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बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

"सूचना"

मान्यवर,
    दिनांक 18-19 अक्टूबर को खटीमा (उत्तराखण्ड) में बाल साहित्य संस्थान द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।
    जिसमें एक सत्र बाल साहित्य लिखने वाले ब्लॉगर्स का रखा गया है।
हिन्दी में बाल साहित्य का सृजन करने वाले इसमें प्रतिभाग करने के लिए 10 ब्लॉगर्स को आमन्त्रित करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी है।
कृपया मेरे ई-मेल
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पर अपने आने की स्वीकृति से अनुग्रहीत करने की कृपा करें।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
सम्पर्क- 074176198289997996437

"सारे जग से न्यारा गांधी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

!! श्रद्धापूर्वक नमन !! 
सत्य, अहिंसा का पथ जिसनेदुनिया को दिखलाया।
सारे जग से न्यारा गांधीसबका बापू कहलाया।। 

भाले-बरछी, तोप-तमञ्चे, हथियारों को छोड़ दिया,
देश-भक्ति के नारों से, जनता का मानस जोड़ दिया,
स्वतन्त्रता का मन्त्र अनोखा, तुमने ही तो बतलाया।
सारे जग से न्यारा गांधीसबका बापू कहलाया।। 

गंगा, यमुना,सरस्वती की, भारत में बहती धारा,
राम, कृष्ण,गौतम,गांधी का देश यही प्यारा-प्यारा,
इसीलिए तो देवजनों ने, इसी भूमि को अपनाया।
सारे जग से न्यारा गांधीसबका बापू कहलाया।। 

दो अक्टूबर को भारत में,गांधी ने अवतार लिया,
लालबहादुर ने भी इस पावन माटी से प्यार किया,
जय-जवान और जय-किसान का नारा सबको सिखलाया।
सारे जग से न्यारा गांधीसबका बापू कहलाया।। 

लोकतन्त्र की आहुति बनकर, दोनों ने बलिदान दिया,
महायज्ञ की बलिवेदी पर, अपना जीवन दान किया,
धन्य-धन्य हे पुण्य प्रसूनों! तुमने उपवन महकाया।
सारे जग से न्यारा गांधीसबका बापू कहलाया।।

"ग़ज़ल-झूठ की तकरीर बच गयी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल गये ख़तूत, पर तहरीर बच गयी
लुट गये असबाब, पर जागीर बच गयी

झेलें हैं बहुत हादसे, जीवन की जंग में
तदवीर काम आ गयी, तकदीर बच गयी

गैरों की दासताँ से तो, आजाद हो गये
बाँधी हुई अपनों की तो, जंजीर बच गयी

हम खा रहे हैं शौक से. भाषण के निवाले
महफिल में सिर्फ झूठ की, तकरीर बच गयी

पेड़ों की कोपलों पे, बुढ़ापा सा आ गया
लेकिन हमारे “रूप” की, तस्वीर बच गयी

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

"धान की बालियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

धान्य से भरपूर, 
खेतों में झुकी हैं डालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

क्वार का आया महीना,
हो गया निर्मल गगन,
ताप सूरज का घटा,
बहने लगी शीतल पवन,
देवपूजन के लिए,
सजने लगी हैं थालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

सुमन-कलियों की चमन में,
डोलियाँ सजने लगीं,
भ्रमर गुंजन कर रहे,
शहनाइयाँ बजने लगीं,
प्रणय-मण्डप में मधुर,
बजने लगीं हैं तालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

सोमवार, 29 सितंबर 2014

"तीस सितम्बर-मेरी संगिनी का जन्मदिन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

30 सितम्बर को
मेरी जीवनसंगिनी
श्रीमती अमरभारती का
60वाँ जन्मदिन है।
इस अवसर पर उपहार के रूप में
कुछ उद्गार उन्हें समर्पित कर रहा हूँ।
 
जन्मदिन पर मैं सतत् उपहार दूँगा।
प्यार जितना है हृदय में, प्यार दूँगा।।

साथ में रहते जमाना हो गया है,
“रूप” भी अब तो पुराना हो गया है,
मैं तुम्हें फिर भी नवल उद्गार दूँगा।
प्यार जितना है हृदय में, प्यार दूँगा।।

एक पथ के पथिक ही हम और तुम हैं,
एक रथ के चक्र भी हम और तुम हैं,
नाव जब भी डगमगायेगी भँवर में,
हाथ में अपनी तुम्हें पतवार दूँगा।
प्यार जितना है हृदय में, प्यार दूँगा।।

साथ तुम मझधार में मत छोड़ देना,
प्रीत की तुम डोर को मत तोड़ देना,
सुमन कलियों से सुसज्जित चमन में,
फैसले का मैं तुम्हें अधिकार दूँगा।
प्यार जितना है हृदय में, प्यार दूँगा।।

ज़िन्दग़ी में नित-नये आग़ाज़ होंगे,
दिन पुराने और नये अन्दाज़ होंगे,
प्राण तन में जब तलक मेरे रहेंगे,
मैं तुम्हें अपना सबल आधार दूँगा।
प्यार जितना है हृदय में, प्यार दूँगा।।

रविवार, 28 सितंबर 2014

"तेल कान में डाला क्यों?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुम हो गया उजाला क्यों?
दर्पण काला-काला क्यों?

चन्दा गुम है, सूरज सोया
काट रहे, जो हमने बोया
तेल कान में डाला क्यों?

राज-पाट सिंहासन पाया
सुख भोगा-आनन्द मनाया
फिर करता घोटाला क्यों?

जब खाली भण्डार पड़े हैं
बारिश में क्यों अन्न सड़े हैं
गोदामों में ताला क्यों?

कहाँ गयीं सोने की लड़ियाँ
पूछ रही हैं भोली चिड़ियाँ
सूखी मंजुल माला क्यों?

जनता सारी बोल रही है
न्याय-व्यवस्था डोल रही है
दाग़दार मतवाला क्यों?

शनिवार, 27 सितंबर 2014

"मैं तुमको समझाऊँ कैसे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शुरूआती दौर की एक रचना
पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,
मैं तुमको समझाऊँ कैसे?
सुलग-सुलगकर मैं जलता हूँ,
यह तुमको बतलाऊँ कैसे?

चन्दा और चकोरी जैसा,
मेरा और तुम्हारा नाता,
दोनों में है दूरी इतनी,
मिलन कभी नही है हो पाता,
दूरी की जो मजबूरी है,
मजबूरी जतलाऊँ कैसे?
पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,
मैं तुमको समझाऊँ कैसे?

बाहर बजती हैं शहनाईं,
लेकिन अन्तर्मन रोता है,
सूख गये आँसू आँखों में ,
पर दिल में कुछ-कुछ होता है,
विरह व्यथा जो मेरे मन में,
बोलो उसे छिपाऊँ कैसे?
पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,
मैं तुमको समझाऊँ कैसे?

बसन्त ऋतु मेंसुमन खिलें हैं,
पर मन में मधुमास नही है,
लाश ढो रहा हूँ मैं अपनी,
जीवन में कुछ रास नही है,
कदम डगमगाते हैं अब तो,
अपनी मंजिल पाऊँ कैसे?
पागल हो तुम मेरी प्रेयसी,
मैं तुमको समझाऊँ कैसे?

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