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मंगलवार, 3 मार्च 2015

"बाल साहित्य के पुरोधा डॉ.राष्ट्रबन्धु नहीं रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बाल साहित्य के पुरोधा डॉ.राष्ट्रबन्धु नहीं रहे
सारे देश के बाल साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोने वाले सुप्रसिद्ध बालसाहित्यकार डॉ.राष्ट्रबन्धु नहीं रहे। अपनी यायावर प्रकृति के अनुरूप पटियाला के बाल साहित्य अधिवेशन से लौटते समय अमृतसर के पास ट्रेन में उनका निधन हो गया और बाल साहित्य का एक जाना माना नाम आज हमारे बीच से चला गया।
    मैं उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूँ जिसे डॉ. राष्ट्रबन्धु का संग-साथ मिला और उन्होंने मेरी कुटिया को भी अपने चरणकमलों से धन्य किया।
डॉ. राष्ट्रबन्धु को नमन करते हुए, 
अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ
--
"हँसता गाता बचपन"
की भूमिका
(डॉ.राष्ट्रबन्धु)
     डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंककी लेखनी कविताओं के साथ-साथ बाल साहित्य में भी समान रूप से चलती है। मुझे इनकी पहली कृति नन्हे सुमनभी देखने का सौभाग्य मिला है और आज मुझे इनकी दूसरी बाल कृति हँसता गाता बचपनकी भूमिका लिखने का अवसर मिला है।
    ‘हँसता गाता बचपनभी नन्हे सुमनकी ही भाँति श्रेष्ठ और आशाप्रद है। इसमें शास्त्रीयता की दृष्टि से छन्दों, रसों और वैज्ञानिकता का परिपालन किया गया है। जिससे उनके लेखन से आशाएँ उभरती हैं। आधुनिक विषयों पर मयंकजी अपनी लेखनी का जादू हमेशा शब्दों के माध्यम से बिखेरते हैं। मेरे विचार से इनके द्वारा वेबकैमपर हिन्दी में प्रकाशित पहली बाल रचना है।
वेब कैम की शान निराली।
करता घरभर की रखवाली।।...
नवयुग की यह है पहचान।
वेबकैम है बहुत महान।।...
    ‘हँसता गाता बचपनएक ऐसी कृति है जिसमें प्राकृतिक परिवेश और बच्चों के वातावरण तथा बाल साहित्य की उद्देश्यपरक सम्भावनाएँ प्रकट होती हैं।
    इस कृति की प्रथम रचना वन्दना मॆं उन्होंने कामना की है-
अन्धकार को दूर भगायें।
मन मन्दिर में दीप जलायें।।
जागो अब हो गया सवेरा।
दूर हो गया तम का डेरा।।
सिक्षा की हम अलख जगायें।
मन मन्दिर में दीप जलायें...।।
    साथ ही शीर्षक गीत में तो इन्होंने कमाल ही किया है-
हँसता-खिलता जैसा,
इन प्यारे सुमनों का मन है।
गुब्बारों सा नाज़ुक,
सारे बच्चों का जीवन है।।
नन्हें-मुन्नों के मन को,
मत ठेस कभी पहुँचाना।
इन कोमल पौधों पर,
अपना स्नेह-सुधा बरसाना।।
ये कोरे कागज़ के जैसे,
होते भोले-भाले।
इन नटखट गुड्डे-गुड़ियों के,
होते खेल निराले।।
भरा हुआ चंचल अँखियों में,
कितना अपनापन है।
झूम-झूमकर मस्ती में,
हँसता गाता बचपन है।।
    इस बालकृति में स्वागत गान के रूप में प्रस्तुत रचना तो उनकी कालजयी रचना है-
स्वागतम आपका कर रहा रहा हर सुमन।
आप आये यहाँ आपको शत् नमन।।
भक्त को मिल गये देव बिन जाप से,
धन्य शिक्षासदन हो गया आपसे,
आपके साथ आया सुगन्धित पवन।
--
अपने आशीष से धन्य कर दो हमें,
देश को दें दिशा ऐसा वर दो हमें,
अपने कृत्यों से लायें वतन में अमन।...
    इसके अतिरिक्त श्यामपट, स्लेट और तख़्ती, थाली के बैंगन, कद्दू, देशी फ्रिज, शहतूत, भैंस, कौआ, बिच्छू आदि बालरचनाओं के ऐसे विषय हैं, जिन पर कलम चलाना आदरणीय मयंकजी के ही बस की बात है।
    मैंने इस कृति की पाण्डुलिपि  को पढ़कर यह अनुभव किया है कि शास्त्री जी ने अपनी रचना का विषय चाहे जो भी चुना हो, मगर उसमें एक सन्देश बच्चों के लिए अवश्य निहित होता है।
   “मैनापर लिखी गयी उनकी इस रचना को ही लीजिए-
मैं तुमको चिड़िया कहता हूँ,
लेकिन तुम हो मैना जैसी।
तुम गाती हो कर्कस सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी।।
और इसके आगे लिखते हैं-
मीटी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।
बैर-भाव को तज कर ही तो,
तुम अच्छे कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।...
     इस प्रकार हम देखते हैं कि मयंकजी ने भाषिक सौन्दर्य के अतिरिक्त बाल साहित्य की सभी विशेषताओं का संग-साथ लेकर जो निर्वहन किया है, वह अत्यन्त सराहनीय है।
    मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चे मयंकजी के बाल साहित्य से अवश्य लाभान्वित होंगे और उनकी यह कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
दुर्गाष्टमी, सम्वत् -२०६८
(डॉ. राष्ट्रबन्धु)
सम्पादक-बाल साहित्य समीक्षा
109 / 309, राम कृष्ण नगर,
कानपुर (उत्तर प्रदेश) 208 012

सोमवार, 2 मार्च 2015

गीत-फागुन की फागुनिया लेकर आया मधुमास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

काफी समय पहले मैंने 
मधुमास का यह गीत लिखा था!
मेरे आग्रह पर इसे मेरी मुँहबोली भतीजी 
अर्चना चावजी ने बहुत मन से गाया था!
आप भी इस गीत का रस लीजिए!
फागुन की फागुनिया लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!!

