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बुधवार, 23 अक्तूबर 2019

दोहे "आवश्यक सामान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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तन के हों निर्धन भले, मन रक्खो धनवान।
मन के भीतर है भरा, दुनियाभर का ज्ञान।।
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माटी का दीपक भले, कितना रहे कुरूप।
जलकर बाती नेह की, फैला देती धूप।।
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दीवाली पर द्वार को, कभी न करना बन्द।
झिलमिल करते दीप ही, देते हैं आनन्द।।
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सदा स्वदेशी का करो, जीवन में उपयोग।
मत चीनी सामान का, करो कभी उपभोग।।
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सुलभ सभी है देश में, आवश्यक सामान।
फिर क्यों लोग विदेश की, चला रहे दूकान।।
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नहीं किसी भी क्षेत्र में, पीछे अपना देश।
फिर क्यों टुकड़े बीनने, जाते युवक विदेश।।
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गाते गान विदेश का, खा स्वदेश का माल।
भारत-भू को कलंकित, करते आज दलाल।।
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मंगलवार, 22 अक्तूबर 2019

समीक्षा “सब्र का इम्तिहान बाकी है” (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिल से निकले ज़द्बातों की शायरी
“सब्र का इम्तिहान बाकी है”
      अभी कल ही की तो बात है। मैं तीन पुस्तकों के विमोचन के कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ। जिनमें डॉ. सुभाष वर्मा कृत कत्आत और ग़ज़लों का  एक संग्रह “सब्र का इम्तिहान बाकी है” भी था। कार्यक्रम में ही मैंने इस पुस्तक का अधिकांश भाग बाँच लिया था। मैं आजकल भुलक्कड़ किस्म का हूँ इसलिए मन में विचार आया कि क्यों न सबसे पहले इसी पुस्तक के बारे में कुछ लिखा जाये। डेस्कटॉप पर बैठा और मेरी उँगलियाँ की-बोर्ड पर चलने लगी।
    अगर देखा जाये तो हमारे आस-पास और दुनियाभर में एक से बढ़कर एक विद्वान हैं मगर सबमें लेखन और कवित्व नहीं होता है। कुदरत की यह देन बहुत कम लोगों में ही पाई जाती है। ऐसी ही एक शख्शियत का नाम सुभाष वर्मा सुखन भी है। राजकीय महाविद्यालय, सितारगंज के प्राचार्य के रूप में कार्यरत डॉ. सुभाष वर्मा से मेरा परिचय लगभग दो वर्ष पूर्व हुआ था। किसी मित्र ने कहा कि सुभाष वर्मा एक अच्छे सुखनवर हैं। इसलिए मैं इनसे मिलने के लिए स्वयं ही इनके कॉलेज में चला गया। बातचीत में मुझे आभास हुआ कि ये न केवल एक शिक्षाशास्त्री हैं बल्कि एक अच्छे शायर और मिलनसार व्यक्ति भी हैं। इस संग्रह में आपने लिखा भी है-
“थोड़ी ग़ज़लें चन्द कत्आत
सीधी-सादी अपनी बात
मिसरे खुद ही बन पड़ते हैं
वरना अपनी क्या औकात”
      उक्त मुक्तक इनके ऊपर बिल्कुल खरा उतरता है। आम बोलचाल के सीधे-सादे शब्द ही इस कृति की विशेषता है जो पाठक के दिल में गहराई से उतरते जाते हैं।
     किताब महल द्वारा प्रकाशित 96 पृष्ठ के पेपरबैक संस्कण का मूल्य मात्र 95 रुपये रखा गया है। जिसे आम आदमी भी खरीदकर पढ़ सकता है।
     “सब्र का इम्तिहान बाकी है” नामक इस संग्रह को शायर ने दो भागों में विभक्त किया है। पहले भाग को “कत्आत खण्ड” नाम दिया गया है जिसमें 123 बेहतरीन मुक्तक हैं और दूसरे भाग को “ग़ज़ल खण्ड” नाम दिया है जिसमें 46 ग़ज़लें है।
     “सब्र का इम्तिहान बाकी है” की शुरुआत सुखनवर ने एक सीख देते हुए एक सशक्त मुक्तक से की है-
“चाहे हिन्दू की मसीही या मुसलमान रहे
ये जरूरी है कि हर आदमी इंसान रहे
वक्त कैसा भी बुरा हो वो बुराई से बचे
यानि हर हाल में बस साहिबे ईमान रहे”
      डॉ. सुख के मुक्तकों में एक ऐसी कशिश है जो पाठक को आह्लादित ही नहीं करती अपितु एक सन्देश भी देती है-
“हर चीज जमाने में जमाने के लिए है
