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बुधवार, 13 नवंबर 2019

बालगीत "जन्मदिवस चाचा नेहरू का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जन्मदिवस चाचा नेहरू का, 
बच्चों भूल न जाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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नित्य-नियम से सदा सींचना, 
बगिया की फुलवारी।
मत-मजहब के गुलदस्ते सी, 
वसुन्धरा है प्यारी।
अपनी इस पावन धरती पर, 
वैमनस्य मत उपजाना।
 ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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सुख-दुख का तो दुनियाभर में, 
चक्र सदा चलता रहता।
वो महान जो दोनों को, 
सहजभाव से है सहता।
विपदाओं के क्षणिक काल में, 
कभी न तुम घबराना।
 ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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पथ में कंकड़-पत्थर बिखरे, 
काँटे उगे चमन में।
पथ पर आगे बढ़ते जाना, 
आशा रखकर मन में।
सत्य-अहिंसा हर हालत में, 
निज हथियार बनाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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भारत के हैं भाग्य विधाता, 
होनहार सब बच्चे।
छल-फरेब को नहीं जानते, 
बालक होते सच्चे।
प्यार बाँटना सारे जग में, 
सबको गले लगाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा, 
सादा जीवन अपनाना।।
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गीत "चढ़ा हुआ बुखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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है नशा चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
राम के ही देश में, राम बेकरार है।
तन-बदन में आज तो, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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मंगलवार, 12 नवंबर 2019

समय का फेर (संस्मरण) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

समय का फेर
(संस्मरण)
       आज से 55 साल पहले की बात है। उस समय मेरी आयु 14-15 साल की रही होगी। मैं तब उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में रहता था। उस समय यातायात का साधन रेलगाड़ी या बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी और साइकिल ही थी। उस समय ट्रैक्टर भी नहीं थे। हमारे शहर से सबसे नजदीक सोती का नांगल ग्राम में गंगा घाट था। जो नजीबाबाद से 9 मील दूर था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ गंगा स्नान का विशाल मेला लगता था।
      हम लोग सपरिवार इस मेले में जाते थे। मुझे मेरी छोटी बहन के साथ पिता जी साइकिल पर मेले में ले जाते थे। माता जी और मेरी मझली बहन को वे पड़ोसी किसान की बैलगाड़ी में बैठा देते थे और हम लोग 3 दिनों के लिए नांगल चले जाते थे।
      नजीबाबाद में मेरे मिहल्ले रम्पुरे में पिता जी के दूर के रिश्ते के चाचा नन्हें सिंह रहते थे। जो सादगी में अपना जीवन यापन करते थे। उनकी बहन नन्ही नांगल में रहती थी। जिसके पति का नाम तुंगल था। उनके पास गुजर-बसर के लिए थोड़ी सी खेती थी। मगर ये दोनों पति-पत्नी बहुत अच्छे स्वभाव के थे। जो 15 दिन पहले से तैयारी में लग जाते थे कि रम्पुरे मुहल्ले से हमारे रिश्तेदार मेले में आयेंगे और उनको कोई असुविधा न हो। इसलिए वे अपने कच्चे घर और उसके आगे दो छप्परों में पराली बिछाकर सूत का पाल बिछा देते थे। जहाँ सब लोगों के सोने का प्रबन्ध होता था। किस्से-कहानी और गप-शप में रात गुजारते थे। खाने में मिष्ठान के रूप में गुड़ होता था, चने का साग और धान की या मक्की की रोटी नन्हीं दादी और उनकी पुत्री बहुतायत में बनाती थीं। जो हम शहरियों के लिए मोहन-भोग से कम नहीं होती थी। कुछ लोग घर से रोटी बाँधकर लाते थे तो नन्हीं दादी बहुत बुरा मानती थी और यह कहती थी कि क्या हम लोग इस काबिल भी नहीं हैं कि आप लोगों को खाना खिला सकें। सच पूछा जाये तो दादी के यहाँ भण्डारा चलता था और इस काम में पास पड़ोस के 3-4 परिवार भी उनके साथ लगे रहते थे।
        रात्रि विश्राम करके सुबह सब लोग अपने-अपने घरों को प्रस्थान कर जाते थे। और हाँ, एक बात तो बताना भूल ही गया। दादी के घर के बाहर उनका गन्ने का कोल्हू भी था। जहाँ गुड़, शक्कर और राब बनायी जाती थी। जिसे साप्ताहिक हाट में घर की आवश्यकता पूरी करने के लिए बेच दिया जाता था। क्योंकि उन दिनों चीनी मिल या क्रेशर नहीं थे।
     सुबह होते ही सारे मेहमान 2-3 बैलगाड़ियों पर सवार होकर दो कोस दूर गंगाघाट पर लगे विशाल मेले में जाते थे। गाड़ी में ही खिचड़ी, घी, आम और आँवले का अचार, लकड़ी, खिचड़ी पकाने के लिए एक बड़ी देग और गंगाघाट पर खिचड़ी बनती थी। मेले में शाम तक सब लोग आनन्द मनाते मनोरंजन करते थे और फिर दादी के घर लौट आते थे। विदाई के समय नन्हीं दादी और तुंगल दादा सबको गर्म गुड़ भी भेंट में देते थे।
      अब जमाना बहुत बदल गया है। स्वागत सत्कार मात्र चाय और नमस्ते तक ही सिमट कर रह गया है। आज तो वह निश्छल प्यार और नाते-रिश्तों के मतलब ही बदल गये हैं। कितना अन्तर हो है उस समय के जमाने में और आज के जमाने में।

