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जिनका पेटभरा
हो उनको, भोजन नहीं कराऊँगा।
जिस महफिल में
उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।
महाइन्द्र की पंचायत
में, भेदभाव की है भाषा,
अपनो की महफिल
में, बौनी हुई सत्य की परिभाषा,
ऐसे सम्मेलन
में, खुद्दारों का होगा मान नहीं,
नहीं टिकेगी
वहाँ सरलता, ठहरेंगे विद्वान नही,
नोक लेखनी की
अपनी में, भाला सदा बनाऊँगा।
जिस महफिल में
उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।
जिस सरिता में
बहती प्रतिपल, व्यक्तिवाद हो धारा,
उससे लाख गुना
अच्छी है, रत्नाकर की जल खारा,
नहीं पता था अमृत
के घट में, होगा विष भरा हुआ,
आतंकों की
परछायी से, राजा होगा डरा हुआ,
जिस व्यंजन को
बाँटे अन्धा, उसे नहीं मैं खाऊँगा।
जिस महफिल में
उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।
उस पथ को कैसे
भूलूँगा, जिस पथ का निर्माता हूँ,
मैं चुपचाप
नहीं बैठूँगा, माता का उद्गाता हूँ,
ऊसर धरती में
भी मैंने, बीज आस के बोए हैँ,
शब्दों की माला
में, नूतन मनके रोज पिरोए हैं,
खर-पतवार हटा
उपवन में, पौधे नये लगाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू
बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।
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बेहतरीन रचना है
जवाब देंहटाएंबहुत खुबसूरत गीत !
जवाब देंहटाएंरहने दो मुझे समाधि में !
सुंदर रचना !
जवाब देंहटाएंनहीं पता था अमृत के घट में, होगा विष भरा हुआ,
जवाब देंहटाएंआतंकों की परछायी से, राजा होगा डरा हुआ,
जिस व्यंजन को बाँटे अन्धा, उसे नहीं मैं खाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा। ............बेहतरीन.
वाह, बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंBehad umda prastuti .....!!
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंseeds of love in barren land, any thing is possible with will and hard work.
हटाएंजिस महफिल में उल्लू बैठे वहां मैं नहीं गाऊंगा---
जवाब देंहटाएंसत्य को कह पाना ही सत्य की रचना कर पाता है.
नमन