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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

दोहे "पुस्तक दिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पाठक-पुस्तक में हमें, करना होगा न्याय।
पुस्तक-दिन के सार्थक, होंगे तभी उपाय।।
--
अब कोई करता नहीं, पुस्तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
--
उपयोगी पुस्तक नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।।
--
अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप।
नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।।
--
बालक की रुचियाँ समझ, देते नहीं सुझाव।
बेमतलब की पुस्तकें, भर देंगी उलझाव।।
--
कुछ मन्त्री हैं देश में, स्नातक से भी न्यून।
कैसे हों लागू वहाँ, हितकारी कानून।।

रविवार, 22 अप्रैल 2018

गीत "घर सब बनाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वेदना के "रूप" को पहचानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा, 
दुःख से नाता बड़ा गहरा रहा, 
मीत इनको ज़िन्दग़ी का मानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

काल का तो चक्र चलता जा रहा है
 
वक़्त ऐसे  ही निकलता जा रहा, 
ख़ाक क्यों दरबार की हम छानते हैं।
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

शूल के ही साथ रहते फूल हैं
, 
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं, 
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

रूप तो इक रोज़ ढल ही जायेगा, 
आँच में शीशा पिघल ही जायेगा, 
तीर खुद पर किसलिए हम तानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

दोहे "पृथ्वी दिवस-बंजर हुई जमीन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एक साल में एक दिन, धरती का त्यौहार।
कैसे धरती दिवस का, सपना हो साकार।१।
--
कंकरीट जबसे बना,  जीवन का आधार।
धरती की तब से हुई, बड़ी करारी हार।२।
--
पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३।
--
नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव।
दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।४।
--
शस्य-श्यामला धरा को, किया प्रदूषित आज।
कुदरत से खिलवाड़ अब, करने लगा समाज।५।
--
नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।६।
--
जहर बेचकर लोग अब, लगे बढ़ाने कोष।
औरों के सिर मढ़ रहे, अपने सारे दोष।७।
--
ओछे कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर।
आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।८।
--
जबसे जंगल में बिछा, कंकरीट का जाल।
धरती पर आने लगे, चक्रवात-भूचाल।९।
--
अब तो मुझे बचाइए, धरती कहे पुकार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का शृंगार।१०।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

दोहे "बातों में है बात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सभी तरह की निकलती, बातों में से बात।
बातें देतीं हैं बता, इंसानी औकात।।
--
माप नहीं सकते कभी, बातों का अनुपात।
रोके से रुकती नहीं, जब चलती हैं बात।।
--
जनसेवक हैं बाँटते, बातों में खैरात।
अच्छी लगती सभी को, चिकनी-चुपड़ी बात।।
--
नुक्कड़-नुक्कड़ पर जुड़ी, छोटी-बड़ी जमात।
ठलवे करते हैं जहाँ, बेमतलब की बात।।
--
बद से बदतर हो रहे, दुनिया के हालात।
लेकिन मुद्दों पर नहीं, होती कोई बात।।
--
बादल नभ पर छा गये, दिन लगता है रात।
गरमी में बरसात की, लोग कर रहे बात।।
--
कूड़े-करकट से भरे, नगर और देहात।
मगर दिखावे के लिए, होती सुथरी बात।।
--
भूल गये हैं लोग अब, कॉपी-कलम-दवात।
करते हैं सब आजकल, कम्प्यूटर की बात।।
--
जीवन के पर्याय हैं, झगड़े-झंझावात।
बैठ आमने-सामने, सुलझाओ सब बात।।
--
बातों से मिलती नहीं, हमको कभी निजात।
कहिए मन की बात अब, बातों में है बात।।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

गीत "गुलमोहर! फिर भी हँसते जाते हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहते हो सन्ताप गुलमोहर!
फिर भी हँसते जाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

ताप धरा का बढ़ा मगर,
गदराई तुम्हारी डाली है,
पात-पात में नजर आ रही,
नवयौवन की लाली है,
दुख में कैसे मुस्काते हैं,
सबक यही सिखलाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

गरमी और पसीने से,
जब कोमल तन अकुलाते हैं,
पथिक तुम्हारी छाया में तब,
पल-दो पल सुस्ताते हैं,
जब-जब सूरज आग उगलता,
तब तुम खिलते जाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

