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बुधवार, 1 अप्रैल 2015

"कभी न उल्लू तुम कहलाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
"उल्लू" 


उल्लू का रंग-रूप निराला।
लगता कितना भोला-भाला।।

अन्धकार इसके मन भाता।
सूरज इसको नही सुहाता।।

यह लक्ष्मी जी का वाहक है।
धन-दौलत का संग्राहक है।।

इसकी पूजा जो है करता।
ये उसकी मति को है हरता।।

धन का रोग लगा देता यह।
सुख की नींद भगा देता यह।।

सबको इसके बोल अखरते।
बड़े-बड़े इससे हैं डरते।।

विद्या का वैरी कहलाता।
ये बुद्धू का है जामाता।।

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।
कभी न उल्लू तुम कहलाना।।


मंगलवार, 31 मार्च 2015

"मूर्ख दिवस पर बुद्धिमानों को समर्पित कविता) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

“मूर्खदिवस पर..चोर पुराण”
कुछ ने पूरी पंक्ति उड़ाई,
कुछ ने थीम चुराई मेरी।
मैं तो रोज नया लिखता हूँ
रोज बजाता हूँ रणभेरी।

चोरों के नहीं महल बनेंगे,
इधर-उधर ही वो डोलेंगे।
उनको माँ कैसे वर देगी,
उनके शब्द नहीं बोलेंगे।

उनका जीना भी क्या जीना,
सिसक-सिसककर जो है जिन्दा।
ऐसे पामर नीच-निशाचर,
होते नहीं कभी शरमिन्दा।

अक्षय-गागर मुझको देकर,
माता ने उपकार किया है।
चोर-उचक्कों से देवी ने,
शब्दकोश को छीन लिया है।

मैं उनका स्वागत करता हूँ,
जो ऐसे गीतों को रचते।
मुखड़ा मेरा जिनको भाया,
किन्तु सत्य कहने से बचते।

छन्द-काव्य को तरस रहे वो,
चूर हुए उनके सपने हैं।
कैसे कह दूँ उनको बैरी,
वो सब तो मेरे अपने हैं।

समझदार के लिए इशारा,
इस तुकबन्दी में करता हूँ।
मैं दिन-प्रतिदिन लिखता जाता,
केवल ईश्वर से डरता हूँ।

सोमवार, 30 मार्च 2015

"क्या कानून बदला नही जा सकता?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

        आज सारी दुनिया भारत को सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के रूप मे जानती है। परन्तु इस लोकतन्त्र का घिनौना चेहरा अब लोगों के सामने आ चुका है।
       क्या आपने किसी निर्धन और ईमानदार व्यक्ति तो चुनाव लड़ते हुए देखा है?
       वह तो केवल मत देने के लिए ही पैदा हुआ है। यदि कोई ईमानदार और गरीब आदमी भूले भटके ही सही चुनाव में खड़ा हो जाता है, तो क्या वह चुनाव जीत कर संसद के गलियारों तक पहुँचा है।
        इसका उत्तर बस एक ही है ‘नही’ ।
       आज केवल धनाढ्य व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है। बस यही सत्य है । नेताओं के पुत्र-पुत्रियाँ, फिल्मी अभिनेता, या बे-ईमान और काला-धन कमाने वाले ही चुनावी समर में दिखाई देते हैं। इसीलिए संसद का चेहरा नित्य प्रति बिगड़ता जा रहा है।
     लोकतन्त्र, लोकतन्त्र कम और राजतन्त्र या भ्रष्टतन्त्र अधिक दिखाई देता है।
       क्या यह कानून बदला नही जा सकता?
     सम्भव तो हैं पर इसे बदलेगा कौन? राजतन्त्र की तरह नेताओं कुर्सी नशीन के पुत्र या भ्रष्ट नेतागण। सारी आशायें दम तोड़ती नजर आती हैं। दूध की रखवाली बिल्लों के हाथ में हो तो ये झूठी आशायें पालना ही बेकार है। 
     आज चारों ओर से आवाज उठ रही हैं कि 100 प्रतिशत मतदान करो। लेकिन ये मत तो राजनेताओं, उनके वंशजों तथा भ्रष्टाचारियों को ही तो जायेंगे।
     कहने को तो चुनाव आयोग बड़े-बड़े अंकुश लगाने के बड़े-बड़े दावे करता है। परन्तु धनाढ्यों को मनमाना धन खर्च करने की छूट मिली हुई है।
      चुनाव आयोग को चाहिए कि वह हर एक प्रत्याशी से एक निश्चित धन-राशि जमा करा कर, चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथ में ले। व्यक्तिगत रूप से न कोई झण्डा न बैनर न पोस्टर न अपील का नियम चुनाव आयोग लागू करे।
        आखिर चुनाव कराना सरकार का काम है। अतः इस गूँगे-बहरे, लुंज-पुंज लोकतन्त्र को पुनः सच्चे लोकतन्त्र के रूप में स्थापित के लिए प्रयास सरकार को ही करने चाहियें। सबका समान प्रचार कराने की जिम्मेदारी सरकार को निभानी चाहिए। प्रत्याशी का काम बस नामांकन तक ही सीमित होना चाहिए।
        तभी सच्चा लोकतन्त्र इस देश में प्रतिस्थापित हो सकता है।

रविवार, 29 मार्च 2015

"गीत-देवभूमि अपना भारत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जब बसन्त का मौसम आता,
गीत प्रणय के गाता उपवन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

पेड़ और पौधें भी फिर से,
नवपल्लव पा जाते हैं,
रंग-बिरंगे सुमन चमन में,
हर्षित हो मुस्काते हैं,
नयी फसल से भर जाते हैं,
गाँवों में सबके आँगन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

आत है जब नवसम्वतसर,
मन में चाह जगाता है,
जीवन में आगे बढ़ने की,
नूतन राह दिखाता है,
होली पर अच्छे लगते हैं,
सबको नये-नये व्यंजन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

माता का वन्दन करने को,
आते हैं नवरात्र सुहाने,
तन-मन का शोधन करने को,
गाते भक्तिगीत तराने,
राम जन्म लेते नवमी पर
दुःख दूर करते रघुनन्दन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

हर्ष मनाते बैशाखी पर,
अन्न घरों में आ जाता है,
कोयल गाती पंचम सुर में,
आम-नीम बौराता है,
नीर सुराही का पी करके,
मन हो जाता है चन्दन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

देवभूमि अपना भारत है,
आते हैं अवतार यहाँ,
षड्ऋतुओं का होता संगम,
दुनियाँ में है और कहाँ,
भारत की पावन माटी को,
करता हूँ शत्-शत् वन्दन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।। 

शनिवार, 28 मार्च 2015

"प्रभू पंख दे देना सुन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बहुत पहले फेसबुक पर
डॉ. प्रीत अरोरा जी का यह चित्र देखा
तो बालगीत रचने से
अपने को न रोक सका!
 
काश् हमारे भी पर होते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

पल में दूर देश में जाते,
नानी जी के घर हो आते,
कलाबाजियाँ करते होते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

चढ़े भाव हैं आज दूध के,
बिलख रहे हम बिना दूध के.
मिलावटी से सेहत खोते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

काश् हमें खग प्रभू बनाते,
ताजे-ताजे फल हम खाते,
भाग्यवान होते हैं तोते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

हमको भी प्रभु हंस बनाना,
सारे गुण हमको सिखलाना,
शुद्ध दूध के लिए न रोते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

जायेंगे हम पार समन्दर,
प्रभू पंख दे देना सुन्दर,
हम भी चिट्ठी ढोते होते।
नभ में हम भी उड़ते होते।।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

"गीत-कलम मचल जाया करती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 "गीत-कलम मचल जाया करती है" 
जब कोई श्यामल सी बदली,
सपनों में छाया करती है!
तब होता है जन्म गीत का,
रचना बन जाया करती है!!

निर्धारित कुछ समय नही है,
कोई अर्चना विनय नही है,
जब-जब निद्रा में होता हूँ,
तब-तब यह आया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

शोला बनकर आग उगलते,
कहाँ-कहाँ से  शब्द निकलते,
अक्षर-अक्षर मिल करके ही,
माला बन जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
धनवानों की कथा देखकर,
दर्पण दिखलाने को मेरी,
कलम मचल जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

भँवरे ने जब राग सुनाया,
कोयल ने जब गाना गाया,
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

वैरी ने  हुँकार भरी जब,
धनवा ने टंकार करी तब,
नोक लेखनी की तब मेरी,
भाला बन जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

गुरुवार, 26 मार्च 2015

"लघुकथा-भूख" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लघु-कथा
       बात  लगभग 40 साल पुरानी है। उन दिनों नेपाल में मेरा हम-वतन प्रीतम लाल पहाड़ में खच्चर लादने का काम करता था। इनका परिवार भी इनके साथ ही पहाड़ में किराये के झाले में रहता था।
     कुछ दिनों के बाद इनका अपने घर नजीबाबाद के पास गाँव में जाने का कार्यक्रम था। अतः रास्ते में मेरा घर होने के कारण मिलने के लिए आये।
औपचारिकतावश् चाय नाश्ता बनाया गया। प्रीतम की लड़की चाय बना कर लाई। परन्तु उसने चाय को बना कर छाना ही नही।  
      पहले सभी को निथार कर चाय परोसी गई। नीचे बची चाय को उसने अपने छोटे भाई बहनों के कपों में उडेल दिया।
     सभी लोग चाय पीने लगे।
     लेकिन प्रीतम के बच्चों ने चाय पीने के बाद चाय पत्ती को भी मजा लेकर खाया।
      ये लोग अब बस से जाने की तैयारी में थे कि प्रीतम ने मुझसे कहा कि डॉ. साहब कल से भूखे हैं। हमें 2-2 रोटी तो खिला ही दो।
    मैंने कहा- ‘‘जरूर।’’
     श्रीमती ने पराँठे बनाने शुरू किये तो मैंने कहा कि इनके लिए रास्ते के लिए भी पराँठे रख देना।
     अब प्रीतम और उसके परिवार ने पराँठे खाने शुरू किये। वो सब इतने भूखे थे कि पेट जल्दी भरने के चक्कर में दो पराँठे एक साथ हाथ में लेकर डबल-टुकड़े तोड़-तोड़ कर खाने लगे।
     उस दिन मैंने देखा कि भूख और निर्धनता क्या होती है।

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