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गुरुवार, 17 जनवरी 2019

"टुकड़ा-Fragment' a poem by Amy Lowell" अनुवादक - डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

"टुकड़ा" 

(Fragment' a poem by Amy Lowell)  

अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कविता क्या है?

♥ काव्यानुवाद ♥
कविता रंग-बिरंगे, मोहक पाषाणों सी होती है क्या?
जिसे सँवारा गया मनोरम, रंग-रूप में नया-नया!!
हर हालत में निज सुन्दरता से, सबके मन को भरना!
ऐसा लगता है शीशे को, सिखा दिया हो श्रम करना!!
इन्द्रधनुष ने सूर्यरश्मियों को जैसे अपनाया है!
क्या होता है अर्थ, धर्म का? यह रहस्य बतलाया है!!

बुधवार, 16 जनवरी 2019

" (सौंदर्य) Beauty by John Masefield" अनुवादक - डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Beauty  by 

 John Masefield 

अनुवादक- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सौंदर्य जॉन मेसफील्ड

प्रातःकालीन वेला में
और
सायंकाल
सूर्यास्त के समय
पहाड़ियों की उत्तुंग चोटी पर
समीर
अपना मस्त राग गा रहा है
ऐसा प्रतीत होता है
मानो स्पेन
अपनी पुरानी
सुरीली धुनों को 
छेड़ रहा हो!

बसन्त ऋतु में
जब मेहनती महिलाएँ
नरम-नरम घास के
गट्ठरों को
अपनी पीठ पर 
लादकर चलतीं हैं
तो ऐसा लगता है
मानों अप्रैल में 
बारिश की बून्दें
गुनगुना रहीं हो !

जहाजों में 
धवल पाल के नीचे
लदे हुए फूल
जब गुनगुनाते हैं
तो ऐसा लगता है
मानों
सागर 
पुराने नगमें सुना रहा हो!

मैं ईश्वर से
पूछता हूँ
सौन्दर्य क्या है?
तो मौन में से
उत्तर आता है-
प्रेयसी के बाल,
उसकी आँखें,
उसके ओंठ,
और उनसे निकली
मधुर ध्वनि
यही तो 
सबसे बड़ा सौन्दर्य है  

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

गीत "सरदी ने रंग जमाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
सन-सन शीतल चला पवन,
सरदी ने रंग जमाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया।।

जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू,
कोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू,
दादा जी ने अपने तन पर,
कम्बल है लिपटाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया।।

जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है,
चन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है,
धूप गुनगुनी पाने को,
सबका मन है ललचाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया।।

काजू और बादाम, स्वप्न जैसे लगते निर्धन को,
मूँगफली खाकर देते हैं, सभी दिलासा मन को,
गजक-रेवड़ी के दर्शन कर,
दिल को समझाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया।।

सोमवार, 14 जनवरी 2019

दोहे "सिर पर खड़ा बसन्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सूर्य उत्तरायण हुआ, हुआ शीत का अन्त।
दिवस बड़े होने लगे, सिर पर खड़ा बसन्त।।

कुदरत ने हमको दिया, षड्-ऋतुओं का दान।
लगे पहनने खेत अब, पीताम्बर परिधान।।

निर्मल अब होने लगा, दिन-प्रतिदिन आकाश।
दस्तक अब देने लगा, जीवन में मधुमास।।

खुली गुनगुनी धूप है, नभ में उगा दिवेश।
सरसों अब खिलने लगी, निखर रहा परिवेश।।

सुबह-सुबह अच्छी लगे, अभी गुनगुनी धूप।
खान-पान रखना सही, मौसम के अनुरूप।।

रविवार, 13 जनवरी 2019

दोहे "आई फिर से लोहिड़ी, लेकर नवल उमंग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आई फिर से लोहिड़ीलेकर नवल उमंग।
अब फिर से बजने लगेढोलक और मृदंग।।

