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मंगलवार, 19 नवंबर 2019

दोहे "रहना भाव-विभोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सबसे सुन्दर जगत में, होता फूल कपास।
जीवन में इस सुमन से, छा जाता उल्लास।।
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कभी चढ़ाई है यहाँ, होता कभी ढलान।
नहीं समझना सरल कुछ, जीवन का विज्ञान।।
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सच्ची होती मापनी, झूठे सब अनुमान।
ताकत पर अपनी कभी, मत करना अभिमान।।
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कंचन काया को कभी, माया से मत तोल।
दौलत के अभिमान में, बुरे वचन मत बोल।।
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नहीं झेल पाया मनुज, कभी समय का वार।
ज्ञानी, राजा-रंक भी, गये समय से हार।।
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दाता के है हाथ में, सकल जगत की डोर।
हरदम उसकी रजा में, रहना भाव-विभोर।।
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कुदरत के कानून से, बचा न अब तक कोय।
जो चाहें भगवान जी, वैसा जग में होय।।
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कभी 'रूप' की धूप पर, मत करना अभिमान।
डरकर रहना समय से, समय बड़ा बलवान।।
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सोमवार, 18 नवंबर 2019

दोहे "फूटनीति का रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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राजनीति के जाल में, फँसे राम-रहमान।
मन्दिर-मस्जिद का नहीं, पथ लगता आसान।।
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न्यायालय के न्याय पर, क्यों उठ रहे सवाल।
अरजी पुनर्विचार की, है अब नया बवाल।।
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हिन्दू-मुस्लिम ने किया, निर्णय था स्वीकार।
लेकिन कुछ शातिर अभी, झगड़े को तैयार।।
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साफ विरासत का हुआ, न्यायालय में पक्ष।
होंगे दैरो-हरम के, अलग-अलग अब कक्ष।।
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चढ़ा इबादत में कुटिल, फूटनीति का रंग।
शैतानों की सोच से, चैन हो रहा भंग।।
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हिन्दू पूजा को करें, मुस्लिम पढ़ें नमाज।
कहते दोनों पन्थ ये, सुख से रहे समाज।।
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सूफी-सन्तों ने दिया, दुनिया को उपदेश।
अपने प्यारे देश का, शान्त रखो परिवेश।।
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रविवार, 17 नवंबर 2019

दोहे "वन्दना - करता हूँ मैं ध्यान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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नमन आपको शारदे, मन के हरो विकार।
नूतन छन्दों का मुझे, दो अभिनव उपहार।।
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तुक-लय-गति का है नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।
मेधावी मुझको करो, मैं मूरख नादान।।
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सबसे पहले आपका, करता हूँ मैं ध्यान।
शब्दों को पहनाइए, कुछ निर्मल परिधान।।
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गीत-ग़ज़ल-दोहे लिखूँ, लिखूँ बाल साहित्य।
माता मेरे सृजन में, भर देना लालित्य।।
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लिखने वाली आप हो, मैं हूँ मात्र निमित्त।
पावन करना चित्त बस, नहीं चाहिए वित्त।।
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बैठक में अज्ञान की, पसरी हुई जमात।
विद्वानों को हाँकते, अब धनवान बलात।।
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देवी हो माँ ज्ञान की, ऐसे करो उपाय।
साधक वीणापाणि के, कभी न हों असहाय।।
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जगत गुरू बन जाय फिर, अपना प्यारा देश।।
वीणा की झंकार से, पावन हो परिवेश।।
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शनिवार, 16 नवंबर 2019

दोहे "दिन हैं अब नजदीक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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रामलला को मिल गयामन्दिर का अधिकार।
सदियों का सपना यहाँ, होगा अब साकार।।
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होगा फिर आबाद अब, उजड़ा जम्बूद्वीप।
जल जायेंगे घरो में, खुशियों के अब दीप।।
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सिंधुनदी-राबीनदीझेलम और चनाब।
होंगी हिन्दुस्तान कीकहता इनका आब।।
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हिस्सा हिन्दुस्तान कासिंध और पंजाब।
गिलगित से पख्तून सेआता यही जवाब।।
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ननकाना साहिब रहाहमको आज पुकार।
नौशेरा लाहौर परकर लो अब अधिकार।।
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करते पाकिस्तान के, लोग यही आह्वान।
कब्जा पाकिस्तान सेछोड़ो अब इमरान।।
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काला धन हो जायगाजड़ से सारा साफ।
गद्दारों को देश अबनहीं करेगा माफ।।
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हर्ष और उल्लास केदिन हैं अब नजदीक।
सबकी पूँजी की सघन, होगी अब तसदीक।।
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शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

