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रविवार, 3 मई 2015

हिन्दी ग़ज़लिका "जेठ लग रहा है चौमासा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कुदरत करने लगी तमाशा
जेठ लग रहा है चौमासा

लू-गरमी के मन में कुंठा
आम-नीम में भरी निराशा

चौपट है किसान की मेहनत
मन में छायी घोर हताशा

लगता है सावन-भादों में
चातक रह जायेगा प्यासा

चक्रवात-भूकम्प लीलते
बदली जीवन की परिभाषा

कल क्या होगा नहीं जानते
मन में भरी हुई जिज्ञासा

पल-पल “रूप” बदलता मौसम
कैसे पूरी हो अभिलाषा

दोहे "बस्ती में भूचाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

काट वनों को कोठियाँ, बना रहे सुग्रीव।
बस्ती में आने गये, जंगल के अब जीव।१।
--
बुनने में संलग्न है, मानव अपने जाल।
इसीलिए तो आ रहे, बस्ती में भूचाल।२।
--
देवदार औचीड़ से, नंगा हुआ पहाड़।
करने को कुछ सन्तुलन, शिवजी रहे दहाड़।३।
--
बादल नभ में गरजते, ओलों की है मार।
लू के मौसम में बहें, शीतल मन्द बयार।४।
--
आदत पल-पल बदलता, कलयुग में इन्सान।
देख हमारे ढंग को, बदल रहा भगवान।५।
--
नरवध-गौवध देखते, होकर सब चुपचाप।
दीन-हीन का पड़ रहा, इसीलिए अभिशाप।६।
--
पग-पग पर ही दे रहे, ईश्वर को सन्ताप।
स्वारथ के ही लिए तो, करते पूजा-जाप।७।
--
नारी से संसार है, नारी नर की खान।
लेकिन फिर भी हो रहा, नारी का अपमान।८।
--
जो रखती है हाथ में, ममता की पतवार।
उस जगदम्बा मात को, अबला रहे पुकार।९।
--
जन-जीवन जीवित रहें, मिटे यहाँ अन्याय।
सबको करने चाहिए, मिलकर आज उपाय।१०।

शनिवार, 2 मई 2015

"बालक कितने प्यारे-प्यारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 लड़ते खुद की निर्धनता से,
भारत माँ के राजदुलारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक कितने प्यारे-प्यारे।।
 
भूख बन गई है मजबूरी,
बाल श्रमिक करते मजदूरी,
झूठे सब सरकारी दावे,
इनकी किस्मत कौन सँवारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।
 
टूटे-फूटे हैं कच्चे घर,
नहीं यहाँ परपंखे-कूलर.
महलों को मुँह चिढ़ा रही है,
इनकी झुग्गी सड़क किनारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।
 
मिलता इनको झिड़की-ताना,
दूषित पानीझूठा खाना,
जनसेवक की सेवा में हैं,
अफसर-चाकर कितने सारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।

शुक्रवार, 1 मई 2015

गीत "सहमा सा मजदूर-किसान, अचरज में है हिन्दुस्तान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


खादी और खाकी दोनों में बसते हैं शैतान।
अचरज में है हिन्दुस्तान! 
अचरज में है हिन्दुस्तान!! 

तन भूखा हैमन रूखा है खादी वर्दी वालों का,
सुर तीखा हैउर सूखा है खाकी वर्दी वालों का,
डर से इनके सहमा-सहमा सा मजदूर-किसान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! 
अचरज में है हिन्दुस्तान!!

 मानवता-मर्यादा घुटती है खादी के बानों मे,
अबलाओं की लज्जा लुटती है सरकारी थानों में,
खादी-खाकी की केंचुलियाँसचमुच हैं वरदान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! 
अचरज में है हिन्दुस्तान!!

खुले साँड संसद में चरतेकरते हैं मक्कारी,
बेकसूर थानों  में मरतेजनता है दुखियारी,
कितना प्यारा अपना नाराभारत बहुत महान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! 
अचरज में है हिन्दुस्तान!!

माली लूट रहे हैं बगिया को बन करके सरकारी,
आलू-दाल-भात महँगा हैमहँगी हैं तरकारी,
जीने से मरना महँगा हैआफत में इन्सान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! 
अचरज में है हिन्दुस्तान!!

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

"दोहे पर दोहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहों में यदि आपके, होगी पैनी धार।
निश्चित वो कर जायेंगे, दिल पर सीधा वार।१।
--
कम शब्दों में जो करें, अपना सीधा काम।
इसीलिए है सार्थक, इनका दोहा नाम।२।
--
तुलसीदास-कबीर ने, बाँटा इनसे ज्ञान।
साथ बिहारीलाल के, रहिमन चतुर सुजान।३।
--
जब भी दोहों को रचो, गण का रखना ध्यान।
तेरह-ग्यारह पर टिका, दोहों का विज्ञान।३।
--
सरल मात्रिकछन्द है, करो तनिक अभ्यास।
शब्दों को चुन कर करो, दोहों का विन्यास।४।
--
दोहों के व्यामोह में, गया ग़ज़ल मैं भूल।
अन्य विधाओं का अभी, समय नहीं अनुकूल।५।
--
खाली गया न आज तक, कभी शब्द का वार।
शब्दों के आगे कभी, नहीं चली तलवार।६।
--
इन्द्रधनुष जैसे लगें, दोहों के सब रंग।
गाते इनको प्रेम से, सन्त-मलंग-निहंग।७।
--
प्यार भरे सब गीत हों, प्यारा हो संगीत।
मिल जायें बिछुड़े हुए, सबको प्यारे मीत।८।
--
मन में हो सच्ची लगन, निष्ठा भी हो साथ।
दोहों में विश्वास से, कहना मन की बात।९।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

दो मुक्तक "पेड़ को देते चुनौती आजकल बौने शज़र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बाँटते उपदेश लेकिन, आचरण होता नहीं।
भावना के साथ में, अन्तःकरण होता नहीं।
देख कर इस दुर्दशा को, दुःख होता है बहुत,
है नयी कविता, मगर कुछ व्याकरण होता नहीं।।
--
पेड़ को देते चुनौती, आजकल बौने शज़र।
नासमझ भोले पतिंगे, मानते खुद को अजर।
सामने कुछ और हैं, पर पीठ पीछे और कुछ,
भीड़ में हमदर्द तो, आता नहीं कोई नज़र।।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गीत "धूप में घर सब बनाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
वेदना के "रूप" को पहचानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा, 
दुःख से नाता बड़ा गहरा रहा, 
मीत इनको ज़िन्दग़ी का मानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

काल का तो चक्र चलता जा रहा है
 
वक़्त ऐसे  ही निकलता जा रहा, 
ख़ाक क्यों दरबार की हम छानते हैं।
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

शूल के ही साथ रहते फूल हैं
, 
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं, 
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

रूप तो इक रोज़ ढल ही जायेगा, 
आँच में शीशा पिघल ही जायेगा, 
तीर खुद पर किसलिए हम तानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

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