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मंगलवार, 29 जुलाई 2014

" दुखद समाचार" मेरे पिताश्री श्रद्धेय घासीराम आर्य जी का देहावसान

बहुत दुःख के साथ सूचित किया जाता है कि
91 वर्षीय मेरे पिताश्री
श्रद्धेय घासीराम आर्य जी का
देहावसान आज दिनांक 29-07-2014 को
अभी प्रातः 5 बजे हो गया है।
अन्तिम संस्कार आज ही सायं 5 बजे
स्थानीय मुक्ति धाम खटीमा में किया जायेगा।

सोमवार, 28 जुलाई 2014

"ईद और तीज आ गई है हरियाली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

भर सोलह सिंगार धरा ने,
फिर से अपना रूप निखारा।
सजनी ने साजन की खातिर,
सावन में तन-बदन सँवारा।
वन-कानन में आज मयूरी,
नाच रही होकर मतवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

आँगन के कट गये पेड़ सब,
पड़े हुए झूले घर-घर में।
झूल रहीं खुश हो बालाएँ,
गूँज रहे मल्हार नगर में।
मस्त फुहारें लेकर आयी,
नभ पर छाई बदरी काली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

उपवन में कोमल कलियों की,
भीग रही है चूनर धानी।
खेतों में लहराते बिरुए,
आसमान का पीते पानी।
पुरवय्या के झोंखे आते,
बल खाती पेड़ों की डाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

घेवर-फेनी और जलेबी,
अच्छी लगती चौमासे में।
लेकिन अब त्यौहार हमारे,
हैं मँहगाई के फाँसे में।
खास आदमी मजे उड़ाते,
जेब आम की बिल्कुल खाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
 
शर्माया-सकुचाया सा,
उग आया चाँद गगन में।
आया है त्यौहार ईद का,
हर्ष समाया मन में।
इस्लामी लोगों के घर में
चल कर आयी दीवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

"मौन निमन्त्रण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आँखों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

इनके बिन बात अधूरी है,
नजदीकी में भी दूरी है,
दुनिया दारी में पड़ करके,
बतियाना बहुत जरूरी है,
मकड़ी के नाजुक जालों में,
बलवान सिंह फंद जाते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

पशु-पक्षी और संगी-साथी,
शब्दों से मन को भरमाते,
तीखे शब्दों से मीत सभी,
पल भर में दुश्मन बन जाते,
पहले तोलोफिर कुछ बोलो,
स्वर मधुर छन्द बन जाते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

रविवार, 27 जुलाई 2014

"चाय हमारे मन को भाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
 परदेशों से चलकर आई।
चाय हमारे मन को भाई।।

कैसे जुड़ा चाय से नाता,
मैं इसका इतिहास बताता,
शुरू-शुरू में इसकी प्याली,
गोरों ने थी मुफ्त पिलाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

जीवन का अंग ये बनी अब,
बड़े चाव से पीते हैं सब,
बिना चाय के फीकी लगती,
बिस्कुट-बर्फी और मलाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

बच्चों को नहीं दूध सुहाता,
चाय देख मन खुश हो जाता,
गर्म चाय की चुस्की लेकर,
बीच-बीच में मठरी खाई।
चाय हमारे मन को भाई।।

इसके बिना अधूरा स्वागत,
नाखुश हो कर जाता आगत.
वशीभूत हम हुए चाय के, 
आदत में वो चाय समायी।
चाय हमारे मन को भाई।।

"गीत-आज और कल का भेद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज बहुत है नया-नवेला,
कल को होगा यही पुराना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

गोल-गोल है दुनिया सारी,
चन्दा-सूरज गोल-गोल है।
गोल-गोल में घूम रहे सब,
गोल-गोल की यही पोल है।
घूम-घूमकर, सारे जग को,
बना रहा है काल निशाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

