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शनिवार, 17 नवंबर 2018

संस्मरण ‘‘बाबा नागार्जुन’’ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

‘‘आर्य समाज: बाबा नागार्जुन की दृष्टि में’’
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

        राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में हिन्दी के विभागाध्यक्ष वाचस्पति शर्मा थे । बाबा नागार्जुन अक्सर उनके यहाँ प्रवास किया करते थे । इस बार भी जून के अन्तिम सप्ताह में बाबा का प्रवास खटीमा में हुआ । दो जुलाई, 1989, महर्षि दयानन्द विद्या मन्दिर टनकपुर में बाबा नागार्जुन के सम्मान में कवि गोष्ठी का आयोजन था । जिसमें बाबा ने कहा शास्त्री जी 5, 6, 7 जुलाई को मैं खटीमा मे आपके घर रहूँगा । प्रातःकाल 5 जुलाई को प्रातःकाल वाचस्पति जी का बड़ा पुत्र अनिमेष बाबा को लेकर मेरे निवास पर पहुँच गया । 6 जुलाई को सुबह मेरी श्रीमती जी ने बाबा का मनपसन्द नमकीन दलिया नाश्ते में बनाया था । बाबा जी बड़ ही अच्छे मूड में थे । दलिया भी कुछ गरम था । उसी समय बाबा ने अपने जीवन के बाल्यकाल का संस्मरण सुनाया -
         ‘शास्त्री जी उस समय मेरी आयु 12 या 14 वर्ष की रही होगी । तब में संस्कृत विद्यालय बनारस में पढ़ता था । मन में विचार आया कि इलाहाबाद में पं0 गंगाप्रसाद उपाध्याय आर्य समाज के बहुत बड़े कार्यकर्ता हैं, उनसे मिला जाये । उस समय आर्य समाज की बड़ी धूम थी । बाबा ने कहा-
     मैंने अपने दो सहपाठी साथ में चलने के तैयार कर लिए और पदल ही बनारस से इलाहाबाद को चल पड़े । चलते-चलते प्यास लगने लगी । आगे एक गाँव रास्ते में पड़ा तो कुएँ पर गये । पनिहारिनों ने पानी पिलाने से मना कर दिया और कहा भाई तुम पण्डितों के लड़का मालूम होते हो । हम तो नीच जाति की है, हम तुम्हारा धर्म नही बिगाड़ेंगी ।
      प्यास बहुत जोर की लगी थी । हमने बहुत अनुनय-विनय की तो उन्होंने पानी पिलाया । हम तीनों ने ओक से पानी पिया । उसी रास्ते पर एक ऊँट वाला भी जा रहा था । वह आगे-आगे सबसे कहता चला जा रहा था कि भाई पीछे जो तीन ब्राह्मण लड़के आ रहे हैं , इन्होंने दलितों के कुएँ पर पानी पिया है । इनका धर्म भ्रष्ट हो गया है ।
       अतः लोग हमें बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखते । अन्ततः हमने रास्ता छोड़ खेतो की मेढ़-मेढ़ चलना शुरू कर दिया । साथ के दोनो सहपाठी तो कष्टोें को देख कर घबरा कर साथ छोड़ कर वापिस चले गये...वगैरा-वगैरा । किसी तरह इलाहाबाद पहुँचा तो पं0 ग्रंगाप्रसाद उपाध्याय का घर पूछा- लोगों ने बताया कि चौक में पंडित जी रहते हैं । खैर पण्डित जी के घर पँहुचा, उनकी श्रीमती जी से कहा बनारस से आया हूँ, पैदल..... पण्डित जी से मिलना है । उन्होंने प्यार से भीतर बुलाया, तख्त पर बैठाया और गर्म-गर्म दूध एक कटोरे में ले आयीं । जब मैंने दूध पी लिया तो उन्होंने कहा कि तुम विश्राम करो । पं0 जी शाम को 7 बजे तक आयेंगे ।
      शाम को जब पण्डित जी आये तो बातचीत हुई । उन्होंन कहा कि तुम बहुत थके हो कल सभी बातें विस्तार में होगी और अपनी पत्नी कलावती को आवाज लगाई, कहा कि देखो ये अपने सत्यव्रत जी के ही समान हैं , इनको 3-4 दिन तक खूब खिलाओ-पिलाओ.....वगैरा-वगैरा ।
           तीन-चार दिन तक पण्डित जी के यहाँ रहा खूब प्रेम से बाते हुईं । जब विदा हुए तो पण्डित जी, उनकी पत्नी और पुत्र सत्यव्रत रेलगाड़ी पर पहुँचाने आये , टिकट दिलाया ।
       अन्त में उनकी पत्नी ने (उस समय में ) दो रुपये जेब खर्च के लिए दिये । पण्डित जी बोले कि देखो कभी पैदल मत आना । जब भी इच्छा हो टिकट कटा कर रेलगाड़ी से आया करो ।
       उसके पश्चात भी मैं तीन-चार बार पण्डित जी के यहाँ गया व एक-एक सप्ताह ठहरा ।
       अन्त में बाबा नागार्जुन ने बताया कि ‘आर्य समाज बहुत ही अच्छी संस्था है’ परन्तु आजकल पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय सरीखे लोगों की कमी हो गयी है ।’’ साथ ही बताया कि ’’आर्य समाज ऊँचा उठने की प्रथम सीढ़ी है ।’’
डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
पूर्वसदस्य-उत्तराखण्ड अन्य पिछड़ा वर्ग आयोगदेहरादून।
कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

