"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

गीत "नूतन वर्ष का अभिनन्दन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गये साल को है प्रणाम! 
है नये साल का अभिनन्दन।।
लाया हूँ स्वागत करने को
थाली में कुछ अक्षत-चन्दन।। 
है नये साल का अभिनन्दन।।

गंगा की धारा निर्मल हो,
मन-सुमन हमेशा खिले रहें,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के,
हृदय हमेशा मिले रहें,
पूजा-अजान के साथ-साथ,
होवे भारतमाँ का वन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।

नभ से बरसें सुख के बादल,
धरती की चूनर धानी हो,
गुरुओं का हो सम्मान सदा,
जन मानस ज्ञानी-ध्यानी हो,
भारत की पावन भूमि से,
मिट जाए रुदन और क्रन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।

नारी का अटल सुहाग रहे,
निश्छल-सच्चा अनुराग रहे,
जीवित जंगल और बाग रहें,
सुर सज्जित राग-विराग रहें,
सच्चे अर्थों में तब ही तो,
होगा नूतन का अभिनन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

गीत "शीतलता ने डाला डेरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मैदानों में कुहरा छाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
सूरज को बादल ने घेरा,
शीतलता ने डाला डेरा,
ठिठुर रही है सबकी काया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
कलियों पर मौसम के पहरे,
बहुत निराश हो रहे भँवरे,
गुंजन उनको रास न आया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
सरसों के सब बिरुए रोते,
गेहूँ अपना धीरज खोते है,
हरियाली का हुआ सफाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
बया नीड़ से झाँक रही है,
इधर-उधर को ताँक रही है,
शीतलता ने हाड़ कँपाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
बूढ़े-बच्चे काँप रहे हैं,
सभी आग को ताप रहे हैं,
हिम पर्वशिखरों पर छाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

दोहे "हुआ समय विकराल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नया तीर तूणीर से, मत करना तामीर।
नये साल में देश की, बदलेगी तसबीर।।
--
छलनी को होता पता, कितने उसमें छेद।
काला धन जितना रहा, सब हो गया सफेद।।
--
बड़बोलेपन के लिए, जो जग में बदनाम।
जनता के मुख पर चला, देने वही लगाम।।
--
सीधी-सच्ची बात में, करते लाग-लपेट।
भाषण से ही भर रहे, जनता का वो पेट।।
--
दाम गाँठ में हैं नहीं, हुआ समय विकराल।
अब भी श्रमिक-किसान की, हालत खस्ताहाल।
--
चलते बिना कमान के, मुख से जिनके तीर।
जनता के सेवक हुए, अब तो भाषणवीर।।
--
मेहनतकश मजदूर है, आज मजे से दूर।
रोटी-रोजी के लिए, कितना है मजबूर।।


बुधवार, 28 दिसंबर 2016

गीत "सब स्वप्न हो गये अंगारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
गधे चबाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!

काँपे माता काँपे बिटिया, भरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससे, क्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

जो इठलाते हैं दौलत पर, वो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंग,वो खूब कमाते द्रव्य-माल,
वाणी में केवल हैं नारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

नव-वर्ष हमेशा आता है, सुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

रोटी-रोजी के संकट में, बस गीत-प्रीत के भाते हैं,
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

टूटा तन-मन भी टूटा है, अभिलाषाएँ ही जिन्दा हैं,
कब जीवन में होंगी बहार, यह सोच रहा कारिन्दा हैं,
चमकेंगें कब सुख के तारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

दोहे "आओ नूतन वर्ष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


होने वाला है विदा, अब मौजूदा साल।
नये साल के साथ में, होगा खूब धमाल।।
--
दरवाजा खटका रहा, नया-नवेला साल।
आशाएँ मन में जगीं, सुधरेंगे अब हाल।।
--
आतुर हैं अब लोग सब, आओ नूतन वर्ष।
विपदाओं का अन्त हो, जीवन में हो हर्ष।।
--
शायद नूतन साल में, शासन दे उपहार।
नीलगगन से धरा पर, बरसे सुख की धार।।
--
भोजन करके पेटभर, लेवें सभी डकार।
मलयानिल से धरा पर, आयें सुखद बयार।।
--
छन्दों में कविता करें, सब हो भावविभोर।
दोहों का उपहास अब, करें न दोहाखोर।।
--
नहीं किसी के पाँव में, चुभें कहीं भी शूल।
बगिया में खिलते रहें, सुन्दर-सुन्दर फूल।।

"नया साल-2017" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बुलबुल गायें मधुर तराने, प्रेम प्रीत का हो संसार।
नया साल मंगलमय होवे, महके -चहके घर परिवार।।

ऋतुओं में सुख की सुगन्ध हो,
काव्यशास्त्र से सजे छन्द हों,
ममता में समानता होवे, मिले सुता को सुत सा प्यार।
नया साल मंगल मय होवे, महके-चहके घर-परिवार।।

