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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

दोहे "योगिराज का जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

योगिराज का जन्मदिन, मना रहा संसार।
हे मनमोहन देश में, फिर से लो अवतार।।

सुनने को आतुर सभी, बंसी की झंकार।
मोहन आओ धरा पर, भारत रहा पुकार।।

श्री कृष्ण भगवान ने, दूर किया अज्ञान।
युद्ध भूमि में पार्थ को, दिया अनोखा ज्ञान।।

भारत के वर्चस्व का, जिससे हो आभास।
लगता वो ही ग्रन्थ तो, हमको सबसे खास।।

वेद-पुराण-कुरान का, गीता में है सार।
भगवतगीता पाठ से, होते दूर विकार।

दो माताओं का मिले, जिसको प्यार दुलार।
वो ही करता जगत में, दुष्टों का संहार।।

दुर्योधन जब हो गया, सत्ता मद में चूर।
तब मनमोहनश्याम ने, किया दर्प को दूर।।

ग़ज़ल "सच्चाई अब डरने लगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


झूठ से सच्चाई अब डरने लगी
बेवफाई वफा से लड़ने लगी

जब से अपने शहर आवारा हुए
रास्तों में गन्दगी बढ़ने लगी

जब से पच्छिम की चलीं हैं आँधियाँ
गाँव में अश्लीलता सड़ने लगी

मतलबी रिश्ते ’ नाते हो गये
फूट हर परिवार में पड़ने लगी

जूतियाँ हरजाई जब से हो गयी
पाँव में कीलें बहुत गड़ने लगी

परबतों सज रहे हैं मयकदाँ
बेहयाई सीढ़ियाँ चढ़ने लगी

शोर के संगीत में सुर हैं कहाँ
मौशिकी में शायरी मरने लगी

इल्म के उस्ताद बौने हो गये
पाठशाला पाठ खुद पढ़ने लगी

अदब में है 'रूप' की महफिल सजी
आशिकी बौनी ग़ज़ल गढ़ने लगी

दोहे "बदल गये हैं चित्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नाजुक दौर निकल गया, बदल गये हैं मित्र।
हुआ खेल का अन्त तो, बदल गये हैं चित्र।।
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मानव मन की हो गयी, हालत बड़ी विचित्र।
बाजारों में बिक रहा, अब तो चित्त-चरित्र।।
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भाषा-भूषा की हुई, हालत अब दयनीय।
कविता जैसी कामिनी, नहीं रही कमनीय।।
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बिगड़ गयी है सभ्यता, चिन्ता की है बात।
पुरखों को पीढ़ी नयी, दिखा रही औकात।
--
नवयुग का इंसान अब, गया पुरातन भूल।
बन्द तिजोरी में किये, सारे आज उसूल।
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पढ़-लिखकर भी लोग तो, भूल गये इतिहास।
इसीलिए है हो रहा, मानवता का ह्रास।।
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चाटुकारिता पा गयी, शासन में अधिकार।
गोमाता-गंगा करे, किससे आज पुकार।।
 --

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

लघु कथा "माँ की ममता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लघु कथा-माँ की ममता
     रम्भा देवी का एक ही बेटा है अर्जुन, जो मूम्बई में किसी कम्पनी में वाचमैन की नौकरी करता है। उसका परिवार उसके साथ ही रहता है। अर्जुन की माता जी पश्चिमी नेपाल के दैजी गाँव में अकेली रहती हैं। वह गठियावात से पीड़ित हैं। गाँव में उसकी एक बीघा जमीन है जो भारत के नौ बीघा के बराबर होती है। वह अक्सर मेरे अस्पताल में दवाई लेने आती है। वह गाँव के किसी अन्य व्यक्ति के साथ वो अपने बेटे से मिलने मुम्बई गयी थी। वहाँ से वो अपने बेटे का मोबाइल नम्बर भी लाई थी।
     अर्जुन अपनी माँ को कभी कोई पैसा भी नहीं भेजता था। इसलिए वह परेशान रहती थी। लेकिन अब उसके पास अर्जुन का फोन नम्बर था और वो अक्सर मेरे मोबाइल से अपने बेटे का फोन मिलवा लेती थी। रो-रोकर वह अपने पोते-पोती, बहू-बेटे से बात करती थी। अपने परिजनों को याद करके उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे।
     वह बात-चीत में फोन पर कहती थी कि बेटा तुम्हारी बहुत याद आती है। मगर बेटा अपने काम में मस्त रहता था और माँ की कोई चिन्ता नहीं करता था। यह माँ का दिल ही है कि बेटा कितना भी निष्ठुर क्यों न हो जाये मगर माँ कभी निष्ठुर नहीं हो सकती।

