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गुरुवार, 30 जून 2016

कविता "आदमी का चमत्कार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आदमी के प्यार को, रोता रहा है आदमी। 
आदमी के भार को, ढोता रहा है आदमी।।

आदमी का विश्व में, बाजार गन्दा हो रहा। 
आदमी का आदमी के साथ, धन्धा हो रहा।। 

आदमी ही आदमी का, भूलता इतिहास है। 
आदमी को आदमीयत का नही आभास है।। 

आदमी पिटवा रहा है, आदमी लुटवा रहा। 
आदमी को आदमी ही, आज है लुटवा रहा।। 

आदमी बरसा रहा, बारूद की हैं गोलियाँ। 
बोलता है आदमी, शैतानियत की बोलियाँ।। 

आदमी ही आदमी का, को आज है खाने लगा। 
आदमी कितना घिनौना, कार्य अपनाने लगा।। 

आदमी था शेर भी और आदमी बिल्ली बना। 
आदमी अजमेर था और आदमी दिल्ली बना।। 

आदमी था ठोस, किन्तु बर्फ की सिल्ली बना। 
आदमी के सामने ही, आदमी खिल्ली बना।। 

आदमी ही चोर है और आदमी मुँह-जोर है । 
आदमी पर आदमी का, हाय! कितना जोर है।। 

आदमी आबाद था, अब आदमी बरबाद है। 
आदमी के देश में, अब आदमी नाशाद है।। 

आदमी की भीड़ में, खोया हुआ है आदमी। 
आदमी की नीड़ में, सोया हुआ है आदमी।। 

आदमी घायल हुआ है, आदमी की मार से। 
आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से।।

बुधवार, 29 जून 2016

ग़ज़ल "रोता है माहताब हमारी आँखों में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ख्वाबों का तालाब हमारी आँखों में
अश्कों का सैलाब हमारी आँखों में

गुज़र गयी है उम्र फक़त तनहाई में
सूखा कमल-गुलाब हमारी आँखों में

चश्म हुईं बेनूर ढला दिन में सूरज
भरा हुआ तेजाब हमारी आँखों में

उठते कई सवाल हमारी आँखों में
मिलता नहीं जवाब हमारी आँखों में

“रूप” चाँदनी का कैसे अब निखरेगा
रोता है माहताब हमारी आँखों में

मंगलवार, 28 जून 2016

ग़ज़ल "मत तराजू में हमें तोला करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



तुम कभी तो प्यार से बोला करो।
राज़ दिल के तो कभी खोला करो।।

हम तुम्हारे वास्ते घर आये हैं,
मत तराजू में हमें तोला करो।

ज़र नहीं है पास अपने तो ज़िगर है,
चासनी में ज़हर मत घोला करो।

डोर नाज़ुक है उड़ो मत फ़लक में,
पेण्डुलम की तरह मत डोला करो।

राख में सोई हैं कुछ चिंगारियाँ,
मत हवा देकर इन्हें शोला करो।

आँख से देखो-सराहो दूर से,
रूप को छूकर नहीं मैला करो।

सोमवार, 27 जून 2016

बालकविता "दो बच्चे होते हैं अच्छे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहाँ चले ओ बन्दर मामा,
मामी जी को साथ लिए।
इतने सुन्दर वस्त्र आपको,
किसने हैं उपहार किये।।

हमको ये आभास हो रहा,
शादी आज बनाओगे।
मामी जी के साथकहीं
उपवन में मौज मनाओगे।।

दो बच्चे होते हैं अच्छे,
रीत यही अपनाना तुम।
महँगाई की मार बहुत है,
मत परिवार बढ़ाना तुम।

चना-चबेना खाकरअपनी
गुजर-बसर कर लेना तुम।
अपने दिल में प्यारे मामा,
धीरजता धर लेना तुम।।

छीन-झपटचोरी-जारी से,
सदा बचाना अपने को।
माल पराया पा करकेमत
रामनाम को जपना तुम।।

कभी इलैक्शन मत लड़ना,
संसद में मारा-मारी है।
वहाँ तुम्हारे कितने भाई,
बैठे भारी-भारी हैं।।

हनूमान के वंशज हो तुम,
ध्यान तुम्हारा हम धरते।
सुखी रहो मामा-मामी तुम,
यही कामना हम करते।।

