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बुधवार, 1 जुलाई 2015

आठ दोहे "सच होता बलवान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

परमपिता से कीजिए, दोहों में फरियाद।
कुछ ऐसा रच दीजिए, दुनिया रक्खे याद।१।
--
अपने दोहों में भरो, उपयोगी सन्देश।
दोहों में ही दिया था, सन्तों ने उपदेश।२।
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उतना सौदा लीजिए, जितना लाओ दाम।
छल-फरेब करना नहीं, इंसानों का काम।३।
--
नहीं झूठ के पाँव हैं, सच होता बलवान।
सदा हिमायत झूठ की, करते हैं शैतान।४।
--
घिर आये आकाश में, सुबह-सुबह घन श्याम।
धान रोपने खेत में, अब चल पड़े किसान।५।
--
छम-छम पानी बरसता, बादल करते शोर।
हरियाली बिखरी हुई, धरती पर चहुँ ओर।६।
--
जाड़े-पाले में हमें, अच्छा लगता घाम।
बारिश से बरसात में, मिलता है आराम।७।
--
गरमी का मौसम गया, शुरू होआ चौमास।
नभ के निर्मल नीर से, बुझी धरा की प्यास।८।

सोमवार, 29 जून 2015

"क्षणिका क्या होती है..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

साहित्य की विधा
"क्षणिका"
    क्षणिका को जानने पहले यह जानना आवश्यक है कि क्षणिका क्या होती है? मेरे विचार से “क्षण की अनुभूति को चुटीले शब्दों में पिरोकर परोसना ही क्षणिका होती है। अर्थात् मन में उपजे गहन विचार को थोड़े से शब्दों में इस प्रकार बाँधना कि कलम से निकले हुए शब्द सीधे पाठक के हृदय में उतर जाये।” मगर शब्द धारदार होने चाहिएँ। तभी क्षणिका सार्थक होगी अन्यथा नहीं। 
    सच पूछा जाये तो क्षणिका योजनाबद्ध लिखी ही नहीं जा सकती है। यह तो वह भाव है यो अनायास ही कोरे पन्नों पर स्वयं अंकित होती है। अगर सरलरूप में कहा जाये तो की आशुकवि ही क्षणिका की रचना सफलता के साथ कर सकता है। साथ ही क्षणिका जितनी मर्मस्पर्शी होगी उतनी वह पाठक के मन पर अपना प्रभाव छोड़ेगी। क्षणिका को हम छोटी कविता भी कह सकते हैं। क्षणिकाएँ हास्य, गम्भीर, शान्त और करुण आदि रसों में भी लिखी जा सकती हैं।

क्षणिका को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-
(१)   तुकान्त क्षणिका।
(२)  अतुकान्त क्षणिका।
 तुकान्त क्षणिका
    दोहा, चौपाई या अशआर अन्य किसी सीमित शब्दों के छोटे-छोटे छन्दों में रची जा सकती है।
देखिए मेरी कुछ तुकान्त क्षणिकाएँ-
--
आँखें कभी छला करती हैं,
आँखे कभी खला करती हैं।
गैरों को अपना कर लेती,
जब ये आँख मिला करती हैं।।
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दुर्बल पौधों को ही ज्यादा,
पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर,
ज्यादा दाद मिला करती है।
--
लटक रहे हैं कब्र में, जिनके आधे पाँव।
वो ही ज्यादा फेंकते, इश्क-मुश्क के दाँव।।
--
अतुकान्त क्षणिका
    इसमें किसी छन्द की मर्यादा की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन शब्द ऐसे होने चाहिएँ कि वह सीधे दिल पर चोट करें।
देखिए मेरी कुछ क्षणिकाएँ-
--
शराब वही
बोतल नई
कैसी रही
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रूप बदला है
ऐब छिपाया है
धोखा देने के लिए
--
गद्य लिखता हूँ
लाइनों को तोड़ कर
कविता बन जाती है
--
शब्द गौण हैं
अर्थ मौन हैं
इसीलिए श्रेष्ठ रचना है
--

"आशाओं पर प्यार टिका है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आशा पर संसार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ ही वृक्ष लगाती,
आशाएँ विश्वास जगाती,
आशा पर परिवार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ श्रमदान कराती,
पत्थर को भगवान बनाती,
आशा पर उपकार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशा यमुनाआशा गंगा,
आशाओं से चोला चंगा,
आशा पर उद्धार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं में बल ही बल है,
इनसे जीवन में हलचल है.
खान-पान आहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ हैंतो सपने है,
सपनों में बसते अपने हैं,
आशा पर व्यवहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं के रूप बहुत हैं,
शीतल छाया धूप बहुत है,
प्रीतरीतमनुहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ जब उठ जायेंगी,
दुनियादारी लुट जायेंगी,
उड़नखटोला द्वार टिका है।
आशाओं पर प्यार टिका है।।

