"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

लोड हो रहा है. . .

समर्थक

बुधवार, 18 जनवरी 2017

गीत "कुदरत ने सिंगार सजाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बौराई गेहूँ की काया,
फिर से अपने खेत में।
सरसों ने पीताम्बर पाया,
फिर से अपने खेत में।।

हरे-भरे हैं खेत-बाग-वन,
पौधों पर छाया है यौवन,
झड़बेरी ने "रूप" दिखाया,
फिर से अपने खेत में।।

नये पात पेड़ों पर आये,
टेसू ने भी फूल खिलाये,
भँवरा गुन-गुन करता आया,
फिर से अपने खेत में।।

धानी-धानी सजी धरा है,
माटी का कण-कण निखरा है,
मोहक रूप बसन्ती छाया,
फिर से अपने खेत में।।

पर्वत कितना अमल-धवल है,
गंगा की धारा निर्मल है,
कुदरत ने सिंगार सजाया,
फिर से अपने खेत में।।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

गीत "सोच-समझकर बटन दबाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सज्जनता का ओढ़ लबादा,
घूम रहे शैतान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!

द्वारे-द्वारे देते दस्तक,
टेक रहे हैं अपना मस्तक,
याचक बनकर माँग रहे हैं,
ये वोटों का दान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!

कोई अपना हाथ दिखाता,
कोई हाथी के गुण गाता,
कोई खुशी के कमल खिलाता,
कोई घड़ी का समय बताता,
अब झाड़ू से भय खाते हैं,
ये प्राचीन निशान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!

जीवन भर गद्दारी करते,
भोली जनता का मन हरते,
मक्कारी से कभी न डरते,
फर्जी गणनाओं को भरते,
खर्च करोड़ों का करते हैं,
ये हैं बे-ईमान।
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!

सोच-समझकर बटन दबाना,
इनके झाँसे में मत आना,
घोटाले करने वालों को,
कभी न कुर्सी पर बैठाना,
मत देने से पहले,
लेना सही-ग़लत पहचान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!

सोमवार, 16 जनवरी 2017

ग़ज़ल "कड़ाके की सरदी में ठिठुरा बदन है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


शीतल धरा और शीतल गगन है
कड़ाके की सरदी में, ठिठुरा बदन है

उड़ाते हैं आँचल, हवा के झकोरे,
काँटों की गोदी में, पलता सुमन है

मिली गन्ध मधु की, चले आये भँवरे
मेरी बेबसी देख, हँसता चमन है

परेशान नदियाँ है, नालों के डर से.
करने को दूभर हुआ आचमन है

भरी “रूप” में आज कितनी मिलावट
झूठी खुशी दे रही अंजुमन है

रविवार, 15 जनवरी 2017

गीत "बीत गया है साल पुराना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

बीत गया है साल पुरानाकल की बातें छोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारोसम्बन्धों को जोड़ो।।

आओ दृढ़ संकल्प करेंगंगा को पावन करना है,
हिन्दी की बिन्दी कोमाता के माथे पर धरना है,
जिनसे होता अहित देश काउन अनुबन्धों को तोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारोसम्बन्धों को जोड़ो।।

नये साल में पनप न पायेउग्रवाद का कीड़ा,
जननी-जन्मभूमि की खातिर, आज उठाओ बीड़ा,
पथ से जो भी भटक गये हैं, उन लोगों को मोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारोसम्बन्धों को जोड़ो।।

मानवता की बगिया में, इंसानी पौध उगाओ,
खुर्पी ले करके हाथों में, खरपतवार हटाओ,
रस्म-रिवाजों के थोथे, अब चाल-चलन को तोड़ो।
फिर से अपना आज सँवारोसम्बन्धों को जोड़ो।।

शनिवार, 14 जनवरी 2017

गीत "नाम बड़े हैं दर्शन थोड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चाँदी की थाली में, सोने की चम्मच से खाने वाले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

नाम बड़े हैं दर्शन थोड़े,
ये घोड़े हैं बहुत निगोड़े,
रंग-बिरंगे ओढ़ दुशाले,
गधे बन गये अरबी घोड़े,
खादी की केंचुलिया पहने, बैठे विषधर काले-काले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

कहलाते थे जो नालायक,
वो बन बैठे आज विधायक,
सौदों में खा रहे दलाली,
ये स्वदेश के भाग्यविनायक,
लूट रहे भोली जनता को, बनकर जन-गण के रखवाले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

