते हैं,
शत्रुता दिल में नहीं हम ठानते हैं।
वो बहुत खुलकर चलाते तीर अपने,
वार हम चुपचाप सहना जानते हैं।।

हम सुमन के हैं हितैषी, गन्ध को पहचानते हैं,
इसलिए हमसे कुटिल-काँटे, लड़ाई ठानते हैं।
छेदते हैं जो हमारे, वतन का नाजुक बदन,
ठोकरों से हम उन्हें, हरदम कुचलना जानते हैं।।

दरियादिली को, बुज़दिली तुम मत समझना,
दिल की लगी को, दिल्लगी तुम मत समझना।
वक्त आने पर बहा देंगे लहू की धार को,
कभी भी लाचार हमको मत समझना।।

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

बालकविता "देश कहाये विश्वगुरू तब" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो करता है अच्छे काम।
उसका ही होता है नाम।।

मर्यादा जो सदा निभाता।
उसको राम पुकारा जाता।

राम नाम है सबसे प्यारा।
निर्बल का है एक सहारा।।

सदाचार होता सुखदायक।
जिससे राम बने गणनायक।।

जस को तस व्यवहार किया।
जीवन का आधार दिया।।

जब आई सम्मुख अच्छाई।।
हुई पराजित सकल बुराई।।

करो न कुंठित प्रतिभाओं को।
करो साक्षर ललनाओं को।।

बच्चा-बच्चा राम जब।
देश कहाये विश्वगुरू तब।।

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

दोहे "कैसे देश-समाज का, होगा बेड़ा पार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार।
जीत हो गयी सत्य की, झूठ गया है हार।।
--
रावण के जब बढ़ गये, भू पर अत्याचार।
लंका में जाकर उसे, दिया राम ने मार।।
--
विजयादशमी ने दिया, हम सबको उपहार।
अच्छाई के सामने, गयी बुराई हार।।
--
मनसा-वाता-कर्मणा, सत्य रहे भरपूर।
नेक नीति हो साथ में, बाधाएँ हों दूर।।
--
पुतलों के ही दहन का, बढ़ने लगा रिवाज।
मन का रावण आज तक, जला न सका समाज।।
--
राम-कृष्ण के नाम धर, करते गन्दे काम।
नवयुग में तो राम का, हुआ नाम बदनाम।।
--
आज धर्म की ओट में, होता पापाचार।
साधू-सन्यासी करें, बढ़-चढ़ कर व्यापार।।
--
आज भोग में लिप्त हैं, योगी और महन्त।
भोली जनता को यहाँ, भरमाते हैं सन्त।।
--
जब पहुँचे मझधार में, टूट गयी पतवार।
कैसे देश-समाज का, होगा बेड़ा पार।।

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

"पाँच मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जानते हैं सच, तभी तो मौन हैं वो,
और ज्यादा क्या कहें हम, कौन हैं वो।
जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।१।
--
दिल तो सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं-
आग के बिन धुँआ नहीं होता।२।
--
उनकी सौगात बहुत दूर गई,
अब तो हर बात बहुत दूर गई।
रौशनी होगी नहीं तारों से-
चाँदनी रात बहुत दूर गई।३।
--
कोई आया था हौसले भरने,
कोई आया था चोंचले करने।
कोई आया था खास मक़सद से-
कोई आया था फासले करने।४।
--
इतनी मजबूत राह थी पाई,
एक बरसात में बनी खाई।
दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
जब किनारे हुए हैं हरजाई।५।

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