"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 26 मई 2019

दोहे "हार गये सामन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेटा-बेटी और माँ, करते नाटक खूब।
काँगरेस की धरा पर, नहीं उगेगी दूब।।

टूटा कुनबेवाद से, जन-गण का विश्वास।
जनता को परिवार से, नहीं रही अब आस।।

गाँधी जी के स्वप्न को, किया नेस्त-नाबूद।
काँगरेस का अब नहीं, बाकी बचा वजूद।।

देख रहे दिग्गज सभी, लेकिन बैठे मौन।
अब बिल्ली के गले में, घण्टा बाँधे कौन।।

हालत बिगड़ी है बहुत, काँगरेस की आज।
मोदी जी के साथ में, अब चल पड़ा समाज।।

चालबाजियाँ अब सभी, समझ गयी मखलूक।
नरसिंहा के साथ में, कैसा किया सुलूक।।

करणी का फल आज तो, भुगत रहे युवराज।
हुई कोढ़ में खाज अब, जिसका नहीं इलाज।।

काँगरेस का हो गया, भारत से अब अन्त।
लोकतन्त्र के समर में, हार गये सामन्त।

शनिवार, 25 मई 2019

दोहे "मोदी की सरकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जनता ने युवराज को, फिर से दिया नकार।
जोर-शोर से आ गयी, मोदी की सरकार।।

काँगरेस के जब तलक, पप्पू हैं अध्यक्ष।
सबल नहीं होगा कभी, काँगरेस का पक्ष।।

जनता जिसको चाहती, उसको मिलता ताज।
जिसमें हो गम्भीरता, वो ही करता राज।।

जिसका होता देश में, पाक-साफ किरदार।
सत्ता-शासन का वही, होता है हकदार।।

नीयत में होता नहीं, जिसकी कोई खोट।
मिलते आम चुनाव में, उसको ज्यादा वोट।।

दशकों से दिल में रहा, जिनके भारी बैर।
जनता खूब समझ गयी, मतलब की यह सैर।।

लोकतन्त्र में हो गये, अब सम्पन्न चुनाव।
डूब गयी मझधार में, ठगबन्धन की नाव।।

शुक्रवार, 24 मई 2019

बालकविता "शिव-शंकर को प्यारी बेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो शिव-शंकर को भाती है 
बेल वही तो कहलाती है 
 
तापमान जब बढ़ता जाता 
पारा ऊपर चढ़ता जाता 

अनल भास्कर जब बरसाता 
लू से तन-मन जलता जाता 
 
तब पेड़ों पर पकती बेल 
गर्मी को कर देती फेल 

इस फल की है महिमा न्यारी 
गूदा इसका है गुणकारी 
 
पानी में कुछ देर भिगाओ 
घोटो-छानो और पी जाओ 

ये शर्बत सन्ताप हरेगा 
तन-मन में उल्लास भरेगा 

गुरुवार, 23 मई 2019

दोहे "बिकती नहीं तमीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।

वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज।।

करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में अब भी बहे, पतित-पावनी धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन नहीं विपक्ष की, नाव लग रही पार।।

कृपण बने खुद के लिए, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

रखना नहीं दिमाग में, राजनीति में मैल।
खटते रहना रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।

बुधवार, 22 मई 2019

ग़ज़ल "कवायद कौन करता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है
बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है

शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को,
मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है

सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से
यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है

मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी
वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है

ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये
मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है

सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे
कमल के बिन सरोवर पर, कवायद कौन करता है

मंगलवार, 21 मई 2019

ग़ज़ल "आपस में सुर मिलाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन की हकीकत का, इतना सा है फसाना
खुद ही जुटाना पड़ता, दुनिया में आबोदाना

सुख के सभी हैं साथी, दुख का कोई न संगी
रोते हैं जब अकेले, हँसता है कुल जमाना

घर की तलाश में ही, दर-दर भटक रहे हैं
खानाबदोश का तो, होता नहीं ठिकाना

अपना नहीं बनाया, कोई भी आशियाना
लेकिन लगा रहे हैं, वो रोज शामियाना

मंजिल की चाह में ही, दर-दर भटक रहे हैं
बेरंग जिन्दगी का, उलझा है ताना-बाना

 अशआर हैं अधूरे, ग़ज़लें नहीं मुकम्मल
दुनिया समझ रही है, लहजा है शायराना

हो हुनर पास में तो, भर लो तमाम झोली
मालिक का दोजहाँ में, भरपूर है खजाना

लड़ते नहीं कभी भी, बगिया में फूल-काँटे
सीखो चमन में जाकर, आपस में सुर मिलाना

दिल की नजर से देखो, मत रूप-रंग परखो
रच कर नया तराना, महफिल में गुनगुनाना
  

सोमवार, 20 मई 2019

दोहे "आम दिलों में खास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आम पिलपिले हो भले, देते हैं आनन्द।
उन्हें चूसने में मिले, लोगों को मकरन्द।।
--
निर्वाचन तक ही रहेंआम दिलों में खास।
लेकिन उसके बाद मेंआती पुनः खटास।।
--
डाल-पाल के आम में, जब तक भरी मिठास।
तब तक रहती आम सेनातेदारी खास।।
--
आम-खास के खेल में, आम गया है हार।
आम खास की कर रहा, सदियों से मनुहार।।
--
खाते-खाते आम कोलोग बन गये खास।
मगर आम की बात काकरते सब उपहास।।
--
अमुआ अपने देश के, दुनिया में मशहूर।
लेकिन आज गरीब की, हुए पहुँच से दूर।।
--
मीठा-मीठा आम में, भरा हुआ है माल।
इसीलिए तो आम को, कहते लोग रसाल।।

