"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

लोड हो रहा है. . .

समर्थक

शनिवार, 23 मई 2015

"मौसम नैनीताल का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

IMG_0657
गरमी में ठण्डक पहुँचाता, 
मौसम नैनीताल का! 
मस्त नज़ारा मन बहलाता, 
माल-रोड के माल का!!  
IMG_1284
नौका का आनन्द निराला, 
क्षण में घन छा जाता काला, 
शीतल पवन ठिठुरता सा तन, 
याद दिलाता शॉल का! 
IMG_1221
पलक झपकते बादल आते,
गरमी में ठण्डक पहुँचाते,
कुदरता का ये अजब नज़ारा,
लगता बहुत कमाल का!
IMG_1205
लू के गरम थपेड़े खा कर, 
आम झूलते हैं डाली पर, 
इन्हें देख कर मुँह में आया, 
मीठा स्वाद रसाल का! 
IMG_1209
चीड़ और काफल के छौने, 
पर्वत को करते हैं बौने, 
हरा-भरा सा मुकुट सजाते, 
ये गिरिवर के भाल का! 
IMG_1250
सजा हुआ सुन्दर बाजार,
ऊनी कपड़ों का अम्बार,
मेले-ठेले, बाजारों में,
काम नहीं कंगाल का!
गरमी में ठण्डक पहुँचाता, 
मौसम नैनीताल का! 
मस्त नज़ारा मन बहलाता, 
माल-रोड के माल का!!

शुक्रवार, 22 मई 2015

"आम फलों का राजा, लीची होती रानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आम फलों का राजा होता
लीची होती रानी
गुठली ऊपर गूदा होता
छिलका है बेमानी
 
जब बागों में कोयलिया ने,
अपना राग सुनाया
आम और लीची का समझो,
तब मौसम है आया
 
पीले, लाल-हरे रंग पर,
सब ही मोहित हो जाते
ये खट्टे-मीठे फल सबके,
मन को बहुत लुभाते
 
लीची पक जाती है पहले,
आम बाद में आते
बच्चे, बूढ़े-युवा प्यार से,
इनको जमकर खाते
 
ठण्डी छाँव, हवा के झोंके,
अगर चाहते पाना
घर के आँगन में फलवाले,
बिरुए आप लगाना 

गुरुवार, 21 मई 2015

"लीची के गुच्छे मन भाए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

हरीलाल और पीली-पीली!
लीची होती बहुत रसीली!!
 IMG_1175
गायब बाजारों से केले।
सजे हुए लीची के ठेले।।
 
आम और लीची का उदगम।
मनभावन दोनों का संगम।।
 
लीची के गुच्छे हैं सुन्दर।
मीठा रस लीची के अन्दर।।
 IMG_1178
गुच्छा बिटिया के मन भाया!
उसने उसको झट कब्जाया!!
 IMG_1179
लीची को पकड़ादिखलाया!
भइया को उसने ललचाया!!
IMG_1180
भइया के भी मन में आया!
सोचा इसको जाए खाया!!
 
गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!
IMG_1177 
दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!

बुधवार, 20 मई 2015

"कोयल आयी मेरे घर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुब सवेरे सहमी-सहमी, 
कोयल आयी मेरे घर में। 
कुहू-कुहू गाने वालों के, 
चीत्कार पसरा है सुर में।।
निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने, 
उसको बहुत सताया था। 
कुदरत का कानून तोड़कर, 
जंगल राज चलाया था।
बँधी हुई आँगन में रस्सी, 
बैठी गयी उसके ऊपर। 
अनजानी आफत को पाकर, 
काँप रही है, वो थर-थर।
दूषित है परिवेश आज का, 
लगा खून का चस्का है। 
इस दुनिया में अबलाओं की, 
कोई नहीं सुरक्षा है।
चारों ओर छिपे हैं डाकू, 
लूटमार का आलम है। 
लाचारी की दशा देखकर, 
आँख बहातीं शबनम हैं।
इन्सानों के घर में आकर, 
खोज रही ये चैन-अमन। 
अस्मत की खातिर ही इसने, 
छोड़ा अपना बाग-चमन।
लगता है अब इस धरती में,
सबके अन्तस मैले हैं। 
कंस और रावण के वंशज, 
जगह-जगह पर फैले हैं।।

मंगलवार, 19 मई 2015

प्यार के दोहे "जीवन का विज्ञान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ढाई आखर में छिपा, जीवन का विज्ञान।
माँगे से मिलता नहीं, कभी प्यार का दान।।
--
प्यार नहीं है वासना, ये तो है उपहार।
दिल से दिल का मिलन ही, होता है आधार।।
--
रोज शाम को पार्क में, मिलते कितने यार।
किन्तु नहीं उमड़ा कभी, आँखों में वो प्यार।।
--
प्यार न देखे रूप को, प्यार देखे जात।
आँखों-आँखों में करे, मन तो मन की बात।।
--
मन ही मन के जानता, छिपे हुए उद्गार।
जो नैसर्गिकरूप से उमड़े, वो है प्यार।।
--
अनजाने को देख कर, आँख हो गयीं चार।
अँखियन में तब प्यार को, देखा पहली बार।।
--
तोता-तोती भी करें, प्यार-प्रीत की बात।
दोनों ही सहला रहे, इक-दूजे का गात।।
--
कभी जुदाई है यहाँ, कभी यहाँ पर मेल।
हैं संयोग-वियोग का, प्यार अनोखा खेल।।
-♥♥♥-

सोमवार, 18 मई 2015

दोहे "नहीं समय अनुकूल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो समाज को दिशा दे, वो ही है साहित्य।
दोहों में मेरे नहीं, होता है लालित्य।१।
--
पहले पंजा गर्व में, रहता था मग़रूर।
जनता ने अब कर दिया, उसके मद को चूर।२।
--
आज हो गया कमल भी, अपने मद में चूर।
जनता ही फिर करेगी, भ्रम उसका भी दूर।३।
--
जनता के है हाथ में, दल-दल की तकदीर।
धूल चाटते समर में, बड़े-बड़े बलवीर।४।
--
होता वो जनतन्त्र में, जो जनता को भाय।
दिल्ली में इक तिफ़्ल को, कुर्सी दई थमाय।५।
--
रास न आया किसी को, हाथ हो गया साफ।
तीन सीट में कमल है, सढ़सठ में है आप।।
--
जनता धोखा खा गयी, मान रही अब भूल।
फूलों के बदले वहाँ, मिले आज हैं शूल।६।
--
अगले आम चुनाव में, होंगे फिर बदलाव।
देखें किस दल की यहाँ, पार लगेगी नाव।७।
--
जिह्वा पर प्रभु नाम हो, लेकिन मन में खोट।
भाषण के बल पर मिलें, जनता के अब वोट।८।
--
करें चाकरी देश में, महासुभट विद्वान।
धनवानों की माँद में, बन्धक हैं गुणवान।९।
--
निर्धन-श्रमिक किसान के, नहीं समय अनुकूल।
अभी दिखाई दे रहा, मौसम भी प्रतिकूल।१०।
--
दिखा नहीं है जेठ में, बदन जलाता घाम।
उमड़-घुमड़कर आ रहे, गरमी में घनश्याम।।
--
सावन-भादों में लगें, अच्छी हमें फुहार।
चौमासे में हे प्रभू, कर देना उपकार।११।

रविवार, 17 मई 2015

दोहे "श्रद्धासुमन लिए हुए लोग खड़े हैं आज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अच्छे दिन के स्वप्न तो, हुए बहुत अब दूर।
दाम तेल के बढ़ रहे, महँगाई भरपूर।।
--
शक्कर-घी महँगा हुआ, महँगा आटा-तेल।
शासक सत्ता मोह में, खेल रहा है खेल।।
--
सबको अच्छे दिनों के, खूब दिखाये स्वप्न।
राज-पाट को पाय कर, सबको किया विपन्न।।
--
समझे थे सब लोग यह, होगा कोउ कमाल।
लेकिन हालत देख कर, होता बहुत मलाल।।
--
राम-राम के नाम पर, पाया रावणराज।
निर्धनभक्तों के यहाँ, बिगड़े सारे काज।।
--
केशर-क्यारी में चली, साठ-गाँठ भरपूर।
पुनर्वास के ख़्वाब़ तो, अब नयनों से दूर।।
--
एक साल में देख कर, बदले हुए मिज़ाज़।
श्रद्धासुमन लिए हुए, लोग खड़े हैं आज।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails