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सोमवार, 31 जुलाई 2017

प्रकाशन "लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास"

"सूर-सूर तुलसी शशि, उडुगन केशव दास।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश।।’’
मित्रों!
आज से 29 वर्ष पूर्व मेरा एक लेख
नैनीताल से प्रकाशित होने वाले
समाचारपत्र
"दैनिक उत्तर उजाला"
में प्रकाशित हुआ था। 
भगवान राम की गाथा को
रामचरित मानस के रूप में
जन-जन में प्रचारित करने वाले महाकवि तुलसीदास की स्मृति
उर में संजोए हुए यह लेख मूलरूप में आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
इसे साफ-साफ पढ़ने के लिए-
कृपया समाचार की कटिंग पर
क्लिक कीजिए।

दोहे "तुलसीदास-नमन हजारों बार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

श्रावण शुक्ला सप्तमी, दिवस आज है खास।
माँ हुलसी की कोख से, जनमे तुलसीदास।।
--
मानस के इस सन्त का, जनम दिवस है आज।
मना रहा अनुभाव से, जिसको आज समाज।।
--
मर्यादित श्री राम का, लिया सबल आधार।
मानस की महिमा सभी, करते हैं स्वीकार।।
--
अपने भारत देश में, कण-कण में श्री राम।
राम नाम के जाप से, बनते बिगड़े काम।।
--
कविवर तुलसीदास ने, दिया हमें उपहार।
दोहा-चौपाई हरें, मन के सकल विकार।।
--
जिसने सत् साहित्य का, चमन किया गुलजार।
उस हुलसी के लाल को, नमन हजारों बार।
--
जो करता है भक्ति का, जन-जन में संचार।
उसकी ही होती सदा, जग में जय-जयकार।।

"जन्मदिन पर मुंशी प्रेमचन्द को शत-शत नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुंशी प्रेमचन्द 
जन्म-
     प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।जीवन धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।
शादी-
     आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे हीसाथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाताउसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
शिक्षा-
     अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक थाआगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।साहित्यिक रुचिगरीबीअभावशोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो - तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला। आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शाररतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद "तिलस्मे - होशरुबा" पढ़ डाली।अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी - बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।प्रेमचन्द की दूसरी शादीसन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।
व्यक्तित्व-
      सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा "हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलनाअपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् - पटखनी खाने के बादधूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, "तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।" कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता,सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं "कि जाड़े के दिनों में चालीस - चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।"प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।ईश्वर के प्रति आस्थाजीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा "तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो - जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।"मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था - "जैनेन्द्रलोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"प्रेमचन्द की कृतियाँप्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में "होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात" नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय "रुठी रानी" नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में "हम खुर्मा व हम सवाब" नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता हैइसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।"सेवा सदन", "मिल मजदूर" तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए "महाजनी सभ्यता" नाम से एक लेख भी लिखा था।
मृत्यु-
      सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने "प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया। 
                                                                                                                   (भारत दर्शन से साभार)

दोहे "हरी-भरी सब बेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मतलब में जब-जब हुए, दुनिया में अनुबन्ध।
थोड़े दिन के बाद में, टूट गये सम्बन्ध।।
--
अधिक दिनों तक तो नहीं, चलता नहीं फरेब।
साथ नहीं जाती कभी, धन-दौलत की जेब।।
--
सिमट जायेगा एक दिन, चार दिनों का खेल।
हो जाती बरसात में, हरी-भरी सब बेल।।
--
पानी पीकर नेह का, फलते पौधे-पेड़।
अपने मतलब के लिए, कुदरत को मत छेड़।।
--
महद कागजों पर दिखें, सरकारी उद्योग।
करते अच्छा काम हैं, सीधे-सादे लोग।।

रविवार, 30 जुलाई 2017

दोहे "राजनीति गन्दी नहीं, गन्दे हैं हम लोग"

राजनीति गन्दी नहीं, गन्दे हैं हम लोग।
जन सेवा के नाम पर, खाते मोहनभोग।।
--
आये जग में किसलिए, समझ लीजिए सार।
जीवनरूपी नाव का, सदाचार आधार।।
--
जैसा बोया खेत में, वही रहा है काट।
सामाजिक परिवेश के, मत कर बन्द कपाट।।
--
जल का करके आचमन, अन्तस करो पवित्र।
लेकिन पहले कीजिए, अपना साफ चरित्र।।
--
अपने स्वारथ के लिए, करो न ओछे काम।
भोर हमेशा साँझ का, लाती है पैगाम।।
--
लालू और नवाज के, एक सरीखे ढंग।
दोनों के आचरण पर, देखो लगा कलंक।।
--
झूठ कभी मत समझना, अपने पावन मन्त्र।
न्यायालय के सामने, बौने सारे तन्त्र।।
--
बदअमनी के अब सभी, बन्द करो उपदेश।
जीवन में धारण करो, ऋषियों के सन्देश।।