योगी और तपस्वी जैसा,
ज्ञान कहाँ से पाया है?
तपकर तप करने का,
निर्मल भाव कहाँ से है?
सड़क किनारे खड़े हुए,
तुम सबको पास बुलाते हो।
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

अरुणलालिमा जैसा तुमने,
अपना भेष बनाया है,
प्यारे-प्यारे फूलों से,
सबका ही मन भरमाया है,
लालरंग संकेत क्रोध का,
मगर प्यार दिखलाते हो?
लू के गरम थपेड़े खाकर,
अपना “रूप” दिखाते हो।।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

दोहे "अँगरेजी का जोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पग-पग पर है घेरती, सौतन जिसको आज।
उस भाषा के जाल में, जकड़ा हुआ समाज।।
--
कविता हिन्दी की मगर, अँगरेजी का जोर।
छिपा हुआ बैठा अभी, दाढ़ी में है चोर।।
--
अँगरेजी का दिलों पर, छाया हुआ बुखार।
कदम-कदम पर हो रही, हिन्दी की ही हार।।
--
आसन पर सब बैठ कर, करते हैं आखेट।
भाषा के तो नाम पर, होते लाग-लपेट।।
--
देवनागरी की हुई, मिट्टी आज पलीद।
अब चमचों के राज में, बची नहीं उम्मीद।।

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

बालगीत "ककड़ी बिकतीं फड़-ठेलों पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल मन का उपवन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
नदी किनारे पालेजों में, 
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
आता जब अप्रैल महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।। 

रविवार, 15 अप्रैल 2018

आलेख "चुनाव लड़ना बस की बात नहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चुनाव लड़ना 
क्या आम आदमी के बस की बात है?
मेरे विचार से तो बिल्कुल नहीं! 
   क्योंकि वार्ड मेम्बर से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के चुनाव में धन का जिस प्रकार से खुला खेल होता है उसे दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतन्त्र का ईमानदार व्यक्ति झेल ही नहीं सकता। कारण यह है कि आम आदमी के पास इतना धन होता ही नहीं है।
    साफ-सुथरे और निष्पक्ष चुनाव होने का दावा निर्वाचन आयोग करता तो है मगर उसमें मेरे विचार से एक प्रतिशत सच्चाई भी नहीं है। यद्यपि निर्वाचन आयोग ने अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करते हुए अब काफी कठोर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मगर इन नियम-कानूनों की धज्जियाँ भी प्रत्याशियों द्वारा खुले आम उड़ाई जाती ही हैं।
    आज विधान सभा के चुनाव के लिए एक प्रत्याशी द्वारा खर्च की अधिकतम धनराशि मेरे विचार से लाखों रुपये तय की हुई है। लेकिन मैंने देखा है कि यहाँ धनवान और बाहूबली प्रत्याशियों द्वारा इससे कई गुना धन खर्च किया जाता है वहीं निर्धन और ईमानदार प्रत्याशी अपना घर-मकान और जमीन तक भी गिरवी रख कर और लाखों खर्च करके भी चुनाव नहीं जीत पाता है।