फूल खिलें हों गुलशन-गुलशन,
झूम-झूमकर बरसे सावन,
नदियों में कल-कल निनाद हो, मोर-मोरनी गायें मल्हार।
नया साल मंगल मय होवे, महके-चहके घर-परिवार।।

भेद-भाव का भूत न होवे,
कोई पूत कपूत न होवे,
हिन्दी की बिन्दी की गूँजे, दुनियाभर में जय-जयकार।
नया साल मंगल मय होवे, महके-चहके घर-परिवार।।

रविवार, 25 दिसंबर 2016

गीत "आने वाला है नया साल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


चमकेगा अब गगन-भाल। 
आने वाला है नया साल।।

आशाएँ सरसती हैं मन में
खुशियाँ बरसेंगी आँगन में
सुधरेंगें बिगड़े हुए हाल। 
आने वाला है नया साल।।

होंगी सब दूर विफलताएँ
आयेंगी नई सफलताएँ
जन्मेंगे फिर से पाल-बाल। 
आने वाला है नया साल।।

सिक्कों में नहीं बिकेंगे मन
सत्ता ढोयेंगे पावन जन
अब नहीं चलेंगी वक्र-चाल। 
आने वाला है नया साल।।

हठयोगी, पण्डे और ग्रन्थी
हिन्दू-मुस्लिम, कट्टरपन्थी
अब नहीं बुनेंगे धर्म-जाल।
आने वाला है नया साल।। 

वन्दना "मंजु-माला में कंकड़ ही जड़ता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।

राह सुनसान थीआगे बढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
धन के आगे कभी माथा टेका नही,
शब्द कमजोर थेशेर गढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

भावनाओं में जीता रहा रात-दिन,
वेदनाओं को पीता रहा रात-दिन,
ज़िन्दग़ी की सलीबों पे चढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

मैंने हँसकर लियाआपने जो दिया,
मैंने अमृत समझकरगरल को पिया,
बेसुरी फूटी ढपली को मढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

कुछ ने सनकी कहाकुछ ने पागल कहा,
कुछ ने छागल कहाकुछ ने बादल कहा,
रीतियों के रिवाजों से लड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

आपने जो लिखायावही लिख दिया,
शब्द जो भी सुझायावही रख दिया,
मंजु-माला में कंकड़ ही जड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

दोहे "क्रिसमस का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रोज-रोज आता नहीं, क्रिसमस का त्यौहार।
खुश हो करके बाँटिए, लोगों को उपहार।।
--
दया-धर्म का जगत में, जीवित रहे निवेश।
यीसू सूली पर चढ़ा, देने यह सन्देश।।
--
झंझावातों में रहा, जो जीवन परियन्त।
माँ मरियम की कोख से, जन्मा था गुणवन्त।।
--
सदा अभावों में पला, लेकिन रहा सपूत।
सारा जग कहता उसे, परमपिता का दूत।।
--
मान और अपमान से, जो भी हुआ विरक्त।
दुनिया उसकी ओर ही, हो जाती अनुरक्त।।
--
परमपिता के नाम की, महिमा बड़ी अपार।
दीन-दुखी का ईश ही, करता बेड़ा पार।।
--
जीवन में मंगल करें, सन्तों के उपदेश।
सर्व धर्म समभाव का, बना रहे परिवेश।।


शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

समीक्षा-दोहा-कृति 'खिली रूप की धूप' (समीक्षक-मनोज कामदेव)

पुस्तक समीक्षा
समीक्ष्य- दोहा-कृति- 'खिली रूप की धूप'

दोहाकार-'डा.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रथम संस्करण-2016

मूल्य-200/-
प्रकाशक-आरती प्रकाशनलालकुआँ 
(नैनीताल) उत्तराखंड
समीक्षक-मनोज कामदेव कवि/लेखक/समीक्षक
गाजियाबाद(यू.पी.)।
(मो.न.09818750159)