रविवार, 28 जून 2015

"माँ पूर्णागिरि का दरबार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जय हो माँ पूर्णागिरि माता की
होली के समाप्त होते ही माँ पूर्णागिरि का मेला प्रारम्भ हो जाता है और भक्तों की जय-जयकार सुनाई देने लगती है! 
मेरा घर हाई-वे के किनारे ही है। अतः साईकिलों पर सवार दर्शनार्थी और बसों से आने वाले श्रद्धालू अक्सर यहीं पर विश्राम कर लेते हैं।
यदि आपका कभी माँ पूर्णागिरि के दर्शन करने का मन हो तो सबसे पहले आप खटीमा से 7 किमी दूर पूर्णागिरि मार्ग पर चकरपुर में बनखण्डी महादेव के प्राचीन मन्दिर भोलेबाबा के दर्शन अवश्य करें।
मान्यता है कि शिवरात्रि पर रात में भोले बाबा के साधारण से दिखने वाले पत्थर का रंग सात बार बदलता है।
इसके बाद आप रास्ते में पढ़ने वाले बनबसा कस्बे में पहुँचें तो भारत-नेपाल की सीमा भी देख लें। 
यहाँ शारदा न नदी पर बना एक विशाल बैराज है। जिसके पार करने पर आप नेपाल की सीमा में प्रविष्ट हो जाएँगे।
पुल के चौंतीस पिलर्स (गेट) हैं उनको पार करने के उपरान्त आपको भारत की आब्रजन और सीमा चौकी पर भी बताना होगा कि हम नेपाल घूमने के लिए जा रहे हैं।
और अगर समय हो तो नेपाल के शहर महेन्द्रनगर की विदेश यात्रा भी कर लें।
बनबसा के आगे पूर्णागिरि जाने के लिए आपको अन्तिम मैदानी शहर टनकपुर आना होगा। 
रास्ते में आपको दिव्य आद्या शक्तिपीठ का भव्य मन्दिर भी दिखाई देगा। आप यहाँ पर भी अपनी वन्दना प्रार्थना करना न भूलें।
यहाँ से 4 किमी दूर जाकर पहाड़ी रास्ते की यात्रा आपको पैदल ही करनी होगी मगर आजकल जीप भी चलने लगीं है इस मार्ग पर। जो आपको भैरव मन्दिर पर छेड़ देंगी। भैरव मन्दिर के बाद तो  कोई सवारी मिलने का सवाल ही नहीं उठता हैा। अपना भार स्वयं उठाते हुए यहाँ से आप माता के दरबार तक 3 किमी तक पैदल चलेंगे।
1500 मीटर चलने के बाद आपको टुन्यास नामक आखरी पड़ाव मिलेगा।
 यहाँ पर आप अपने बाल-गोपाल का मुण्डन संस्कार भी करा सकते हैं।
उसके बाद आपको नागाबाड़ी में पहाड़ी रास्ते के दोनों ओर बहुत से नागा साधुओं के दर्शन होंगे।
    थोडी दूर और चलने के बाद माता का पक्का पहाड़ आ जाएगा और सीढ़ियों से चलकर आपको दरबार तक जाना पड़ेगा।
    और यह है माता के मन्दिर का पिछला भाग। 
इसके साथ ही सीढ़ियाँ माता के मन्दिर की ओर मुड़ती हैं और माता का दरबार आपको दिखाई दे जाएगा।
    यदि भीड़ कम हुई तो शीघ्र ही माता के दर्शनों का लाभ भी मिल जाएगा।
यही वो छोटा सा मन्दिर है जिसके दर्शनों के लिए आप इतना कष्ट उठा कर यहाँ तक आयेंगे। मगर इसकी मान्यताएँ बहुत बड़ी हैं।
नीचे है माता के दरबार से लिया गया पर्वतों का मनोहारी चित्र। 
जिसमें नीचे शारदा नदी दिखाई दे रही है।
आप जिस रास्ते से माता के दर्शन करने के लिए आये थे अब उस रास्ते से वापिस नहीं जा पाएँगे क्योंकि मन्दिर से नीचे उतरने के लिए अलग से सीढ़िया बनाई गईं हैं।
वापस लौटते हुए आप झूठे के चढ़ाए हुए मन्दिर के भी दर्शन कर लें। 
यहाँ आपको यह भोला-भाला नन्दी और कुष्ट रोगियों के परिवार खाना पकाते खाते हुए भी नजर आयेंगे।
आपकी श्रद्धा हो तो आप दान-पुण्य भी कर सकते हैं।
माता पूर्णागिरि आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें।

शुक्रवार, 26 जून 2015

दोहागीत "मरे हुए को मारना दुनिया का दस्तूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुद को वाद-विवाद से, रखना हरदम दूर।
मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।।
--
आडम्बर को देखकर, ईश हुआ हैरान।
आज आदमी हो गया, धरती का भगवान।।
छल-फरेब मन में भरा, होठों पर हरिनाम।
काम-काम को छल रहा, अब तो आठों याम।।
ठोंगी साधू-सन्त तो, मद में रहते चूर।
मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।१।
--
गेँहूँ-चावल-दाल से, भरे हुए गोदाम।
अकस्मात कैसे बढ़े, खान-पान के दाम।।
पहले जैसे हैं कहाँ, हरे-भरे मैदान।
घटते ही अब जा रहे, खेत और खलिहान।
आपे से बाहर हुई, अरहर-मूँग-मसूर।
मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।२।
--
प्रजातन्त्र में बढ़ गया, कितना भ्रष्टाचार।
जालसाजियों को रही, बचा आज सरकार।।
नकली लिए उपाधियाँ, शासक करते राज।
घोटालों में लिप्त हैं, बड़े-बड़े अधिराज।
जनता के ही राज में, जनता है मजदूर।
मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।३।
--
सत्ता पाने के लिए, होते पूजा जाप।
मतलब में सब कह रहे, आज गधे को बाप।।
दाता थे जो अन्न के, आज हुए कंगाल।
लालाओं ने भर लिया, गोदामों में माल।
मजदूरी मिलती नहीं, पढ़े-लिखे मजबूर।
मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।४।
--
पुख़्ता करने में लगे, नेतागण बुनियाद।
निर्धन श्रमिक-किसान की, कौन सुने फरियाद।।
कहने को आजाद है, लोकतन्त्र में लोग।
सबकी किस्मत में नहीं, लड्डू-माखनभोग।।
अपनी कलम-कृपाण से, लिखता हूँ भरपूर।।
मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।५।

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