"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

गीत "एक रहो और नेक रहो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

त्यौहारों की धूम मची है,
पर्व नया-नित आता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

उत्सव हैं उल्लास जगाते,
सूने मन के उपवन में,
खिल जाते हैं सुमन बसन्ती,
उर के उजड़े मधुवन में,
जीवन जीने की अभिलाषा,
को फिर से पनपाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

भावनाओं की फुलवारी में
ममता नेह जगाती है
रिश्तों-नातों की दुनिया,
साकार-सजग हो जाती है,
बहना के हाथों से भाई,
रक्षासूत्र बँधाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

क्रिसमस, ईद-दिवाली हो,
या बोधगया बोधित्सव हो,
महावीर स्वामी, गांधी के,
जन्मदिवस का उत्सव हो,
एक रहो और नेक रहो का
शुभसन्देश सुनाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

दोहे "बुड्ढों के अनुबन्ध" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लटक रहे हैं कबर में, जिनके दोनों पाँव।
साठ साल के बाद वो, चले इश्क के दाँव।।

कल तक जो शागिर्द थी, रूपवती जसलीन।
पत्नी बनी अनूप की, होकर अब लवलीन।।

नहीं युवतियों से निभें, बुड्ढों के सम्बन्ध।
मतलब से होते यहाँ, दौलत के अनुबन्ध।।

हुआ कलेवर खोखला, झूठा सारा खेल।
बुड्ढे और जवान की, जोड़ी है बेमेल।।

शर्म-हया सब मर गयी, होकर पैंसठ पार।
किया नहीं है उमर का, बिल्कुल सोच-विचार।।

ओम नाम का जाप कर, पढ़ गीता के श्लोक।
इश्क-मुश्क से तो नहीं, सुधरेगा परलोक।।

गर लौकिक संसार में, चमकाना हो रूप।
ग़ज़ल गायकी छोड़कर, गाओ भजन अनूप।।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

गीत "हुआ निर्मल गगन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


खिल उठे फिर से वही सुन्दर सुमन।
छँट गये बादल हुआ निर्मल गगन।।

उष्ण मौसम का गिरा कुछ आज पारा,
हो गयी सामान्य अब नदियों की धारा,
नीर से, आओ करें हम आचमन।

रात लम्बी हो गयी अब हो गये छोटे दिवस,
सूर्य की गर्मी घटी, मिटने लगी तन की उमस,
सुख हमें बाँटती, मन्द-शीतल पवन।

अर्चना-पूजा की चहके दीप लेकर थालियाँ,
धान के बिरुओं ने पहनी हैं सुहानी बालियाँ,
अन्न की खुशबू से, महका है चमन।

तितलियाँ उड़ने लगीं बदले हुए परिवेश में,
भर गयीं फिर से उमंगे आज अपने देश में,
शीत का होने लगा अब आगमन।

रविवार, 16 सितंबर 2018

बालकविता "छुट्टी दे दो अब श्रीमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मास्साब मत पकड़ो कान।
है जुकाम से बहुत थकान।।

सरदी से ठिठुरे हैं हाथ।
नहीं दे रहे कुछ भी साथ।।

नभ में छाये काले बादल।
भरा हुआ जिनमें शीतल जल।।

आज नहीं लिखने की मर्जी।
सेवा में भेजी है अर्जी।।

दया करो हे कृपानिधान!
छुट्टी दे दो अब श्रीमान।।

जल्दी से अब घर जाऊँगा।
चाय-पकौड़े मैं खाऊँगा।।

कल जब सूरज उग जायेगा।
समय सुहाना तब आयेगा।।

तब मैं आऊँगा स्कूल।
नहीं करूँगा कुछ भी भूल।।



गीत "धान खेतों में लरजकर पक गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
आषाढ़ से आकाश अब तक रो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 
आज पानी बन गया जंजाल है,
भूख से पंछी हुए बेहाल हैं,
रश्मियों को सूर्य अपनी खो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 
कब तलक नौका चलाएँ मेह में,
भर गया पानी गली और गेह में,
इन्द्र जल-कल खोल बेसुध सो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 Image result for उड़ते पंछी
बिन चुगे दाना गगन में उड़ चले,
घोंसलों की ओर पंछी मुड़ चले,
दिन-दुपहरी दिवस तम को ढो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 
धान खेतों में लरजकर पक गया है,
घन गरजकर और बरसकर थक गया है,
किन्तु क्यों नगराज छागल  ढो रहा है?
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है
 
पुण्य सलिला में नजर आने लगे हैवान हैं
देखकर अतिवृष्टि को सब लोग अब हैरान हैं
उग रही वैसी फसल जैसी धरा में बो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?  

शनिवार, 15 सितंबर 2018

गीत "तुम मौन-निमन्त्रण तो दे दो" डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जलने को परवाना आतुरआशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 
मधुवन में महक समाई है
कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर
भँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुलतुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 
मधुमक्खी भीने-भीने सुर में
सुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भी
आस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती हैखुलकर कलियों मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 
चाहे मत दो मधु का कणभर
पर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करके
तुम मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं में, तुम बिजली बन कर आओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

गीत "हिन्दी की बिन्दी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गौरय्या का नीड़, चील-कौओं ने है हथियाया
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया

जाल बिछाया अपना, छीनी है हिन्दी की बिन्दी
अपने घर में हुई परायी, अपनी भाषा हिन्दी
खोटे सिक्के से लोगों के मन को है बहलाया

हिन्दीभाषा से हमने, भारत स्वाधीन कराया
हिन्दी में भाषण करके, सत्ता का आसन पाया
लेकिन गद्दी पाते ही उस हिन्दी को बिसराया

चीन और जापान आज भाषा के बल पर आगे
किन्तु हमारे खेवनहारे नहीं नींद से जागे
अन्न देश का खाकर, हमने राग विदेशी गाया

वाणी क्यों हो गयी विदेशी, क्या ऐसी लाचारी
विश्वपटल पर कैसे होगी, अब पहचान हमारी
पुरखों के गौरव-गुमान पर भी संकट गहराया

अन्धे-गूँगे-बहरों को क्या अपनी व्यथा सुनायें
हुक्मरान हिन्दी के दिन को हिन्दी-डे बतलाएँ
हलवा-पूड़ी व्यञ्जन छोड़े, पिज्जा-बर्गर खाया

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails