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रविवार, 31 जुलाई 2016

"उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का जीवनवृत्त"

मुंशी प्रेमचन्द का जीवनवृत्त 
जन्म-
     प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।जीवन धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।
शादी-
     आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
शिक्षा-
     अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।साहित्यिक रुचिगरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो - तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला। आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद "तिलस्मे - होशरुबा" पढ़ डाली।अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी - बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।प्रेमचन्द की दूसरी शादीसन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।
व्यक्तित्व-
      सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा "हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् - पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, "तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।" कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं "कि जाड़े के दिनों में चालीस - चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।"प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।ईश्वर के प्रति आस्थाजीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा "तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो - जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।"मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था - "जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"प्रेमचन्द की कृतियाँप्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में "होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात" नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय "रुठी रानी" नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में "हम खुर्मा व हम सवाब" नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।"सेवा सदन", "मिल मजदूर" तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए "महाजनी सभ्यता" नाम से एक लेख भी लिखा था।
मृत्यु-
      सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने "प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया। 
                                                                                                                   (भारत दर्शन से साभार)

ग़ज़ल "मन को न हार देना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना।
जीवन के रास्तों को, ढंग से निखार लेना।

सावन की घन-घटाएँ, बरसे बिना न रहतीं,
बारिश की मार से तुम, मन को न हार देना।

इठला रहे हैं अब तो, नाले-नदी-गधेरे,
गर हो सके तो इनसे, मस्ती उधार लेना।

धरती में लहलहाते, बिरुए तुम्हें बुलाते,
करके निराई इनका, आँचल सँवार देना।

अब झूम-झूम भँवरे, गुंजार कर रहे हैं,
तुम सादगी से अपने, लम्हें गुज़ार देना।

चढ़ती हुई नदी का, तो रूप मस्त होता,
तुम ज़लज़लों से अपना, यौवन उबार लेना।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

ग़ज़ल "छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुझे तो छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता।
सही मतला, सही मक़्ता, लगाना भी नहीं आता।।

दिलों के बलबलों को मैं, भला अल्फ़ाज़ कैसे दूँ,  
मुझे लफ्ज़ों का गुलदस्ता, सजाना भी नहीं आता।

सुहाने साज मुझको, प्यार से आवाज़ देते हैं,
मगर मजबूर हूँ, इनको बजाना भी नहीं आता।

भरा है प्यार का सागर, मैं कैसे जाम में ढालूँ,
भरी गागर से पानी, मुझको छलकाना नहीं आता।

महकता है-चहकता है, ये ग़ुलशन खिलखिलाता है,
मुझे क्यारी में जल की धार, टपकाना नहीं आता।