रविवार, 26 जून 2016

"विविध दोहावली-अपना भारत देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 
बारिश और गुलाब का, सुन्दर है संयोग।
वर्षा के आनन्द को, लोग रहे हैं भोग।१।
--
कुरीतियों के जाल में, जकड़े लोग तमाम।
खोलो ज्ञानकपाट को, जिससे बनते काम।२।
--
हर घर में बैठे हुए, कितने नीम-हकीम।
जहर घोलते जगत में, बनकर मीठे नीम।३।
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परिवर्तन ही ज़िन्दगी, आयेंगे बदलाव।
अनुभव के पश्चात ही, आता है ठहराव।४।
--
योगिराज के नाम का, सब करते गुणगान।
कलियुग में फिर आइए, श्री कृष्ण भगवान।५।
--
सहने को सन्ताप को, जनता है मजबूर।
महँगाई ने कर दिया, सबको सुख से दूर।६।
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नुक्कड़ की हर गली में, पत्रकार की धूम।
उल्लू सीधा कर रहे, चरण-धूलि को चूम।७।
--
चल मनवा उस देश में, जहाँ नहीं हों काम।
चैन-अमन के साथ में, मन पाये विश्राम।८।
--
खास आदमी पूछता, आम आदमी कौन।
खास-खास-को पूछते, आम हो गया गौण।९।
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खाम-खयाली में नहीं, रहना यहाँ ज़नाब।
काम बिना कोई यहाँ, बनता नहीं नवाब।१०।
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मधु के लालच में कभी, मिल जाता आघात।
दुनिया में मनुहार से, बनती बिगड़ी बात।११।
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भिन्न-भिन्न हैं मान्यता, मिन्न-भिन्न परिवेश।
गुलदस्ता सा लग रहा, अपना भारत देश।१२।
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माँ सबको प्यारी लगे, ममता का पर्याय।
माँ के शुभ-आशीष से, सब सम्भव हो जाय।१३।
--
चाँद चमकती है तभी, जब यौवन ढल जाय।
पीले पत्तों में नहीं, हरियाली आ पाय।१४।
--
सहता है अपमान को, धरती का भगवान।
फिर भी अन्न उगा रहा, सबके लिए किसान।१५।
--
जिस घर में मिलता सदा, नारी को सम्मान।
वो घर मन्दिर सा लगे, मानो स्वर्ग समान।१६।
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भोलीचिड़िया बाज को, समझ रहीं है मीत।
रक्षक ही भक्षक बनें, कैसी है ये रीत।१७।
--
चपला चमके व्योम में, बादल करते शोर।
रिमझिम पानी बरसता, मन में उठे हिलोर।१८।
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नेताओं की बात पर, करना मत विश्वास।
वाह-वाही के वास्ते, चमचे सबके पास।१९।
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जो चमचे फौलाद के, वो हैं धवल सफेद।
उनकी तो हर बात में, भरे हुए हैं भेद।२०।
--
अच्छी सूरत देखकर, मत होना अनुरक्त। 
जग के मायाजाल से, मन को करो विरक्त।२१।

शनिवार, 25 जून 2016

ग़ज़ल "सुर्ख काया जाफरानी हो गयी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उम्र की अब मेजबानी हो गयी
सुर्ख काया जाफरानी हो गयी

सोच अब अपनी सयानी हो गयी
चदरिया भी अब पुरानी हो गयी

ज़िन्दग़ी की मेहरबानी हो गयी
इश्क की पूरी कहानी हो गयी

झुर्रियाँ पड़ने लगीं अब जिस्म में
खून की मद्धम रवानी हो गयी

अब नहीं उस “रूप” के ज़लवे रहे
खत्म अब सारी जवानी हो गयी

शुक्रवार, 24 जून 2016

ग़ज़ल "इलज़ाम के पत्थर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भले हों नाम के पत्थर
मगर हैं काम के पत्थर

समन्दर में भी तिरते हैं
अगर हों राम के पत्थर

बढ़े जब पाप धरती पर
गिरे शिवधाम के पत्थर

हुआ है आम बेचारा
चले हुक्काम के पत्थर

कभी जो मुफ्त मिलते थे
हुए अब दाम के पत्थर

बचेंगी बस्तियाँ कैसे
खिसकते डाम के पत्थर

हमेशा झेलता है “रूप”
क्यों इलज़ाम के पत्थर

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