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शनिवार, 31 अक्तूबर 2020

गीत "नारी की तो कथा यही है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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अपने छोटे से जीवन में 
कितने सपने देखे मन में
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इठलाना-बलखाना सीखा 
हँसना और हँसाना सीखा 
सखियों के संग झूला-झूला 
मैंने इस प्यारे मधुबन में
कितने सपने देखे मन में 
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भाँति-भाँति के सुमन खिले थे 
आपस में सब हिले-मिले थे 
प्यार-दुलार दिया था सबने 
बचपन बीता इस गुलशन में 
कितने सपने देखे मन में
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एक समय ऐसा भी आया 
जब मेरा यौवन गदराया 
विदा किया बाबुल ने मुझको 
भेज दिया अनजाने वन में 
कितने सपने देखे मन में
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मिला मुझे अब नया बसेरा 
नयी शाम थी नया सवेरा 
सारे नये-नये अनुभव थे 
अनजाने से इस आँगन में 
कितने सपने देखे मन में
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कुछ दिन बाद चमन फिर महका 
बिटिया आयी, जीवन चहका चहका  
लेकिन करनी पड़ी विदाई 
भेज दिया नूतन उपवन में 
कितने सपने देखे मन में
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नारी की तो कथा यही है 
आदि काल से प्रथा रही है 
पली कहीं तोफली कहीं है
दुनिया के उन्मुक्त गगन में 
कितने सपने देखे मन में
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शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

दोहे "शरद पूर्णिमा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शरद पूर्णिमा पर हँसा, खुलकर आज मयंक।
गंगा जी के नीर की, दूर हो गयी पंक।।
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फसन घरों में आ गयीकृषक रहे मुसकाय।
अपने मन के छन्द कोरचते हैं कविराय।।
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हरी-हरी उगने लगीचरागाह में घास।
धरती से आने लगीसोंधी-तरल सुवास।।
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देख-देख कर धान कोखुश हो रहे किसान।
माता जी का हो रहाघर-घर में गुणगान।।
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पंचपर्व नजदीक हैंसजे हुए बाजार।
दूकानों में आज तोउमड़ी भीड़ अपार।।
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मिलता है भगवान केमन्दिर में सन्तोष।
माता जी का भुवन मेंगूँज रहा उद्घोष।।
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होता है अन्तःकरणजब मानव का शुद्ध।
दर्शन देते हैं तभीमहादेव अनिरुद्ध।।
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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2020

दोहे "मत कर देना भूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

कवियों की रचनाओं में, होते भाव प्रधान।
सात सुरों का जानते, गायक ही विज्ञान।।
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उच्चारण में शब्द की, मत कर देना भूल।
गाना कविता-गीत को, शब्दों के अनुकूल।।
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कल्पनाओं में हैं निहित, जाने कितने अर्थ।
कविताओं की भावना, करते शब्द समर्थ।।
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नियमित-नित्य रियाज से, बनता व्यक्ति महान।
साधक बनकर कीजिए, शब्दों की पहचान।।
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कदमताल हैं कर रहे, घात और प्रतिघात।
जीवन के हर मोड़ पर, पसरे झंझावात।।
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मौसम पल-पल बदलता, अपना नूतन रूप।
जीवन में मिलती नहीं, सदा सुहानी धूप।।
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थोड़े में होता नहीं, दुनिया को सन्तोष।
लगे लोग अब ढूँढते, सच्चाई में दोष।।

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बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

दोहा "ग्वाले हैं भयभीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

नौका में छल-छद्म की, मतलब के सब मीत। 
कृष्ण-सुदामा सी नहीं, आज जगत में प्रीत।।
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मिलते हैं संसार में, भाँति-भाँति के लोग।
होती तब ही मित्रता, जब बनता संयोग।।
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कर्मों के अनुसार ही, मिलता सबको भोग।
खुद के बस में है नहीं, विरह और संयोग।।
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नहीं सरल है सीखना, जीवन का संगीत।
शब्दों के ही भार से, बनता सुन्दर गीत।।
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रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख।
जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।।
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सरिता और तड़ाग के, सब ही जाते तीर।
मगर आचमन के लिए, गंगा का है नीर।।
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देख दशा गोवंश की, ग्वाले हैं भयभीत।
कैमीकल के दूध में, मत खोजो नवनीत।।

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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

गीत "आओ दूर करें अँधियारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

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आलोकित हो चमन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
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दुर्गुण मन से दूर भगाओ,
राम सरीखे सब बन जाओ,
निर्मल हो गंगा की धारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
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विजय पर्व हो या दीवाली,
रहे न कोई मुट्ठी खाली,
स्वच्छ रहे आँगन-गलियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
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कंचन जैसा तन चमका हो,
उल्लासों से मन दमका हो,
खुशियों से महके चौबारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
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सभी अल्पना आज सजाएँ,
माता से धन का वर पाएँ,
आओ दूर करें अँधियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
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घर-घर बँधी हुई हो गैया,
चहके प्यारी सोन चिरैया,
सुख का सरसेगा फव्वारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
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सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

ग़ज़ल "कठिन बुढ़ापा होता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

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बहता जल का सोता है 
हाथ-हाथ को धोता है 
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फूल कहाँ से पायेगा वो 
जो काँटों को बोता है 
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जिसके पास अधिक है होता
 
वही अधिकतर रोता है 
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साथ समय के सब सम्भव है 
क्यों धीरज को खोता है  
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फसल उगेगी कैसे अच्छी 
नहीं खेत को जोता है 
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मुखिया अच्छा वो कहलाता 
जो रिश्तों को ढोता है  
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धूप रूप” की ढल जाती तो
कठिन बुढ़ापा होता है  
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रविवार, 25 अक्तूबर 2020

दोहे "हुआ दशानन पुष्ट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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लीलाएँ बाधित हुई, जला नहीं लंकेश।
चारों ओर बुराई का, जीवित है परिवेश।।
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मुख पर हैं मुखपट्टियाँ, भीतर से है दुष्ट।
कोरोना के काल में, हुआ दशानन पुष्ट।।
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होने लगे असत्य से, समझौते अनुबन्ध।
ओढ़ लबादा राम का, घूम रहे हैं दशकन्ध।।
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बिन माँगे ही मिल रहे, नवयुग के उपहार।
असभ्यता की बह रही, चारों ओर बयार।।
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रावण के पुतले रहे, लोगों को ललकार।
मन के शठ संहार के, बने नहीं हथियार।।
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चीन-पाक का जब तलक, मिटता नहीं गुरूर।
विजय-पर्व के तब तलक, लक्ष्य बहुत हैं दूर।।
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करते हैं फरियाद अब, धरा और आकाश।
भारत माता कह रही, करो शत्रु का नाश।।
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