    सुना तो यह है कि मान्यता प्राप्त राष्ट्रीयदल अपने प्रत्याशी को कई लाख रूपये नकद धनराशि तो देती ही हैं इसके अलावा इससे कई गुना खर्च वो विज्ञापनों और चुनाव प्रचार सामग्री में ही चुनाव की भेंट चढ़ा देती हैं। इसके साथ-साथ सत्ताधारी दल की सहायता परदे के पीछे से उद्योगपति भी करते ही हैं।
    आम आदमी किसी भी राजनीतिक दल की प्राथमिक सदस्यता इसीलिए ग्रहण करता है कि किसी दिन उसकी भी बारी आयेगी और वो भी चुनाव लड़कर सदन में जायेगा। मगर देखा यह गया है कि हर बार मान्यताप्राप्त राजनीतिक दल अपने पुराने दिग्गजों को ही चुनाव मैदान में उतारते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि एक व्यक्ति को केवल एक बार ही चुनाव लड़ने का मौका दिया जाना चाहिए। इससे न तो वंशवाद का ठप्पा किसी दल पर लगेगा और न ही भ्रष्ट लोग शासन में आयेंगे।
    आज हमारे जाने-माने सन्त और सामाजिकता का झण्डा लहराने वाले सामाजिक लोग कभी लोकपाल की बात करते हैं और कभी विदेशों में काले धन को वापिस लाने की बात करते हैं।
    मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि वो यह आवाज क्यों नहीं उठाते कि एक व्यक्ति को केवल एक बार ही चुनाव लड़ने दिया जाए।
    माना कि बड़ी दिक्कतें आयेगी जो यह होंगी कि नये चेहरों को सदन चलाने का प्रशिक्षण कौन देगा? लेकिन इसके लिए भी उपाय है कि दस प्रतिशत साफ-सुथरी छवि के ईमानदार और कानूनविद् लोगों को मनोनीत किया जाए जो नये विधायकों और सांसदों को प्रशिक्षित करें।
    चुनाव कराना सरकार का काम है और इस काम को अंजाम देता है निर्वाचन आयोग!
     अतः निर्वाचन आयोग को चाहिए कि वह निर्धारित तिथि को प्रत्याशियों के  नामांकन कराते ही उनसे चुनाव प्रचार के लिए आवश्यक धनराशि जमा करा ले। इसके बाद इन प्रत्याशियों को अपने अधीन करके चुनाव सम्पन्न होने तक देश या विदेश के ऐसे भाग में भेज दिया जाए जहाँ से यह लोग मतदाताओं के सम्पर्क में विल्कुल भी न रहें।
     आयोग द्वारा इनके द्वारा जमा की गई धनराशि से समानरूप से स्वयं प्रचार कराया जाए। क्योंकि आज भारत की जनता साक्षर है। उसे अपने विवेक से वोट करने की सुविधा दी जानी चाहिए।
     इसके बाद जो व्यक्ति सरकार की सदन में आयेंगे वो वास्तव में जनता के प्रतिनिधि होंगे। फिर न तो प्रत्याशी के 11 लाख खर्च होंगे और नही कोई फर्जी हिसाब बनाने को बाध्य होना पड़ेगा। आज जाहे कितनी भी मँहगाई की मार हो लेकिन मैं समझता हूँ कि दो लाख रुपयों में चुनाव आयोग प्रत्याशी के चुनाव को अपने सरकारी स्तर से सम्पन्न करा सकता है।
     आशान्वित हूँ कि कभी ऐसा समय भी अवश्य आयेगा ही।

