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बुधवार, 23 जुलाई 2014

“हिन्दी व्यञ्जनावली-तवर्ग” (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आज सरल शब्दों में
बाल साहित्य का अभाव होता जा रहा है।
लेकिन मैंने माँ की कृपा से 
सभी बालसुलभ विषयों पर
बाल साहित्य में अपनी लेखनी चलायी है।
यद्यपि सीधे-सादे शब्दों में कविता रचना
इतना आसान नहीं होता है, 
जितना कि उनको पढ़ना सरल होता है।
परन्तु आजकल ब्लॉग और फेसबुक
दोनों ही स्थानों पर बालसाहित्य की
उपेक्षा होती देख कर मन में मलाल
जरूर होता है।
--
हिन्दी व्यञ्जनावली-तवर्ग 
t
 --
"त"
patti1[3]
"त" से तकली और तलवार!
बच्चों को तख्ती से प्यार!
तरु का अर्थ पेड़ होता है,
तरुवर जीवन का आधार!!
 --
"थ"
 thermos
"थ" से थन, थरमस बन जाता!
थम से जन जीवन थम जाता!
थाम रहा थम जगत-नियन्ता,
सबका रक्षक एक विधाता!!
 --
"द"
ink
द से दवा-दवात-दया है!
दंगल में बलवान नया है!
कभी नही वो वापिस आया,
जो दुनिया से चला गया है!!
-- 
"ध"
"ध" से धरा-धनुष होता है!
गुण से धनी मनुष होता है!
जिसमें मानवता बसती हो,
वही महान-पुरुष होता है!!
 --
"न"
Brass_tap
"न" से नल-नदिया बन जाता!
नल का पानी से है नाता!
नल को मत बेकार चलाओ,
जल ही है जीवन का दाता!!

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

"हिन्दी व्यञ्जनावली-टवर्ग" (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

"हिन्दी व्यञ्जनावली-टवर्ग"
 --
"ट"
"ट" से टहनी और टमाटर!
अंग्रेजी भाषा है टर-टर!
हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है,
सम्बोधन में होता आदर!!
 --
"ठ"
"ठ" से ठेंगा और ठठेरा!
दुनिया में ठलुओं का डेरा!
ठग लोगों को बहकाता है,
तोड़ डालना इसका घेरा!!
 --
"ड"
"ड" से बनता डम्बिल-डण्डा!
डलिया में मत रखना अण्डा!
रूखी-सूखी को खाकर के,
पानी पीना ठण्डा-ठण्डा!!
 -- 
"ढ"
"ढ" से ढक्कन ढककर रखना!
ढके हुए ही फल को चखना!
मनमाने मत ढोल बजाना,
सच्चाई को सदा परखना!! 
 --
"ण"
"ड" को बोलो नाक बन्दकर!
मुख से "ण" का निकलेगा स्वर!
झण्डे-डण्डे में आधा ”,
सदा लगाना होता हितकर!!

सोमवार, 21 जुलाई 2014

"हिन्दी व्यञ्जनावली-चवर्ग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हिन्दी व्यञ्जनावली-चवर्ग
patti1_thumb[3] copy
"च"
 Spoon
"च" से चन्दा-चम्मच-चमचम!
चरखा सूत कातता हरदम!
सरदीगरमी और वर्षा का,
बदल-बदल कर आता मौसम!!
-- 
"छ"
 
"छ" से छतरी सदा लगाओ!
छत पर मत तुम पतंग उड़ाओ!
छम-छम बारिश जब आती हो,
झट इसके नीचे छिप जाओ!!
 --
"ज"
ship
"ज" से जड़ और लिखो जहाज!
सागर पार करो तुम आज!
पानी पर सरपट चलता जो,
उस जहाज पर हमको नाज!!
--
"झ"
flag
"झ" से झण्डा लगता प्यारा!
झण्डा ऊँचा रहे हमारा!
नही झुका है नही झुकेगा,
हम सबके नयनों का तारा!!
--
"ञ"
yan copy
"ञ" को अगर बोलना हो तो!
नाक बन्द कर ” बोलो तो!
"ञ" की ध्वनि सुनाई देगी,
थोड़ा सा मुँह को खोलो तो!!

रविवार, 20 जुलाई 2014

‘‘चारों ओर भरा है पानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

खटीमा में बाढ़ के ताज़ा हालात
जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।
बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
--
कुछ और चित्र








शनिवार, 19 जुलाई 2014

"रस्सी-डोरी के झूले अब कहाँ लगायें सावन में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
आज एक पुराना गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ।

सपनों में ही पेंग बढ़ातेझूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी हैघी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अबपापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों परकैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसेअब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

आँगन के कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूलेअब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

"खुशहाली लेकर आया है चौमास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
विगत वर्ष चौमास का गीत लिखा था।
जिसको अपना स्वर दिया है 


मेरी मुँहबोली भतीजी "अर्चना चावजी" ने

आप भी इस गीत का आनन्द लीजिए।
खेतों में हरियाली लेकर आया है चौमास! 

जीवन में खुशहाली लेकर आया है चौमास!! 
 
सन-सन, सन-सन चलती पुरुवा, जिउरा लेत हिलोर,
इन्द्रधनुष के रंग देखकर, नाचे मनका मोर,
पकवानों की थाली लेकर आया है चौमास!
जीवन में खुशहाली लेकर आया है चौमास!!

झूले ने उपवन चहकाया, महका है परिवेश,
सावन के गीतों ने गाया, मिलने का सन्देश,
चोटी, बिन्दी, लाली लेकर आया है चौमास!
जीवन में खुशहाली लेकर आया है चौमास!!

सूरज आँख-मिचौली करता, श्याम घटा के संग,
तालाबों में कमल खिले हैं, भरकर नूतन रंग,
नभ में बदली काली लेकर आया है चौमास!
जीवन में खुशहाली लेकर आया है चौमास!!
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"कवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

व्यञ्जनावली-कवर्ग
"क"
"क" से कलम हाथ में लेकर!
लिख सकते हैं कमल-कबूतर!!
"क" पहला व्यञ्जन हिन्दी का,
भूल न जाना इसे मित्रवर!!
--
"ख"
"ख" से खम्बा और खलिहान!
खेत जोतता श्रमिक किसान!!
"ख" से खरहा और खरगोश,
झाड़ी जिसका विमल वितान!!
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"ग"
"ग" से गङ्गा, गहरी धारा!
गधा भार ढोता बेचारा!!
"ग" से गमला घर में लाओ,
फूल उगाओ इसमें प्यारा!!
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"घ"
"घ" से घण्टा-घर-घड़ियाल!
घड़ी देख कर समय निकाल!!
"घ" से घड़ा भरो पानी से,
जल पी कर हो जाओ निहाल!!
--
"ङ"
"ग" को नाक बन्द कर बोलो!
अब अपने मुँह को तुम खोलो!!
"ङ" का उच्चारण गूँजेगा,
कानों में मिश्री सी घोलो!!

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