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शनिवार, 20 दिसंबर 2014

"दोहे-आयेगा इस बार भी, नया-नवेला साल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आयेगा इस बार भी, नया-नवेला साल।
करता हूँ यह कामना, हो न कोई बबाल।१।
--
आशाएँ सब पूर्ण हो, तुमसे नूतन वर्ष।
सबके घर-परिवार में, सरसे फिर से हर्ष।२।
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नये वर्ष में नहीं हों, हत्या और बलात।
दुनिया भर में कहीं भी, कभी न हो उत्पात।३।
--
नवप्रभात जब आयेगा, दुनिया में हर ओर।
सुख के सूरज से सभी, होंगे भावविभोर।४।
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दौलत के मद में नहीं, कोई बने उलूक।
आपस में सब लोग अब, अच्छा करें सुलूक।५।
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प्यार भरे हों गीत सब, प्यारा हो संगीत।
नये साल में सभी को, मिलें सलोने मीत।६।
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सरस्वती की कृपा से, खुलें ज्ञान के सोत।
सबके ही घर में जलें, जगमग-जगमग जोत।७।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

"दोहे-बापू जी के देश में बढ़ने लगे दलाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बापू जी के देश में, बढ़ने लगे दलाल।
कब तक बीनेंगे इसे, पूरी काली दाल।।
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मैदानी भूभाग की, ठहर गयी रफ्तार।
सरदी लेकर आ गयी, कुहरे का उपहार।।
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कंकरीट के महल हैं, वन का हुआ कटाव।
ईंधन मिलता है नहीं, कैसे जलें अलाव।।
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आजादी के बाद तो, बिगड़े हैं हालात।
बचपन कचरा बीनता, लज्जा की है बात।।
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अपने प्यारे देश में, निर्धन हुए विपन्न।
राजनीति करके बने, नेता जी सम्पन्न।।
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मक्कारी पामाल है, खुद्दारी बेहाल।
कल तक जो बेकार थे, अब हैं मालामाल।।
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जिनका केवल रह गया, रिश्वतखोरी काम।
वो जनसेवक कर रहे, सत्ता को बदनाम।।
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रामराज के नाम पर, राम नाम की लूट।
राम और रहमान में, डाल रहे हैं फूट।।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

"दस दोहे-हो आपस में मेल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहरे ने सूरज ढका, थर-थर काँपे देह।
कहीं बर्फबारी हुई, कहीं बरसता मेह।१।
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कल तक छोटे वस्त्र थे, फैशन की थी होड़।
लेकिन सर्दी में सभी, रहे शाल को ओढ़।२।
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ऊनी कपड़े पहनकर, मिलता है आराम।
बच्चे-बूढ़े कर रहे, बिस्तर में विश्राम।३।
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ख़ास मजे को लूटते, व्याकुल होते आम।
गाजर का हलवा यही, खाते सुबहो-शाम।३।
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आज घरेलू गैस के, बढ़े हुए हैं भाव।
लकड़ी मिलती हैं नहीं, कैसे जले अलाव।४।
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हाड़ कँपाते शीत से, ठिठुरा देश-समाज।
गीजर-हीटर क्या करें, बिन बिजली के आज।५।
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मँहगा आलू-प्याज है, चावल-आटा-दाल।
निर्धन का तो हो गया, जीना आज मुहाल।६।
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विद्वानों की जेब में, कौड़ी नहीं छदाम।
कंगाली में हो रहा, परमारथ का काम।७।
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कविता लिखकर हो गया, जीवन मटियामेट।
दोहे लिखने से नहीं, भरता पापी पेट।८।
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अब थमना ही चाहिए, अस्त्र-शस्त्र का खेल।
बैर-भाव मिट जाये तोहो आपस में मेल।९।
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विद्वानों का काव्य औ, सन्तों का उपदेश।
आपस में मिल कर रहें, सबका ये सन्देश।१०।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