इक तू है कि बस मुझको सताने के लिए है
तू जुल्म न करता तो मैं ये शेर न कहता
अहसां है तेरा कुछ तो सुनाने के लिए है”
        इसी मिजाज का उनका यह कता भी काबिले गौर है-
“दिल से दिल तक तो मेरी सदा पहुँचेगी
आह पहुँचेगी कि आवाजे वफा पहुँचेगी
मुझको इतना तो यकीं है कि मेरी बेचैनी
बनके परियादे सुखन अर्श पे जा पहुँचेगी”
        शायर ने पाठक को वर्जना करते हुए लिखा है-
“लोरिया मत गा जमाने को सुलाने के लिए
जागरण के गीत गा सबको जगाने के लिए
दर्द सारा आँसुओं में बहा देगा सुखन
पास तेरे क्या बचेगा गुनगुनाने के लिए”
        इस संकलन में जितने भी मुक्तक हैं उन सबमें कहीं एक शिक्षा जरूर दी गई है। देखिए उनका यह मुक्तक-
“नफरत की बात कर न अदावत की बात कर
ऐ दोस्त कर सके तो मुहब्बत की बात कर
ख्वाबों की ऐशगाह से बाहर निकल के आ
अब आग लग चुकी है हिफाजत की बात कर”
         प्रशंसा उन्हीं अशआरों की होती हैं जो दिल में सीधे ही उतर जायें। ऐसा ही एक कता निम्नवत् है-
“किसी ने आरती कर ली किसी ने बन्दगी कर ली
मगर मैं आशिकों में था तो मैंने आशिकी कर ली
सुना है आरती औ बन्दगी बेजा गयी उनकी
मगर हम हैं कि हासिल दो घड़ी में हर खुशी कर ली”
--
“अखलाख घट रहा है रिश्ते सिकुड़ रहे हैं
बढ़ने की होड़ में अब कुनबे बिछड़ रहे हैं
यूँ तख्त हो चुका है इंसान का जिगर अब
ये तीरे मुहब्बत में टकरा के मुड़ रहे हैं”
       शायरी के इस उपयोगी संग्रह “सब्र का इम्तिहान बाकी है” का दूसरा भाग ग़ज़ल खण्ड है, जिसकी हर एक नज्म बहुत ही दिलकश है। शायर ने इस भाग की शुरुआत इस ग़ज़ल से की है-
“पेशे खिदमत है मेरी ताजा ग़ज़ल
एकदम सीधी बहुत सादा गजल
अपनी आँखें खुश्क हैं तो क्या सुखन
गैर के अश्कों से छलका जा गजल”
      संग्रह की एक और ग़ज़ल को भी देखिए, जो पाठक को इस कृति को सांगोपांग पढ़ने का मजबूर कर देगी-
“जब तक जाँ में जान नहीं है
मुस्काना आसान नहीं है
ब्याज सहित लौटा देगा सब
समय तो बेईमान नहीं है”
       “सब्र का इम्तिहान बाकी है” की ग़ज़लों जीवन की परिभाषा भी है। देखिए निम्न ग़ज़ल के दो शेर-
“हर खुशी बेवफा हो गई
जिन्दगी बेमजा हो गई
मौत की अब जरूरत है क्या
जिन्दगी ही कजा हो गई”
       इसी मिजाज की की एक और ग़ज़ल है-
“सुख न जिसको मिला उम्र भर
वो सुखन में हुआ तर-ब-तर
वो मिला ना मिला उसका घर
बस भटकते रहे दर-ब-दर”
       काव्य की सबसे बड़ी खूबी होती है शब्द चयन जिसमें “सुखन” हर हज़रिए से सफल रहा है-
“कुछ सपने बेकार हो गये
कुछ सपने साकार हो गये
कुछ सपने वीभत्स हो गये
कुछ सपने शृंगार हो गये”
      मजमुआ में सभी ग़ज़ल एक से बढ़कर एक हैं अन्त में इस ग़जल का भी उल्लेख जरूरी है-
“जब तलक कश-म-कश नहीं होती
जिन्दगी, जिन्दगी नहीं होती
तुम न करते तो कोई और सही
अपनी दुर्गत तो लाजमी होती”
       ग़ज़ल प्रेमी प्रेमिका का बातचीत ही नहीं होती अपितु समाज में जो घट रहा होता है उसका इजहार करना भी ग़ज़लकार का दायित्व होता है। इसीलिए ग़ज़ल को उर्दू साहित्य की एक प्रमुख विधा माना गया है। काव्य की इन्हीं खूबियों के कारण हिन्दी में भी ग़ज़ल या गीतिका एक लोकप्रिय विधा बन गयी है। डॉ. सुभाष वर्मा सुखन ने अपनी ग़ज़लों और कत्आत में मौजूदा हालात के साथ-साथ पुरानी रवायतों का भी वाखूबी निर्वहन किया है।  “सब्र का इम्तिहान बाकी है” की शायरी अपने में एक समूचा प्रयोग है। जो सुखन की कलम से निकला है। जिसमें शायरी के अदब की सभी खूबियाँ हैं।
      मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास भी है कि “सब्र का इम्तिहान बाकी है”  की ग़ज़ले और कत्आत पाठकों के दिल को अवश्य छुएगीं बनायेगी और समीक्षकों के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी। इस उम्दा लेखन के लिए मैं सुखनवर को दिली मुबारकवाद देता हूँ।
दिनांकः 21 अक्टूबर, 2019  
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-

