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गौरव के इतिहास पर, आधारित भूगोल।
जरी-सूत या जूट के, धागे हैं अनमोल।।
ममता की इस डोर में, उमड़ रहा है प्यार।
भावनाओं से हैं बँधे, सम्बन्धों के तार।।
राखी के हर तार में, छिपी हुई है प्रीत।
जब तक सूरज-चाँद हैं, अमर रहेगी रीत।।
कच्चे धागों से बँधा, राखी का त्यौहार।
रोली, अक्षत-तिलक में, छिपा बहन का प्यार।।
अपनी बहनों से कभी, मत होना नाराज।
रक्षा के इस सूत्र की, रखना हरदम लाज।।
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गुरुवार, 23 अगस्त 2018
दोहे "सम्बन्धों के तार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
बुधवार, 22 अगस्त 2018
"ज्येठ भ्राता सम मेरे बहनोई मा. रघुनन्दन प्रसाद"
मंगलवार, 21 अगस्त 2018
कथा और दोहे "कुदरत का कानून" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
"कुदरत का कानून"
कुछ दिनों पहले मेरे बाँयीं
ओर के जबड़े की ऊपर की एक दाढ़ खुक्खल हो कर टूट गयी थी। जिससे खाना खाते समय
भोजन का अंश उसमें फँस जाता था। इसलिए मैं भोजन को चबाने का काम दायी ओर से ही
करता था। कुछ समय बाद दायीं ओर की नीचे की एक दाढ़ हिलने लगी लेकिन खाना खाने
में कोई दिक्कत नहीं होती थी।
कल अचानक दायीं ओर की इस दाढ़
को ऊपर वाली दाढ़ ने इस प्रकार कुचला कि यह एक और को झुक गयी और टूट गयी। मन में
बहुत चिन्ता हुई और इस चिन्ता ने सोचने को मजबूर कर दिया कि आखिर अपने ही घर के
अभिन्न साथी को दूसरे साथी घर से बाहर क्यों कर देते हैं?
तभी विचार आया कि जब घर का
कोई सदस्य मर जाता है तो उसे जल्दी से जल्दी घर से बाहर कर दिया जाता है। शायद
इसीलिए मेरे मुख रूपी घर से एक सदस्य के निष्प्राण होने पर घर के दूसरे सदस्यों
ने यह किया होगा। अर्थात कुदरत के कानून से ही लौकिक कानून बने होंगे।
समझ न आया आज तक, कुदरत का विज्ञान।
निर्बल को जीने नहीं, देते हैं बलवान।।
कुदरत के कानून से, मानव है अंजान।
इसीलिए अभिमान में, रहता है इंसान।।
जग में सब कुछ है सुलभ, रखना हरदम ध्यान।
कर्मों के अनुसार ही, मिले मानअपमान।।
जीते जी आया नहीं, कभी गाय का ध्यान।
मर जाने के बाद क्यों, करते हैं गोदान।।
मानव कितना ही रहे, बनकर अफलातून।
दया कभी करता नहीं, कुदरत का कानून।।
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सोमवार, 20 अगस्त 2018
दोहे "सीख सिखाते ज्येष्ठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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बहती गंगा झूठ की, गिरी सत्य पर गाज।
पापकर्म बढ़ने लगे, दूषित हुआ समाज।।
लुप्त हुई है चेतना, सोया हुआ दिमाग।
ओ भारत के आदमी, सुबह हुई अब जाग।।
बदल न पाये आज तक, निर्धन की तकदीर।
सन्तों की हैं आज तो, झूठी सब तकरीर।।
सहजयोग की प्रेरणा, करती है कुलश्रेष्ठ।
आओ जनम सुधार लें, सीख सिखाते ज्येष्ठ।।
जन-जीवन रक्षित रहे, मिटें यहाँ अन्याय।
मिलकर करने चाहिए, सबको आज उपाय।। |
रविवार, 19 अगस्त 2018
दोहे "आपस में मतभेद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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अपनी भाषा में नहीं, न्यायालय में काज।
आजादी से है अभी, मीलों दूर सुराज।।
इन्द्र देवता आपसे, इतनी है अरदास।
उतना पानी दीजिए, जितनी जग को प्यास।।
भुवन भास्कर जब कभी, ले लेता अवकाश।
मेघों से आछन्न हो, तब नीला आकाश।।
दाता सबका एक है, लेकिन नाम अनेक।
लीला उसकी देखकर, है असमर्थ विवेक।।
राम और रहमान में, लोग कर रहे भेद।
इसीलिए तो हो रहे, आपस में मतभेद।।
देशभक्ति का हो रहा, धीरे-धीरे ह्रास।
ऐसी हालत देखकर, मन हो रहा उदास।।
नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश।
भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।। |
शनिवार, 18 अगस्त 2018
दोहे "सिमट गया संसार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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बात-बात पर हो रही, आपस में तकरार।
रिश्तों-नातों में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
झगड़ा है सुख के लिए, अब अपनों के बीच।
बिन पानी के डूबते, तट पर देखो नीच।।
आपाधापी-स्वार्थ में, सिमट गया संसार।
हरे-भरे परिवेश से, नहीं किसी को प्यार।।
पेड़ घट रहे धरा से, बढ़ता जाता ताप।
झेल रहे हम अवश हो, पीड़ा को चुपचाप।।
देख रीत संसार की, मन हो रहा उदास।
धन-दौलत तो पास है, मगर नहीं उल्लास।।
पंजी-दस्सी-चवन्नी, हुई चलन से दूर।
हुआ अठन्नी-रुपइया, अब कितना मजबूर।।
जब से आया चलन में, दो हजार का नोट।
बढ़ती महँगाई रही, तब से हृदय कचोट।।
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शुक्रवार, 17 अगस्त 2018
दोहे "उजड़ गया है नीड़" श्रद्धांजलि अटलबिहारी वाजपेई
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अटल बिहारी की नहीं, मिलती कहीं मिसाल।
लीन हो गया शून्य में, भारत माँ का लाल।।
हंस पलायन कर गया, उजड़ गया है नीड़।
दर्शन करने देह का, उमड़ी भारी भीड़।।
आने-जाने के नहीं, नियत दिवस-तारीख।
अटल बिहारी दे गये, सारे जग को सीख।।
कथनी-करनी में अटल, सदा रहे अनुरक्त।
शब्दों से अलमस्त थे, धन से बड़े विरक्त।।
अटल बिहारी हों भले, चिर निद्रा में लीन।
पुनर्जन्म लेंगे यहाँ, सबको यही यकीन।।
देशभक्ति-दलभक्ति के, संगम थे अभिराम।
अमर रहेगा जगत में, अटल आपका नाम।।
अस्त हो गया गगन से, स्वस्थ हास-परिहास।
लोकतन्त्र में काव्य का, मेला हुआ उदास।
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