"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 22 जुलाई 2019

ग़ज़ल "नजारा देख मौसम का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चमन के फूल सहमें हैं, नजारा देख मौसम का
हुए गमगीन भँवरे हैं, नजारा देख मौसम का

फलक में हैं बहुत बादल, नदारत है मगर बारिश
बड़ा हैरान है माली, नजारा देख मौसम का

करो जैसा-भरो वैसा, यही कानून कुदरत का
मियाँ हलकान क्यों होते, नजारा देख मौसम का

जफा करके मिलेगा क्या, यहाँ अहसान का बदला
नजर के सामने अपनी, नजारा देख मौसम का

मिला जितना उसी का, शुक्रिया करना नहीं आया
हकीकत तो हकीकत है, नजारा देख मौसम का

सितारों से नहीं होती, कभी भी रात रौशन है
अँधेरी रात में दिलवर, नजारा देख मौसम का

अदब की अंजुमन में, आज होती रूप की पूजा
सुनाते हैं ग़ज़ल जाहिल, नजारा देख मौसम का

रविवार, 21 जुलाई 2019

ग़ज़ल "वही बस पावमानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वही नदिता कहाती है, भरी जिसमें रवानी है
धरा की सब दरारों को, मिटाता सिर्फ पानी है

पनपती बुजदिली जिसमें, युवा वो हो नहीं सकता
उसी को नौजवां समझो, भरी जिसमें जवानी है

जहाँ ईमान बिकते हों, वहाँ सब बात बेमानी
शिकायत और शिकवों की, वहाँ झूठी कहानी है

इबादत तो जमाने में, सभी दिन-रात करते हैं
अगर दिल से इबादत हो, वही बस पावमानी है

मुनाफे के लिए ही लोग तो, करते तिजारत हैं
सियासत में तिजारत तो, यहाँ पर खानदानी है

भरी हों खामियाँ कितनी, बने फिर भी भले-चंगे
हमारी आज भी फितरत, मगर हिन्दोस्तानी है

बुलन्दी का का पतन होना, जमाने की रवायत है
छिपी है खण्डहरों में भी, इमारत की निशानी है

फकत मतलब में होती है, इनायत लोकशाही में
दिखावे की यहाँ पर रह गयी, अब मेजबानी है

भरी हैवानियत कितनी, मनुजता के लिबासों में
जहाँ में 'रूप' पर होना फिदा, आदत पुरानी है

आज एक पुरानी गज़ल "इक शामियाना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सिर छिपाने के लिएइक शामियाना चाहिए
प्यार पलता हो जहाँवो आशियाना चाहिए

राजशाही महल हो, या झोंपड़ी हो घास की
सुख मिले सबको जहाँ, वो घर बनाना चाहिए

दाँव भी हैं-पेंच भी हैं, प्यार के इस खेल में
इस पतंग को, सावधानी से उड़ाना चाहिए

मुश्किलों से है भरी, ये ज़िन्दग़ानी की डगर
आखिरी लम्हात तक, रिश्ता निभाना चाहिए

जोड़ना मुश्किल बहुत है, तोड़ना आसान है
सभ्यता का आचरण, सबको दिखाना चाहिए

चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है
घर सभी का रौशनी से, जगमगाना चाहिए

आइना दिल का मिला है, देख गर्दन को झुका
“रूप” के अभिमान को, अपने हटाना चाहिए

शनिवार, 20 जुलाई 2019

गीत "पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रंग भी रूप भी छाँव भी धूप भी,
देखते-देखते ही तो ढल जायेंगे।
देश भी भेष भी और परिवेश भी,
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

ढंग जीने के सबके ही होते अलग,
जग में आकर सभी हैं जगाते अलख,
प्रीत भी रीत भीशब्द भी गीत भी,
एक न एक दिन तो मचल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

आप चाहे भुला दो भले ही हमें,
याद रक्खेंगे हम तो सदा ही तुम्हें,
तंगदिल मत बनोसंगदिल मत बनो,
पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

हर समस्या का होता समाधान है,
याद आता दुखों में ही भगवान है,
दो कदम तुम बढ़ोदो कदम हम बढ़ें,
रास्ते मंजिलों से ही मिल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

अब अँधेरों से बाहर भी निकलो जरा,
पथ बुलाता तुम्हें रोशनी से भरा,
हार को छोड़ दोजीत को ओढ़ लो,
फूल फिर से बगीचे में खिल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

दोहे "गोरी का शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अधरों को अच्छा लगे, अधरों का इकरार।
मन को बहुत लुभा रहा, गोरी का शृंगार।।
--
लाल रंग के अधर हैं, घुँघराले से बाल।
दाड़िम जैसे दहकते, उसके गोरे गाल।।
--
कजरारे दो नैन हैं, चितवन करें कमाल।
कानों में झुमकी सजें, बिँदिया चमके भाल।।
--
रत्न-जटित है करघनी, मोती की है माल।
मटक-मटक कर चल रही, हिरणी जैसी चाल।।
--
सजनी साजन के लिए, सजा रही है थाल।
खाने में अच्छी लगे, सब्जी-रोटी-दाल।।
--
चटनी-रोटी भी कभी, कर देती सन्तुष्ट।
जीवनभर होना नहीं, घरवाली से रुष्ट।।
--
बात-बात पर मत करो, कभी रंग में भंग।
जीवन को जीते रहो, अमन-चैन के संग।
--

दोहे "अखबारों में नाम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वृक्षारोपण की लगी, आज सब जगह होड़।
सबने पौधे रोपकर, दिये अधर में छोड़।।
--
गत वर्षों की पौध का, बचा न नाम-निशान।
अधिकारीगण आँकड़े, करते खूब बखान।।
--
महज दिखावे के लिए, सब सरकारी काम।
यहाँ सभी को चाहिए, अखबारों में नाम।।
--
रोपो पौधे कम भले, लेकिन करो रखाव।
लेकिन धरती के लिए, रखिए सेवा-भाव।।
--
शाक-पात, फल-फूल-जल, देती हमें जमीन।
लेकिन सब भू-सम्पदा, के दोहन में लीन।।
--
बहुत घिनौनी हो गयीं, लोगों की करतूत।
छल से लोग कमा रहे, धन-सम्पदा अकूत।।
--
सबको अपनी ही पड़ी, जाय भाड़ में देश।
भारत माँ का कर रहे, ये दूषित परिवेश।।
--

बुधवार, 17 जुलाई 2019

दोहे "सद्गुरुओं को रंज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मतलब के हैं अब गुरू, मतलब के हैं शिष्य।
नेह बिना तब पौध का, कैसे बने भविष्य।।
--
लेखन-शोधन के लिए, चलकर आते द्वार।
चेले मतलब के लिए, करते हैं मनुहार।।
--
नहीं छिपाये से छिपें, खिलते फूल कनेर।
मिलकर चेले राह में, लेते नजरें फेर।।
--
हो जाये गुरु-शिष्य का, रिश्ता यदि निष्काम।
तभी सार्थक हो यहाँ, करना दुआ-सलाम।।
--
यदि दैनिक व्यवहार में, बरतें शिष्टाचार।
होगा तब गुरुपूर्णिमा, दिवस यहाँ साकार।।
--
बिकती है बाजार में, शिक्षा देकर मोल।
इसीलिए तो योग्यता, होती डाँवाडोल।।
--
चाहे समझो सीख ये, चाहे समझो तंज।
होता है यह देखकर, सद्गुरुओं को रंज।।

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

दोहे "गुरू पूर्णिमा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चलो गुरू के द्वार पर, गुरु का धाम विराट।
गुरू शिष्य के खोलता, सारे ज्ञान-कपाट।।
--
इस अवसर पर कीजिए, गुरुसत्ता को याद।
गुरुओ को मत दीजिए, जीवन में अवसाद।।
--
जो गुरु का आदर करे, वो है सच्चा शिष्य।
अनुकम्पा से गुरू की, उज्जवल बने  भविष्य।।
--
गुरू पूर्णिमा दिवस पर, मन को करो पवित्र।
नहीं पूजना चित्र को, पूजो मात्र चरित्र।।
--
गुरुपूर्णिमा का दिवस, देता है सन्देश।
जीवन में धारण करो, गुरुओं के उपदेश।।
--
खुला हुआ सबके लिए, विद्यालय का द्वार।
गुरु के चरणों में बहे, ज्ञानगंग की धार।।
--
गुरूकुलों से है बनी, भारत की पहचान।
विद्या का  मिलता जहाँ, सबको समुचित दान।।
--

दोहे "उत्तर अब माकूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

पत्तों को सब सींचते, नहीं सींचते मूल।
नवयुग में होने लगीं, बातें ऊल-जुलूल।।
--
सबके अपने ढंग हैं, अपने नियम-उसूल।
अब आदर-सत्कार को, लोग गये हैं भूल।।
--
चौमासे में उड़ रही, सड़कों पर अब धूल।
वीराना लगता चमन, मुरझाये हैं फूल।।
--
तू-तू मैं-मैं को यहाँ, लोग दे रहे तूल।
आपाधापी में हुए, सब कितने मशगूल।।
--
जो कल तक अनुकूल थे, आज हुए प्रतिकूल।
अहसानों के दाम को, दाता रहे वसूल।।
--
नदियाँ-सागर स्वयं के, काट रहे हैं कूल।
पनप रहे हैं खेत में, खरपतवार-बबूल।।
--
नष्ट हो रहे धरा से, पौधे-पेड़ समूल।
मिलते नहीं सवाल के, उत्तर अब माकूल।।
--

सोमवार, 15 जुलाई 2019

दोहे "गरिमा जीवन सार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गरिमा को मत त्यागिए, गरिमा जीवन सार।
जग में रहने के लिए, गरिमा है उपहार।।

रखना गरिमा को सदा, घर हो या ससुराल।
गरिमा जैसे तत्व को, रखना खूब सँभाल।।

गरिमा बतलाती हमें, साम-दाम के अर्थ।
गरिमा के बिन मनुज के, धर्म-कर्म हैं व्यर्थ।।

गरिमा सुख का सार है, गरिमा ही शृंगार।
गरिमा के कारण बने, मानव का आधार।।

गरिमा का जब तक हमें, मिलता रहता साथ।
तब तक रखते शीश पर, ईश्वर अपने हाथ।।

गरिमा के कारण मिले, चेलों को गुण-ज्ञान।
लेकिन गरिमाहीन को, मिलता है अपमान।।

गरिमा जैसे शब्द की, महिमा बड़ी महान।
गरिमा के बिन विज्ञ भी, कहलाते नादान।।

आभूषण है बदन का, यही स्वर्ण की खान।
गरिमा के हैं सामने, फीके सब सम्मान।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails