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शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

"दम घुटता है आज वतन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सज्जनता बेहोश हो गई,
दुर्जनता पसरी आँगन में।
कोयलिया खामोश हो गई,
मंडराती हैं चील चमन में।।

अबलाओं के कपड़े फाड़े,
लज्जा के सब गहने हारे,
यौवन के बाजार लगे हैं,
नग्न-नग्न शृंगार सजे हैं,
काँटें बिखरे हैं कानन में।
मंडरातीं हैं चील चमन में।। 

मानवता की झोली खाली,
दानवता की है दीवाली,
कितना है बेशर्म-मवाली,
अय्यासी में डूबा माली,
दम घुटता है आज वतन में।
मंडरातीं हैं चील चमन में।। 

रवि ने शीतलता फैलाई,
पूनम ताप बढ़ाने आई,
बदली बेमौसम में छाई,
धरती पर फैली है काई,
दशा देख दुख होता मन में।
मंडरातीं हैं चील चमन में।। 

सुख की खातिर पश्चिमवाले,
आते हैं होकर मतवाले,
आज रीत ने पलटा खाया,
हमने उल्टा पथ अपनाया,
खोज रहे हम सुख को धन में।
मंडरातीं हैं चील चमन में।। 

 शावकसिंह खिलाने वाले,
श्वान पालते बालों वाले,
बौने बने बड़े मनवाले,
जो थे राह दिखाने वाले,
भटक गये हैं बीहड-वन में।
मंडरातीं हैं चील चमन  में।।

बुधवार, 26 नवंबर 2014

"दोहे-जीवन पतँग समान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आसमान का है नहीं, कोई ओर न छोर।
जीवन पतँग समान है, कच्ची जिसकी डोर।।
--
अंधकार का रौशनी, नहीं निभाती साथ।
भोर-साँझ का खेल तो, सूरज के है हाथ।।
--
मछली पानी के बिना, रहती सदा उदास।
लेकिन जल में भी नहीं, बुझती उसकी प्यास।।
--
हैं संयोग-वियोग के, बहुत अनोखे ढंग।
आँसू के-मुस्कान के, अलग-अलग हैं रंग।।
--
सुन्दरता को देखकर, मत होना मदहोश।
पत्तों पर तो देर तक, नहीं ठहरती ओस।।
--
कभी न आता लौटकर, बीत गया जो सत्र।
हरे नहीं होते कभी, पीले-पीले पत्र।।
--
भेद-भाव रखता नहीं, सुमन बाँटता गन्ध।
लेकिन सबके भाग्य में, लिखा नहीं मकरन्द।। 

"साँस की डोर-देवदत्त 'प्रसून' " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।

कवि देवदत्त "प्रसून" आज हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन उनका साहित्य अमर रहेगा।
--

डोर तुम्हारे हाथों में (देवदत्त प्रसून)

मेरी साँस की  डोर  तुम्हारे  हाथों  में  ।
है  दामन  का  छोर  तुम्हारे हाथों  में ।।

प्यासा  जैसे रहा  हो  कोई सावन में  -
खडा  लिये  उम्मीद  जैसे   आँगन  में  ।।
तुम  आये  मन  भीग  उठा, आनन्द मिला -
मैं हूँ  हर्ष विभोर, प्रेम सौगातों   में  ।
नाच  उठे ज्यों मोर सघन बरसातों में ।।1।।

लम्बी बिरह के बाद  तुम्हारी  पहुनाई ।
जैसे बादल  हटे पूर्णिमा  खिल  आयी  ।।
बिखरा  सुन्दर  हास,धरा के आँचल में  -
ज्यों  खुश  हुए  चकोर , चाँदनी रातों में ।।2।।

मिलन  की वीण से पीडित मन बहलाओ  ।
तार   प्यार  के  धीरे  धीरे   सहलाओ  ।। 
अँगुली  का  वरदान   जगे  मीठी सरगम ।
छुपे  हैं मीठे  शोरमधुर आघातों    में   ।
डूबी  हर  टंकोर ,मृदुल   सुर सातों  में   ।।3।।

