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गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

गीत "इंसान बदलते देखे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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तालाबन्दी में हमने, ईमान बदलते देखे हैं।
आड़ धर्म की ले करके, इंसान बदलते देखे हैं।।
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कोरोना आया भारत में, सबको सबक सिखाने को,
निर्मल नीर हुआ नदियों का, पावन हमें बनाने को,
मौलाना की बोली में, फरमान बदलते देखे हैं।
आड़ धर्म की ले करके, इंसान बदलते देखे हैं।।
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भारी पाला दिखा जिधर, उस ओर अचानक जा फिसले,
माना था जिनको अपना, वो थाली के बैंगन निकले,
मक्कारों की टोली में, मैदान बदलते देखे हैं।
आड़ धर्म की ले करके, इंसान बदलते देखे हैं।।
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नहीं भरोसा है नियमन पर, तबलीकी हैवानों को,
छिपा रहे अपने दामन में, कोरोना मेहमानों को,
बीमारों की खोली में, लुकमान बदलते देखे हैं।
आड़ धर्म की ले करके, इंसान बदलते देखे हैं।।
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जीवन की आपाधापी में, झंझावात बहुत फैले हैं,
उजले-उजले तन वालों के, अन्तस तो मैले-मैले हैं,
रंगों की रंगोली में, परिधान बदलते देखे हैं।
आड़ धर्म की ले करके, इंसान बदलते देखे हैं।।
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साग-दाल को छोड़, अमानुष भोजन को अपनाया है,
लुप्त हो गयी सत्य अहिंसा, हिंसा का युग आया है,
कोरोना की डोली में, सुल्तान बदलते देखे हैं।
आड़ धर्म की ले करके, इंसान बदलते देखे हैं।।
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बुधवार, 29 अप्रैल 2020

गीत "जीवन की आपाधापी में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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सुख के बादल कभी न बरसे,
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं।
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं।।
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अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था,
उनके ही अन्तस् मैले हैं।
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं।।
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बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं।
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं।।
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ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं।
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं।।
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मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

"रोटी का गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जिन्दगी का गीत, रोटी मे छिपा है।
साज और संगीत, रोटी में छिपा है।।
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रोटियों के लिए ही, मजबूर हैं सब,
रोटियों के लिए ही, मजदूर हैं सब।
कीमती सोना व चाँदी, तब तलक,
रोटियाँ संसार में हैं, जब तलक।
खेत और खलिहान सुन्दर, तब तलक,
रोटियाँ उनमें छिपी हों, जब तलक।
काल आशातीत रोटी में छिपा है।
साज और संगीत, रोटी में छिपा है।।
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झूठ, मक्कारी, फरेबी, रोटियों के रास्ते हैं,
एकता और भाईचारे, रोटियों के वास्ते हैं।
हम सभी यह जानते है, रोटियाँ इस देश में हैं,
रोटियाँ हर वेश में है, रोटियाँ परिवेश में है।
रोटियों को छीनने को , उग्रवेशी छा गये हैं,
रोटियों को बीनने को ही, विदेशी आ गये हैं।
याद मन्दिर की सताती, रोटियाँ जब पेट में हों,
याद मस्जिद बहुत आती, रोटियाँ जग पेट में हों।
कृत्य का अभिनीत रोटी में छिपा है।
साज और संगीत, रोटी में छिपा है।।
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रोटियों से चल रही है जिन्दगी,
रोटियों से पल रही है बन्दगी।
राम ही रोटी बना और रोटिया ही राम हैं,
पेट की ये रोटियाँ ही, बोलती श्री-राम हैं।
रोटियों से, थाल सजते, आरती के,
रोटियों से, भाल-उज्जवल भारती के।
रोटियों से बस्तियाँ, आबाद हैं,
रोटियाँ खाकर, सभी आजाद हैं।
प्यार और मनमीत, रोटी में छिपा है।
जिन्दगी का गीत, रोटी मे छिपा है।।
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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

बालवन्दना "जय-जय जय वरदानी माता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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जय-जय जय कल्याणी माता।
जय-जय जय वरदानी माता।।

मन है माता मेरा चंचल,
माँग रहा हूँ अविचल सम्बल,
दे दो ज्ञान भवानी माता।
जय-जय जय वरदानी माता।।
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माँ वीणा की तान सुना दो,
शब्दों का आधार बना दो,
दया करो विज्ञानी माता।
जय-जय जय वरदानी माता।।
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गुलशन बन जाये वृन्दावन,
रहे हमेशा खिलता उपवन,
दिवस-रैन मैं तुमको ध्याता।
जय-जय जय वरदानी माता।।
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भक्तिभाव वन्दना जाप हो, 
निराकार-साकार आप हो,
माता का भक्तों से नाता।
जय-जय जय वरदानी माता।।
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रविवार, 26 अप्रैल 2020