ढला जब रूप” तो, कोई फिदा कैसे भला होगा,
मुखौटा माँज-धोकर, मुझको चमकाना नहीं आता।

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

आलेख "काव्य को जानिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

काव्य (छन्दों) को जानिए
      शब्दों को गेयता के अनुसार सही स्थान पर रखने से कविता बनती है। अर्थात् जिसे स्वर भरकर गाया जा सके वो काव्य कहलाता है। इसीलिए काव्य गद्य की अपेक्षा जल्दी कण्ठस्थ हो जाता है।
      गद्य में जिस बात को बड़ा सा आलेख लिखकर कहा जाता है, पद्य में उसी बात को कुछ पंक्तियों में सरलता के साथ कह दिया जाता है। यही तो पद्य की विशेषता होती है।
     काव्य में गीत, ग़ज़ल, आदि ऐसी विधाएँ हैं। जिनमें गति-यति, तुक और लय का ध्यान रखना जरूरी होता है। लेकिन दोहा-चौपाई, रोला आदि मात्रिक छन्द हैं। जिनमें मात्राओं के साथ-साथ गणों का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। तभी इन छन्दों में गेयता आती है।
   अन्तर्जाल पर मैंने यह अनुभव किया है कि नौसिखिए लोग दोहा छन्द में मात्राएँ तो पूरी कर देते हैं मगर छन्दशास्त्र के अनुसार गणों का ध्यान नहीं रखते हैं। इसीलिए उनके दोहों में प्रवाह नहीं आ पाता है और लय भंग हो जाती है।
·         मात्रिक छन्द ː 
जिन छन्दों में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है उन्हें मात्रिक छन्द कहा जाता है। जैसे - दोहारोलासोरठाचौपाई । उदाहरण के लिए मेरा एक दोहा देखिए-
फसल धान की खेत में, लहर-लहर लहराय।
अपने मन के छन्द को, रचते हैं कविराय।।
·         वार्णिक छन्द ː 
वर्णों की गणना पर आधारित छन्द  वार्णिक छन्द कहलाते हैं। जैसे - घनाक्षरीदण्डक। घनाक्षरी चन्द का एक उदाहरम देखिए-
विद्या वो भली है जो हो क्षमता के अनुसार,
मान व सम्मान भला लगे सद-रीत का|
रिश्ते हों या नाते सभी, सीमा तक लगें भले,
गायन रसीला भला, भव-हित गीत का|
शूरता लगे है भली समय की 'कविदास',
उम्र की जवानी भली, संग सच्चे मीत का|
श्रद्धा वाली भक्ति भली, सम्भव विरक्ति भली,
रोना भला मौके का व गौना भला शीत का||
·         वर्णवृत ː 
सम छन्द को वृत कहते हैं। इसमें चारों चरण समान होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु गुरु मात्राओं का क्रम निश्चित रहता है। जैसे - द्रुतविलंबितमालिनी। उदाहरण देखिए-
इसका अर्थ है कि मालिनी छन्द में प्रत्येक चरण में नगण, नगण, मगण और दो यगणों के क्रम से 15 वर्ण होते हैं और इसमें यति आठवें और सातवें वर्णों के बाद होती है; जैसे : 
।  ॥  ।   ॥ ऽ ऽ  ऽ  । ऽ  ऽ  । ऽ ऽ 
वयमिह परितुष्टाः वल्कलैस्त्वं दुकूलैः

सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः ।

स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला  
मनसि तु परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः॥ वैराग्यशतक /45

·         मुक्त छन्दː 
भक्तिकाल तक मुक्त छन्द का अस्तित्व नहीं था, यह आधुनिक युग की देन है। इसके प्रणेता सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' माने जाते हैं। मुक्त छन्द नियमबद्ध नहीं होते, केवल स्वछन्द गति और भावपूर्ण यति ही मुक्त छन्द की विशेषता हैं।

दोहे "प्यार और अनुराग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ऐसा होना चाहिए, जल से भरा तड़ाग।
जिसके सुमनों में रहे, प्यार और अनुराग।।
--
नहीं चाहिए चमन में, माली अब गद्दार।
उपवन के सारे सुमन, होवें पानीदार।।
--
कट्टरपन्थी छोड़ कर, होवें सभी उदार।
गरदन पर मासूम की, अब न चले हथियार।।
--
भाषा-भूषा-पन्थ हों, चाहे भले अनेक।
रहना है हर हाल में, हमको बनकर नेक।।
--
जग के दाता ने दिया, हमको मानव रूप।
रहें हमारे आचरण, मानव के अनुरूप।।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

दोहे "खुश हो रहे किसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बादल नभ में छा गये, पुरवा बहे बयार।
आमों का मौसम गया, सेबों की भरमार।।
--
फसल धान की खेत में, लहर-लहर लहराय।
अपने मन के छन्द को, रचते हैं कविराय।।
--
हरी-हरी उग आयी है, चरागाह में घास।
धरती से आने लगी, सोंधी-तरल सुवास।।
--
देख-देख कर फसल को, खुश हो रहे किसान।
करते सावन मास में, भोले का गुणगान।।
--
काँवड़ लेने चल पड़े, नर-नारी हरद्वार।
आशुतोष के धाम में, उमड़ी भीड़ अपार।।
--
मिलता है भगवान के, मन्दिर में सन्तोष।
हर-हर, बम-बम नाद का, गूँज रहा उद्घोष।।
--
होता है अन्तःकरण, जब मानव का शुद्ध।
दर्शन देते हैं तभी, जगन्नाथ अनिरुद्ध।।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

गीत "रिश्ते-नाते प्यार के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ढंग निराले होते जग में,  मिले जुले परिवार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

चमन एक हो किन्तु वहाँ पर, रंग-विरंगे फूल खिलें,
मधु से मिश्रित वाणी बोलें, इक दूजे से लोग मिलें,
ग्रीष्म-शीत-बरसात सुनाये, नगमें सुखद बहार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