समीक्षक
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308
मोबाइल-7906360576
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com

रविवार, 20 अक्तूबर 2019

दोहे "पर्व अहोई-अष्टमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सारे जग से भिन्न है, अपना भारत देश।
रहता बारह मास ही, पर्वों का परिवेश।।
 --
पर्व अहोई-अष्टमी, दिन है कितना खास।
जिसमें पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास।।
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दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद।
बेटा-बेटी में जहाँ, दुनिया करती भेद।।
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पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।।
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बेटा-बेटी के लिए, हों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार से, पार लगाओ नाव।।
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एक पर्व ऐसा रचो, जो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ में, करो स्वयं पर गर्व।।
-- 
बेटा-बेटी समझ लो, कुल के दीपक आज।
बदलो पुरुष प्रधान का, अब तो यहाँ रिवाज।।
 --

समीक्षा पेपरवेट "उदात्त भावनाओं की शायरी" (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 उदात्त भावनाओं की शायरी
“पेपरवेट”
      पंजाबी मूल के कृषक परिवार में 1980 में जन्मी पेशे से शिक्षिका श्रीमती राजविन्दर कौर एक कामकाजी महिला हैं। मैंने अपनी अनुभवी दृष्टि से अक्सर यह देखा है कि कामकाजी महिलाओं का अधिकांश समय अपने कार्यालय या चूल्हे-चौके तक ही सीमित हो जाता है। बहुत कम महिलाएँ ऐसी होती हैं जो अपने दैनिक कार्यों में लेखन को भी स्थान देती हैं। ऐसी ही साहित्य जगत की उदीयमान प्रतिभा श्रीमती राजविन्दर कौर भी हैं। जो समाज को अपनी लेखनी से घन्य कर रहीं हैं।
     मुझे आपकी सद्यः प्रकाशित कृति “पेपरवेट” को पढ़ने का सौभाग्य मिला है।जिसमें आपने 89 अतुकान्त रचनाओं का समावेश किया है। इस कृति की ग्यारहवीं रचना पेपरवेट है। जिसमें आपने सेलफोन के माध्यम से अपनी भावनाओं को सीधे-सरल और आम बोलचाल की भाषा में बखूबी उतारा है। इस रचना का महत्वपूर्ण अंश निम्नवत् है-
“बुक मार्क
लगाने की
कभी आदत
नहीं रही
फोन ही अब
बन जाता है
अक्सर
मेरी किताबों का
पेपरवेट”
     मेरा अब तक यह मानना था कि तुकान्त और गेय रचनाएँ ही कविता कहलाती हैं मगर कुछ आधुनिक कवियों की कविताएँ पढ़कर मी यह धारणा बदल गयी है। अब मेरा मानना यह है कि सशक्त शब्दों से जो रचनाएँ लिखी जाती हैं वो मन पर गहरे पैंठ जाती हैं और ऐसी रचनाएँ वास्तव में कविता कहलातीं हैं। श्रीमती राजविन्दर कौर ने अपने सशक्त शब्दों और शुद्ध अन्तःकरण से अपनी रचनाओं को उकेरा है।
      पेपरवेट में संकलित उनकी रचना “मेरी लकीरों” का कुछ अंश इस प्रकार है जो मन पर सीधा असर करती हैं-
“आड़ी तिरछी
लकीरों को जब
देखती हूँ गौर से
कभी-कभी
तुम्हारे चेहरे से मिलता
एक चेहरा उभर जाता है
इन लकीरों में
तब मेरी नजर
हथेलियों में
गहरी गड़ जाती है
और
अपने सामने
तुम्हें खींचकर लकीरों से
खड़ा कर लेना चाहती हूँ...”