शनिवार, 29 जुलाई 2017

"पूज्य पिता जी आपको श्रद्धापूर्वक नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पूज्य पिता जी आपको श्रद्धापूर्वक नमन।
2014 में आज ही के दिन आप विदा हुए थे।
पूज्य पिता जी आपकावन्दन शत्-शत् बार।
बिना आपके हो गयाजीवन मुझ पर भार।।
--
बचपन मेरा खो गयाहुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, करने हैं सब काज।।
--
जब तक मेरे शीश पररहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष काछूट गया है साथ।।
--
प्रभु मुझको बल दीजिएउठा सकूँ मैं भार।
एक-नेक बनकर रहेमेरा ये परिवार।।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

गीत "मौत ज़िन्दगी की रेल में सवार हो गई"

ज़िन्दगी हमारे लिए
आज भार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

हादसे सबल हुए हैं 
गाँव-गली-राह में 
खून से सनी हुई 
छुरी छिपी हैं बाँह में 
मौत ज़िन्दगी की 
रेल में सवार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

भागने की होड़ में
उखाड़ है-पछाड़ है
आज जोड़-तोड़ में
अजीब छेड़-छाड़ है
जीतने की चाह में
करारी हार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

चीत्कार काँव-काँव 
छल रही हैं धूप-छाँव 
आदमी के ठाँव-ठाँव 
चल रहे हैं पेंच-दाँव 
सभ्यता के हाथ 
सभ्यता शिकार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

दोहे "नागपंचमी-अद्भुत अपना देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

श्रावण शुक्ला पञ्चमी, बहुत खास त्यौहार।
नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार।१।
--
महादेव ने गले में, धारण करके नाग।
विषधर कण्ठ लगाय कर, प्रकट किया अनुराग।२।
--
दुनिया को अमृत दिया, किया गरल का पान।
जो करते कल्याण को, उनका होता मान।३।
--
अद्भुत अपनी सभ्यता, अद्भुत अपना देश।
दया-धर्म के साथ में, सजा हुआ परिवेश।४।
--
खग-मृग, हिल-मिल कर रहे, दुनिया रहे निरोग।
नागदेव रक्षा करें, निर्भय हों सब लोग।५।
--
पूरी निष्ठा से करो, अपने-अपने कर्म।
जीवों पर करना दया, सिखलाता है धर्म।६।
--
मन्दिर-मस्जिद-चर्च की, नहीं हमें दरकार।
पंडित-मुल्ला-पादरी, बने न ठेकेदार।७।
--
जो कण-कण में रम रहा, वो है मालिक एक।
धर्मपरायण सब रहें, बने रहें सब नेक।।
--
मन में कभी न लाइए, ऊँच-नीच का भेद।
नौका में करना नहीं, जान-बूझ कर छेद।८।
--
वैज्ञानिकता से भरा, पर्वों का विन्यास।
ये देते हैं ऊर्जा, लाते हैं उल्लास।९।

दोहे "बन बैठे अधिराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहयोगी करने लगें, जब कुछ ओछे कर्म।
पल्ला उनसे झाड़ना, सबसे अच्छा कर्म।।

हो जाये जब भुनन में, तारा ताराधीश।
तब विवेक से काम को, करता है नीतीश।।

तेजस्वी का बन गया, घोटाला नैमित्त।
एक चाल से ही किया, लालू जी को चित्त।।

सत्ता पाने के लिए, किया पुराना काज।
फिर से पाला बदल कर, बन बैठे अधिराज।।

जनमत की किसको यहाँ, रहती है परवाह।
राजनीति के मूल में, कुरसी की है चाह।।

बुधवार, 26 जुलाई 2017

गीत "झंझावातों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मानव दानव बन बैठा हैजग के झंझावातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

होड़ लगी आगे बढ़ने कीमची हुई आपा-धापी,
मुख में राम बगल में चाकूमनवा है कितना पापी,
दिवस-रैन उलझा रहता हैघातों में प्रतिघातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

जीने का अन्दाज जगत मेंकितना नया निराला है,
ठोकर पर ठोकर खाकर भीखुद को नही संभाला है,
ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकरलिपटा गन्दी बातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

मित्रपड़ोसीऔर भाईभाई के शोणित का प्यासा,
भूल चुके हैं सीधी-सादीसम्बन्धों की परिभाषा।
 विष के पादप उगे बाग मेंजहर भरा है नातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

एक चमन में रहते-सहतेजटिल-कुटिल मतभेद हुए,
बाँट लिया गुलशन कोलेकिन दूर न मन के भेद हुए,
खेल रहे हैं ग्राहक बन करदुष्ट-बणिक के हाथों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

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