मुमकिन नहीं हसीन नजारों के चार पल
बेमौसमी बरसात कहर बनके बरसती
पाते हैं खुशनसीब बयारों के चार पल
सबके नहीं नसीब में होतीं इनायतें
मिलते नहीं सभी को सहारों के चार पल
मुद्दत से दिल के भाव खड़े हैं कतार में
आते कभी-कभी हैं विचारों के चार पल
गुम हो गये जहान से किरदार आज तो
दिल ढूँढता है चैन-करारों के चार पल
करते दिखावा प्यार का आशिक हैं मनचले
सब खोजने चले हैं इशारों के चार पल
अब बागवाँ ही चमन को बरबाद कर रहे
तकते हैं फूल कबसे बहारों के चार पल
पतझड़ में पेड़-पौधों का बेनूर हुस्न है
करते हैं इन्तजार फुहारों के चार पल
बेरंग हो गयी है आज 'रूप' की घटा
गर्दिशजदा फलक के सितारों के चार पल
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सोमवार, 10 जून 2019
ग़ज़ल "बहारों के चार पल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सादर नमस्कार,
जवाब देंहटाएंआपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (18-06-2021) को "बहारों के चार पल'" (चर्चा अंक- 4099) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
धन्यवाद सहित।
"मीना भारद्वाज"
बहुत ही सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल कही है सर ।
जवाब देंहटाएंअति उत्तसम । दिली दाद ।
सादर
बहुत सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंप्रणाम शास्त्री जी, बहुत सुंदर कविता ---अब बागवाँ ही चमन को बरबाद कर रहे
जवाब देंहटाएंतकते हैं फूल कबसे बहारों के चार पल
ख़ूबसूरत ग़ज़ल...
जवाब देंहटाएंबेहतरीन अशआर...
बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय।
जवाब देंहटाएं