पंचम सुर में गाये कोयल, कलिका खुश होकर चहके,
नाती-पोतों की खुशबू से, घर की फुलवारी महके,
माटी के कण-कण में गूँजें, अभिनव राग सितार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

नग से भू तक, कलकल करती, सरिताएँ बहती जायें,
शस्यश्यामला अपनी धरती, अन्न हमेशा उपजायें,
मिल-जुलकर सब पर्व मनायें, थाल सजें उपहार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

गुरूकुल हों विद्या के आलय, बिके न ज्ञान दुकानों में,
नहीं कैद हों बदन हमारे, भड़कीले परिधानों में,
चाटुकार-मक्कार बनें ना, जनसेवक सरकार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

बरसें बादल-हरियाली हो, बुझे धरा की प्यास यहाँ,

चरागाह में गैया-भैंसें, चरें पेटभर घास जहाँ,
झूम-झूमकर सावन लाये, झोंके मस्त बयार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

गीत "सितारों में भरा तम है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')




बहारों में नहीं दम है, नज़ारों में भरा ग़म है
फिजाओं में नहीं दम हैं, सितारों में भरा तम है
हसीं दुनिया बनाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं आभास रिश्तों का, नहीं एहसास नातों का
हमें तो आदमी की है, नहीं विश्वास बातों का
बसेरे को बसाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

लुभाती गाँव की गोरी, सिसकता प्यार भगिनी का
सुहाती अब नहीं लोरी, मिटा उपकार जननी का
सरल उपहार पाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं गुणवान बनने की, ललक धनवान बनने की
बुजुर्गों की हिदायत को, जरूरत क्या समझने की
वतन में अमन लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
चहक ग़ुलशन में लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

रविवार, 24 जुलाई 2016

गीत "रेत के घरौंदे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सज रहे हैं ख्वाब,
जैसे हों घरौंदे रेत में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

मोम के सुन्दर मुखौटे,
पहन कर निकले सभी,
बदल लेते रूप अपना,
धूप जब निकली कभी,
अब हुए थाली के बैंगन,
थे कभी जो खेत में। 
बाढ़, बारिश-हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

हो रही वादाख़िलाफी,
रो रहे सम्बन्ध हैं,
हाट का रुख़ देखकर ही,
हो रहे अनुबन्ध हैं,
नज़र में कुछ और है,
कुछ और ही है पेट में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

जो स्वयं अज्ञान है,
वो क्या परोसेगा हुनर,
बेहया की लाज को,
ढक पाएगी कैसे चुनर,
जिग़र में जो कुछ भरा है,
वही देगा भेंट में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

शनिवार, 23 जुलाई 2016

दोहे "वर्षा का आनन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सावन आया झूम के, पड़ती सुखद फुहार।
तन-मन को शीतल करे, बहती हुई बयार।१।
--
सावन अपने साथ में, लाता है त्यौहार।
रक्षाबन्धन-तीज के, संग बहन का प्यार।२।
--
श्रावण शुक्ला पंचमी, बहुत खास त्यौहार।
नाग पंचमी आज भी, श्रद्धा का आधार।३।
--
जंगल में मंगल हुआ, सुधरा है परिवेश।
सावन हमको दे रहा, जीवन का सन्देश।४।
--
शैल शिखर से आ रही, नभ में सघन कतार।
 कहीं बरसता रात-दिन, कहीं गरज-बौछार।५।
--
बालक बैठे ले रहे, वर्षा का आनन्द।
भीनी-भीनी आ रही, पौधों में से गन्ध।६।
--
मक्का फूली खेत में, पके डाल पर आम।
जामुन गदराने लगी, डाली पर अभिराम।७।
--
चारों ओर बिछा हुआ, हरा-हरा कालीन।
पौधों को जीवन मिला, खुश हैं जल में मीन।८।
--
बया चहकती नीड़ में, चिड़िया मौज मनाय।
पौध धान की शान से, लहर-लहर लहराय।९।
--
काँवड़ लेने चल पड़े, भक्त शम्भु के द्वार।
बम-भोले के नाम की, होती जय-जयकार।१०।
--
मानसरोवर जा रहे, जत्थों में कुछ लोग।
शिवजी को कैलाश में, चले लगाने भोग।११। 

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