दिन दूनी औ रात चौगुनी,
बढ़ती जातीं अभिलाषाएँ।
देश-काल के साथ बदलतीं,
पाप-पुण्य की परिभाषाएँ।
धन संचय की होड़ लगी है,
लेकिन साथ नहीं कुछ जाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

कहीं सरल हैं कहीं वक्र हैं,
बहुत कठिन जीवन की राहें।
मंजिल पर जानेवालों की,
छोटे पथ पर लगी निगाहें।
लेकिन लक्ष्य उसे ही मिलता,
जिसने सही मार्ग पहचाना।
जीवन के इस कालचक्र में,
लगा रहेगा आना-जाना।।

शनिवार, 26 जुलाई 2014

“हिन्दी वर्णमाला-ऊष्म और संयुक्ताक्षर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज हिन्दी वर्णमाला की 
अन्तिम कड़ी में प्रस्तुत हैं
ऊष्म और संयुक्ताक्षर
सबसे पहले देखिए..
--
से बन जाता षटकोण!
षड्दर्शन, षड्दृष्टिकोण! 
षट्-विद्याओं को धारणकर,
बन जाओ अर्जुन और द्रोण!!
-- 
से शंकर हैं भगवान!
शम्भू जी हैं कृपानिधान!
खाओ शहद, शरीफा मीठा,
कभी न कहलाना शैतान!!  
-- 
से संविधान, सरकार,
संसद में बैठा सरदार!
विजय सत्य की ही होती है,
झूठों की हो जाती हार!!
 --
से हल को हाथ लगाओ!
हरियाली धरती पर लाओ!
सरल-सुगम है हिन्दी भाषा,
देवनागरी को अपनाओ!!
--
दो या दो से अधिक अक्षरों की
सन्धि से मिलकर बने अक्षरों को
संयुक्ताक्षर कहते हैं!
हिन्दी वर्णमाला के साथ
इनको पढ़ाया जाना सर्वथा अनुपयुक्त है!
फिर भी आजकल के शिक्षाविदों ने
ये संयुक्ताक्षर 
वर्णमाला के साथ जोड़ दिये हैं !
लगे हाथ इन पर भी
एक-एक मुक्तक देख लीजिए!
--
"क्ष"
ksh
क् और श मिल क्षबन जाता!
"क्ष" से ही क्षत्रिय कहलाता!
क्षमा बहुत ही अच्छा गुण है,
वेद हमें यह ही बतलाता!!
--
"त्र"
tra
त् और र मिल बने त्रिशूल!
तीन नुकीले इसमें शूल!
तीन कोण वाले त्रिभुज को,
बच्चों कभी न जाना भूल!
--
"ज्ञ"
gyan
ज् और ञ मिल "ज्ञ" बन जाता
ज्ञानी हमको ज्ञान सिखाता!
गुरूद्वारों में जाकर देखो,
ग्रन्थी ज्ञानी-जीकहलाता!!
"श्र"
sra
श् और र मिल श्र बन जाता!
श्रम करने से धन मिल जाता!
श्री लक्ष्मी का है वरदान,
श्रमिक देश का भाग्य-विधाता!!

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

“हिन्दी व्यञ्जनावली-अन्तस्थ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अभी कल ऊष्म पर
मुक्तक और लगाने है!
उसके बाद फिर से
अपने रंग में आ जाऊँगा!
"व्यञ्जनावली-अन्तस्थ"
--

से यति वो ही कहलाते!
जो नित यज्ञ-हवन करवाते!
वातावरण शुद्ध हो जाता,
कष्ट-क्लेश इससे मिट जाते!
--

से रसना को लो जान!
रथ को हाँक रहे भगवान!
खट्टा, मीठा और चरपरा,
सबकी है इसको पहचान!
--

से लड्डू और लंगूर!
लट्टू घूम रहा भरपूर!
काले मुँह वाले वानर को,
हम सब कहते हैं लंगूर!!
--

वन, वनराज महान!
जंगल जीवों का उद्यान!
वर्षा ऋतु में भीग रहे हैं,
खेत, बाग, वन और किसान!!

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