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शुक्रवार, 7 मई 2010

"कभी कुछ नही बचेगा : Percy Bysshe Shelley " (अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

Oh Never More : Percy Bysshe Shelley
अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"  
ओ संसार!
ओ जीवन!
ओ समय!
जो भी तुम्हारी
अन्तिम सीढ़ी पर चढ़ा
वो कँपकपाया
जो पहले से ही
यहाँ पर विद्यमान था
जब वह लौटेगा
अपनी सर्वोच्च महिमा पर
तब कुछ नही बचेगा
कभी नहीं कुछ बचेगा

रात और दिन
गुजरते जायेंगे
खुशियाँ उड़ जायेंगी
ताजा बसन्त,
गर्मियाँ और सर्दियाँ
मेरे दुखी दिल को
खुशी से
छोड़ जायेंगी
और 
कुछ नही बचेगा
कभी भी कुछ नही बचेगा!
Percy Bysshe Shelley
1792–1822

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया सर .............आज कल आप पूरे mood में है !!

    जवाब देंहटाएं
  2. रात और दिन
    गुजरते जायेंगे
    खुशियाँ उड़ जायेंगी

    बहुत सुन्दर भावानुवाद

    जवाब देंहटाएं
  3. जो भी तुम्हारी
    अन्तिम सीढ़ी पर चढ़ा
    वो कँपकपाया
    जो पहले से ही
    यहाँ पर विद्यमान था


    हर पंक्ति एक विशेष भाव को समेटे हुए है...बहुत सुन्दर अनुवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. जब पूर्णता मे समा जाते हैं तो कुछ नही बचता…………बहुत बढिया अनुवाद्।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर भाव के साथ आपने बढ़िया अनुवाद किया है!

    जवाब देंहटाएं
  6. badiya kaam...aacha lagta hai inko aap ke hathon padna.

    जवाब देंहटाएं
  7. जो भी तुम्हारी
    अन्तिम सीढ़ी पर चढ़ा
    वो कँपकपाया

    शब्दों का सुन्दर चयन

    जवाब देंहटाएं
  8. Shashtri ji ke anuwaad kiye hue har lafz ki chor [akadte hue main zindagi ki us chor ka aks dekh paati hoo. shabdon ki sashakta, lajawaab
    sadar

    जवाब देंहटाएं

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