![]() इक पुराना पेड़ है अब भी है हमारे गाँव में।
चाक-ए-दामन सी रहा अब भी हमारे गाँव में।।
सभ्यता के ज़लज़लों से लड़ रहा है रात-दिन,
रंज-ओ-ग़म को पी रहा अब भी हमारे गाँव में।
मिल रही उसको तसल्ली देखकर परिवार को,
इसलिए ही जी रहा अब भी हमारे गाँव में।
जानता है ज़िन्दगी की हो रही अब साँझ है,
हाड़ अपने धुन रहा अब भी हमारे गाँव में।
“रूप” में ना नूर है, तेवर नहीं अब वो रहे,
थान मखमल बुन रहा अब भी हमारे गाँव में।
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बहुत ही बेहतरीन रचना , इसको पढ़ने के बाद अंतिम शब्द यहीं हैं मेरे , ॥ तारीफ करूं क्या उसकी जिसने आप को बनाया ॥ आदरणीय धन्यवाद !
जवाब देंहटाएं॥ जय श्री हरि: ॥
बहुत सुन्दर प्रस्तुति !
जवाब देंहटाएंNew post मोदी सरकार की प्रथामिकता क्या है ?
new post ग्रीष्म ऋतू !
मिल रही उसको तसल्ली देखकर परिवार को,
जवाब देंहटाएंइसलिए ही जी रहा अब भी हमारे गाँव में।
जानता है ज़िन्दगी की हो रही अब साँझ है,
हाड़ अपने धुन रहा अब भी हमारे गाँव में।
..वक़्त का तकाजा है ...कितना कुछ बदल जाता है देखते-देखते ..
बहुत बढ़िया
बढ़िया ग़ज़ल
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