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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

दोहे "बिगड़ रहा परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हरकत से नापाक की, बिगड़ रहा परिवेश।
हमले सेना शिविर पर, झेल रहा है देश।।
--
करो-मरो की होड़ में, हैं मशगूल जवान।
लेकिन प्रमुख वजीर की, है खामोश जबान।।
--
मत को पाने के लिए, सड़क रहे हैं नाप।
सीमा के हालात पर, रहते हैं चुपचाप।।
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मातम के माहौल में, मना रहे हैं जश्न।।
मुद्दों में हैं दब गये, सभी सुलगते प्रश्न।।
--
क्यों बैरी को गोद में, खिला रहे आदित्य।
भारी रक्षाबजट का, बतलाओ औचित्य।।
--
मीठी गोली से नहीं, घटे भयंकर रोग।
अस्त्र-शस्त्र का ही करो, बैरी पर उपयोग।।
--
घुस कर घर में शत्रु के, डट कर करो प्रहार।
अभी समय अनुकूल है, करो आर या पार।।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

गीत "आ हमारे साथ श्रम को ओढ़ ना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अब पढ़ाई और लिखाई छोड़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।

काम मिलता ही नहीं हैशिक्षितों के वास्ते,
गुज़र करने के लिएअवरुद्ध हैं सब रास्ते,
इस लिए मेहनत से नाता जोड़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।

समय कटता है हमारा पत्थरों के साथ में,
वार करने को जिगर पर हथौड़ा है हाथ में.
देखकर नाज़ुक कलाई मोड़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।

कोई रिक्शा खींचता हैकोई बोझा ढो रहा,
कोई पढ़-लिखकर यहाँ पर भाग्य को है रो रहा,
आ हमारे साथ श्रम को ओढ़ ना।
सीख ले अब पत्थरों को तोड़ना।।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

गीत "शिव का डमरू बन जाऊँगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जो मेरे मन को भायेगा,
उस पर मैं कलम चलाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।।

मैं कभी वक्र होकर घूमूँ,
हो जाऊँ सरल-सपाट कहीं।
मैं स्वतन्त्र हूँमैं स्वछन्द हूँ,
मैं कोई चारण भाट नहीं।
फरमाइश पर नहीं लिखूँगा,
गीत न जबरन गाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।।

भावों की अविरल धारा में,
मैं डुबकी खूब लगाऊँगा।
शब्दों की पतवार थाम,
मैं नौका पार लगाऊँगा।
घूम-घूम कर सत्य-अहिंसा
 की मैं अलख जगाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे बढ़ता जाऊँगा।।

चाहे काँटों की शय्या हो,
या नर्म-नर्म हो सेज सजे।
सारंगी का गुंजन सुनकर,
चाहे ढोलक-मृदंग बजे।
अत्याचारी के दमन हेतु,
शिव का डमरू बन जाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे बढ़ता जाऊँगा।।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

गीत "जीवन आशातीत हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो लगता था कभी पराया,
जाने कब मनमीत हो गया।
पतझड़ में जो लिखा तराना,
वो वासन्ती गीत हो गया।।

अच्छे लगते हैं अब सपने,
अनजाने भी लगते अपने,
पारस पत्थर को छू करके,
रिश्ता आज पुनीत हो गया।

मैंने जब सरगम को गाया,
उसने सुर में ताल बजाया,
गायन-वादन के संगम से,
मनमोहक संगीत हो गया।

सुलझ गया है ताना-बाना,
लगता है संसार सुहाना,
बासन्ती अब सुमन हो गये,
जीवन आशातीत हो गया।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल "चमन की तलाश में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कितने हसीन फूल, खिले हैं पलाश में
फिर भी भटक रहे हैं, चमन की तलाश में

पश्चिम की गर्म आँधियाँ, पूरब में आ गयी
ग़ाफ़िल हुए हैं लोग, क्षणिक सुख-विलास में

जब मिल गया सुराज तो, किरदार मर गया
शैतान सन्त सा सजा, उजले लिबास में

क़श्ती को डूबने से, बचायेगा कौन अब
शामिल हैं नयी पीढ़ियाँ, अब तो विनाश में

किसको सही कहें अब, और कौन ग़लत है
असली ज़हर भरा हुआ, नकली मिठास में

काग़ज़ के फूल में, कभी आती नहीं सुगन्ध
मसले गये सुमन सभी, भीनी सुवास में

बदला हुआ है “रूप”, रंग और ढंग भी
अन्धे चलें हैं देखने, दुनिया उजास में 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

गीत "बौराई गेहूँ की काया (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बौराई गेहूँ की काया,
फिर से अपने खेत में।
सरसों ने पीताम्बर पाया,
फिर से अपने खेत में।।

हरे-भरे हैं खेत-बाग-वन,
पौधों पर छाया है यौवन,
झड़बेरी ने "रूप" दिखाया,
फिर से अपने खेत में।।

नये पात पेड़ों पर आये,
टेसू ने भी फूल खिलाये,
भँवरा गुन-गुन करता आया,
फिर से अपने खेत में।।

धानी-धानी सजी धरा है,
माटी का कण-कण निखरा है,
मोहक रूप बसन्ती छाया,
फिर से अपने खेत में।।

पर्वत कितना अमल-धवल है,
गंगा की धारा निर्मल है,
कुदरत ने सिंगार सजाया,
फिर से अपने खेत में।।

गीत देता है ऋतुराज निमन्त्रण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


देता है ऋतुराज निमन्त्रण,
तन-मन का शृंगार करो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

नये पंख पक्षी पाते हैं,
नवपल्लव वृक्षों में आते,
आँगन-उपवन, तन-मन सबके,
वासन्ती होकर मुस्काते,
स्नेह और श्रद्धा-आशा के
उर मन्दिर में दीप धरो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

मन के हारे हार और
मन के जीते ही जीत यहाँ,
नजर उठा करके तो देखो,
बुला रही है प्रीत यहाँ,
उड़ने को उन्मुक्त गगन है,
पहले स्वयं विकार हरो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

धर्म-अर्थ और काम-मोक्ष के,
लिए मिला यह जीवन है,
मैल हटाओ, द्वेश मिटाओ,
निर्मल तन में निर्मल मन है,
दीन-दुखी को गले लगाओ,
दुर्बल से मत घृणा करो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

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