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सोमवार, 22 सितंबर 2014

"दोहे-महँगाई उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब से छोटा हो गया, रुपये का आकार।
तब से बौना हो गया, रिश्तों का संसार।।
--
बिगड़ रही है व्यवस्था, बेबस है सरकार।
कीमत रुपये की घटी, मँहगाई की मार।।
--
आम जरूरत का हुआ, मँहगा सब सामान।
ऐसी हालत देख कर, जनता है हैरान।।
--
फोन-कार के कर दिये, अब तो सस्ते रेट।
लेकिन कैसे भरेगा, इनसे भूखा पेट।।
--
सब्जी और अनाज के,  बढ़े हुए हैं भाव।
अब तक भी आया नहीं, कीमत में ठहराव।।
--
तेल कान में डाल कर, सोई है सरकार।
निर्धन जनता के लिए, महँगाई उपहार।।
--
अच्छे दिन का हो गया, सपना अब काफूर।
सत्ता मिलते ही हुए, मोदी मद में चूर।।

रविवार, 21 सितंबर 2014

"ग़ज़ल-नंगा आदमी भूखा विकास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


दिल्ली उन्हीं के वास्ते, दिल जिनके पास है
खाली है अगर जेब तो, दिल्ली उदास है

चारों तरफ मची हुई है भाग-दौड़ सी
रिश्तो में अब मिठास के बदले खटास है

चलता है टेढ़ी चाल सियासत का पजामा
मैला है मन-बदन मगर उजला लिबास है

पद मिल गया तो देश की चिन्ता नहीं रही
कुर्सी की टाँग से बँधा अब तो विलास है

सागर में रह के मीन को मिनरल की चाह है
बुझती नहीं है आज मगर की पिपास है

रोजी के लिए नौनिहाल माँजता बरतन
हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है

वो देख रहा “रूप” को आजाद वतन के
नंगा है आज आदमी भूखा विकास है

शनिवार, 20 सितंबर 2014

कविता -"टुकड़ा-एमी लोवेल" (अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"टुकड़ा" (Fragment' a poem by Amy Lowell)  

अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

कविता क्या है?

♥ काव्यानुवाद ♥
कविता रंग-बिरंगे, मोहक पाषाणों सी होती है क्या?
जिसे सँवारा गया मनोरम, रंग-रूप में नया-नया!!
हर हालत में निज सुन्दरता से, सबके मन को भरना!
ऐसा लगता है शीशे को, सिखा दिया हो श्रम करना!!
इन्द्रधनुष ने सूर्यरश्मियों को जैसे अपनाया है!
क्या होता है अर्थ, धर्म का? यह रहस्य बतलाया है!!
 एमी लोवेल
जन्म - 1874
मृत्यु - 1925

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

"ग़ज़ल-यहाँ अरमां निकलते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

वही साक़ी वही मय है, नई बोतल बदलते हैं
सुराखानों में दारू के, नशीले जाम ढलते हैं

कोई ग़म को भुलाता है, कोई मस्ती को पाता है,
तभी तो शाम होते ही, यहाँ अरमां निकलते हैं

नहीं है तन-बदन का होश, बूढ़े और जवानों को
ख़ुमारी के नशे में तो, सभी के दिल मचलते हैं

न अपनी कार भाती है, न बीबी याद आती है
किराये की सवारी में, मज़े करने को चलते हैं

हकीकत मानकर कोई, लुटाता रूपपर दौलत
खुली आँखों में ज़न्नत के, सुनहरे ख़्वाब पलते हैं

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

"काव्यानुवाद-पिता की आकांक्षाएँ...by Samphors Vuth" (अनुवादक-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

My Dad Wishes
Samphors Vuth
अनुवादक-
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
पिता की आकांक्षाएँ
(काव्यानुवाद)
मेरे साथ सदा अच्छा हो, 
यही कामना करते हो।
नहीं लड़ूँ मैं कभी किसी से,
यही भावना भरते हो।।

उन्नति के सोपान चढ़ूँ मैं,
नीचे कभी न गिर जाऊँ।
आप यही इच्छा रखते हो,
विजय हमेशा मैं पाऊँ।।

पूज्य पिता जी आप पुत्र की,
देखभाल में लगे हुए।
मेरे लिए हमेशा तत्पर,
जीवनपथ पर डटे हुए।।

मेरा हँसना-गाना सुनकर,
तुम कितना सुख पाते हो।
लेकिन मेरा रुदन देख तुम,
दुखित तात हो जाते हो।।

 जीवित रहूँ सदा मैं जग में,
दुआ हमेशा करते हो।
मेरे सुख का मुस्तैदी से,
ध्यान हमेशा धरते हो।।

तुम हो मेरे पूज्य पिता जी,
इस जीवन के दाता हो।
मेरा जीवन तुमसे ही है,
मेरे तुम्हीं विधाता हो।।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

"दोहे-शोकदिवस ही उचित है हिन्दीदिन का नाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बिगड़ गयी है वर्तनी, बिगड़ गया विन्यास।
हिन्दी वाले कर रहे, हिन्दी का उपहास।।
--
अंग्रेजी भी लचर है, हिन्दी नहीं दुरुस्त।
हुई ज्ञान के क्षेत्र में, पकड़ हमारी सुस्त।।
--
लोकतन्त्र में हो रहा, इंग्लिश का परित्राण।
फिर कैसे होगा भला, हिन्दी का कल्याण।।
--
भारत में सब हो रहे, अंग्रेजी में काम।
शोकदिवस ही उचित है, हिन्दीदिन का नाम।।
--
हिन्दी के सिर पर नहीं, सजा अभी तक ताज।
इसीलिए हिन्दीदिवस, मना रहे हम आज।। 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

"दोहे....हिन्दी-डेःअपनी भाषा मौन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

हिन्दी भाषा का दिवस, बना दिखावा आज।
अंग्रेजी रँग में रँगा, पूरा देश-समाज।१।
--
हिन्दी-डे कहने लगे, अंग्रेजी के भक्त।
निज भाषा से हो रहे, अपने लोग विरक्त।२।
--
बिन श्रद्धा के आज हम, मना रहे हैं श्राद्ध।
घर-घर बढ़ती जा रही, अंग्रेजी निर्बाध।३।
--
लेकिन आशा है मुझे, आयेगा शुभप्रात।
जब भारत में बढ़ेगा, हिन्दी का अनुपात।४।
--
देखें कब तक रहेगी, अपनी भाषा मौन।
सन्तों की आवाज को, दबा सका है कौन?।५।

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