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गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

दोहे "विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


विजयादशमी ने दिया, कभी हमें उपहार।
अच्छाई के सामने, गयी बुराई हार।।
--
विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार।
आज झूठ है जीतता, सत्य रहा है हार।।
--
रावण के जब बढ़ गये, भू पर अत्याचार।
लंका में जाकर उसे, दिया राम ने मार।।
--
तब से पुतले दहन का, बढ़ता गया रिवाज।
मन का रावण आज तक, जला न सका समाज।।
--
आज भोग में लिप्त हैं, योगी और महन्त।
भोली जनता को यहाँ, भरमाते हैं सन्त।।
--
दावे करते हैं सभी, बदलेंगे तकदीर।
अपनी रोटी सेंकते, राजा और वजीर।।
--
मनसा-वाचा-कर्मणा, नहीं सत्य भरपूर।
आम आदमी मजे से, आज बहुत है दूर।।

बुधवार, 17 अक्तूबर 2018

दोहे "मन के मैले पात्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



त्यौहारो की शृंखला, लाते हैं नवरात्र।।
साफ कीजिए नित्य ही, मन के मैले पात्र।।

अगर आचरण शुद्ध हो, उज्जवल रहे चरित्र।
प्रतिदिन तन के साथ में, मन भी रहे पवित्र।।

दुर्गा माँ की अष्टमी, का है ये सन्देश।
जग में पूजा-पाठ का, बन जाये परिवेश।।

नवमी तो श्रीराम की, करती मार्ग प्रशस्त।
बैरी के कर दीजिए, सभी हौसले पस्त।।

विजयादशमी विजय का, है पावन त्यौहार। 
उत्सव मानवमात्र के, जीवन का आधार।।

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

दोहे "विद्वानों के वाक्य" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


छन्दों का जिनको नहीं, लेशमात्र भी ज्ञान।
नहीं परोसें छन्द में, निज मन का विज्ञान।।

छन्द नहीं जो जानते, सुन लो एक सुझाव।
मुक्तछन्द में ही रचो, निज मन के अनुभाव।।

गणना अक्षर-शब्द की, होती है क्या चीज।
छन्दों की कैसे भला, होगी उन्हें तमीज।।

छेंप मिटाने के लिए, केवल करते तर्क।
ऐसे लोगों से सदा, रहना सदा सतर्क।।

घर में आकर जो नहीं, कर पाते शालाक्य।
चुरा रहे बेखौफ वो, विद्वानों के वाक्य।।

समालोचना में नहीं, चलती कोई घूस।
लेखक के तो शब्द ही, होते हैं फानूस।।

चला रहे जो माँग कर, अब तक अपना काम।
दुनिया में होता नहीं, भिखारियों का नाम।।

सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल "मुफ़लिसी के साए में अपना सफ़र चलता रहा" (गुरु सहाय भटनागर 'बदनाम')

मित्रों!
आज श्रद्धाञ्जलि के रूप में अपने अभिन्न मित्र
स्व. गुरु सहाय भटनागर 'बदनाम'
की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ
आदमी फिर ज़िन्दगी के बोझ से मरता रहा
आदमी है आदमी को देखकर हँसता रहा

इक तरफ़ जीना था मुश्किल घर में थी मजबूरियाँ
फिर भी एक इंसान जाम-ए-मय में था ढलता रहा

इक किरन राहत की उसके दर तलक पहुँची नहीं
आदमी फिर आदमी को रोज ही छलता रहा

उसका घर फ़ाकाकशी मजबूरियों से था घिरा
कैसी किस्मत थी कि वो उरियाँ बदन चलता रहा

भूख का सौदा जिसे अस्मत लुटा करना पड़ा
बोझ मायूसी का लादे उम्र भर चलता रहा

ऐ गरीबी अब तेरा मैं कर चुका हूँ शक्रिया
मुफ़लिसी के साए में अपना सफ़र चलता रहा

ज़ुल्म की टहनी कभी सर-सब्ज़ हो पाती नहीं
दिल तो फिर बदनामका दुख देखकर जलता रहा

रविवार, 14 अक्तूबर 2018

दोहे " कृपा करो अब मात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जन्म हिमालय पर लिया, नमन आपको मात।
शैलसुता के नाम से, आप हुईं विख्यात।।
 
