रोटियों को बीनने को, आ गये फकीर हैं। अमन-चैन छीनने को, आ गये हकीर हैं।। तिजारतों के वास्ते, बना रहे हैं रास्ते, हरी घास छीलने को, आ गये अमीर हैं। दे रहे हैं मुफ्त में, सुझाव भी-सलाह भी, बादशाह लीलने को, आ गये वज़ीर हैं। ज़िन्दगी के हाट में, बेचते हैं मौत को, धीरता को जीमने को, आ गये अधीर हैं। “रूप” वानरों सा है, दिल तो है लँगूर का, मनुजना को पीसने को, आ गये कदीर हैं। |
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बिल्कुल सच,
जवाब देंहटाएंसामयिक रचना
एक बार फिर --
जवाब देंहटाएंसामने आई
आपकी सुन्दर प्रस्तुति ||
बधाई आपको ||
वास्तविकता बताती सुन्दर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंसच!
जवाब देंहटाएंबहुत सटीक और समसामयिक प्रस्तुति..
जवाब देंहटाएंसच है, हाल फकीरों जैसा हो गया है, हमारा।
जवाब देंहटाएंसही में आज आम आदमी हालत खस्ता ही होती जा रही है
जवाब देंहटाएंएक एक पंक्ति सच है.
जवाब देंहटाएंबिल्कुल सच कहा....सुन्दर प्रस्तुति ||
जवाब देंहटाएंसौ फीसदी सही
जवाब देंहटाएंShandaar rachnaa Shashtriji !
जवाब देंहटाएंहरी घास छीलने को, आ गये अमीर हैं।
जवाब देंहटाएंक्या खूब ग़ज़ल लिखा है आपने!!
देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गयी भगवान् !
जवाब देंहटाएंis baar to urdu ke shabdon ka bhee bahut gazab prayog kiya hai aapne..!!
जवाब देंहटाएंNice post .
जवाब देंहटाएंआपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा
Bloggers' Meet Weekly men
http://hbfint.blogspot.com/2011/11/19-happy-islamic-new-year.html
ज़िन्दगी के हाट में, बेचते हैं मौत को,
जवाब देंहटाएंधीरता को जीमने को, आ गये अधीर हैं।
वाह ...बिल्कुल सच कहती ये पंक्तियां ।
शास्त्री जी ने ओबामा के चित्र के साथ उनकी 'वालमार्ट 'आदि कंपनियों को फकीर बताया है और टिप्पणीकारों ने अपने देश की स्थिति पर ले लिया है। वस्तुतः ये विदेशी व्यापारी फकीर नहीं लुटेरे हैं।
जवाब देंहटाएंहमारा अपने-आप को लुटाने का शौक पुराना है,जो कायम है.सादार धन्यवाद,एक बार
जवाब देंहटाएंअपने-आप को देखने का.
वाह सर...
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया...
सादर...
बहुत सही कहा आपने
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