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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

दोहे "प्यार और अनुराग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ऐसा होना चाहिए, जल से भरा तड़ाग।
जिसके सुमनों में रहे, प्यार और अनुराग।।
--
नहीं चाहिए चमन में, माली अब गद्दार।
उपवन के सारे सुमन, होवें पानीदार।।
--
कट्टरपन्थी छोड़ कर, होवें सभी उदार।
गरदन पर मासूम की, अब न चले हथियार।।
--
भाषा-भूषा-पन्थ हों, चाहे भले अनेक।
रहना है हर हाल में, हमको बनकर नेक।।
--
जग के दाता ने दिया, हमको मानव रूप।
रहें हमारे आचरण, मानव के अनुरूप।।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

दोहे "खुश हो रहे किसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बादल नभ में छा गये, पुरवा बहे बयार।
आमों का मौसम गया, सेबों की भरमार।।
--
फसल धान की खेत में, लहर-लहर लहराय।
अपने मन के छन्द को, रचते हैं कविराय।।
--
हरी-हरी उग आयी है, चरागाह में घास।
धरती से आने लगी, सोंधी-तरल सुवास।।
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देख-देख कर फसल को, खुश हो रहे किसान।
करते सावन मास में, भोले का गुणगान।।
--
काँवड़ लेने चल पड़े, नर-नारी हरद्वार।
आशुतोष के धाम में, उमड़ी भीड़ अपार।।
--
मिलता है भगवान के, मन्दिर में सन्तोष।
हर-हर, बम-बम नाद का, गूँज रहा उद्घोष।।
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होता है अन्तःकरण, जब मानव का शुद्ध।
दर्शन देते हैं तभी, जगन्नाथ अनिरुद्ध।।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

गीत "रिश्ते-नाते प्यार के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ढंग निराले होते जग में,  मिले जुले परिवार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

चमन एक हो किन्तु वहाँ पर, रंग-विरंगे फूल खिलें,
मधु से मिश्रित वाणी बोलें, इक दूजे से लोग मिलें,
ग्रीष्म-शीत-बरसात सुनाये, नगमें सुखद बहार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

पंचम सुर में गाये कोयल, कलिका खुश होकर चहके,
नाती-पोतों की खुशबू से, घर की फुलवारी महके,
माटी के कण-कण में गूँजें, अभिनव राग सितार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

नग से भू तक, कलकल करती, सरिताएँ बहती जायें,
शस्यश्यामला अपनी धरती, अन्न हमेशा उपजायें,
मिल-जुलकर सब पर्व मनायें, थाल सजें उपहार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

गुरूकुल हों विद्या के आलय, बिके न ज्ञान दुकानों में,
नहीं कैद हों बदन हमारे, भड़कीले परिधानों में,
चाटुकार-मक्कार बनें ना, जनसेवक सरकार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

बरसें बादल-हरियाली हो, बुझे धरा की प्यास यहाँ,

चरागाह में गैया-भैंसें, चरें पेटभर घास जहाँ,
झूम-झूमकर सावन लाये, झोंके मस्त बयार के।
देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।।

गीत "सितारों में भरा तम है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')




बहारों में नहीं दम है, नज़ारों में भरा ग़म है
फिजाओं में नहीं दम हैं, सितारों में भरा तम है
हसीं दुनिया बनाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं आभास रिश्तों का, नहीं एहसास नातों का
हमें तो आदमी की है, नहीं विश्वास बातों का
बसेरे को बसाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

लुभाती गाँव की गोरी, सिसकता प्यार भगिनी का
सुहाती अब नहीं लोरी, मिटा उपकार जननी का
सरल उपहार पाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

नहीं गुणवान बनने की, ललक धनवान बनने की
बुजुर्गों की हिदायत को, जरूरत क्या समझने की
वतन में अमन लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

भटककर जी रही दुनिया, सिमटकर जी रही दुनिया
सभी को चाहिएँ बेटे, सिसककर जी रही मुनिया
चहक ग़ुलशन में लाने की, हमें फुरसत नहीं मिलती।

रविवार, 24 जुलाई 2016

गीत "रेत के घरौंदे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सज रहे हैं ख्वाब,
जैसे हों घरौंदे रेत में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

मोम के सुन्दर मुखौटे,
पहन कर निकले सभी,
बदल लेते रूप अपना,
धूप जब निकली कभी,
अब हुए थाली के बैंगन,
थे कभी जो खेत में। 
बाढ़, बारिश-हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

हो रही वादाख़िलाफी,
रो रहे सम्बन्ध हैं,
हाट का रुख़ देखकर ही,
हो रहे अनुबन्ध हैं,
नज़र में कुछ और है,
कुछ और ही है पेट में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

जो स्वयं अज्ञान है,
वो क्या परोसेगा हुनर,
बेहया की लाज को,
ढक पाएगी कैसे चुनर,
जिग़र में जो कुछ भरा है,
वही देगा भेंट में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

शनिवार, 23 जुलाई 2016

दोहे "वर्षा का आनन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सावन आया झूम के, पड़ती सुखद फुहार।
तन-मन को शीतल करे, बहती हुई बयार।१।
--
सावन अपने साथ में, लाता है त्यौहार।
रक्षाबन्धन-तीज के, संग बहन का प्यार।२।
--
श्रावण शुक्ला पंचमी, बहुत खास त्यौहार।
नाग पंचमी आज भी, श्रद्धा का आधार।३।
--
जंगल में मंगल हुआ, सुधरा है परिवेश।
सावन हमको दे रहा, जीवन का सन्देश।४।
--
शैल शिखर से आ रही, नभ में सघन कतार।
 कहीं बरसता रात-दिन, कहीं गरज-बौछार।५।
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बालक बैठे ले रहे, वर्षा का आनन्द।
भीनी-भीनी आ रही, पौधों में से गन्ध।६।
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मक्का फूली खेत में, पके डाल पर आम।
जामुन गदराने लगी, डाली पर अभिराम।७।
--
चारों ओर बिछा हुआ, हरा-हरा कालीन।
पौधों को जीवन मिला, खुश हैं जल में मीन।८।
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बया चहकती नीड़ में, चिड़िया मौज मनाय।
पौध धान की शान से, लहर-लहर लहराय।९।
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काँवड़ लेने चल पड़े, भक्त शम्भु के द्वार।
बम-भोले के नाम की, होती जय-जयकार।१०।
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मानसरोवर जा रहे, जत्थों में कुछ लोग।
शिवजी को कैलाश में, चले लगाने भोग।११। 

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

गीत "पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



कंकड़ को भगवान मान लूँ
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 
काँटों को वरदान मान लूँ
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

दुर्गम पथ बन जाये सरल सा
अमृत घट बन जाए गरल का
पीड़ा को मैं प्राण मान लूँ.  
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

बेगानों से प्रीत लगा लूँ
अनजानों को मीत बना लूँ
आशा को अनुदान मान लूँ
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

रीते जग में  मन भरमाया
जीते जी माया ही माया
साधन को संधान मान लूँ
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!

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