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

दोहे "कर्म हुए बाधित्य" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जबरदस्ती के दोहे
जैसे कुहरा चीरकर, उगता है आदित्य।
वैसे ही कुण्ठाओं में, पलता है साहित्य।।

अपने नवल विचार को, जो लिखते हैं नित्य।
उनके ही साहित्य में, मिलता है लालित्य।।

जो पुर के हित के लिए, करता पौरोहित्य।
कर्मकाण्ड में निहित है, जीवन का साहित्य।।

लालन-पालन में भरा, ममता का लालित्य।
बड़ा कठिन सन्तान का, बन जाना पालित्य।।

नहीं न्याय का युग रहा, नहीं विक्रमादित्य।
कलियुग में इंसान के, कर्म हुए बाधित्य।।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

"चौपाई के बारे में भी जानिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बहुत समय से चौपाई के विषय में
कुछ लिखने की सोच रहा था!
आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख।
     यहाँ यह स्पष्ट करना अपना चाहूँगा कि चौपाई को लिखने और जानने के लिए पहले छंद के बारे में जानना बहुत आवश्यक है।
"छन्द काव्य को स्मरण योग्य बना देता है।"
      छंद का सर्वप्रथम उल्लेख 'ऋग्वेद' में मिलता है। जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना'
अर्थात्- छंद की परिभाषा होगी 'वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं'
छन्द तीन प्रकार के माने जाते हैं।
‍१- वर्णिक
२- मात्रिक और
‌३- मुक्त
मात्रा
वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहा जाता है। अ, , , ऋ के उच्चारण में लगने वाले समय की मात्रा ‍एक गिनी जाती है। आ, , , , , , औ तथा इसके संयुक्त व्यञ्जनों के उच्चारण में जो समय लगता है उसकी दो मात्राएँ गिनी जाती हैं। व्यञ्जन स्वतः उच्चरित नहीं हो सकते हैं। अतः मात्रा गणना स्वरों के आधार पर की जाती है।
मात्रा भेद से वर्ण दो प्रकार के होते हैं।
१- हृस्व अ, , ,
, कि, कु, कृ
अँ, हँ (चन्द्र बिन्दु वाले वर्ण)
(अँसुवर) (हँसी)
त्य (संयुक्त व्यंजन वाले वर्ण)
२- दीर्घ आ, , , , , ,
का, की, कू, के, कै, को, कौ
इं, विं, तः, धः (अनुस्वार व विसर्ग वाले वर्ण)
(इंदु) (बिंदु) (अतः) (अधः)
अग्र का अ, वक्र का व (संयुक्ताक्षर का पूर्ववर्ती वर्ण)
राजन् का ज (हलन् वर्ण के पहले का वर्ण)
हृस्व और दीर्घ को पिंगलशास्त्र में क्रमशः लघु और गुरू कहा जाता है।
समान्यतया छंद के अंग छः अंग माने गये हैंं
1. चरण/ पद/ पाद
2. वर्ण और मात्रा
3. संख्या और क्रम
4. गण
5. गति
6. यति/ विराम
चरण या पाद
      जैसा कि नाम से ही विदित हो रहा है चरण अर्थात् चार भाग वाला।
दोहा, सोरठा आदि में चरण तो चार होते हैं लेकिन वे लिखे दो ही पंक्तियों में जाते हैं, और इसकी प्रत्येक पंक्ति को 'दल' कहते हैं।
कुछ छंद छः- छः पंक्तियों (दलों) में लिखे जाते हैं, ऐसे छंद दो छंद के योग से बनते हैं, जैसे- कुण्डलिया (दोहा + रोला), छप्पय (रोला + उल्लाला) आदि।
चरण 2 प्रकार के होते हैं- सम चरण और विषम चरण।
प्रथम व तृतीय चरण को विषम चरण तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण को सम चरण कहते हैं।
अब मूल बिन्दु पर वापिस आते हैं कि
चौपाई क्या होती है?
चौपाई सम मात्रिक छन्द है
जिसमें 16-16 मात्राएँ होती है।
        अब प्रश्न यह उठता है कि चौपाई के साथ-साथ अरिल्लऔर पद्धरिमें भी 16-16 ही मात्राएँ होती हैं फिर इनका नामकरण अलग से क्यों किया गया है?
      इसका उत्तर भी पिंगल शास्त्र ने दिया है- जिसके अनुसार आठ गण और लघु-गुरू ही यह भेद करते हैं कि छंद चौपाई है, अरिल् है या पद्धरि है। लेख अधिक लम्बा न हो जाए इसलिए अरिल्लऔर पद्धरिके बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे।
लेकिन गणों को थोड़ा सा जरूर देख लीजिए-
गण 8 होते है-
यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण
गणों को याद रखने के लिए सूत्र-
यमाताराजभानसलगा
     इसमें पहले आठ वर्ण गणों के सूचक हैं और अन्तिम दो वर्ण लघु (ल) व गुरु (ग) के।
सूत्र से गण प्राप्त करने का तरीका-
बोधक वर्ण से आरंभ कर आगे के दो वर्णों को ले लें। गण अपने-आप निकल आएगा।
उदाहरण- यगण किसे कहते हैं
यमाता
| ऽ ऽ
अतः यगण का रूप हुआ-आदि लघु (| ऽ ऽ)
चौपाई में जगण और तगण का प्रयोग निषिद्ध माना गया है। साथ ही इसमें अन्त में गुरू वर्ण का ही प्रयोग अनिवार्यरूप से किया जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए मेरी कुछ चौपाइयाँ देख लीजिए-
मधुवन में ऋतुराज समाया।
पेड़ों पर नव पल्लव लाया।।
टेसू की फूली हैं डाली।
पवन बही सुख देने वाली।।
--
सूरज फिर से है मुस्काया।
कोयलिया ने गान सुनाया।।
आम, नीम, जामुन बौराए।
भँवरे रस पीने को आए।।
--
भुवन भास्कर बहुत दुलारा।
मुख मंडल है प्यारा-प्यारा।।
सुबह-सवेरे जब जगते हो।
तुम कितने अच्छे लगते हो।।
--
श्याम-सलोनी निर्मल काया।
बहुत निराली प्रभु की माया।।
जब भी दर्श तुम्हारा पाते।
कली सुमन बनकर मुस्काते।।
--
कोकिल इसी लिए है गाता।
स्वर भरकर आवाज लगाता।।
जल्दी नीलगगन पर आओ।
जग को मोहक छवि दिखलाओ।।
इति!


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