भावनाओं को ये भड़काते,
मुद्दों को भरपूर भुनाते,
कैसे क़ायम रहे एकता,
चाल दोहरी ये अपनाते,
सत्ता पर क़बिज़ रहने को, चलते भाँति-भाँति की चाले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

दोहे "मकर संक्रान्ति-सजने लगा बसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आया है उल्लास का, उत्तरायणी पर्व।
झूम रहे आनन्द में, सुर-मानव-गन्धर्व।१।
--
जल में डुबकी लगाकर, पावन करो शरीर।
नदियों में बहता यहाँ, पावन निर्मल नीर।२।
--
जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढंग।
बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।३।
--
तिल के मोदक खाइए, देंगे शक्ति अपार।
मौसम का मिष्ठान ये, हरता कष्ट-विकार।४।
--
उत्तरायणी पर्व के, भिन्न-भिन्न हैं नाम।
आया लेकर हर्ष को, उत्सव ललित-ललाम।५।
--
सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।
शस्य-श्यामला धरा का, निखरेगा अब रूप।६।
--
भुवनभास्कर भी नहीं, लेगा अब अवकाश।
कुहरा सारा छँट गया, चमका भानुप्रकाश।७।
--
अब अच्छे दिन आ गये, हुआ शीत का अन्त।
धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।८।
--
रजनी आलोकित हुई, खिला चाँद रमणीक।
देखो अब आने लगे, युवा-युगल नज़दीक।९।
--
पतझड़ का मौसम गया, जीवित हुआ बसन्त।
नवपल्लव पाने लगा, अब तो बूढ़ा सन्त।१०।
--
पौधों पर छाने लगा, कलियों का विन्यास।
दस्तक देता द्वार पर, खड़ा हुआ मधुमास।११।
--
रवि की फसलों के लिए, मौसम ये अनुकूल।
सरसों पर आने लगे, पीले-पीले फूल।१२।
--
भँवरा गुन-गुन कर रहा, तितली करती नृत्य।
खुश होकर करते सभी, अपने-अपने कृत्य।१३।
--
आज सार्थक हो गयी, पूजा और नमाज।
जीवित अब होने चला, जीवन में ऋतुराज।१४।
 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

दोहे "उड़तीं हुई पतंग-उत्तरायणी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मकर राशि में आ गये, अब सूरज भगवान।
नदिया में स्नान कर, करना रवि का ध्यान।‍१।
--
उत्तरायणी पर्व को, ले आया नववर्ष।
तन-मन में सबके भरा, कितना नूतन हर्ष।२।
--
भारत में इस पर्व के, अलग-अलग हैं नाम।
“रूप” धूप का एक है, सुन्दर-सुखद-ललाम।३।
--
चारों ओर भरा हुआ, लोगों में उल्लास।
सुधरेगा परिवेश अब, सबको यह विश्वास।४।
--
दिन-प्रतिदिन घट जायेगी, अब सर्दी की मार।
उपवन में आ जायेगा, नैसर्गिक सिंगार।५।
--
सरसों फूली खेत में, गेहूँ करते नृत्य।
अपने रीति-रिवाज से, हम सब करते कृत्य।६।
--
कलाबाजियाँ कर रहीं, उड़तीं हुई पतंग।
बिखराती आकाश में, भाँति-भाँति के रंग।७।
--
वसुन्धरा सजने लगी, भर सोलह सिंगार।
भारतमाता को करो, सच्चा-सच्चा प्यार।८।
--
तन को भी निर्मल करो, मन के हरो विकार।
गंगासागर दे रहा, पूजा का अधिकार।९।
--
अब भँवरे करने लगे, गुलशन में गुंजार।
कलियों में होने लगा, यौवन का संचार।१०।
--
पीताम्बर को ओढ़कर, घूम रहा है सन्त।
बासन्ती परिवेश में, सजने लगा बसन्त।११।
--
शंकर जी भी चल दिये, मैदानों की ओर।
निर्मल हो मन्दाकिनी, कल-कल करती शोर।१२।
--
माता-पिता बुजुर्ग का, हरदम करना मान।
ज्ञानसिन्धु आचार्य का, करना मत अपमान।१३।
--
नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश।
भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।‍‍१४।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails