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गुरुवार, 30 जुलाई 2015

गीत "जग के झंझावातों में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मानव दानव बन बैठा है, जग के झंझावातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

होड़ लगी आगे बढ़ने की, मची हुई आपा-धापी,
मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी,
दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

जीने का अन्दाज जगत में, कितना नया निराला है,
ठोकर पर ठोकर खाकर भी, खुद को नही संभाला है,
ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकर, लिपटा गन्दी बातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

मित्र, पड़ोसी, और भाई, भाई के शोणित का प्यासा,
भूल चुके हैं सीधी-सादी, सम्बन्धों की परिभाषा।
विष के पादप उगे बाग में, जहर भरा है नातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

एक चमन में रहते-सहते, जटिल-कुटिल मतभेद हुए,
बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए,
खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


बुधवार, 29 जुलाई 2015

"पूज्य पिता जी आपको शत्-शत् नमन..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज ही के दिन 
पिछले वर्ष आप विदा हुए थे..
पूज्य पिता जी आपको शत्-शत् नमन...!! 
पूज्य पिता जी आपकावन्दन शत्-शत् बार।
बिना आपके हो गयाजीवन मुझ पर भार।।
एक साल बीता नहींमाँ भी गयी सिधार।
बिना आपके हो रहादुखी बहुत परिवार।।
--
बचपन मेरा खो गयाहुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, करने हैं सब काज।।
--
जब तक मेरे शीश पररहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष काछूट गया है साथ।।
--
प्रभु मुझको बल दीजिएउठा सकूँ मैं भार।
एक-नेक बनकर रहेमेरा ये परिवार।।

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

दोहे "भारतरत्न ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को श्रद्धाञ्जलि" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

भारत माँ की कोख से, जन्मा पूत कलाम।
करते श्रद्धा-भाव से, उसको आज सलाम।।
--
दुनिया में जाना गया, वह मिसाइल-मैन।
उसके जाने से सभी, कितने हैं बेचैन।।
--
जिसने जीवन भर किया, मानवता का काम।
भारत का सर्वोच्च-पद, हुआ उसी के नाम।।
--
बचपन जिया अभाव में, कभी न मानी हार।
दुनिया में विज्ञान को, दिया सबल आधार।।
--
कुदरत को मञ्जूर जो, वो ही तो है होय।
क्रूर काल के चक्र से, बचा नहीं है कोय।।
--
जीव आत्मा अमर है, मरता तुच्छ शरीर।
अपने उत्तम कर्म से, अमर रहेंगे वीर।।
--
युगों-युगों तक रहेगा, दुनियाभर में नाम।
गूँजेगा संसार में, प्रेरक नाम कलाम।।
--
भावप्रवण श्रद्धा-सुमन, करूँ समर्पित आज।
शोकाकुल है शोक से, देश-विदेश-समाज।।

सोमवार, 27 जुलाई 2015

ग़ज़ल "वो पढ़ नही सकते" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहुत जज्बात ऐसे हैंजिन्हें वो गढ़ नही सकते 
हमें लिखने की आदत है, मगर वो पढ़ नही सकते

सफीना चलते-चलते ही, भँवर में फँस गया उनका
हमें मिलने की आदत है, मगर वो बढ़ नही सकते

समर में इश्क के वो तो, बिना हथियार के उतरे
हमें भिड़ने की आदत है, मगर वो लड़ नही सकते

जरा सा जाम पीते ही, उड़े वो आसमानों में
कठिन पर्वत की राहों पर, मगर वो चढ़ नही सकते

बड़ी ही शान से अपना, दिखाते “रूप” वो फिरते,
नगीनों को करीने से, मगर वो जड़ नहीं सकते

रविवार, 26 जुलाई 2015

अकविता "जीवन का चक्र." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हर रोज 
सुबह आयेगी 
शाम ढलेगी  
रात हो जायेगी 
और फिर होगा 
नया सवेरा  
मिट जायेगा 
धरा से अंधेरा 

लेकिन... 
मन के कोटर में 
न कभी धूप आयेगी 
और न कभी सवेरा होगा 
अंधेरा था 
और अंधेरा ही रहेगा 
फिर भी..
क्यों करते हैं हम 
ख़त्म न होने वाला
ये इन्तजार 
सोचते हैं 
शायद हो जाये 
कोई चमत्कार 

इसी अभिलाषा में 
तो जी रहे हैं 
और दवा के नाम पर 
गरल के घूँट पी रहे हैं 

नहीं रहा 
आह! में असर 
दुआएँ भी 
हो गयीं हैं बेअसर 

चाह तो है 
पर राह नहीं है 
जिस्म को
रूह की परवाह नहीं है 

देह की
बुझ जाती है पिपासा 
मगर अधूरी रहती है
आत्मा की अभिलाषा 

यही तो 
जीवन का चक्र है 
इसीलिए
दुनिया वक्र है...!

शनिवार, 25 जुलाई 2015

दोहे "जागेगा इंसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वर्तमान को देखकर, सहमा हुआ अतीत।
घोटालों से हो रहे, घोटाले भयभीत।।
--
अपनी भाषा में नहीं, न्यायालय में काज।
 कहने को आजाद हैं, मीलों दूर सुराज।।
--
कुंठाओं के देश में, जीना है दुश्वार।
पढ़े-लिखो को हाँकते, अनपढ़ और गँवार।
--
वोट माँगने के लिए, हिन्दी की लें आड़।।
सत्ता-सुख को पायकर, लेते पल्ला झाड़।।
--
जो कल तक याचक बना, अब दाता कहलाय।
पाँच साल तक तो कभी, सूरत नहीं दिखाय।।
--
साम-दाम औ भेद से, खूब बटोरे वोट।
पाँच साल तक करेगा, अब वो लूट-खसोट।।
--
भाषण से ही कर रहा, जनता को सम्पन्न।
लेकिन जन-गण हो गया, सचमुच बहुत विपन्न।।
--
चिकनी-चुपड़ी बात का, टूट जायगा मोह।
आज समय आरोह का, कल होगा अवरोह।।
--
जब आयेगी चेतना, जागेगा इंसान।
मिट्टी में मिल जायेगा, तब सारा अभिमान।।
--
सारा जग वन्दन करे, खग करते हैं शोर।।
अँधियारे को चीर कर, आती है जब भोर।।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

दोहे "नौकरशाही भ्रष्ट" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नीचे से ऊपर तलक, दूषित है परिवेश।
प्रश्न सभी के सामने, कब सुधरेगा देश।।
--
जनसेवक भी भ्रष्ट हैं, नौकरशाही भ्रष्ट।
जनता बेचारी बनी, भोग रही है कष्ट।।
--
सरकारी अनुभाग में, रिश्वत की भरमार।
आम आदमी पूछता, ये कैसी सरकार।।
--
दूध-दाल-तरकारियाँ, बिकती ऊँचे दाम।
आज मिलावट हो रही, बिल्कुल खुल्ले-आम।।
--
बोतल बदली पेय की, बदल न पाया माल।
शासक चाहे कोई हो, जनता है बेहाल।।
खटीमा (उत्तराखण्ड)
दूध में पानी मिलाने का अद्भुत् तरीका।

सहकारी दुग्ध संघ चम्पावत के कर्मचारियों द्वारा
सरे आम बर्फ की 10 सिल्लियों को 
दूद के टैंकर में डाला जा रहा है।

इसके दो फायदे हैं -
पहला तो यह कि दूध खराब नहीं होगा।
और दूसरा यह कि 7-8 कुन्टल पानी दूध में मिलाकर 
उसको दूध के दाम पर बेचा जायेगा।
लाभ किन किन को मिलेगा ?......... 
पहचान लीजिए इन मिलावटखोरों को-

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