आयी फिर से लोहड़ीदेने को सौगात।
कम होगा अब देश मेंजाड़े का उत्पात।।

पर्व लोहिड़ी का यहीदेता है सन्देश।
मानवता अपनाइएसुधरेगा परिवेश।।

प्रेम और सद् भाव सेबन जाते हैं काज।
मूँगफली औरेवड़ीबाँटो सबको आज।।

गुड़ में भरी मिठास हैतिल में होता स्नेह।
खाकर मीठा बोलिएबना रहेगा नेह।।

बढ़ जायेगा देश में, अब फिर से दिनमान।
कोयलिया वन-बाग में, फिर छेड़ेगी तान।।

दोहे उत्तरायणी "उड़ती हुई पतंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उत्तरायणी पर्व को, ले आया नववर्ष।
तन-मन में सबके भरा, कितना नूतन हर्ष।१।
--
आया है उल्लास का, उत्तरायणी पर्व।
झूम रहे आनन्द में, सुर-मानव-गन्धर्व।२।
--
जल में डुबकी लगाकर, पावन करो शरीर।
नदियों में बहता यहाँ, पावन निर्मल नीर।३।
--
जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढंग।
बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।४।
--
तिल के मोदक खाइए, देंगे शक्ति अपार।
मौसम का मिष्ठान ये, हरता कष्ट-विकार।५।
--
उत्तरायणी पर्व के, भिन्न-भिन्न हैं नाम।
लेकर आता हर्ष ये, उत्सव ललित-ललाम।६।
--
सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।
शस्य-श्यामला धरा का, निखरेगा अब रूप।७।
--
भुवनभास्कर भी नहीं, लेगा अब अवकाश।
कुहरा सारा छँट गया, चमका भानु-प्रकाश।८।
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अब अच्छे दिन आ गये, हुआ शीत का अन्त।
धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।९।
--
रजनी आलोकित हुई, खिला चाँद रमणीक।
देखो अब आने लगे, युवा-युगल नज़दीक।१०।
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जीवित अब होने लगा, फिर से नवल बसन्त।
नवपल्लव पाने लगे, कानन में अब सन्त।११।
--
पौधों पर छाने लगा, कलियों का विन्यास।
दस्तक देता द्वार पर, खड़ा हुआ मधुमास।१२।
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रवि की फसलों के लिए, मौसम ये अनुकूल।
सरसों पर आने लगे, पीले-पीले फूल।१३।
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भँवरा गुन-गुन कर रहा, तितली करती नृत्य।
खुश होकर करते सभी, अपने-अपने कृत्य।१४।
--
आज सार्थक हो गयी, पूजा और नमाज।
जीवित अब होने चला, जीवन में ऋतुराज।१५।

शनिवार, 12 जनवरी 2019

दोहे "उत्तरायणी-लोहड़ी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नये साल का आगमन, लाया है सौगात।
पर्व लोहड़ी में करो, सबसे मीठी बात।।
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कुदरत ने हमको दिया, षड् ऋतुओं का दान।
खेतों ने पहना हुआ, पीताम्बर परिधान।
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मास जनवरी में हुआ, परबत पर हिमपात।
मूँगफली औ’ रेबड़ी, की बाँटो सौगात।।
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सरदी में अच्छा लगे, खिचड़ी का आहार।
तिल के लड़डू खाइए, कहता है त्यौहार।।
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उत्तरायणी-लोहड़ी, देती है सन्देश।
थोड़े दिन के बाद में, सुधरेगा परिवेश।।
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झड़बेरी पर छा गये, खट्टे-मीठे बेर।
धूप सेंकने कोकिला, बैठ गयी मुंडेर।।
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सरसों फूली खेत में, लहर-लहर लहराय।
षटपद औ मधुमक्खियाँ, गुन-गुन गीत सुनाय।।
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मिलजुल कर सब प्रेम से, भँगड़ा करते लोग।
लोहड़ी में उत्साह से, लगा रहे हैं भोग।।

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