मैंने   मन की  कह ली, तुम भी बोलो तो  ।
मेरे  कानों में भी मधु रस घोलो तो   ।।
है  मिठास मिसरी  सी कितनी स्वाद  भरी -
हे  प्रियतम  चितचोर , तुम्हारी  बातों में  ।
सुख मिल गयाअथोर ,स्नेह के नातों में  ।।4 ।।

"प्रसून "तेरी  याद  इस तरह मन में  है  -
मीठी मीठी गन्ध  महकती सुमन में है  ।।
कोई सुन्दर मोती  मानों सीप में  हो  -
उतरे  जैसे  हंस  बगुल  की  पाँतों  में  ।
या  शबनम  की  बूँद कमल  की पाँतों में।।5।।

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

"देवदत्त 'प्रसून' जी हमारे बीच नहीं रहे।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
बड़े दुःख के साथ सूचित कर रहा हूँ कि
मेरे स्नातकोत्तर के सहपाठी
और मेरे अभिन्न मित्र
हमारे बीच नहीं रहे।
आज ही प्रातःकाल हृदयगति रुक जाने से
उनका देहान्त हुआ है।
--
श्री देवदत्त प्रसून जी
के ब्लॉग हैं-
प्रसून
--
साहित्य प्रसून
--
ग़ज़लकुञ्ज
--
परसों की ही तो बात है मेरी उनसे अपराह्न 2 बजे
फोन पर बात हुई थी।
आगामी रविवार को अपने निवास पर
उन्होंने कविगोष्ठी आहूत की थी।
उसी के निमन्त्रणपत्र वो बाँट रहे थे।
मुझे भी आमन्त्रित किया था।
लेकिन विधि को यह मंजूर नहीं था।
मैं बहुत दुखी मन से 
अपने सखा देवदत्त प्रसून को
अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए 
उनकी निम्न रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
--
दौलत से कहीं कोई अमीर होता है,
अमीर वो है जिसका कोई जमीर होता है।

लोहा तो लोहा है, चाहे जो बना लो,
लोहा जो पिट जाये, शमशीर होता है।

नस-नस में आग भर देता, चुभ जाये तो,
ततैया-डंक बहुत ही हकीर होता है।

जीना हराम कर दे, छीन ले दिल का चैन,
कोई काँटा जब बगलगीर होता है।

भलाई करे और खुद का पता तक न दे,
बस वही तो सच्चा, दानवीर होता है।

रावण की लंका जला दे जो ‘प्रसून’,
दिखने में छोटा सा महावीर होता है।

सोमवार, 24 नवंबर 2014

"बालगीत-राजा हूँ मैं अपने मन का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

राही हूँ मैं अपने पथ का
राजा हूँ मैं अपने मन का
भटक रहा हूँ अन्धकार में
लक्ष्य नहीं है इस जीवन का

चन्दा मुझसे डर जाता है
सूरज मुझसे शरमाता है
गरज रहा हूँ बरस रहा हूँ
आवारा घन हूँ सावन का
राजा हूँ मैं अपने मन का

लेकर आता मैं खुशहाली
धरती में भरता हरियाली
मैं चातक की प्यास बुझाता
श्याम-सखा हूँ वृन्दावन का
राजा हूँ मैं अपने मन का

मैं ही सरिता मैं ही सागर
मुझसे ही भरती है गागर
मैं लाता हूँ जल की धारा
प्यारा हूँ मैं जन-गण-मन का
राजा हूँ मैं अपने मन का

रविवार, 23 नवंबर 2014

"गीत-क़लम मचल जाया करती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जब कोई श्यामल सी बदली,
सपनों में छाया करती है!
तब मेरे मन में शब्दों की,
माला बन जाया करती है!!

निर्धारित कुछ समय नही है,
कोई अर्चना-विनय नही है,
जब-जब निद्रा में होता हूँ,
तब-तब यह आया करती है!
माला बन जाया करती है!!

अन्तस से जो शब्द निकलते,
शोला बनकर आग उगलते,
चिंगारी जब धधक उठे तो,
ज्वाला बन जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
धनवानों की कथा देखकर,
दर्पण दिखलाने को मेरी,
क़लम मचल जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

भँवरे ने जब राग सुनाया,
कोयल ने जब गाना गाया,
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

वैरी ने  हुँकार भरी जब,
धनवा ने टंकार करी तब,
नोक लेखनी की तब मेरी,
भाला बन जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!

