ज़हरीले हैं ताल-तलय्या। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या? -- अन्न उगाने के लालच में, ज़हर भरी हम खाद लगाते, खाकर जहरीले भोजन को, रोगों को हम पास बुलाते, घटती जाती हैं दुनिया में, अपनी ये प्यारी गौरय्या। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या?? -- चिड़िया का तो छोटा तन है, छोटे तन में छोटा मन है, विष को नहीं पचा पाती है, इसीलिए तो मर जाती है, सुबह जगाने वाली जग को, अपनी ये प्यारी गौरय्या।। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या?? -- गिद्धों के अस्तित्व लुप्त हैं, चिड़ियाएँ भी अब विलुप्त हैं, खुशियों में मातम पसरा है, अपनी बंजर हुई धरा है, नहीं दिखाई देती हमको, अपनी ये प्यारी गौरय्या।। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या?? -- |
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सोमवार, 11 जनवरी 2021
गीत-प्रीत का व्याकरण "कैसे बचे यहाँ गौरय्या" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 9 जनवरी 2021
देशभक्ति गीत ♦मैं तिरंगे को झुकने न दूँगा कहीं♦ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गुरुवार, 7 जनवरी 2021
गीत-प्रीत का व्याकरण "नीर पावन बनाओ करो आचमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। -- कुछ भी दुर्लभ नहीं आदमी के लिए, मान-सम्मान है संयमी के लिए, सींचना नेह से अपना प्यारा चमन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। -- रास्ते में मिलेंगे बहुत पेंचो-खम, साथ में आओ मिलकर बढ़ायें कदम, नीर पावन बनाओ करो आचमन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। -- पेड़ जो दर्प में थे अकड़ कर खड़े, एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े, लोच वालो का होता नही है दमन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। -- सख्त चट्टान पल में दरकने लगी, जल की धारा के संग में लुढ़कने लगी, छोड़ देना पड़ा कंकड़ों को वतन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। -- घास कोमल है लहरा रही शान से, सबको देती सलामी बड़े मान से, आँधी तूफान में भी सलामत है तन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। -- |
बुधवार, 6 जनवरी 2021
प्रीत का व्याकरण-गीत "तुम्हारे हाथों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- लहराती-बलखाती, पेंग बढ़ाती है, नीलगगन में ऊँची उड़ती जाती है, होती भावविभोर तुम्हारे हाथों में। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- वसुन्धरा की प्यास बुझाती है गंगा, पावन गंगाजल करता तन-मन चंगा, सरगम का मृदु शोर तुम्हारे हाथों में।। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- उपवन में कलिकाएँ जब मुस्काती हैं, भ्रमर और तितली को महक सुहाती है, जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- प्रणय-प्रेम के बिना अधूरी पावस है, बिन “मयंक” के छायी घोर अमावस है, चन्दा और चकोर तुम्हारे हाथों में। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- |
मंगलवार, 5 जनवरी 2021
भूमिका "प्रीत का व्याकरण" (डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द')
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सोमवार, 4 जनवरी 2021
सरस्वती वन्दना "रचनाएँ रचवाती हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रोज-रोज सपनों में आकर, |
शुक्रवार, 3 जुलाई 2020
गीत "प्रीत का व्याकरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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घूमते शब्द कानन में उन्मुक्त से,
जान पाये नहीं प्रीत का व्याकरण।
बस दिशाहीन सी चल रही लेखिनी
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
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ताल बनती नहीं, राग कैसे सजे,
बेसुरे हो गये साज-संगीत हैं।
ढाई-आखर बिना है अधूरी ग़ज़ल,
प्यार के बिन अधूरे प्रणयगीत हैं
नेह के स्रोत सूखे हुए हैं सभी,
खो गये हैं सभी आजकल आचरण।
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
--
सूदखोरों की आबाद हैं बस्तियाँ,
आज गिरवीं पड़ा है तिजोरी में दिल।
बिक रहा बोतलों में जहाँ पेयजल,
आचमन के लिए है कहाँ अब सलिल।
खोखले छन्द बोलेंगे कैसे व्यथा,
स्वार्थ के वास्ते आज पोषण-भरण।
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
--
चारणों के नगर में, सुख़नवर कहाँ,
जिन्दग़ी चल रही भेड़ की चाल से।
कौन तूती के सुर को सुनेगा यहाँ,
मढ़ रहे ढपलियाँ, बाल की खाल से।
लाज कैसे बचे द्रोपदी की यहाँ
कंस ओढ़े हुए हैं कृष्ण का आवरण
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
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शनिवार, 25 अगस्त 2018
गीत "प्रीत का व्याकरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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घूमते शब्द कानन में उन्मुक्त से,
जान पाये नहीं प्रीत का व्याकरण।
बस दिशाहीन सी चल रही लेखिनी
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
ताल बनती नहीं, राग कैसे सजे,
बेसुरे हो गये साज-संगीत हैं।
ढाई-आखर बिना है अधूरी ग़ज़ल,
प्यार के बिन अधूरे प्रणयगीत हैं
नेह के स्रोत सूखे हुए हैं सभी,
खो गये हैं सभी आजकल आचरण।
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
सूदखोरों की आबाद हैं बस्तियाँ,
आज गिरवीं पड़ा है तिजोरी में दिल।
बिक रहा बोतलों में जहाँ पेयजल,
आचमन के लिए है कहाँ अब सलिल।
खोखले छन्द बोलेंगे कैसे व्यथा,
स्वार्थ के वास्ते आज पोषण-भरण।
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
चारणों के नगर में, सुख़नवर कहाँ,
जिन्दग़ी चल रही भेड़ की चाल से।
कौन तूती के सुर को सुनेगा यहाँ,
मढ़ रहे ढपलियाँ, बाल की खाल से।
लाज कैसे बचे द्रोपदी की यहाँ
कंस ओढ़े हुए हैं कृष्ण का आवरण
कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।।
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