बुधवार, 21 अगस्त 2019

ग़ज़ल "साथ चलना सीखिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आदतें अपनी बदलना सीखिए
जिन्दगी में साथ चलना सीखिए

कंकड़ों और पत्थरों की राह में
ठोकरें खाकर सँभलना सीखिए

दुःख और सुख जिन्दगी के अंग हैं
फूल के मानिन्द खिलना सीखिए

खूशनुमा फिर से बहारें आयेंगी
साफगोई रखके मिलना सीखिए

प्यार का धागा-सूईं लेकर जरा
चाके-दिल को आप सिलना सीखिए

दोजहाँ में लोग हैं जालिम बड़े
अश्क को अपने निगलना सीखिए

चीरती है जो अँधेरा रात का
उस शमा जैसा पिघलना सीखिए

गैर को अपना बनाने के लिए
प्यार के साँचे में ढलना सीखिए

हर जगह हैं जाल फैले रूप के
काटकर फन्दे निकलना सीखिए

सोमवार, 19 अगस्त 2019

दोहे "चित्रकारिता दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चित्रकारिता दिवस पर, सुखद बना संयोग।
लिए कैमरा हाथ में, निकल पड़े हैं लोग।।
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संग किसी के परिणिता, चली घूमने साथ।
किसी-किसी ने प्रेयसी, का थामा है हाथ।।
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कुछ हैं चले समूह में, लिए साथ में मित्र।
दृश्य सुहाने देखकर, खींच रहे हैं चित्र।।
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अपने-अपने चित्र से, सबको होता प्यार।
लगते चित्र सुहावने, बिना साज-सिंगार।।
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कानन-पेड़-पहाड़ हैं, कुदरत का उपहार।
चित्रकला के विश्व में, सम्यक् हैं भण्डार।।
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आमन्त्रण देते हमें, पत्ते-कलियाँ-फूल।
चित्रकारिता के लिए, उपवन हैं अनुकूल।।
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झरने-नदियाँ सिन्धु के, दृश्य बड़े अनमोल।
कैद कैमरे में करो, दुनिया का भूगोल।।
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गीत "मौत का पैगाम लाती है सुरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़िन्दगी को आज खाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

उदर में जब पड़ गई दो घूँट हाला,
प्रेयसी लगनी लगी हर एक बाला,
जानवर जैसा बनाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

ध्यान जनता का हटाने के लिए,
नस्ल को पागल बनाने के लिए,
आज शासन को चलाती है सुरा,
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

आज मयखाने सजे हर गाँव में,
खोलती सरकार है हर ठाँव में,
सभ्यता पर ज़ुल्म ढाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

इस भयानक खेल में वो मस्त हैं,
इसलिए भोले नशेमन त्रस्त हैं,
हर कदम पर अब सताती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

सोमरस के दो कसैले घूँट पी,
तोड़ कर अपनी नकेले ऊँट भी,
नाच नंगा अब नचाती है सुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।

डस रहे हैं देश काले नाग अब,
कोकिला का रूप" भऱकर काग अब,
गान गाता आज नाती बेसुरा।
मौत का पैगाम लाती है सुरा।।
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