     इसी मिजाज की एक और रचना “यकीनन भोर है” जो पाठकों के मन में आशा का संचार अवश्य करेगी। देखिए इसका मुख्य अंश-
“...मेरे अन्दर
आजकल
कोई शोर है
और ये वही है
जो मेरे सुकून का
चोर है
गुजर ही जायेगी
स्याह तल्खियों की रात
इसके बाद तो
यकीनन भोर है”
     “हो गया पराया रिश्ता” में आपने एक संवेदनशील और मार्मिक रचना को कुछ इस प्रकार उकेरा है-
“...शक के घेरे में मेरा नाम
अभी-अभी हो गया पराया
पल भर में एक रिश्ता
दिल की सादादिली
सिसकियाँ भरती आहिस्ता-आहिस्ता
आँखों की कोई नमी न देखे
न देखे
दिल से लहू जो रिसता
हाय! अभी-अभी
हो गया पराया
पलभर में एक रिश्ता”
      पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता को प्रकट करती “चाँद” शीर्षक से इस संकलन की एक और रचना भी देखिए-
“..अँधेरा छाँटकर तुमने
मेरे वजूद को
चमकाया है
तुम ही तो हो
मेरे पूर्णिमा के चाँद...”
     इस संकलन में संकलित “अहद और तअल्लुक” नामक रचना के शब्द भी बहुत प्रभावशाली हैं-
“मुहब्बत के साये
कभी मेरे
सर से न गये
एक दर पर
किया था सजदा
फिर बाद उसके
किसी दर पर न गये...”
    वर्तमान परिवेश का चित्रण करते हुए “हूरें नहीं मिलतीं” में आपने उग्रवादियों को नसीहतें देते हुए लिखा है-
“उनसे कहो
शरीर पर
बम बाँधकर
भीड़ में
निर्दोषों को मारकर
हूरें नहीं मिलतीं...”
     “सरफिरी हवा” को ताकीद करते हुए कवयित्री राजविन्दर कौर लिखती हैं-
“ऐ सरफिरी हवा
तुझे ताकीद है
मेरी मुँडेर का चराग
यूँ न बुझाया कर
जरा सलीके से
पेश आया कर...”
     साहित्य की विधाएँ साहित्यकार की देन होती हैं। जो समाज को दिशा प्रदान करती हैंजीने का मकसद बताती हैं। सूरकबीरतुलसीजायसीनरोत्तमदास इत्यादि समस्त कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ नया देने का प्रयास किया है। पेपरवेट की शायरी भी एक ऐसा ही प्रयोग है। जो डॉ. राजविन्दर कौर की कलम से निकला है।
मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास भी है कि पेपरवेट की कविताएँ पाठकों के दिल की गहराइयों तक जाकर अपनी जगह बनायेगी और समीक्षकों की दृष्टि में भी यह उपादेय सिद्ध होगी।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
समीक्षक
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोडखटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308
मोबाइल-7906360576
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
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शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

गीत "दूषित हुआ वातावरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
देश का दूषित हुआ वातावरण।
सभ्यताशालीनता के गाँव में,
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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सुर हुए गायबमृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान कीसम्मान में,
आब खोता जा रहा अन्तःकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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लग रहे घट हैं भरेपर रिक्त हैं,
लूटने में राज कोसब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ है आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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