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मेहनतकश मजदूर है, आज मजे से दूर।
रोटी-रोजी के लिए, कितना है मजबूर।।
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श्रम करके भी श्रमिक तो, रहा मजे से दूर।
खाता नहीं हराम का, जो होता मजदूर।।
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कल तक सूखा झेलते, अब बारिश की मार।
निर्धन-श्रमिक-किसान का, खिसक रहा आधार।।
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खुद को वाद-विवाद से, रखती हरदम दूर।
जनता के ही राज में, जनता है मजदूर।।
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जो रखता मन में नही, किसी तरह का मैल।
बेगारी वो कर रहा, ज्यों कोल्हू का बैल।।
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काम-धाम को छोड़कर, हुए आज मजबूर।
घर जाने की आस में, खड़े हुए मजदूर।।
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सन्नाटा बाजार में, समय हुआ विकराल।
नोट जेब में हैं नहीं, कौन खरीदे माल।।
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कोरोना के काल में, घर से होकर दूर।
दर-दर ठोकर खा रहे, बेचारे मजबूर।।
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जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(२३-०५-२०२०) को 'बादल से विनती' (चर्चा अंक-३७१०) पर भी होगी
आप भी सादर आमंत्रित है
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अनीता सैनी
विडंबना है कि उसी बेहाली, मजबूरी, हताशा को राजनीति का दांव बना लिया गया है
जवाब देंहटाएंबहुत सही लिखा सर!
जवाब देंहटाएंजो देश का आधार हैं आज उनका ही हाल बेहाल है।
सादर
आज के हालात पर बहुत सटीक रचना.
जवाब देंहटाएंवाह!सर ,मजदूरों की मजबूरी को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया है आपनें ।
जवाब देंहटाएंबेबस, लाचार, बेरोजगाव श्रमिकों का अपनी कविता के माध्यम से उनके जीवन में उतप्नन वर्तमान समस्या को बहुत ही सहज एवं सरल तरीके से लिखा है आपने । - सादर नमस्कार
जवाब देंहटाएंआदरणीय सारः, प्रवासी मजदूरों की मजबूरी की मार्मिक अभिव्यक्ति! --ब्रजेंद्रनाथ
जवाब देंहटाएंयह दोहे सच्चाई का बयान करते हैं
जवाब देंहटाएंप्रवासी मजदूरों की मजबूरी बयां करते लाजवाब दोहे।
जवाब देंहटाएंप्रवासी मजदूरों की मजबूरी बयां करते लाजवाब दोहे।
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