"दोहे-आतंक को पाल रहा नापाक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बच्चों पर होते जहाँ, बन्दूकों के वार।।
ऐसे ज़ुल्मी मुल्क में, रहना है दुश्वार।।
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इस घटना को देख कर, सबको है अफसोस।।
जो हत-आहत हो गये, उनका क्या था दोष।।
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देश विभाजन के समय, धरा नाम था पाक।
लेकिन क्यों आतंक को, पाल रहा नापाक।।
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दहशतगर्दों को सदा, देता रहा पनाह।
आज सामने आ गया, उसके वही गुनाह।।
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उग्रवाद के संगठन, करते गन्दे काज।।
इनका पूरे जतन से, करो सफाया आज।।
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शस्त्र नहीं पहचानता, राजा हो या रंक।
उग्रवादियों का रहा, कर्म सदा आतंक।।
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आवारा है जानवर, कस दो आज लगाम।
कोरी निन्दा से नहीं, आज चलेगा काम।।
--
बाल-वृद्ध औ नारि तो, हैं असहाय निरीह।
ऐसा करो उपाय कुछ, रहें सुरक्षित जीव।।
                          --
मन का मैल मिटाय कर, करे अगर सत्कर्म।
पाक-पाक बन जायेगा, अगर समझ ले मर्म।।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

"दीपक जलाएँ बार-बार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मित्रों!
मेरे गाँव में
आज पूरे 48 घंटे बाद
बिजली आयी है

आते रहेंगे
नये दिन
नये साल
वक्त गुजरेगा
चक्र चलेगा
जन्म पर 
मनाई जाएँगी
खुशियाँ
और मत्यु पर
होंगे मलाल
जिन्दगी पर
भारी होगा काल
--
हर दिन
सूरज उगेगा
रातों में
चन्द्रमा निकलेगा
लेकिन
अमावस की रात में
होगा सिर्फ अन्धकार
जिम्मेदारी हमारी है
कि हम सजाएँ 
जलते दीपकों की कतार
--
आलोकित करें धरा को
बार-बार
ज्ञान का 
दीपक जलाएँ
हर बार
बार-बार.....!

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

"दोहे-करो तनिक अभ्यास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


दोहा रचना सरल है, करो तनिक अभ्यास।
तेरह-ग्यारह से करो, दोहे का विन्यास।।
--
शब्दों का मन में अगर, संचित है भण्डार।
शब्दों से ही छन्द का, होता है शृंगार।।
--
करो सतत् अभ्यास को, सुधर जायेगा काव्य।
श्रम से ही संसार में. सब कुछ है सम्भाव्य।।
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कीचड़ में खिलता कमल, देता यह सन्देश।
उपवन गन्ध लुटायेगा, महकेगा परिवेश।।
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मन में हो सच्ची लगन, निष्ठा भी हो साथ।
कह देना विश्वास से, अपने मन की बात।।
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खाली गया न आज तक, कभी शब्द का वार।
शब्दों के आगे कभी, नहीं चली तलवार।।
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जब तक सरिताएँ बहीं, जल था तब तक शुद्ध।
जब धारायें थम गयीं, पानी हुआ अशुद्ध।।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

"ग़ज़ल-कहाँ जायें बताओ पाप धोने के लिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खो चुके सब, कुछ नहीं अब, शेष खोने के लिए।
कहाँ से लायें धरा, अब बीज बोने के लिए।।

सिर्फ चुल्लू में सिमटकर, रह गई गंगा यहाँ,
अब कहाँ जायें बताओ, पाप धोने के लिए।

पत्थरों के साथ रह कर, हो गये हैं संगे-दिल,
अब नहीं ज़ज़्बात बाकी, रुदन रोने के लिए।

पर्वतों से टूट कर, बहने लगे जब धार में,
चल पड़े हैं सफर पर, भगवान होने के लिए।

"रूप" था हमने तराशा, पारखी के वास्ते,
किन्तु कोई है नहीं, माला पिरोने के लिए।

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