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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

"प्यार का ज़ज़्बा बनाता मोम पत्थर को" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


रतन की खोज में हमने, खँगाला था समन्दर को
इरादों की बुलन्दी से, बदल डाला मुकद्दर को

लगी दिल में लगन हो तो, बहुत आसान है मंजिल
हमेशा जंग में लड़कर, फतह मिलती सिकन्दर को

अगर मर्दानगी के साथ में, जिन्दादिली भी हो
जहां में प्यार का ज़ज़्बा, बनाता मोम पत्थर को

नहीं ताकत थी गैरों में, वतन का सिर झुकाने की
हमारे देश का रहबर, लगाता दाग़ खद्दर को

हमारे रूप पर आशिक हुए दुनिया के सब गीदड़
सभी मकड़ी के जालों में फँसाते शेर बब्बर को

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

"जग का आचार्य बनाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
कई वर्ष पहले यह गीत रचा था!
पिछले साल इसे श्रीमती अर्चना चावजी को भेजा था।
उसके बाद मैं इसे ब्लॉग पर लगाना भूल गया।
आज अचानक ही एक सी.डी. हाथ लग गई,
जिसमें  मेरा यह गीत भी था!
इसको बहुत मन से समवेत स्वरों में 
मेरी मुँहबोली भतीजियों 
श्रीमती अर्चना चावजी  और उनकी छोटी बहिन 
रचना बजाज ने गाया है।
आप भी इस गीत का आनन्द लीजिए!
तन, मन, धन से हमको, भारत माँ का कर्ज चुकाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

राम-कृष्ण, गौतम, गांधी की हम ही तो सन्तान है,
शान्तिदूत और कान्तिकारियों की हम ही पहचान हैं।
ऋषि-मुनियों की गाथा को, दुनिया भर में गुंजाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

उनसे कैसा नाता-रिश्ता? जो यहाँ आग लगाते हैं,
हरे-भरे उपवन में, विष के पादप जो पनपाते हैं,
अपनी पावन भारत-भू से, भय-आतंक मिटाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

जिनके मन में रची बसी, गोरों की काली है भाषा,
ये गद्दार नही समझेंगे, जन,गण, मन की अभिलाषा ,
हिन्दी भाषा को हमको, जग की शिरमौर बनाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

प्राण-प्रवाहक, संवाहक हम, यही हमारा परिचय है,
हम ही साधक और साधना, हम ही तो जन्मेजय हैं,
भारत की प्राचीन सभ्यता, का अंकुर उपजाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

वीरों की इस वसुन्धरा में, आयी क्यों बेहोशी है?
आशाओं के बागीचे में, छायी क्यों खामोशी है?
मरघट जैसे सन्नाटे को, दिल से दूर भगाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

"अँधियारा हरते जाएँगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नेह अगर होगा खुश होकर दीपक जलते जाएँगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

सुमन-सुमन से मिलकर, जब घर-आँगन में मुस्काएँगे,
सूनी-वीरानी बगिया में, फिर से गुल खिल जाएँगे,
फड़-फड़ करती तितली, भँवरे गुंजन करते आयेंगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

दीपक-बाती स्नेह स्नेहभरी जब, लौ उजास की उगलेगी,
देवताओं का वन्दन होगा, धूप सुगन्धित सुलगेगी,
जननी-जन्मभूमि का हम आराधन करते जाएँगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

महफिल में शम्मा होगी तो, सुर की धारा निकलेगी,
विरह सुखद संयोग बनेगा, जमी पीर सब पिघलेगी.
उर के सारे जख़्म पुराने, प्रतिपल भरते जाएँगे।
धरती पर फैला सारा अँधियारा हरते जाएँगे।।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

"गीत-दरबान बदलते देखे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

इंसानों की बोली में, ईमान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

सौंपे थे हथियार युद्ध में, अरि को सबक सिखाने को,
उनका ही मुँह मोड़ दिया, अपनों को घाव खिलाने को,
गद्दारों की गोली में, संधान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

भार पाला दिखा जिधर, उस अचानक जा फिसले,
माना था जिनको अपना, वो थाली के बैंगन निकले,
मक्कारों की टोली में, मैदान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

किस पर करें भरोसा, अब कोई भी धर्म-इमान नहीं,
अपने और पराये की, दुनिया में कुछ पहचान नहीं,
अरमानों की डोली में, मेहमान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

जीवन की आपाधापी में, झंझावात बहुत फैले हैं,
उजले-उजले तन वालों के, अन्तस तो मैले-मैले हैं,
रंगों की रंगोली में, परिधान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

साग-दाल को छोड़, अमानुष भोजन को अपनाया है,
लुप्त हो गयी सत्य अहिंसा, हिंसा का युग आया है,
नादानों की होली में, अनुपान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

बाहुबली हैं सत्ताधारी, हरिश्चन्द्र लाचार हुए,
लोकतन्त्र के दरवाजे पर, पढे-लिखे बेकार हुए,
बलवानों की खोली में, दरबान बदलते देखे हैं।
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं।।

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

"धरती पर नजारों को बुलाते हो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ग़मों की ओड़कर चादर, बहारों को बुलाते हो
बिना मौसम के धरती पर, नजारों को बुलाते हो

गगन पर सूर्य का कब्जा, नहीं छायी कहीं बदली
बड़े नादान हो दिन में, सितारों को बुलाते हो

नहीं चिट्ठी-नहीं पत्री, नहीं मौसम सुहाना है
बिना डोली सजाये ही, कहारों को बुलाते हो

कब्र में पैर लटके हैं, हुए हैं ज़र्द सब पत्ते,
पुरानी नाव लेकर क्यों, किनारों को बुलाते हो

कली चटकी नहीं कोई, नहीं है “रूप” का गुलशन
पड़ी वीरान महफिल में, अशआरों को बुलाते हो
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रविवार, 13 अप्रैल 2014

"ग़ज़ल-अब नीड़ बनाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मासूम निगाहों में, खामोश तराना है
मदहोश परिन्दों को, अब नीड़ बनाना है

सूखे हुए पेड़ों पर, फिर आ गये हैं पत्ते
अब प्यार के दीपक को, हर दिल में जलाना है

भटके हुए राही को, पथ मिल गया है सीधा
इस पर कदम बढ़ा कर, अब लक्ष्य को पाना है

कुछ करके दिखाने के, अरमान दिलों में हैं
उजड़ी हुई दुनिया को, अब फिर से बसाना है

हिंसा की की चल रहीं हैं, चारों तरफ हवाएँ
आतंक की आँधी को, अब दूर भगाना है

इस मादरे-वतन को, मक़्तल की जरूरत क्या
अब पाठ अहिंसा का, मक़तब में पढ़ाना है

फिरकापरस्त होना, मज़हब नहीं सिखाता
इंसानियत का हमको, अब “रूप” दिखाना है

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

"बालकविता-ककड़ी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
 
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल मन का उपवन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
 
नदी किनारे पालेजों में,
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
 
 आता है जब मई महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।

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