बुधवार, 27 जनवरी 2021

गीत "भारत के जननायक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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विपिन चन्द्र पाल बंगाली,
भारत के जननायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
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चाटुकारिता अँगरेजों की,
उनको नहीं सुहाती थी।
गाँधी जी की नरम नीति तो,
उनको रास न आती थी।
पत्रकारिता में बाबू जी,
क्रान्तिदूत संवाहक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
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शिक्षक, लेखक-पत्रकार थे,
स्वतन्त्रता सेनानी थे।
लाल-बाल और पाल,
हमारे भारत की पेशानी थे।
"वन्देमातरम्" पत्र चलाया,
स्वतन्त्रता के गायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
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फूलों की जिनको चाह न थी,
था काँटों को स्वीकार किया।
चन्दन से था कुछ मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार किया।।
झुके नहीं थे, रुके नहीं थे,
जन-गण के अधिनायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
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इस तिकड़ी को शत-शत वन्दन,
नमन हजारों बार करूँ।
चरणों की धूल समझ चन्द्न,
मस्तक पर उनकी क्षार धरूँ।।
वंशी के बदले पाञ्चजन्य ही,
उनके सदा सहायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
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चरण कमल की चाह न थी,
भाता अंगद का एक पाँव।
खुली हवा में आजादी की,
उन्हें सुहाता नगर-गाँव।
ये नर-नाहर थे बंगाली,
भारत भाग्य विनायक थे।
आजादी के परवाने थे,
भारत के उन्नायक थे।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. स्वतंत्रता सेनानियों की महिमा बयान करती बहुत ही सुन्दर रचना..

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  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 29-01-2021) को
    "जन-जन के उन्नायक"(चर्चा अंक- 3961)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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  3. चरण कमल की चाह न थी,
    भाता अंगद का एक पाँव।
    खुली हवा में आजादी की,
    उन्हें सुहाता नगर-गाँव।

    बहुत अच्छा गीत...
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  4. जय हिंद,भारत माता की जय

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  5. प्रणाम शास्त्री जी, चन्दन से था कुछ मोह नहीं,
    ज्वाला को अंगीकार किया।। ऐसे थे हमारे लाल,बाल,पाल...बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं

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