दोहे "उल्लू की है जात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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दुनिया में देखे बहुत, हमने जहाँपनाह।
उल्लू की होती जिन्हें, कदम-कदम पर चाह।।
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उल्लू करते हों जहाँ, सत्ता पर अधिकार।
समझो वहाँ समाज का, होगा बण्टाधार।।
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खोज रहें हों घूस के, उल्लू जहाँ उपाय।
फिर ऐसी सरकार में, कैसे होगा न्याय।।
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दिनभर जो सोता रहे, जागे पूरी रात।
वो मानव की खोल में, उल्लू की है जात।।
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जगह-जगह फैला हुआ, उल्लू का आतंक।
देख लीजिए ताल को, जल में पसरा पंक।।
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सत्ता के मद-मोह में, बनते सभी उलूक।
इसीलिए होता नहीं, अच्छा कभी सुलूक।।
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बैठा जिनके शीश पर, उल्लू जी का भूत।
आ जाता है खुद वहाँ, लालच बनकर दूत।।
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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

गीत "चढ़ा हुआ बुखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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है नशा चढ़ा हुआखुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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मुश्किलों में हैं सभीफिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप सेआज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बानशान-दानस्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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हो गये उलट-पलटवायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिएकायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान परसम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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अंजुमन पे आजसारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका काहर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गयेखार पर निखार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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झूठ के प्रभाव सेसत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव सेआदमी मरा हुआ,
राम के ही देश मेंराम बेकरार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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बुधवार, 13 नवंबर 2019

बालगीत "जन्मदिवस चाचा नेहरू का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जन्मदिवस चाचा नेहरू का, 
बच्चों भूल न जाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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नित्य-नियम से सदा सींचना, 
बगिया की फुलवारी।
मत-मजहब के गुलदस्ते सी, 
वसुन्धरा है प्यारी।
अपनी इस पावन धरती पर, 
वैमनस्य मत उपजाना।
 ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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सुख-दुख का तो दुनियाभर में, 
चक्र सदा चलता रहता।
वो महान जो दोनों को, 
सहजभाव से है सहता।
विपदाओं के क्षणिक काल में, 
कभी न तुम घबराना।
 ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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पथ में कंकड़-पत्थर बिखरे, 
काँटे उगे चमन में।
पथ पर आगे बढ़ते जाना, 
आशा रखकर मन में।
सत्य-अहिंसा हर हालत में, 
निज हथियार बनाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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भारत के हैं भाग्य विधाता, 
होनहार सब बच्चे।
छल-फरेब को नहीं जानते, 
बालक होते सच्चे।
प्यार बाँटना सारे जग में, 
सबको गले लगाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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मंगलवार, 12 नवंबर 2019

