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रविवार, 20 अगस्त 2017

बालकविता "बच्चे होते स्वयं खिलौने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सीधा-सादा, भोला-भाला।
बचपन होता बहुत निराला।।

बच्चे सच्चे और सलोने।
बच्चे होते स्वयं खिलौने।।

पल में रूठें, पल में मानें।
बच्चे बैर कभी ना ठानें।।

किलकारी से घर गुंजाते।
धमा-चौकड़ी खूब मचाते।।

टी.वी. से मन को बहलाते।
कार्टून इनके मन भाते।।

पापा जब थककर घर आते।
बच्चे खुशियों को दे जाते।।

तुतली भाषा में बतियाते।
बच्चे बचपन याद दिलाते।।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

दोहे "चौमासे का रूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अभी-अभी बारिश हुई, अभी खिली है धूप।
सबके मन को मोहता, चौमासे का रूप।।

खेल रहे आकाश में, बादल अपना खेल।
इन्द्रधनुष में हो रहा, सात रंग का मेल।।

रिमझिम-रिमझिम पड़ रहीं, धरती पर बौछार।
वन-उपवन-तालाब में, जल का है संचार।।

निचले भागों में बसे, लोग रहे अकुलाय।
बारिश का जलपान कर, धान रहे लहराय।।

कहीं-कहीं सूखा पड़ा, कहीं बाढ़ की मार।
बाजारों में है नहीं, कोई कारोबार।।

फूल रही है शान से, वन में आज मकोय।
कुदरत लीला नहीं, जान सका है कोय।।

बारिश सुख देती कहीं, देती कहीं विषाद।
नदिया के तट पर खड़ा, नौका लिए निषाद।।



शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

दोहे "माँगे सबकी खैर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करती धन की लालसा, जग को मटियामेट।
दौलत से भरता नहीं, कभी किसी का पेट।।

ज्ञान बाँटने के लिए, लिखते लोग निबन्ध।
लेकिन सबके हैं यहाँ, धन से ही सम्बन्ध।।

जो होते धनहीन हैं, उनको मिलता चैन।
जब से धन आने लगा, तब से ही बेचैन।।

क्षमा-सरलता-धैर्य का, मन में नहीं निवेश।
धन की गरमी ला रही, मानस में आवेश।।

अपना भारत चाहता, नहीं किसी से बैर।
यह है सन्त कबीर सा, माँगे सबकी खैर।।

चैन-अमन होते सदा, जीवन के पर्याय।
उग्रवाद फैले नहीं, ऐसे करो उपाय।।

चलते सत्तर साल में, यौवन जैसे पाँव।
बूढ़ा बरगद दे रहा, सबको अपनी छाँव।।
  


गुरुवार, 17 अगस्त 2017

कविता "सुख के सूरज से सजी धरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


तुम शब्दयुक्त हो छन्दमुक्त,
बहती हो निर्मल धारा सी।
तुम सरल-तरल अनुप्रासयुक्त,
हो रजत कणों की तारा सी।

आलेख पंक्तियाँ जोड़-तोड़कर
बन जाती हो गद्यगीत।
संयोग-वियोग, भक्ति रस से,
छलकाती हो तुम प्रीत-रीत।

उपवन में गन्ध तुम्हारी है,
कानन में है मृदुगान भरा।
लगती रजनी उजियारी सी,
सुख के सूरज से सजी धरा।

मेरे कोमल मन के नभ पर,
तुम अनायास छा जाती हो।
इतनी हो सुघड़-सलोनी सी,
सपनों में निशि-दिन आती हो।

तुम छन्द-काव्य से ओत-प्रोत,
कोमल भावों की रचना हो।
जिसमें अनुराग निहित मेरा,
वो सुरसवती सी रसना हो।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

गीत "स्वार्थ छलने लगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करते-करते भजन, स्वार्थ छलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

झूमती घाटियों में, हवा बे-रहम
घूमती वादियों में, हया  बे-शरम
शीत में है तपन, हिम पिघलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे
फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे
गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन
रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,  
नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।  
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

गीतिका "आजादी की वर्षगाँठ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चौमासे में श्याम घटा जब आसमान पर छाती है।
आजादी के उत्सव की वो मुझको याद दिलाती है।।

देख फुहारों को उगते हैं, मेरे अन्तस में अक्षर,
इनसे ही कुछ शब्द बनाकर तुकबन्दी हो जाती है।

खुली हवा में साँस ले रहे हम जिनके बलिदानों से,
उन वीरों की गौरवगाथा, मन में जोश जगाती है।

लाठी-गोली खाकर, कारावास जिन्होंने झेला था,
वो पुख़्ता बुनियाद हमारी आजादी की थाती है।

खोल पुरानी पोथी-पत्री, भारत का इतिहास पढ़ो,
यातनाओं के मंजर पढ़कर, छाती फटती जाती है।

आओ अमर शहीदों का, हम प्रतिदिन वन्दन-नमन करें,
आजादी की वर्षगाँठ तो, एक साल में आती है।

दोहे "आजादी का जश्न" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डरा रही नर-नार को, बन्दूकों की छाँव।
नहीं सुरक्षित अब रहे, सीमाओं पर गाँव।।
--
देख दुर्दशा गाँव की, मन में बहुत मलाल।
विद्यालय जाँये भला, कैसे अपने बाल।।
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आजादी के जश्न को, मना रहा है देश।
लेकिन मेरे गाँव का, बिगड़ रहा परिवेश।।
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फसलें भी चौपट हुईं, खेत बने शमसान।
गोलों की बौछार से, सहमा हुआ किसान।।
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मनमोहन-मनमौन थे, मोदी हैं खामोश।
भारत की सरकार को, कब आयेगा होश।।
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ऐसी हालत देख कर, आजादी भी रोय।
आतंकी घुसपैठ पर, कैसे काबू होय।।
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भरे पड़ें है देश में, कितने गुरू-कसाब।
फाँसी देकर कीजिए, उनका जल्द हिसाब।।
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नक्शे पर से मेटिये, पाक नाम का देश।
गूँज रहा है गगन में, जन-गण का सन्देश।।

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