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बुधवार, 7 मार्च 2012

‘‘फागुन-फाग, फुहारों में’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

होली का हुड़दंग मचा है,
गाँव-गलीघर-द्वारों में।
ठण्डाई और भंग घुट रही,
चौराहों-चौबारों में।
प्रेम-गीत और ढोल नगाड़े,
साज सुरीले बजते हैं,
रंग-बिरंगी पिचकारी की,
चहल-पहल बाजारों में।
राधा-रानीकृष्ण-कन्हैया,
हँसी-ठिठोली करते है,
गोरी की चोली भीगी है,
फागुन-फागफुहारों में।
खुशियों का सन्देशा लेकर,
पवन-बसन्ती आयी है,
सजनी का मन रंगा हुआ है,
सतरंगी बौछारों में।
धर सोलह सिंगार धरा ने,
अनुपम छटा बिखेरी है,
खेतबागवन-मन-उपवन,
छाये हैं मस्त बहारों में।

मंगलवार, 6 मार्च 2012

‘‘हमने कभी नहीं बिसराया है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


होली हो या नयासाल हो, क्रिसमस-ईद-दिवाली हो।
रक्षाबन्धन-प्रेमदिवस हो, या तीजो हरियाली हो।।

भारत की ऋतुओं को मैंने कभी नहीं बिसराया है।
अपनी तुकबन्दी में मैंने सबको जमकर गाया है।।

हँसता-गाता बचपन, नन्हे सुमन मुझे भाते हैं।
रोज नया कुछ लिखने की ये मन में चाह जगाते हैं।।

श्यामल गइया, उल्लू-मछली, कम्प्यूटर, गांधी-टोपी।
नहीं किसी को छोड़ा अबतक, मिला विषय मुझको जो भी।।

कॉफी-चाय, शराब-सिलिण्डर, या कौओं का जोड़ा हो।
गदहा बोझा ढोता हो या सरपट घोड़ा दौड़ा हो।।

बीती यादों को भी मैंने, आलेखों में जोड़ा है।
मेले-त्यौहारों का मैंने, मोह कभी ना छोड़ा है।।

नहीं जानता कैसे प्रतिदिन, नया सृजन हो जाता है।
नहीं जानता कौन व्योम से रचनाएँ लिखवाता है।।

मातु शारदे का मैं पल-प्रतिपल वन्दन करता हूँ।
उनकी चरणधूलि का चन्दन माथे पर धरता हूँ।।

सोमवार, 5 मार्च 2012

"प्रीत बढ़ाएँ होली में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


दिल से दिल को आज मिलाएँ, रंगों की रंगोली में।
आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।

एक साल में एक बार यह पर्व सलोना आता है,
फाग-फुहारों के पड़ने से जुड़ता दिल से नाता है,
संगी-साथी को बैठाएँ, अरमानों की डोली में।
आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।

पड़े हुए हैं अलग-थलग जो, रिश्तों में दरार आई,
उनको टीका कर गुलाल का, भर दो अब गहरी खाई,
आओ फिर सम्बन्ध बनाएँ, बिछुड़े दामन-चोली में।
आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।

नहीं साँच को आँच, होलिका जली दर्प की ज्वाला में,
शक्ति असीमित भरी हुई है प्रभू नाम की माला में,
प्यार भरा आशीष निहित है, अक्षत्-चन्दन रोली में।
आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।

रविवार, 4 मार्च 2012

"रंगों का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


फागुन लेकर आया खुशियाँ, मस्ती और बहार।
हरष रहा है-सरस रहा है, रंगों का त्यौहार।।

धवल चाँदनी से चन्दा ने, नभ का रूप निखारा,
होली की रजनी में फैला, धरती पर उजियारा,
हँसी-ठिठोली की होती है, होली में बौछार।
हरष रहा है-सरस रहा है, रंगों का त्यौहार।।

नई कोपलें पेड़ों की शाखाओं पर लहराती,
टेसू-सेंमल की कलियाँ अंगारों सी हो जाती,
गुझिया-मठरी की सुगन्ध से महके हैं घर-बार।
हरष रहा है-सरस रहा है, रंगों का त्यौहार।।

राग-रागिनी, ढपली-ढोलक अभिनव राग सुनाते,
हुलियारे भी नाच-नाच कर, गीत प्रणय के गाते,
इक-दूजे को गले लगाकर, करते प्रेम अपार।
हरष रहा है-सरस रहा है, रंगों का त्यौहार।।

पीतम्बर पहने सरसों के बिरुए बहुत लुभाते.
झूम-झूमकर, गुन-गुन करते भँवरे दौड़े आते,
मधुमक्खी-तितली रस पीने आयी पंख पसार।
हरष रहा है-सरस रहा है, रंगों का त्यौहार।।

शनिवार, 3 मार्च 2012

"दोहे-होली का त्यौहार-1250वीं पोस्ट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अब पछुआ चलने लगी, सर्दी गयी सिधार।
कुछ दिन में आ जाएगा, होली का त्यौहार।१।

सारा उपवन महकता, चहक रहा मधुमास।
होली का होने लगा, जन-जन को आभास।२।

अंगारा बनकर खिला, वन में वृक्ष पलाश।
रंग, गुलाल-अबीर की, आने लगी सुवास।३।

गेहूँ पर हैं बालियाँ, कुन्दन सा है रूप।
बादल-कुहरा छँट गया, खिली-खिली है धूप।४।

अम्मा मठरी बेलती, सजनी तलती जाय।
सजना इनको प्यार से, चटकारे ले खाय।५।  

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

"परीक्षा देना बड़ा जरूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


खेल-कूद में रहे रात-दिन,
अब पढ़ना मजबूरी है।
सुस्ती - मस्ती छोड़,
परीक्षा देना बड़ा जरूरी है।।

मात-पिता,विज्ञान,गणित है,
ध्यान इन्हीं का करना है।
हिन्दी की बिन्दी को,
माता के माथे पर धरना है।।

देव-तुल्य जो अन्य विषय है,
उनके भी सब काम करेगें।
कर लेंगें, उत्तीर्ण परीक्षा,
अपना ऊँचा नाम करेंगे।।

श्रम से साध्य सभी कुछ होता,
दादी हमें सिखाती है।
रवि की पहली किरण,
हमेशा नया सवेरा लाती है।।

बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2012

‘‘दोहे-खिलते हुए पलाश’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश।
अँग्रेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।१।

भूल गये है मनचले, हिन्दुस्तानी भेष।
भौँडे कपड़े धार के, किया कलंकित देश।२।

लाँघ रहे सीमाओं को, नंगा कर सिंगार।
मोबाइल से सुन रहे, गोरों की झंकार।३।

फागुन के परिवेश में, होली का आनन्द।
फाग-फुहारों से सजे, गीत हो गये मन्द।४।

खुला निमन्त्रण दे रहे, खिलते हुए पलाश।
पूरब की ले सभ्यता, और न करो विनाश।५।

अम्बुआ, जामुन-नीम भी, देते हैं ये सीख।
परदेशों के सामने, माँग रहे क्यों भीख।६।

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