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शनिवार, 1 नवंबर 2014

"संस्मरण-मेरी प्यारी जूली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी प्यारी जूली
बात 1975 की है! मैं नया-नया बनबसा में आकर बसा था। किराये का मकान था और कुत्ता पालने का शौक भी चर्राया हुआ था। इसलिए मैं अपने एक गूजर मित्र के यहाँ गया और उसके यहाँ से भोटिया नस्ल का प्यारा सा पिल्ला ले आया।
बहुत प्यार से इसे एक दिन रखा मगर मकान मलिक से मेरा यह शौक देखा न गया। मुझे वार्निंग मिल गई कि कुत्ता पालना है तो कोई दूसरा मकान देखो!
अतः मन मार कर मैं इसे दूसरे दिन अपने गूजर मित्र को वापिस कर आया।
अब तो मन में धुन सवार हो गई कि अपना ही मकान बनाऊँगा। उस समय जैसे तैसे पाँच हजार रुपये का इन्तजाम किया और कैनाल रोड पर एक प्लॉट ले लिया। दो माह में दो कमरों का प्लैट बना लिया और उसके आगे की ओर अपना क्लीनिक भी बना लिया।
उस समय बनबसा पशु चिकित्सालय में डॉ.ब्रह्मदत्त पशु चिकित्साधिकारी थे। उनसे मेरी दोस्ती हो गई थी। एक दिन जब मैं उनके घर गया तो देखा कि उनके यहाँ 3 पामेरियन नस्ल के पिल्ले खेल रहे थे। मैने उनसे अपने लिए एक पिल्ला माँगा तो उन्होंने कहा कि डॉ. साहब एक पेयर तो मैं अपने पास रखूँगा। इसके बाद एक पिल्ली बचती है इसे आप ले जाइए।
मैंने अपने ओवरकोट की जेब में इस प्यारी सी पिलिया को रखा और अपने घर आ गया। छोटी नस्ल की यह पिलिया सबको बहुत पसंद आई और इसका नाम जूली रखा गया।
उन दिनों कुकिंग गैस नहीं थी इसलिए घर में चूल्हा ही जलता था। बनबसा में लकड़ियों की भी भरमार थी। जाड़े के दिनों में मैं चूल्हे के आगे बैठकर जूली को सौ-सौ बार नमस्ते करना और 1-2-5-10-100 के नोट पहचानना बताता था।
जूली बहुत तेज दिमाग की थी जिसके कारण उसने बहुत जल्दी ही सब कुछ याद कर लिया था।
जूली को ग्लूकोज के बिस्कुट खाना बहुत पसंद था और यह मेरे प्रिया स्कूटर की बास्केट में बैठी रहती थी।
उन दिनों नेपाल में जाने और बाहन ले जाने के लिए कोई लिखा-पढ़ी या टैक्स नहीं लगता था। मैं रोगी देखने के ले प्रतिदिन ही नेपाल के एक दो गाँवों में जाता रहता था।
     एक दिन एक नेपाली मुझे बुलाने के लिए आया। वह पहले ही अपनी साइकिल से चल पड़ा था और गड्डा चौकी में उसको मेरी इन्तजार करनी थी। अब मैं उसके गाँव बाँसखेड़ा के लिए चल पड़ा।
जैसे ही शारदा बैराज पार किया रास्ते में एक काली गाय बहुत ही खूँख्वार बनकर मेरे स्कूटर की ओर बढ़ी। मुझे स्कूटर रोक देना पड़ा। इतने में तपाक से जूली बास्केट में से छलाँग लगा कर उस गाय के पीछे पड़ गई। वह बार-बार गाय की पूँछ पकड़ कर उसको काट लेती थी। अन्ततः गाय को भागना पड़ा। और मैं सुरक्षित गड्डाचौकी पहुँच गया।
मुझे तो अनुमान भी न था कि मेरे स्कूटर की बास्केट में जूली बैठी है। 
इतने वफादार होते हैं यह बिन झोली के फकीर। जो मालिक की जान की रक्षा अपनी जान पर खेलकर भी हर हाल में करते हैं।
क्रमशः........................

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

"!! शत्-शत् नमन !!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम!" 

राष्ट्र-नायिका श्रीमती इन्दिरा गांधी को 
!! शत्-शत् नमन !!
मैंने 31 अक्टूबर, 1984 को लिखी थी यह कविता।
31 अक्टूबर, 1984 को 
जिन्होंने यह मंजर देखा होगा
वही इस रचना का 
मर्म समझ सकते हैं 
!! श्रद्धाञ्जलि़ !!
रोयें सारे नगर और गाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

तेरी हत्या पर नभ रोया,
रोये चाँद सितारे।
सारे तेरे विरोधी रोये,
रोये अपने सारे।
सब जन करते हैं तेरो गुणगान।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

तुलसी की मानस रोई और 
जायसी की अखरावट,
श्रीमति शिवा बावनी रोई
रोई है पद्मावत,
रोये नानक की वाणी,
सबह-औ-शाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

सूर कबीर के पद रोये
और रोईं हैं कुण्डलिया.
नरोत्तम के कृष्ण रोये थे,
रोईं उनकी मुरलिया,
रोये रसिक बिहारी के श्याम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

स्वर्ग-लोक के सुर और दानव
करते क्रन्दन-क्रन्दन,
भारत के सब नर और नारी
करते तेरा वन्दन.
करते तुझको हैं शत्-शत् प्रणाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

“कंकरीटों ने मिटा डाला चमन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

cowभूख से व्याकुल हुई मैंं जा रही हूँ।  
घास के बदले में कूड़ा खा रही हूँ।। 
याद आते हैं मुझे वो दिन पुराने। 
दूर तक मैदान थे कितने सुहाने।। 

cow_open_mouthed_and_reclinedपेट भर चारा उदर में बन्द था। 
उस जुगाली में बहुत आनन्द था।। 
अब चरागाहों में फैले हैं भवन। 
कंकरीटों ने मिटा डाला चमन।। 
अब वनों का खो गया अस्तित्व है। 
होम सारा हो गया अपनत्व है।। 
गाय-भैसों को मनुज खाने लगे। 
यूरिया का दूध अपनाने लगे।। 
दिल-जिगर के रोग अब बढ़ने लगे। 
सभ्यता से लोग अब लड़ने लगे।।

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

"सारे संसार में, सब से न्यारा वतन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हमको प्राणों ,से प्यारा, हमारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!

गंगा-जमुना निरन्तर, यहाँ बह रही,
वादियों की हवाएँ, कथा कह रही,
राम और श्याम का है, दुलारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!

बुद्ध-गांधी अहिंसा के आधर थे,
सत्य नौका के मजबूत पतवार थे,
जान वीरों ने देकर, सँवारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!

शैल-शिखरों पे, संजीवनी की छटा,
सर्दी-गर्मी कभी है, कभी घन-घटा,
कितनी सुन्दर धरा, कितना प्यारा गगन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!

पेड़-पौधों का, निखरा हुआ रूप है,
घास है मखमली, गुनगुनी धूप है,
साधु-सन्तों ने तपकर, निखारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!

सबको पूजा-इबादत का, अधिकार है,
सर्व धर्मों का सम्भाव-सत्कार है,
दीन-दुखियों को देता, सहारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

"ग़ज़ल-हाथ-हाथ को धोता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

बहता जल का सोता है 
हाथ-हाथ को धोता है 

फूल कहाँ से पायेगा वो 
जो काँटों को बोता है 

जिसके पास अधिक है होता
 
वही अधिकतर रोता है 

साथ समय के सब सम्भव है 
क्यों धीरज को खोता है  

बीज खेत में नहीं बिखेरा 
खेत सभी ने जोता है 

मुखिया अच्छा वो कहलाता 
जो रिश्तों को ढोता है  

धूप रूपकी ढल जाती तो
कठिन बुढ़ापा होता है  

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

"ग़ज़ल-प्यार के सिलसिले नहीं होते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

आप आकर मिले नहीं होते
प्यार के सिलसिले नहीं होते

बात होती न ग़र मुहब्बत की
कोई शिकवे-गिले नहीं होते

ग़र न मिलती नदी समन्दर से
मौज़ के मरहले नही होते

घर में होती चहल-पहल कैसे
शाख़ पर घोंसले नहीं होते

सुख की बारिश अगर नही आती
गुल चमन में खिले नहीं होते

दिल में उल्फ़त अगर नही होती
आज ये हौसले नहीं होते

“रूप” में गर कशिश नहीं होती
इश्क के काफिले नहीं होते 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

"ग़ज़ल-बगीचे में ग़ुलों पर आब है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है
रात में उगता हुआ माहताब है

था कभी ओझल हुआ जो रास्ता
अब नज़र आने लगा मेहराब है

आसमां से छँट गयीं अब बदलियाँ
अब खुशी का आ गया सैलाब है

पत्थरों में प्यार का ज़ज़्बा बढ़ा
अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है

फूल पर मँडरा रहा भँवरा रसिक
एक बोसे के लिए बेताब है

 शाम ढलने पर कुमुद हँसने लगे
भा रहा कीचड़ भरा तालाब है

रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ
ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है

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