गीत "अमलतास-पीले फूलों के गजरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सूरज की भीषण गर्मी से,
लोगो को राहत पहँचाता।।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
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डाली-डाली पर हैं पहने
झूमर से सोने के गहने,
पीले फूलों के गजरों का,
रूप सभी के मन को भाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
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दूभर हो जाता है जीना,
तन से बहता बहुत पसीना,
शीतल छाया में सुस्ताने,
पथिक तुम्हारे नीचे आता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
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स्टेशन पर सड़क किनारे,
तन पर पीताम्बर को धारे,
दुख सहकर, सुख बाँटो सबको,
सीख सभी को यह सिखलाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अमलतास खिलता-मुस्काता।।
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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

गीत "आया पास किनारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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बलखाती-लहराती उमड़ीपर्वत से जल धारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल 'रूप' सँवारा।।
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बहती है उन्मुक्त भाव से, अपनी राह बनाती,
कलकल-छलछल करती, सबको मधुरिम राग सुनाती,
गंगा ने सिखलाया जग को, चरैवेति का नारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल 'रूप' सँवारा।।
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जब-जब कदम बढ़ाता राही, आगे को बढ़ जाता,
तालाबों का नीर, पंक के साथ सदा सड़ जाता,
बैठे-ठाले नहीं किसी को, देता कोई सहारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल 'रूप' सँवारा।।
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बिना नेह के सूखी बाती, कभी नहीं जलती है,
साहस-श्रम से ही तो, जीवन की नौका चलती है,
नाविक की पतवार चली, तो आया पास किनारा।
मैदानों पर आकर, उसने चंचल 'रूप' सँवारा।।
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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

दोहे-विश्व पुस्तक दिवस "पुस्तक से सम्वाद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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पाठक-पुस्तक में हमें, करना होगा न्याय।
पुस्तक-दिन के सार्थक, होंगे तभी उपाय।।
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अब कोई करता नहीं, पुस्तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
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हैं पुस्तक के नाम पर, बस्ते का ही भार।
बच्चों को कैसे भला, पुस्तक से हो प्यार।।
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अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप।
नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।।
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बालक की रुचियाँ समझ, देते नहीं सुझाव।
बिना काम की पुस्तकें, भर देंगी उलझाव।।
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राजनीति में हो गये, पढ़े-लिखे मगरूर।
हितकारी शिक्षा हुई, भारत में मजबूर।।
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दोहे-धरादिवस "धरती का सन्ताप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



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धरा-दिवस पर कीजिए, यही प्रतिज्ञा आज।
भू पर पेड़ लगाइए, जीवित रहे समाज।१।
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हरितक्रान्ति से मेटिए, धरती का सन्ताप।
पर्यावरण बचाइए, बचे रहेंगे आप।२।
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पेड़ लगाकर कीजिए, अपने पर उपकार।
करो हमेशा यत्न से, धरती का सिंगार।३।
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नहीं कहीं खाली रहे, खेतों की दीवार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरा दिवस साकार।४।
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प्राणवायु देते सदा, पीपल-वट औ नीम।
दुनियाभर में हैं यही, सबसे बड़े हकीम।५।
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लिखने से होता नहीं, धरा-दिवस साकार।
धरती में है नीर का, सीमित ही भण्डार।६।
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धरती माता तुल्य है, देती प्यार-अपार।
संचित है सबके लिए, धरती में भण्डार।७।
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बालगीत "मिलने आना तुम बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
कैसे भूलें प्यार आपका,
नहीं सूझता कुछ बाबा।।
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छोटा घर है, नया नगर है,
सर्द हवा चलती सर-सर है,
बन जायेंगे नये दोस्त भी,
अभी अकेले हैं बाबा।
पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
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प्यारे चाचा-दादी जी की,
हमको याद सताती है,
विद्यालय की पीली बस भी,
गलियों में नहीं आती है,
भीड़ बहुत है इस नगरी में,
मँहगाई भी है बाबा।
पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
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आप हमारे लिए रोज ही,
रचनाएँ रच देते हो,
बच्चों के मन की बातों को,
सहज भाव से कहते हो,
ब्लॉग आपका बिना नेट के,
कैसे हम देखें बाबा।
पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
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मेरी छोटी बहना को,
बाबा-दादी प्यारी थी,
छोटी होने के कारण वो,
सबकी बहुत दुलारी थी।
बहुत अकेली सहमी सी है,
गुड़िया रानी जी बाबा।
पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
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गर्मी की छुट्टी होते ही,
अपने घर हम आयेंगे,
जो भी लिखा आपने बाबा,
पढ़कर वो हम गायेंगे,
जब भी हो अवकाश आपको,
मिलने आना तुम बाबा।
पापा की लग गई नौकरी,
दूर नगर में अब बाबा।
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