सोमवार, 11 नवंबर 2019

दोहे "गठबन्धन की नाव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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खींचातानी में हुआ, मोह आपसी भंग।
नूरा-कुश्ती देखकर, लोग रह गये दंग।।
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राजनीति का देश में, इतना बढ़ा खुमार।
सत्ता पाने के लिए, होती मारामार।।
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दशकों से दोनों रहे, सुख-दुख में थे साथ।
लेकिन कुरसी के लिए, छोड़ दिया अब हाथ।।
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नेक-नीति के साथ में, दोनों लड़े चुनाव।
लेकिन डूबी स्वार्थ में, गठबन्धन की नाव।।
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जनता से जो थे किए, मिलकर कौल-करार।
अहम भाव से हो गयी, आपस में तकरार।।
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राजनीति की धूप को, सेंक रहा परिवार।
खानदान के लिए सब, माँग रहे अधिकार।।
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बाहर बने कपोत से, भीतर से हैं काग।
अलग-अलग सुर में सभी, गाते अपने राग।।
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दोहे "गंगा जी की धार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कातिक की है पूर्णिमा, सजे हुए हैं घाट।
सरिताओं के रेत में, मेला लगा विराट।।
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एक साल में एक दिन, आता है त्यौहार।
बहते निर्मल-नीर में, डुबकी लेना मार।।
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गंगा तट पर आज तो, उमड़ी भारी भीड़।
लगे अनेकों हैं यहाँ, छोटे-छोटे नीड़।।
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खिचड़ी गंगा घाट पर, लोग पकाते आज।
जितने भी आये यहाँ, सबका अलग मिजाज।।
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गुरू पूर्णिमा पर्व पर, खुद को करो पवित्र।
सरिताओं के घाट पर, आज नहाओ मित्र।।
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गुरु नानक का जन्मदिन, देता है सन्देश।
जीवन में धारण करो, सन्तों के उपदेश।।
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बुला रहा है आपको, हर-हर का हरद्वार।
मैली मत करना कभी, गंगा जी की धार।।
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गंगा जी के नाम से, भारत की पहचान।
गंगा तीनों लोक में, करती मोक्ष प्रदान।।
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शनिवार, 9 नवंबर 2019

दोहे "स्वर्णिम इतिहास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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न्याय मिला श्री राम को, न्यायालय से आज।
अब मन्दिर निर्माण का, पूरा होगा काज।।
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दोनें पक्षों को मिला, उनका अब अधिकार।
मन्दिर-मस्जिद को दिया, धरती का उपहार।।
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भव्य बने मन्दिर वहाँ, मस्जिद आलीशान।
अलग-अलग भू पर बने, पूजा-सदन महान।।
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धर्मों के दरम्यान में, कभी न हो तकरार।
न्यायालय ने पाट दी, अब तो सभी दरार।।
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सदियों से था चल रहा, जो भी वाद-विवाद।
मिटा एक आदेश से, दोनों का उन्माद।।
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न्याय अदालत ने किया, सबका रखकर ध्यान।
अमर हुआ नौ नवम्बर, तवारीख के नाम।।
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वर्तमान ये बन गया, अब स्वर्णिम इतिहास।
करते जय-जयकार हैं, धरा और आकाश।।
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दोहे "नियम और कानून" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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न्यायालय तो साक्ष्य पर, करता सोच-विचार।
आये जो भी फैसला, करो उसे स्वीकार।।
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देते हैं सन्देश ये, गीता और कुरान।
आपस में लड़ते नहीं, राम और रहमान।।
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नहीं किसी की हार है, नहीं किसी की जीत।
सत्य-तथ्य से है बँधा, होता काल-अतीत।।
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सारी दुनिया जानती, भारत के थे राम।
मचा हुआ फिर किसलिए, क्यों इतना कुहराम।।
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अभिलेखों में आज भी, दर्ज अजुध्या नाम।
त्रेता में पैदा हुए, इसी जगह श्री राम।।
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भावनाओं के वेग में, बह मत जाना मित्र।
रखना हर हालात में, अपने साथ चरित्र।।
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रखना होगा अमन का, भारत में परिवेश।
मत-मजहब से है बड़ा, अपना प्यारा देश।।
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सर्वोपरि हैं देश में, नियम और कानून।
मन में मत रखना कभी, दुर्भावना-जुनून।।
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