कठिन तपस्या से मिला, ब्रह्मचारिणी नाम।
तप के बल से पा लिया, शिवशंकर का धाम।।
 
चन्द्र और घंटा रहे, जिनके हरदम पास।
घंटाध्वनि से हो रहा, दिव्यशक्ति आभास।।
 
जगजननी माता बनी, जग की सिरजनहार।
कूष्माण्डा ने रचा, सारा ही संसार।।
 
मूरख भी ज्ञानी बने, कृपा करे जब मात।
स्कन्दमाता अब धरो, मेरे सिर पर हाथ।।
 
योग-साधना से मिटे, क्षोभ-लोभ औ काम।
माता कात्यायिनी का, बैजनाथ है धाम।।
 
कालरात्री का करो, सच्चे मन से जाप।
दुर्गाजी निज भक्त का, हर लेती हैं ताप।।
 
सद्यशक्ति का पुंज हैं, देती हैं परित्राण।
महागौरि श्वेताम्बरा, करती हैं कल्याण।।
 
सिद्धिदात्रि मातु का, रहे शीश पर हाथ।
नवमरूप में रम रहीं, माता सबके साथ।।
--
मर्यादा की जीत है, मक्कारी की हार।
विजयादशमी विजय का, है पावन त्यौहार।।
--

शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

वन्दना "मनके मनकों को तुम, माता उज्जवल कर दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


माँ मेरी रचना मेंकुछ शब्द सरल भर दो।

गीतों के सागर सेसब दूर गरल कर दो।।

 

दिन-रात तपस्या करमैंने पूजा तुमको,

जीवन भर का मेरासंधान सफल कर दो।

गीतों के सागर सेसब दूर गरल कर दो।।

 

कुछ भी तो नहीं मेरामाँ सब कुछ है तेरा,

इस रीती गागर में,  निज स्नेह सबल भर दो।

गीतों के सागर सेसब दूर गरल कर दो।। 

 

लिखता हूँ जो कुछ मैंवो धूमिल हो जाता,

मसि देकर माता तुमछवि धवल-प्रबल कर दो।

गीतों के सागर सेसब दूर गरल कर दो।।

 

जितना माँगा मैंनेउससे है अधिक दिया,

मन के मनके मेरेमाता उज्जवल कर दो।

गीतों के सागर सेसब दूर गरल कर दो।।


शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

गीत "अपना भारत देश महान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जब होगा अपने भारत मेंउन्नत-सबल किसान।
तब जग का शिरमौर बनेगाअपना हिन्दुस्तान।।

भ्रष्टाचारी जब खेतों मेंकंकरीट नहीं बोयेंगे,
गट्ठर बाँध अन्न की जब सबअपने सिर पर ढोयेंगे,
कहलायेगा तब ही अपना भारत देश महान।
तब जग का शिरमौर बनेगाअपना हिन्दुस्तान।।

भोग छोड़कर लोग यहाँ जब, सहज योग अपनायेंगे,
मदिरा-मांस छोड़ प्राणीजब शाक-सब्जियाँ  खायेंगे,
भौंडे गाने छोड़ गायें सब,  देशभक्ति के गान।
तब जग का शिरमौर बनेगाअपना हिन्दुस्तान।।

जब शिक्षा की दूकानों में, ज्ञान न बेचा जायेगा,
तब अध्यापक को श्रद्धा सेगुरू पुकारा जायेगा,
विद्यालय से शिक्षित होकरनिकलेंगे विद्वान।
तब जग का शिरमौर बनेगाअपना हिन्दुस्तान।।

जिस दिन वीर सैनिकों का सम्मान बढ़ाया जायेगा,
दुश्मन को उसकी भाषा मेंसबक सिखाया जायेगा,
क़ायम रखना होगा हमकोआन-बान-अभिमान।
तब जग का शिरमौर बनेगाअपना हिन्दुस्तान।।

अपनी धरती परअपना कानून बनाना होगा,
सत्ता से सब गद्दारो कोहमें हटाना होगा,
अलग बनानी होगी अपनीदुनिया में पहचान।
तब जग का शिरमौर बनेगाअपना हिन्दुस्तान।।

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