    समीक्ष्य दोहा-कृति 'खिली रूप की धूपकवि के उत्कृष्टसामाजिक प्रभावपूर्ण व ह्र्दयस्पर्शी दोहों का मात्र एक गुलदस्ता नहीं बल्कि एक समग्र उपवन है। इस दोहे संग्रह में जिन्दगी के विभिन्न रंगअनेक पहलूअनेक यथार्थअनुभूतियाँसामाजिक चिंतनआँसूमुस्कानपीरहर्ष-विषाद के अनेक परिदृश्य इस संग्रह में अति श्रेष्ठताकलात्मकतागहनता व परिपवक्ता के साथ समाहित किए गए हैं।
    कवि की वैचारिकता में वैशिष्ट्य हैतो कथ्य में गहराई व वजन भी है। सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से हर दोहा खरा उतरता है। प्रस्तुति में रवानगी है तो विषयवस्तु में मौलिकताप्रखरतातरलता व विविधता भी है। तभी तो 144 पृष्ठीय कृति में जीवन के यथार्थ व सत्य को उकेरते हुए प्रायः हर विषयवस्तु के दोहे समाहित हो गये हैं।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक जी ने 'खिली रूप की धूप' में उर्दू और एंव हिन्दी के शब्दों का उत्तम प्रयोग किया है तथा अपने मन के भावों को शब्दों के माध्यम से इस पुस्तक के फलक पर सजीवरूप में उतार दिया है। इस पुस्तक को मैंने पढ़ा और यह मेरे दिल को छू गई ये पुस्तक। उदाहरण के तौर पर उसके कुछ दोहों के अंश प्रस्तुत हैं-
माँ ममता का रूप हैपिता सबल आधार
मात-पिता सन्तान कोकरते प्यार अपार।।
(तात मुझे बल दीजिए)
गुरु-शिष्य पागल हुएज्ञान हुआ विकलांग
नहीं भरोसा कर्म परबाँच रहे पंचांग।।
(पागलपन)
आभासी संसार हैआभासी सम्बन्ध
मिलने-जुलने के लिएहो जाते अनुबन्ध।।
(मुखपोथी बनाम फेसबुक)
हिन्दी का दिन बन गयाअब तो एक मखौल
अंग्रेजी के भक्त भीबजा रहे हैं ढोल।।
(हिन्दी दिवस)
अपनी सूरत देख करविदित हुआ परिणाम
उगते सूरज को करेंझुककर सभी प्रणाम।।
(मत होना मगरूर)
अब मजहब के नाम पर, होते ओछे कर्म
मुल्ला-पण्डित-पादरीके चंगुल में धर्म।।
(धर्म)
ढाई आखर में छिपाजीवन का विज्ञान
माँगे से मिलता नहींकभी प्यार का दान।।
(छन्दों का विज्ञान)
पूरब से होता शुरूनूतन जीवन सत्र
दिनचर्या के भेजतासूरज लिखकर पत्र।।
(आशा का अध्याय)
कच्चे धागों से बँधीरक्षा की पतवार
रोली-अक्षत-तिलक मेंछिपा हुआ है प्यार।।
(रक्षाबन्धन)
मिलते हैं संसार मेंपग-पग पर आघात
जाँच-परख कर कीजिएसाझा मन की बात।।
(शैवाल)
थोथी-थोथी सी लगेंसरकारी तकरीर
कैसे निर्मल हो यहाँगंगा जी का नीर।।
(लोभ)
नहीं बुढ़ापे में चलेंयौवन जैसे पाँव
बरगद बूढ़ा हो चलाकब तक देगा छाँव।।
(उलझे तार)
इतने पर भी बोलतापाक झूठ पर झूठ
जब बनता माहौल कुछतब ही जाता रूठ।।

(वन्देमातरम्)

कण-कण में जो रमा है, वो ही है भगवान
मंदिर-मस्जिद में उसेखोज रहा नादान।।
(ईश्वर आता याद)
भारत माँ कोख सेजन्मा पूत कलाम
करते श्रद्वा-भाव सेउसको आज सलाम।।
(ए.पी.जे.अब्दुल कलाम)
सरकारी अनुभाग मेंरिश्वत की भरमार
आम आदमी पूछताये कैसी सरकार।।
(नौकरशाही)
नीम करेला जगत मेंकभी न मीठा होय
मगर न छोड़े दुष्टतापीकर निर्मल तोय।।
(अच्छे दिन)
जर्रे-जर्रे में बसाराम और रहमान
सिखलाते इंसानियतपूजा और अजान।।
(ईद मुबारक)
दोहे लिखने में कभीचलता नहीं जुगाड़
नियमों से करना नहींकोई भी खिलवाड़।।
(नियम-विधान)
पेड़ कट गये धरा केबंजर हुई जमीन
प्राणवायु घटने लगीछाया हुई विलीन।।
(पर्यावरण)
दोहा छोटा छ्न्द हैकरता भारी मार
सीधे-सादे शब्द हीकरते सीधा वार।।
(दोहा छोटा छन्द)
    वास्तव में हर दोहा एक से एक बढकर एक हैं। मुखपृष्ठ सादा पर आकर्षक है, छपाई उत्तम है। निष्कर्ष यह कि यह दोहा-संग्रह साहित्य की एक बहुत बड़ी धरोहर है और "खिली रूप की धूप"समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
समीक्षक-मनोज कामदेव कवि/लेखक/समीक्षक

गाजियाबाद(यू.पी.)।

(मो.न.09818750159)

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails