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बुधवार, 7 दिसंबर 2016

दोहे "थर-थर काँपे देह" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहरे ने सूरज ढकाथर-थर काँपे देह।
पर्वत पर हिमपात है, नहीं बरसता मेह।१।
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कल तक छोटे वस्त्र थेफैशन की थी होड़।
लेकिन सरदी में सभीरहे शाल को ओढ़।२।
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ऊनी कपड़े पहनकरमिलता है आराम।
बच्चे-बूढ़े सेंकतेअपनी शीतल चाम।३।
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ख़ास मजे को लूटतेव्याकुल होते आम।
गाजर का हलवा यहीखाते सुबहो-शाम।३।
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आज घरेलू गैस केबढ़े हुए हैं भाव।
लकड़ी मिलती हैं नहींकैसे जले अलाव।४।
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हाड़ काँपता शीत सेठिठुरा देश-समाज।
गीजर-हीटर क्या करेंबिन बिजली के आज।५।
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बाजारों में हो गयामहँगा आटा-दाल।
निर्धन का तो हो रहाजीना आज मुहाल।६।
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गुणवानों की जेब मेंकौड़ी नहीं छदाम।
कंगाली में हो रहापरमारथ का काम।७।
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कविता लिखकर हो गयाजीवन मटियामेट।
दोहे लिखने से नहींभरता पापी पेट।८।
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दुनिया भर में चल रहाअस्त्र-शस्त्र का खेल।
कैसे इन हालात मेंहो आपस में मेल।९।
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कलमकार रचना करेंसन्त करें उपदेश।
आपस में मिल कर रहेंदेते ये सन्देश।१०।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

गीत "दुनियादारी जाम हो गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नीलगगन पर कुहरा छाया, दोपहरी में शाम हो गई।
शीतलता के कारण सारी, दुनियादारी जाम हो गई।।

गैस जलानेवाली ग़ायब, लकड़ी गायब बाज़ारों से,
कैसे जलें अलाव? यही तो पूछ रहे हैं सरकारों से,
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।
शीतलता के कारण सारीदुनियादारी जाम हो गई।।

खुदरा व्यापारी जायेंगे, परदेशी व्यापार करेंगे
आम आदमी को लूटेंगे, अपनी झोली खूब भरेंगे
दलदल में फँस गया सफीना, धारा तो गुमनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

सस्ती हुई ज़िन्दग़ी कितनी, बढ़ी मौत पर मँहगाई है,
बिल्लों ने कुर्सी को पाकर, दूध-मलाई ही खाई है,
शीला की लुट गई जवानी, मुन्नी भी बदनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

दोहे "सिन्दूरी परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सालगिरह पर ब्याह की, पाकर शुभसन्देश।
जीवन जीने का हुआ, सिन्दूरी परिवेश।।
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कर्म करूँगा तब तलक, जब तक घट में प्राण।
पा जाऊँगा तन नया, जब होगा निर्वाण।।
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आना-जाना ही यहाँ, जीवन का है मर्म।
वैसा फल मिलता उसे, जैसे जिसके कर्म।।
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चुनकर गंगा घाट पर, पत्थर रहा तराश।
किसी मोड़ पर भी कभी, होता नहीं निराश।।
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कामनाओं का विश्व में, कोई ओर न छोर।
स्वारथ के बाजार में, भरे पड़े हैं चोर।।
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हम भीतर के राम को, नहीं सके पहचान।
खोज रहे हैं लोग सब, मन्दिर में भगवान।।
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जगतनियन्ता ईश का, कण-कण में है वास।
मन से अनुभव कीजिए, उसकी मधुर सुवास।।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

दोहागीत "पाँच दिसम्बर-वैवाहिक जीवन के तैंतालीस वर्ष पूर्ण"