समय का फेर (संस्मरण) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

समय का फेर
(संस्मरण)
       आज से 55 साल पहले की बात है। उस समय मेरी आयु 14-15 साल की रही होगी। मैं तब उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में रहता था। उस समय यातायात का साधन रेलगाड़ी या बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी और साइकिल ही थी। उस समय ट्रैक्टर भी नहीं थे। हमारे शहर से सबसे नजदीक सोती का नांगल ग्राम में गंगा घाट था। जो नजीबाबाद से 9 मील दूर था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ गंगा स्नान का विशाल मेला लगता था।
      हम लोग सपरिवार इस मेले में जाते थे। मुझे मेरी छोटी बहन के साथ पिता जी साइकिल पर मेले में ले जाते थे। माता जी और मेरी मझली बहन को वे पड़ोसी किसान की बैलगाड़ी में बैठा देते थे और हम लोग 3 दिनों के लिए नांगल चले जाते थे।
      नजीबाबाद में मेरे मिहल्ले रम्पुरे में पिता जी के दूर के रिश्ते के चाचा नन्हें सिंह रहते थे। जो सादगी में अपना जीवन यापन करते थे। उनकी बहन नन्ही नांगल में रहती थी। जिसके पति का नाम तुंगल था। उनके पास गुजर-बसर के लिए थोड़ी सी खेती थी। मगर ये दोनों पति-पत्नी बहुत अच्छे स्वभाव के थे। जो 15 दिन पहले से तैयारी में लग जाते थे कि रम्पुरे मुहल्ले से हमारे रिश्तेदार मेले में आयेंगे और उनको कोई असुविधा न हो। इसलिए वे अपने कच्चे घर और उसके आगे दो छप्परों में पराली बिछाकर सूत का पाल बिछा देते थे। जहाँ सब लोगों के सोने का प्रबन्ध होता था। किस्से-कहानी और गप-शप में रात गुजारते थे। खाने में मिष्ठान के रूप में गुड़ होता था, चने का साग और धान की या मक्की की रोटी नन्हीं दादी और उनकी पुत्री बहुतायत में बनाती थीं। जो हम शहरियों के लिए मोहन-भोग से कम नहीं होती थी। कुछ लोग घर से रोटी बाँधकर लाते थे तो नन्हीं दादी बहुत बुरा मानती थी और यह कहती थी कि क्या हम लोग इस काबिल भी नहीं हैं कि आप लोगों को खाना खिला सकें। सच पूछा जाये तो दादी के यहाँ भण्डारा चलता था और इस काम में पास पड़ोस के 3-4 परिवार भी उनके साथ लगे रहते थे।
        रात्रि विश्राम करके सुबह सब लोग अपने-अपने घरों को प्रस्थान कर जाते थे। और हाँ, एक बात तो बताना भूल ही गया। दादी के घर के बाहर उनका गन्ने का कोल्हू भी था। जहाँ गुड़, शक्कर और राब बनायी जाती थी। जिसे साप्ताहिक हाट में घर की आवश्यकता पूरी करने के लिए बेच दिया जाता था। क्योंकि उन दिनों चीनी मिल या क्रेशर नहीं थे।
     सुबह होते ही सारे मेहमान 2-3 बैलगाड़ियों पर सवार होकर दो कोस दूर गंगाघाट पर लगे विशाल मेले में जाते थे। गाड़ी में ही खिचड़ी, घी, आम और आँवले का अचार, लकड़ी, खिचड़ी पकाने के लिए एक बड़ी देग और गंगाघाट पर खिचड़ी बनती थी। मेले में शाम तक सब लोग आनन्द मनाते मनोरंजन करते थे और फिर दादी के घर लौट आते थे। विदाई के समय नन्हीं दादी और तुंगल दादा सबको गर्म गुड़ भी भेंट में देते थे।
      अब जमाना बहुत बदल गया है। स्वागत सत्कार मात्र चाय और नमस्ते तक ही सिमट कर रह गया है। आज तो वह निश्छल प्यार और नाते-रिश्तों के मतलब ही बदल गये हैं। कितना अन्तर हो है उस समय के जमाने में और आज के जमाने में।

सोमवार, 11 नवंबर 2019

दोहे "गठबन्धन की नाव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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खींचातानी में हुआ, मोह आपसी भंग।
नूरा-कुश्ती देखकर, लोग रह गये दंग।।
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राजनीति का देश में, इतना बढ़ा खुमार।
सत्ता पाने के लिए, होती मारामार।।
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दशकों से दोनों रहे, सुख-दुख में थे साथ।
लेकिन कुरसी के लिए, छोड़ दिया अब हाथ।।
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नेक-नीति के साथ में, दोनों लड़े चुनाव।
लेकिन डूबी स्वार्थ में, गठबन्धन की नाव।।
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जनता से जो थे किए, मिलकर कौल-करार।
अहम भाव से हो गयी, आपस में तकरार।।
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राजनीति की धूप को, सेंक रहा परिवार।
खानदान के लिए सब, माँग रहे अधिकार।।
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बाहर बने कपोत से, भीतर से हैं काग।
अलग-अलग सुर में सभी, गाते अपने राग।।
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