| जब मन्दिर-मस्जिद जलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ। जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।। त्योहारों की परम्परा में, जो मज़हब को लाये, दंगों के शोलों में, जम कर घासलेट छिड़काये, जब भाषण आग उगलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ। जब जूते-चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।। कूड़ा-कचरा बीन-बीन जो, रोजी कमा रहे हैं, पढ़ने-लिखने की आयु में, जीवन गँवा रहे हैं, जब भोले बचपन ढलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ। जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।। दर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने, जिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने, जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ। जब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।। |
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Dil se nikle bhaav Shashtri ji !
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना ... आज के हालात् को बयां करते हुए...
जवाब देंहटाएंजब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जवाब देंहटाएंजब जूते - चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।
कमाल का लिखा है !!
आज के हालत को बयान करती सुंदर रचना.
जवाब देंहटाएंदर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,
जवाब देंहटाएंजिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,
sahii,saundar rachana
बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंरामराम.
बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति ...अब जूते चप्पलों का नज़ारा तो आम बात होती जा रही है ..
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर रचना, धन्यवाद
जवाब देंहटाएंदर्द-दर्द है जिसको होता, वो ही उसको जाने,
जवाब देंहटाएंजिसको कभी नही होता, वो क्या उसको पहचाने,
सत्य वचन शास्त्री जी!! बेहतरीन अभिव्यक्ति....
मैं भी हो जाता हूं लेकिन गंजे को नाखून नहीं मिलते...
जवाब देंहटाएंसच कहा………………ऐसे हालातों से सभी पागल होते हैं मगर उन पर बस नही चल पाता और खुद को असहाय महसूस करके पागल होने के सिवा और कोई चारा भी तो नही बचता………………आज तो आपने हर दिल का हाल कह दिया।
जवाब देंहटाएंmain tab tab paagal hota hoon....maja aa gaya padh kar.aantrik rosh ko kis khoobsurti se vyakt kiya hai aapne.
जवाब देंहटाएंशास्त्री जी
जवाब देंहटाएंप्रणाम
सच तो यह है कि हर अच्छा आदमी गलती से आस्तीन वाली कमीज पहनने पर यकीन रखता है और उसी में सांप पल जाते हैं, लेकिन यह भी उतनी ही बड़ी हकीकत है कि समझदार आदमी को गदहे और कुत्ते को हरकतों पर पागल नहीं होना चाहिए।
हां... आपसे छोटा होने के बाद भी आपको एक सलाह देने की धृष्टता कर रहा हूं और वह यह कि जो सांप आस्तीन में पले और हाथ में पकड़ जाए उसके फन को जूते से मसल डालिए.
शोले फिल्म का यह संवाद याद रखिए- गब्बर सांपों को हाथों से नहीं पैरों से मसला जाता है।
गदहे और कुत्तों की हरकतों पर
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