सन-सन शीतल चला पवन, सरदी ने रंग जमाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शरमाया।। जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू, कोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू, दादा जी ने अपने तन पर, कम्बल है लिपटाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शरमाया।। जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है, चन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है, धूप गुनगुनी पाने को, सबका मन है ललचाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शरमाया।। काजू और बादाम, स्वप्न जैसे लगते निर्धन को, मूँगफली खाकर देते हैं, सभी दिलासा मन को, गजक-रेवड़ी के दर्शन कर, दिल को समझाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शरमाया।। |
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बहुत सुंदर गीत आदरणीय।
जवाब देंहटाएंशानदार दोहों की माला....जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू,
जवाब देंहटाएंकोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू,
दादा जी ने अपने तन पर,
कम्बल है लिपटाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शरमाया।।...वाह शास्त्री जी
सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-1-22) को पुस्तकों का अवसाद " (चर्चा अंक-4311)पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
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कामिनी सिन्हा
शुभकामनाओं के संग वन्दन
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है,
जवाब देंहटाएंचन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है,
बहुत सुन्दर सृजन ।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
जवाब देंहटाएंसूरज नभ में शरमाया।।
सटीक वर्णन, सामायिक मौसम पर शानदार दोहे।
सादर।
आदरणीय शास्त्री सर, आपकी कविता में विम्बों के जो दर्शन होते हैं, उससे हम सबों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
जवाब देंहटाएंगजक-रेवड़ी के दर्शन कर,
दिल को समझाया।
आपने मकर संक्रांति पर्व को भी कविता में समहिय कर लिया है। साधुवाद!--ब्रजेंद्रनाथ
जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है,
जवाब देंहटाएंचन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है,
ठंड के मौषम की सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय । बहुत बधाइयाँ ।
जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है,
जवाब देंहटाएंचन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है,
बहुत सुंदर रचना