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शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

गीत "कहाँ खो गई मीठी-मीठी इन्सानों की बोली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहाँ खो गई मीठी-मीठी इन्सानों की बोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

कहाँ गयीं मधुरस में भीगी निश्छल वो मुस्कानें,
कहाँ गये वो देशप्रेम से सिंचित मधुर तराने,
किसकी कारा में बन्दी है सोनचिरैया भोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

लुप्त कहाँ हो गया वेद की श्रुतियों का उद्-गाता,
कहाँ खो गया गुरू-शिष्य का प्यारा-पावन नाता,
ढोंगी-भगत लिए फिरते क्यों चिमटा-डण्डा-झोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

मक्कारों को दूध-मलाई मिलता घेवर-फेना,
भूखे मरते हैं सन्यासी, मिलता नहीं चबेना,
सत्याग्रह पर बरसाई जाती क्यों लाठी-गोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

लोकतन्त्र में राजतन्त्र की क्यों फैली है छाया,
पाँच साल में जननायक ने कैसे द्रव्य कमाया,
धरती की बेटी की क्यों है फटी घाघरा-चोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

आठ दोहे "श्री कृष्ण जन्माष्टमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कारा में गोपाल ने, लिया आज अवतार।
धरा-गगन में हो रही, उसकी जय-जयकार।।
--
बादल नभ में छा रहे, बरस रहा है नीर।
हुआ देवकी-नन्द का, मन तब बहुत अधीर।।
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बन्दीघर में कंस की, पहरे थे संगीन।
खिसक रही वसुदेव के, पैरो तले जमीन।।
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बालकृष्ण ने जब रची, लीला स्वयं विराट।
प्रहरी सारे सो गये, सब खुल गये कपाट।।
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जब-जब अत्याचार से, लोग हुए लाचार।
तब-तब लेते धरा पर, महापुरुष अवतार।।
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जग-तप, पूजा-पाठ सब, हुए अकारथ आज।
सीधी-सच्ची राह से, भटका हुआ समाज।।
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बढ़ते पापाचार से, हुए सभी बेहाल।
कलयुग तुम्हें पुकारता, आ जाओ गोपाल।।
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जग के माया जाल में, जकड़े सारे लोग।
भोगवाद के दैत्य को, कौन सिखाये योग।।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

दोहे "आ जाओ गोपाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कृष्ण पक्ष की अष्टमी, भादों का है मास।
भारतमाता के लिए, दिन यह सबसे खास।
--
गोप-गोपियाँ कृष्ण को, कब से रहे पुकार।
जल्दी से आ जाइए, नन्द पिता के द्वार।।
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भारत में गो-वंश का, बहुत बुरा है हाल।
गौवें तुम्हें पुकारतीं, आ जाओ गोपाल।।
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धर्म पराजित हो रहा, बढ़ता जाता पाप।
जनता सारी है दुखी, बढ़ा जगत में ताप।।
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आहत वृक्ष कदम्ब का, तकता है आकाश।
अपनी शीतल छाँव में, बंशी रहा तलाश।।
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बरसाने की गोपियाँ, कितनी है बेचैन।
विरह-व्यथा में बरसते, उनके निशि-दिन नैन।।
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गूँज रहा है युगों से, कृष्ण मनोहर नाम।
बृज की सूनी धरा में, आ जाओ अब श्याम।।
--
मनमोहन की हो रही, जग में जय-जयकार।
मन्दिर में लगने लगी, फिर से आज कतार।।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

गीत "शब्दों के मौन निमन्त्रण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

इनके बिन बात अधूरी है,
नजदीकी में भी दूरी है,
दुनिया दारी में पड़ करके,
बतियाना बहुत जरूरी है,
मकड़ी के नाजुक जालों में,
बलवान सिंह फंद जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

पशु-पक्षी और संगी-साथी,
शब्दों से मन को भरमाते,
तीखे शब्दों से मीत सभी,
पल भर में दुश्मन बन जाते,
पहले तोलोफिर कुछ बोलो,
स्वर मधुर छन्द बन जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बँध जाते हैं।।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

गीत "बहुत कठिन जीवन की राहें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज बहुत है नया-नवेला,
कल को होगा यही पुराना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

गोल-गोल है दुनिया सारी,
चन्दा-सूरज गोल-गोल है।
गोल-गोल में घूम रहे सब,
गोल-गोल की यही पोल है।
घूम-घूमकर, सारे जग को,
बना रहा है काल निशाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

दिन दूनी औ रात चौगुनी,
बढ़ती जातीं अभिलाषाएँ।
देश-काल के साथ बदलतीं,
पाप-पुण्य की परिभाषाएँ।
धन संचय की होड़ लगी है,
लेकिन साथ नहीं कुछ जाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

कहीं सरल हैं कहीं वक्र हैं,
बहुत कठिन जीवन की राहें।
मंजिल पर जानेवालों की,
छोटे पथ पर लगी निगाहें।
लेकिन लक्ष्य उसे ही मिलता,
जिसने सही मार्ग पहचाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

रविवार, 21 अगस्त 2016

ग़ज़ल "आ गई गुलशन में फिर बहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मयंक
निन्यानबे के फेर में आया हूँ कई बार
रहमत औ’ करम ने तेरी, मुझको लिया उबार

ऐसे भी हैं कई बशर, अटक गये हैं जो
श्रम करके मैंने अपना, मुकद्दर लिया सँवार

कल तक थी जो कमी, वो पूरी हो गई है आज,
शबनम में आ गया है, मोतियों सा अब निखार

चलता ही रहा जो, वो पा गया है मंजिलें
पतझड़ के बाद आ गई, गुलशन में फिर बहार

नदियाँ मुकाम पा के, समन्दर सी हो गईं
थे बेकरार जो कभी, उनको मिला क़रार

माहताब को दी रौशनी, जब आफताब ने,
बहने लगी है रात में, शीतल-सुखद बयार

चेहरा चमक उठा, दमक उठा है रूप भी
फिर से हरा-भरा हुआ, उजड़ा हुआ दयार

शनिवार, 20 अगस्त 2016

गीत "सुमनो को सब नोच रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चौकीदारी मिली खेत की, अन्धे-गूँगे-बहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

घात लगाकर मित्र-पड़ोसी, धरा हमारी लील रहे,
पर बापू के मौन-मनस्वी, देते उनको ढील रहे,
बोल न पाये, ना सुन पाये, ना पढ़ पाये चेहरो को।।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

कैसे भरे तिजोरी अपनी, दिवस-रैन ये सोच रहे,
अपने पैने नाखूनों से, सुमनो को सब नोच रहे,
गाँवों को वीरान बनाकर, रौशन करते शहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

चीर पर्वतों की छाती को, बहती चंचल धारा है,
गहरी नदिया दूर किनारा, कोई नहीं सहारा है,
चप्पू लेकर दूर खड़े ये, चले थामने लहरो को।
चोटी पर बैठे मचान की, लगा रहे हैं पहरो को।।

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