वन्दना "चहकता-महकता चमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आओ माता! सुवासित करो मेरा मन।
शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।

घोर तम है भरा आज परिवेश में,
सभ्यता सो गई आज तो देश में,
हो रहा है सुरा से यहाँ आचमन।
शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।

दो सुमेधा मुझे मैं तो अनजान हूँ,
माँगता काव्य-छन्दों का वरदान हूँ,
चाहता हूँ वतन में सदा हो अमन।
शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।

वन्दना आपकी नित्य मैं कर रहा,
शीश चरणों में, मैं आपके धर रहा,
आपके दर्शनों के हैं प्यासे नयन।
शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।

तान वीणा की माता सुना दीजिए,
मेरे मन को सुमन अब बना दीजिए,
हो हमेशा चहकता-महकता चमन।
शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

ग़ज़ल "नहीं जाती" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कभी आरम्भ की शिक्षा, भुलायी ही नहीं जाती
भवन के नींव की ईंटे, दिखायी ही नहीं जाती

जमाने भर की कमियाँ, हम जमाने को बताते हैं
मगर सन्तान की कमियाँ, गिनायी ही नहीं जाती

जो दिलवर चोर हैं वो डालते खुलकर डकैती को
मगर दौलत स्वयं अपनी, चुरायी ही नहीं जाती

कभी जो दिल के दरवाजे पे, दस्तक रोज देते थे
सभी को दिल की वो दस्तक, सुनायी ही नहीं जाती

जिन्होंने जन्म देकर, रूप को नाजों से पाला है
कभी माँ-बाप की कीमत, चुकायी ही नहीं जाती

बुधवार, 14 नवंबर 2018

बालकविता "काँव-काँवकर चिल्लाया है कौआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का, 
जोड़ा कितना प्यारा।

नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।

काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।

कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली, 
इनका मन बहलाती।।

देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँवकर,
चिल्लाया है कौआ।।

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

"बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू को शत्-शत् नमन!"

बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू को
शत्-शत् नमन!

जिस दिन लाल जवाहर ने था,
जन्म जगत में पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

मोती लाल पिता बैरिस्टर,
माता थी स्वरूप रानी।
छोड़ सभी आराम-ऐश को,
राह चुनी थी बेगानी।।
त्याग वकालत को नेहरू ने,
गांधी का पथ अपनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

आजादी पाने की खातिर,
वीरों ने बलिदान दिया।
अमर सपूतों ने पग-पग पर ,
अपमानों का पान किया।
दमन चक्र से जो गोरों के,
कभी नहीं घबराया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

दागे नहीं तोप से गोले,
ना बरछी तलवार उठायी।
सत्य-अहिंसा के बल पर,
खोई आजादी पायी।
अनशन करकेअंग्रेजों से,
शासन वापिस पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

बच्चों को जो सदा प्यार से,
हँसकर गले लगाता था।
इसीलिए तो लाल जवाहर,
चाचा जी कहलाता था।
अपने जन्मदिवस को जिसने,
बालकदिवस बनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

शासक था स्वदेश का पहला,
अपना प्यारा चाचा।
नवभारत के निर्माता का,
मन था सीधा-साचा।
उद्योगों का जिसने,
चौबिस घंटे चक्र चलाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

"बालगीत और बालकविता में भेद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बालगीत और बालकविता
             बहुत से लोग जानकारी के अभाव में बाल गीत को बाल कविता और बालकविता को बालगीत लिख देते हैं। किन्तु यह विचार नहीं करते कि बालकविता और बालगीत कोई नयी विधा नहीं है। गीत से बालगीत और कविता से बालकविता बना है। अर्थात् बच्चों के लिए लिखा गया पद्य साहित्य। इसके लिए हमें गीत और कविता के बारे में विस्तार से जानना होगा। मैं बिन्दुवार इस विषय पर प्रकाश डालना चाहता हूँ।
     1-  गीत और कविता दोनों में गेयता होती है।
    2-   गीत में अन्तरा होता है जिसमें गीत की प्रारम्भिक पंक्ति अर्थात टेक के अनुसार तुकान्त शब्द होता है।
    3-     गीत को संगीत के रागों में लयबद्ध किया जा सकता है परन्तु कविता को रागों में नहीं बाँधा जा सकता।
    4-     गीत और कविता कलात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं जिनमें विशिष्ट भाषा प्रयोग किया जाता है। जबकि गीत एक संगीत रचना है।
     5-     कविता को गाया भी जा सकता है और पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। लेकिन गीत का तो अर्थ इसके शब्द से ही स्पष्ट होता है अर्थात् गाया जाना।
    6-     कविता कवि के आन्तरिक अनुभावों की अभिव्यक्ति है जबकि गीत में अन्तरे में तुकान्त शब्द लाने के लिए जोर-जबरदस्ती की जाती      
      
      लेख को अधिक स्पष्ट करने के लिए मैं अपना एक बालगीत और एक बाल कविता उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ-
बालगीत (होली)
रंग-गुलाल साथ में लाया।
होली का मौसम अब आया।

पिचकारी फिर से आई हैं,
बच्चों के मन को भाई हैं,
तन-मन में आनन्द समाया।
होली का मौसम अब आया।।

गुझिया थाली में पसरी हैं,
पकवानों की महक भरी हैं,
मठरी ने मन को ललचाया।
होली का मौसम अब आया।।

बरफी की है शान निराली,
भरी हुई है पूरी थाली,
अम्मा जी ने इसे बनाया।
होली का मौसम अब आया।।


मम्मी बोली पहले खाओ,
उसके बाद खेलने जाओ,
सूरज ने मुखड़ा चमकाया।
होली का मौसम अब आया।

बालकविता (शहतूत)
कितना सुन्दर और सजीला।
खट्टा-मीठा और रसीला।।

हरे-सफेदबैंगनी-काले।
छोटे-लम्बे और निराले।।

शीतलता को देने वाले।
हैं शहतूत बहुत गुण वाले।।

पारा जब दिन का बढ़ जाता।
तब शहतूत बहुत मन भाता।

इसका वृक्ष बहुत उपयोगी।
ठण्डी छाया बहुत निरोगी।।

टहनी-डण्ठल सब हैं बढ़िया।
इनसे बनती हैं टोकरिया।।

  रेशम के कीड़ों को पालो।
घर बैठे धन खूब कमालो।।

आँगन-बगिया में उपजाओ।
खेतों में शहतूत उगाओ।।

रविवार, 11 नवंबर 2018

दोहे "छठ माँ का उद्घोष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छठपूजा का आ गया, फिर पावन त्यौहार।
माता जन-गण के हरो, अब तो सभी विकार।।

लोग छोड़कर आ गये, अपने-अपने नीड़।
सरिताओं के तीर पर, लगी हुई है भीड़।।

अस्तांचल की ओर जब, रवि करता प्रस्थान।
छठ पूजा पर अर्घ्य तब, देता हिन्दुस्थान।।

परम्पराओं पर टिका, सारा कारोबार।
मान्यताओं में है छिपा, जीवन का सब सार।।

षष्टी मइया सभी का, करती बेड़ा पार।
माता ही सन्तान को, करती प्यार अपार।।

छठपूजा के दिवस पर, कर लेना उपवास।
अन्तर्मन से कीजिए, माता की अरदास।।

उदित-अस्त रवि को सदा, अर्घ्य चढ़ाना नित्य।
देता है जड़-जगत को, नवजीवन आदित्य।।

कठिन तपस्या के लिए, छठ का है त्यौहार।
व्रत पूरा करके करो, ग्रहण शुद्ध आहार।।

पूर्वांचल से हो गया, छठ माँ का उद्घोष।
दुनियाभर में किसी का, रहे न खाली कोष।।

ग़ज़ल "सरपंच मेरे गाँव के" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सरपंच मेरे गाँव के, कितने कमाल के
होते हैं फैसले जहाँ, सिक्का उछाल के

बन्दों के साथ भेद-भाव, कर रहे खुदा
इंसाफ के मन्दिर में, जाना देखभाल के

जब बिक गया ज़मीर तो, नज़ीर क्या करे
मिलते नहीं जवाब हैं, सीधे सवाल के

होली में भाईचारा तो, कब से जुदा हुआ
बेरंग हो गये हैं रंग, अब गुलाल के

कच्चे फलों को तोड़, पाल में हैं पकाते
पायें कहाँ से अब, रसीले आम डाल के

सेवक में आज सेवा का, ज़ज़्बा नहीं रहा
कब्जे हुए हैं हर जगह, अब तो दलाल के

बोली लगा रहे हैं, अब सौदाई रूपकी
महिलाएँ कैसे आबरू, रक्खें सँभाल के



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