मृग के जैसी चाल अब, बनी बैल की चाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।।
--
वैवाहिक जीवन हुआ, अब तैंतालिस वर्ष।
जीवन के संग्राम में, किया बहुत संघर्ष।।
पात्र देख कर शिष्य को, ज्ञानी देता ज्ञान।
श्रम-सेवा परमार्थ से, मिलता जग में मान।।
जो है सरल सुभाव का, वो ही है खुशहाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
सजनी घर के काम में, बँटा रही है हाथ।
चैन-अमन से कट रहा, जीवन उसके साथ।।
अपने-अपने क्षेत्र में, करते सब उद्योग।
पुत्र-पौत्र-बहुएँ सभी, करती हैं सहयोग।।
जीवन के संगीत में, मिलते हैं सुर-ताल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
सरल-तरल है जिन्दगी, बहती सुख की धार।
एक नेक मुझको मिला, सुन्दर सा परिवार।।
होते रहते हैं कभी, आपस में मतभेद।
लेकिन रखते हैं नहीं, घरवाले मनभेद।।
हल कर देता है समय, सारे कठिन सवाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
जीवन के पथ में भरे, कदम-कदम पर मोड़।
जिस पथ से मंजिल मिले, कभी न उसको छोड़।।
बैठे गंगा घाट पर, सन्त और शैतान।
देना सदा सुपात्र को, धन में से कुछ दान।।
करके दान कुपात्र को, होता बहुत मलाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

बालगीत "नहीं सुहाता ठण्डा पानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।
 
नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
हीटर-गीजर शुरू हो गये,
नहीं सुहाता ठण्डा पानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।। 

बालक विद्यालय को जाते,
कभी न मौसम से घबराते,
 पढ़कर सब काबिल बन पाते,
करो साधना सच्चे मन से,
कहलाओगे ज्ञानी-ध्यानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।। 

कहता पापी पेट हमारा,
बिना कमाए नही गुजारा,
नहीं काम बिन कोई चारा,
श्रम करने से जी न चुराओ,
ऋतुएँ तो हैं आनी जानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।


चूल्हे और अलाव जलाओ,
गर्म-गर्म भोजन को खाओ,
काम समय पर सब निबटाओ,
खाना-सोना और कमाना,
जीवन की है यही कहानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।

ग़ज़ल "करने मलाल निकले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

ये पात-पात निकलेवो डाल-डाल निकले
मुर्दार बस्तियों में, लेकर मशाल निकले 

परदेशियों के आगे, घुटने वो टेकते हैं,
ईमान के शिकारी, गठरी खँगाल निकले 

निर्धन का जो अभी तक, दामन भी सिल न पाये 
शतरंज के खिलाड़ी, चलने को चाल निकले

लोगों की गर्दनों पर, खंजर चला रहे हैं
सपने हसीं दिखाकर, करने कमाल निकले 

सीमा पे अपने सैनिक, दिन-रात मर रहे हैं 
कायर बने हुए से, करने मलाल निकले 

वोटों के ये भिखारी, दर-दर भटक रहे हैं
अपनों के वास्ते ही, बुनने को जाल निकले।

है नाम भी सुरीला और "रूप" सन्त का सा
मीठी छुरी से सबको, करने हलाल निकले।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

दोहे "जनता है कंगाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

बैंक हुई कंगाल सब, किसका है ये दोष।
उसको कहें दिवालिया, जिसका खाली कोष।।
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प्रजातन्त्र में क्यों हुआ, तन्त्र प्रजा से दूर।
समझो इसके मूल में शासक को मगरूर।।
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बैंकों के बाहर लगीं, लम्बी बहुत कतार।
अपने ही धन के लिए, जनता है लाचार।।
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मासिक वेतन हो भले, चाहे साठ हजार।
पैसा पाने के लिए, मिलती है फटकार।।
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सन्नाटा बाजार में, रुके जरूरी काज।
धन के आज अकाल से, सहमा हुआ समाज।।
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इन्तजाम के बाद ही, करना था ऐलान।
अफरा-तफरी में किया, जारी क्यों फरमान।।
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सेवक मनमानी करें, बनकर अफलातून।
रोज-रोज ही देश में, बदल रहे कानून।।
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नयी करंसी से हुई, खाली अब टकसाल।
शासन मालामाल है, जनता है कंगाल।।
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सच को लिखने से डरे, अब शायर-फनकार।
करता उनकी कलम को, मैं सौ-सौ धिक्कार।।

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