रविवार, 19 मई 2019

दोहे "खिले कमल का फूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


है बदरी-केदार की, महिमा अपरम्पार।
मोदी मन्नत माँगने, आये  हर के द्वार।।

सारी बाधायें हरो, हे बदरी-केदार।
सिंहासन की नाव को, लगा दीजिए पार।।

निष्कण्टक शासन करूँ, राह करो आसान।
भोले बाबा भक्त को, दे देना वरदान।।

जी.यस.टी. की भूल को, माफ करो भगवान।
नोटों की बन्दी नहीं, होगी अब श्रीमान।।

अब तक मैंने जो चली, लोकतन्त्र में चाल।
उनसे मेरे देश का, सुधर न पाया हाल।।

सारे लोग विपक्ष के, मुझ पर करते वार।
एक बार दे दीजिए, शासन का अधिकार।।

जगतनियन्ता कीजिए, माफ हमारी भूल।
ऐसा वर दे दीजिए, खिले कमल का फूल।।

शनिवार, 18 मई 2019

दोहे "हिंसा का परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ओछी हरकत वो करें, जिनके टेढ़े कान।
कहने को इंसान हैं, लेकिन हैं हैवान।।

पक्षपात से पूर्ण हैं, सरकारी आदेश।
आज हमारे देश में, हिंसा का परिवेश।।

बने हुए आयोग हैं, पक्षपात के धाम।
जो भी शासक चाहता, होते वो ही काम।।

सत्ता के अनुकूल हैं, सरकारी आयोग।
दफ्तर में मिलता नहीं, निर्धन को सहयोग।।

हाथों में बन्दूक हैं, चेहरा है मासूम।।
हिंसा करने के लिए, रहे देश में घूम।।

नियम और कानून सब, लगते हैं विद्रूप।
लोकतन्त्र का आजकल, बहुत घिनौना रूप।।

नेताओं का आचरण, जनता के प्रतिकूल। 
सत्ता के मद में करें, बातें ऊल-जुलूल।।

शुक्रवार, 17 मई 2019

बुद्धपूर्णिमा पर कुछ दोहे "आओ गौतम बुद्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो ले जाये जो लक्ष्य तक, वो पथ होता शुद्ध।
भारत तुम्हें पुकारता, आओ गौतम बुद्ध।।

बोधि वृक्ष की छाँव में, मिला बुद्ध को ज्ञान।
अन्तर्मन से छँट गया, तम का सब अज्ञान।।

सुत-दारा को छोड़कर, वन में किया निवास।
राज-पाट सिद्धार्थ को, कभी न आया रास।।

जिसका अन्तःकरण हो, सभी तरह से शुद्ध।
जीता जो जग के लिए, वो कहलाता बुद्ध।।

बुद्धम् शरणम् आइए, पकड़ बुद्धि की डोर।
चलो धर्म की राह में, होकर भाव-विभोर।।

दिव्य ज्ञान की खोज में, मानव हो संलग्न।
बौद्ध धर्म कहता यही, रहो ध्यान में मग्न।।

सत्य-अहिंसा दूत थे, प्यारे गौतम बुद्ध।
दूर किया जिसने सभी, वातावरण अशुद्ध।।

गुरुवार, 16 मई 2019

गीत "चलने से कम दूरी होगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक')

महक रहा है मन का आँगन,
दबी हुई कस्तूरी होगी।
दिल की बात नहीं कह पाये,
कुछ तो बात जरूरी होगी।।

सूरज-चन्दा जगमग करते,
नीचे धरती, ऊपर अम्बर।
आशाओं पर टिकी ज़िन्दग़ी,
अरमानों का भरा समन्दर।
कैसे जाये श्रमिक वहाँ पर,
जहाँ न कुछ मजदूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।

मुट्ठी में है सारी दुनिया,
मोबाइल सब काम कर रहा।
चिट्ठी-पत्री का युग बीता,
पत्रालय आराम कर रहा।
ऊहापोह भरे जीवन में,
सबकी कुछ मजबूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।

हर मुश्किल का समाधान है,
सुख-दुख का चल रहा चक्र है।
लक्ष्य दिलाने वाला पथ तो,
कभी सरल है, कभी वक्र है।
चरैवेति को भूल न जाना,
चलने से कम दूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।

अरमानों के आसमान का,
ओर नहीं है, छोर नहीं है।
दिल से दिल को राहत होती,
प्रेम-प्रीत पर जोर नहीं है।
जितना चाहो उड़ो गगन में,
चाहत कभी न पूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।

रूप-रंग पर गर्व न करना,
नश्वर काया, नश्वर माया।
बरगद-पीपल-नीम पथिक को,
देता हरदम शीतल छाया।
साजन से ही तो सजनी की,
सजी माँग सिन्दूरी होगी।
कुछ तो बात जरूरी होगी।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails