नहीं परोसें छन्द में, निज मन का विज्ञान।।
छन्द नहीं जो जानते, सुन लो एक सुझाव।
मुक्तछन्द में ही
रचो, निज मन के अनुभाव।।
गणना अक्षर-शब्द की,
होती है क्या चीज।
छन्दों की कैसे भला, होगी उन्हें तमीज।।
छेंप मिटाने के
लिए, केवल करते तर्क।
ऐसे लोगों से सदा,
रहना सदा सतर्क।।
घर में आकर जो
नहीं, कर पाते शालाक्य।
चुरा रहे बेखौफ
वो, विद्वानों के वाक्य।।
समालोचना में
नहीं, चलती कोई घूस।
लेखक के तो शब्द
ही, होते हैं फानूस।।
चला रहे जो माँग कर, अब तक अपना काम।
दुनिया में होता नहीं, भिखारियों का नाम।।
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उम्दा आदरणीय 👌
जवाब देंहटाएंचला रहे जो माँग कर, अब तक अपना काम।
जवाब देंहटाएंदुनिया में होता नहीं, भिखारियों का नाम।।
बढ़िया दोहावली शास्त्रीजी की :
परिभाषित करती छंद मुक्तछंद ,
शास्त्र बद्ध या स्वच्छंद।
भाषण अब तक पढ़ रहे लिखवा कर श्री मान ,
इनमें अपना कछु नहीं न कोई पहचान।
veersa.blogspot.com
veerujan.blogspot.com
veerujibraj.blogspot.com
वाह
जवाब देंहटाएंसही है सर आज दौर चल पडा है छंद में लिख कर खुद को आदर्श कवि के रुप में स्थापित करने का, शिक्षक भी जल्द उपलब्ध हो रहे हैं, और अपक्य से छंद जगह जगह दिखाई दे रहे हैं, ना मात्रा की सही गणना ना लघु गुरु के स्थान का पता दोहा छंद तो सबसे ज्यादा लिखा जा रहा है, और प्रायः मात्राओं के ज्ञान के बिना, सच है कि इससे अच्छा अपनी अभिव्यक्ति को छंद मुक्त प्रवाह दें और सुन्दर लेखन कार्य में सहयोग करें सिखना गलत नही है पर परिपक्वता आये बिना आधा सही आधा गलत लिख कर खुद को और सामान्य जानकारी रखने वालों को धोखा तो न दें।
जवाब देंहटाएंसर आपकी अभिव्यक्ति की सदा कायल रही हूं और ये तो एक अहम और वैचारिक मुद्दा है।
एक बहुत ही विचारशील रचना।
दोहा छंद में, सादर।
वाह!!!
जवाब देंहटाएंबहुत सटीक...
जी गुरु जी शब्द शब्द सत्य ! हमारे जैसे अनाडी नये कलमकारों के लिए एक पाठशाला और कड़ा सबक | हार्दिक आभार और नमन |
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