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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

"स्वतन्त्रता का नारा है बेकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिस उपवन में पढ़े-लिखे हों रोजी को लाचार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

जिनके बंगलों के ऊपर,
निर्लज्ज ध्वजा लहराती,
रैन-दिवस चरणों को जिनके,
निर्धन सुता दबाती,
जिस आँगन में खुलकर होता सत्ता का व्यापार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

मुस्टण्डों को दूध-मखाने,
बालक भूखों मरते,
जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी,
दौलत से घर भरते,
भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

 
वयोवृद्ध सीधा-सच्चा,
हो जहाँ भूख से मरता,
सत्तामद में चूर वहाँ हो,
शासक काजू चरता,
ऐसे निठुर वजीरों को, क्यों झेल रही सरकार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

"अमरूदःगुणों की खान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

guava2नीर पी बरसात का, 
अमरूद गदराने लगे।
"रूप" पर अभिमान कर, 
डण्ठल पे इतराने लगे।।
images (23)डालियों पर एक से हैं, 
रंग में और रूप में
खिल रहे इनके मुखौटे, 
गन्दुमी सी धूप में।।
कुछ मझोले और छोटे, 
कुछ बड़े आकार के।
मौन आमन्त्रण सभी को, 
दे रहे हैं प्यार से।
images (2)किसी का मन है गुलाबी,
और किसी का है धवल।
पीत है चेहरा किसी का,
किसी का तन है सबल।। 
स्वस्थ रहने के लिए,
खाना इसे वरदान है।
नाम का अमरूद है,
लेकिन गुणों की खान है।।

बुधवार, 20 अगस्त 2014

"ग़ज़ल-मासूम चेहरों से धोखा न खाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नहीं दिल्लगी कोई दिल को लगाना
सरल है मुहब्बत, कठिन है निभाना

सूरत छिपी हैं मुखौटों के पीछे
मासूम चेहरों से धोखा न खाना

बाहर से नाजुक हैं भीतर से पत्थर
अगर हो सके तो ज़िगर को बचाना

उमड़ते हैं ज़ज़्बात बनते हैं मिसरे
आसां नहीं उनको गाकर सुनाना

काँटों भरी है डगर आशिकी की
समझ-बूझकर ही कदम को बढ़ाना

मुहब्बत का कोई नहीं रूप होता
उल्फत के जंगल में बिखरा ख़जाना

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

"दोहे-मन हो रहा अशान्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छन्दमुक्त आलेख तो, कहलाता है गद्य।
छन्दशास्त्र में जो बँधी, वो तुकबन्दी पद्य।‍१।

लिख करके आलेख को, अनुच्छेद में बाँट।
इसको कविता नाम दे, ज्ञान रहे हैं छाँट।२।

दूषण इतना हो गया, दूषित हुआ समीर।
कथित काव्य के रचयिता, मैला करते नीर।३।

लोग छापने के लिए, माँग रहे अतुकान्त।
देख दुर्दशा काव्य की, मन हो रहा अशान्त।४।

निकल गयी जब आत्मा, तब निष्प्राण शरीर।
ऐसी ही अब बेतुकी, शब्दों की तसबीर।५।

पथ हमको दिखला गये, तुलसी-सूर-कबीर।
लोग काव्य के पाँव में, बाँध रहे जंजीर।६।

जो दिल से निकले वही, वो है कविता मित्र।
ठोंक-पीटकर गढ़ रहे, शब्दों के क्यों चित्र।७।

करना हो तो कीजिए, ऐसा शब्द निवेश।
रोचकता के साथ में, हो जिसमें सन्देश।८।

गति-यति और विराम से, मुक्त हुआ साहित्य।
इसी लिए तो काव्य से, मिटा आज लालित्य।९।

कविता में मिलता नहीं, नैसर्गिक आनन्द।
सी.डी.-टी.वी. ने किये, भजन-कीर्तन बन्द।१०।

तुलसी-सूर-कबीर की, मीठी-मीठी तान।
निर्गुण-सगुण उपासना, भूल गया इन्सान।११।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

"मैं अंगारों से प्यार करूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सोने-चाँदी की चाह नहींमैं केसरिया शृंगार करूँ।
चन्दा से मुझको मोह नहींसूरज को अंगीकार करूँ।।

नेता सुभाषआजादभगतफिर से आओ इस भारत में,
मोहन दो चक्रसुदर्शन कोक्यों चरखे की दरकार करूँ।

जब भरी सभा में चीर खिँचाखामोश रही-बिजली न बनी,
अब नहीं चाहिए पांचालीलक्ष्मीबाई स्वीकार करूँ।

सीमा पर वीर-बाँकुरे तोबारूद-आग से खेल करें,
जो देशप्रेम को सुलगा देंउन अंगारों से प्यार करूँ।

अपनी वीणा से माताजीअब मुझको तान सुनाओ मत,
दे दो अपना त्रिशूल मुझेमैं अरिमस्तक पर वार करूँ।

अपने अधिकारों की भिक्षाबन दीन-दलित क्यों माँग रहे,
अपनी वस्तु को पाने कोदुर्जन से क्यों मनुहार करूँ! 

रविवार, 17 अगस्त 2014

“श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बधाई!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

योगिराज श्रीकृष्णचन्द्र महाराज की जय हो!
फल की इच्छा मत करो, कर्म करो निष्काम।
कण्टक वृक्ष खजूर पर, कभी न लगते आम।।
sri_krishna
जन्म लिया यदुवंश में, कहलाये गोपाल। 
लीलाओं को देखकर, माता हुई निहाल।।
lord-krishna-govardhan-mountain

क्रूर कंस का नाश कर, कहलाए भगवान।।
jg04zd
जन, गण, मन में रम रहे, कृष्णचन्द्र महाराज।
गीता अमृतपान से, बनते बिगड़े काज।।

शनिवार, 16 अगस्त 2014

"आजादी करती है आज सवाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

चीख-चीखकर आजादी,
करती है आज सवाल।
हुआ क्यों जन-जीवन बेहाल?
दुखी क्यों लाल-बाल औ’ पाल?
चीख-चीखकर आजादी,
करती है आज सवाल।।

बढ़ा है मँहगाई का क्लेश,
वतन में फैला हिंसा-द्वेष,
हो गया नष्ट विमल परिवेश,
नहीं पहले जैसा संगीत,
सजेंगे कैसे सुर और ताल?
चीख-चीखकर आजादी,
करती है आज सवाल।
हुआ क्यों जन-जीवन बेहाल? 

सत्य का मन्त्र हुआ अस्पष्ट,
हो गया तन्त्र आत तो भ्रष्ट,
लोक की किस्मत में हैं कष्ट,
बचेगा कैसे भोला कीट,
हर तरफ मकड़ी के हैं जाल।
चीख-चीखकर आजादी,
करती है आज सवाल।
हुआ क्यों जन-जीवन बेहाल? 

हुए जननायक अब मग़रूर,
नयी नस्लें मस्ती में चूर,
श्रमिक है आज मजे से दूर,
राह में काँटे हैं भरपूर,
धरा का “रूप” हुआ विकराल।
चीख-चीखकर आजादी,
करती है आज सवाल।
हुआ क्यों जन-जीवन बेहाल?

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