| आज से एक सप्ताह की छुट्टी पर जा रहा हूँ! सम्भवतः 30 जुलाई को पुनः मिलूँगा! उच्चारण पर कुछ रचनाएँ कतार में लगाकर जा रहा हूँ! आज पेश कर रहा हूँ अपनी डायरी की एक पुरानी रचना- गुलों की चाह में, अपना चमन बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। चहकती थीं कभी, गुलशन की छोटी-छोटी कलियाँ जब, महकती थी कभी, उपवन की छोटी-छोटी गलियाँ जब, गगन की छाँह में, शीतल पवन बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। चमकती थी कभी बिजली, मिरे काँधे पे झुक जाते, झनकती थी कभी पायल, तुम्हारे पाँव रुक जाते, ठिठुर कर डाह में, अपना सुमन बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। सिसकते हैं अकेले अब, तुम्ही को याद कर-कर के, बिलखते हैं अकेले अब, फकत फरयाद कर-कर के, अलम की बाँह में, अपना जनम बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। |
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आज तो कुछ अलग ही तेवर हैं……………मगर अन्दाज़ ये भी बहुत ही भाया………………दिल मे उतर गयी।
जवाब देंहटाएंआप जल्द से जल्द ब्लॉग जगत में लौटें, यही कामना है।
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सबसे खूबसूरत आँखें।
व्यायाम द्वारा बढ़ाएँ शारीरिक क्षमता।
बड़ी सुन्दर रचना। छुट्टियाँ आनन्दमयी बीतें।
जवाब देंहटाएंबढ़िया और आनन्ददायक छुट्टियां मनाकर आइये.
जवाब देंहटाएंछुट्टियाँ ...अरे वाह ..खूब आनद लीजिए ..कविता सुन्दर है हमेशा की तरह.
जवाब देंहटाएंohho..chaliye sir ..enjoy yr time..:)
जवाब देंहटाएंबहुत शुभकामनाएं.
जवाब देंहटाएंरामराम.
अपना चमन बरबाद कर डाला।
जवाब देंहटाएंचैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।
जल्द से जल्द ब्लॉग जगत में लौटें!
बड़ी सुन्दर रचना।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया ...
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