शनिवार, 22 नवंबर 2014

‘‘करनी-भरनी-काठी का दर्द’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उन दिनों मेरे दोनों पुत्र बहुत छोटे थे। तब अक्सर पिकनिक का कार्यक्रम बन जाता था। कभी हम लोग पहाड़ पर श्यामलाताल चले जाते थे, कभी माता पूर्णागिरि देवी के मन्दिर में माथा टेकने चले जाते थे और कभी नेपाल के शहर महेन्द्रनगर में घूम आते थे। यहाँ से 20-25 किमी की दूरी पर गुरू नानक साहिब का विशाल गुरूद्वारा "नानकमत्ता साहिब" भी है कभी-कभी वहाँ भी मत्था टेक आते थे। 
अब तो नानकमत्ता में 5 कमरों का एक घर भी बना लिया है। जब तक पिता जी समर्थ थे तब तक इसमें तपस्थली विद्यापीठ के नाम से एक छोटे बालकों का विद्यालय भी वो चलाते थे।

तब से यह क्रम अभी तक जारी है। अक्सर रविवार के दिन तो हम लोग कहीं न कहीं घूमने जाते ही हैं।
अब एक पौत्र और एक पौत्री हो गये हैं तो अक्सर पिकनिक के कार्यक्रम बन ही जाते हैं।
पिछले वर्ष की बात है। एक दिन मन में यह विचार आया कि इस बार कार से नेपाल की सैर करने नही जायेंगे। कार सिर्फ बनबसा तक ही ले जायेंगे। उसके बाद घोड़े ताँगे से नेपाल जायेंगे।
इतवार का दिन था। हम लोग कार से बनबसा तक गये और वहाँ से 400रुपये में आने जाने के लिए घोड़ा ताँगा कर लिया और चारों ओर का नजारा देखते हुए नेपाल के महेन्द्रनगर जा पहुँचे।
वहाँ पर घने पेड़ों के बीच सिद्धबाबा का एक प्राचीन मन्दिर है।
हमने वहाँ पर प्रसाद चढ़ा कर भोजन किया। फिर थोड़ा आराम करके घोड़े-ताँगें मे सवार हो गये।
इस अलौकिक सवारी में बैठ कर खास तौर से बच्चे बहुत खुश थे।
घोड़ा-ताँगा अपनी मस्त चाल से चलता जा रहा था परन्तु उसका मालिक घोड़े को चाबुक मार ही देता था।
मैंने उसे एक-दो बार टोका ता वह बोला-
‘‘बाबू जी! घोड़े को बीच-बीच में चाबुक लगानी ही पड़ती है।’’
यह घोड़ा-वान इस घोड़े को अक्सर बारातों में भी घुड़-चढ़ी के लिए भी इस्तेमाल करता था और उसकी पीठ पर काठी बड़ी जोर से कस कर बाँधता था।
संयोगवश् एक बार मैंने इसे घोड़े को इतनी जोर से काठी बाँधते हुए देख लिया था।
मैंने इससे कहा भी कि भाई इतनी जोर से घोड़े को कस कर काठी मात बाँधा करो।
इस पर उसने अपना तर्क दिया-
‘‘बाबू जी! घोड़े का तंग और आदमी का अंग कस का ही बाँधा जाता है।’’
बात आई गयी हो गयी।
एक दिन मैं बनबसा गया तो पता लगा कि सुलेमान तांगेवाले की कमर की हड्डी क्रेक हो गयी हैं। पुरानी जान-पहचान होने के कारण मैं उसे देखने के लिए उसके घर चला गया।
वहाँ जाकर मैंने देखा कि सुलेमान भाई की पीठ में काठीनुमा एक बेल्ट कस कर बँधी हुई है।
मुझे देख कर उसकी आँखों में आँसू आ गये वह बोला-
‘‘ करनी भरनी यहीं पर हैं। 
बाबू जी! आपने ठीक ही कहा था। 
अब मुझे अहसास होता है कि 
काठी का दर्द क्या होता है?
कभी मैं घोड़े को काठी कस कर बाँधता था।
आज मुझे कस का काठी बाँध दी गयी है।

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