धूल उड़ाती पछुआ चलतीजिउरा लेत हिलोर,
देख खेत में सरसों खिलतीनाचे मन का मोर,
फूलों में पंखुड़िया लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!!

निर्मल नभ है मन चञ्चल हैसुधरा है परिवेश,
माटी के कण-कण मेंअभिनव उभरा है सन्देश,
गीतों में लावणियाँ लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!!

छम-छम कानों में बजती हैं गोरी की पायलियाँ,
चहक उठी हैंमहक उठी हैंसारी सूनी गलियाँ,
होली की रागनियाँ लेकरआया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकरआया मधुमास!! 

"दोहे-फीका रंग-गुलाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

होली में इस साल है, फीका रंग-गुलाल।
बारिश के कारण हुआ, जीवन तो बदहाल।१।
--
सावन सा फागुन लगे, बरस रहा है मेह।
कहने को मधुमास है, मगर नहीं है नेह।२।
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बर्फ पहाड़ों पर पड़ी, मैदानों में नीर।
फिर से सर्दी आ गयी, शीतल हुआ समीर।३।
--
होली में करते सभी, अपने रीत-रिवाज।
चिप्स और पापड़ भला, कैसे सूखें आज।४।
--
मोदी जी के बजट ने, उड़ा दिये हैं होश।
सिर्फ अबीर-गुलाल से, कर लेना सन्तोष।५।
--
सबके मन को भा गये, भाषण लच्छेदार।
सत्ता हथिया कर मगर, बदल गया किरदार।६।
--
मँहगाई की मार से, बिगड़ गये हैं ढंग।
खुश होकर कैसे भला, खेले जनता रंग।७। 

रविवार, 1 मार्च 2015

"दोहे... मोदी का अवतार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

खेतीहर पर हो रहा, अब तो अत्याचार।
जनता पर भारी पड़ा, मोदी का अवतार।१।
--
गाँधी टोपी देखकर, सहम गयी सरकार।
अन्ना जी अब करेंगे, शासक का उपचार।२।
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मँहगाई का हो गया, शासन में अब मेल।
झूठे सपने दिखाकर, बना लिया है खेल।३।
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आज आदमी मल रहा, अपने खाली अपने हाथ।
आगामी मतदान में, नहीं मिलेगा साथ।४।
--
मँहगाई के बजट ने, खोली सारी पोल।
अच्छे दिन का स्वप्न तो, आज हो गया गोल।५।
--
आम जरूरत की हुईं, मँहगी सारी चीज।
देख सुशासन को यहाँ, लोग रहे हैं खीझ।६।
--
अपना भारतवर्ष हैगाँधी जी का देश।
सत्य-अहिंसा का यहाँबना रहे परिवेश।७।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

"बालगीत-आयी होली-आई होली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आयी होली, आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।
 
मुन्नी आओ, चुन्नी आओ,
रंग भरी पिचकारी लाओ,
मिल-जुल कर खेलेंगे होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
 
मठरी खाओ, गुँजिया खाओ,
पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,
मस्ती लेकर आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
 
रंगों की बौछार कहीं है,
ठण्डे जल की धार कहीं है,
भीग रही टोली की टोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
 
परसों विद्यालय जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
मेहनत से पढ़ना हमजोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

"होली गीत-महके है मन में फुहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आई बसन्त-बहार, चलो होली खेलेंगे!!
रंगों का है त्यौहार, चलो होली खेलेंगे!!

बागों में कुहु-कुहु बोले कोयलिया,
धरती ने धारी है, धानी चुनरिया,
पहने हैं फुलवा के हार,
चलो होली खेलेंगे!!

हाथों में खन-खन, खनके हैं चुड़ियाँ.
पावों में छम-छम, छनके पैजनियाँ,
चहके हैं सोलह सिंगार,
चलो होली खेलेंगे!!

कल-कल बहती है, नदिया की धारा.
सजनी को लगता है साजन प्यारा,
मुखड़े पे आया  निखार,
चलो होली खेलेंगे!!

उड़ते अबीर-गुलाल भुवन में,
सिन्दूरी-सपने पलते सुमन में,
महके है मन में फुहार!
चलो होली खेलेंगे!!
 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

"होली आई है" (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुशियों की सौगात लिए होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

रंग-बिरंगी पिचकारी ले,
बच्चे होली खेल रहे हैं।

मम्मी-पापा दोनों मिल कर,
मठरी-गुझिया बेल रहे हैं।

पकवानों को साथ लिए, होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

जाड़ा भागा, गरमी आई,
होली यह सन्देशा लाई।
कोयल बोल रही बागों में,
कौए ने पाँखे खुजलाई।

ठण्डी कुल्फी हाथ लिए, होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

सरसों फूली, टेसू फूले,
आम-नीम बौराये हैं।
मक्खी, मच्छर भी होली का,
गीत सुनाने आये हैं।

साथ चाँदनी रात लिए, होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

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