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रविवार, 24 जून 2018

दोहे "बढ़ा जगत में ताप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जब से मिली स्वतंत्रताहुई सभ्यता नष्ट। 
अधिकारी अधिकांश हैंआज देश में भ्रष्ट।।

अपनी लीला जानता, खुद कोविद भगवान।
झूठे दावे कर रहा, लेकिन अब इंसान।।

नीला नभ नीला रहा, घटा नहीं चहुँ ओर।
अब तो बिन बरसात के, दादुर करते शोर।।

जब-जब बढ़ता धरा पर, अनाचार-अन्याय। 
तब होता प्रारम्भ है, आशा का अध्याय।।

धर्म पराजित हो रहा, जीत रहा है पाप। 
जनता होती है दुखी, बढ़ा जगत में ताप।।

अपनी सूरत देखकर, विदित हुआ परिणाम। 
उगते सूरज को सभी, झुककर करें प्रणाम।।

शनिवार, 23 जून 2018

दोहे "तालाबों की पंक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अपना आज सँवार लो, कर लो कर्म पुनीत। 
मौसम के उपहार हैं, गरमी-पावस-शीत।।

उनके मँहगे बिल सभी, हो जाते है पास। 
जो सरकारी खर्च पर, नाप रहे आकाश।।

जनसेवक तो देश के, होंगे नहीं विपन्न। 
भत्ते-वेतन छोड़ दें, फिर भी हैं सम्पन्न।।

अब तो सेवाभाव का, खिसक रहा आधार।
मक्कारी की बाढ़ में, घिरा हुआ संसार।।

चाहे पर उपकार हो, या हो खुद का पेट।
जनसेवक हर हाल में, दौलत रहा समेट।।

जहाँ शेर के साथ में, बकरी का गठजोड़।
वहाँ अकेला चना तो, भाड़ न सकता फोड़।

अपना माथा पीटता, दोहाकार मयंक। 
गंगा जी में आ गयी, तालाबों की पंक।।

शुक्रवार, 22 जून 2018

दोहे "करना ऐसा प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ओस चाटने से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।
तारों से होती नहीं, जग में कभी उजास।।

जीवन के संग्राम को, समझ न लेना खेल।
जीवनसाथी से सदा, रखना हरदम मेल।।

पूरे जीवन प्यार का, उतरे नहीं खुमार।
जीवनसाथी से सदा, करना ऐसा प्यार।।

प्रीत और मनुहार है, दुनिया का आधार।
जीवन साथी से सदा, करना सच्चा प्यार।।

बेमन से देना नहीं, वचन किसी को मित्र।
जिसमें तुम रँग भर सको, वही बनाना चित्र।।

गुरुवार, 21 जून 2018

दोहे "सारे नम्बरदार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ऊँची कुरसी के लिए, सब हैं दावेदार।
गठबन्धन की नाव को, कौन करेगा पार।।

ताल-मेल कुछ भी नहीं, गर्दिश में है कार।
छीना-झपटी से नहीं, चलती है सरकार।।

मिल-जुलकर सबने चुनी, सबसे बढ़िया कार।
लेकिन चलने में हुई, कार बहुत लाचार।।

बोनट पर बैठे कई, भीतर कई सवार।
बात एकता की करें, सारे नम्बरदार।।

तू-तू, मैं-मैं का लगा, जब से मन में रोग।
वानर जैसी हरकतें, तब से करते लोग।।

मुखियाओं के हों जहाँ, मन में भरे विकार।
राजनीति के खेत की, कैसे भरे दरार।।

अपने दावे सब करें, खूब करें तकरार।
अच्छे नहीं भविष्य के, लगते हैं आसार।।

बुधवार, 20 जून 2018

दोहागीत "योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।१।

अगर चाहते आप हो, पास न आये रोग।
रोज सुबह कर लीजिए, ध्यान लगा कर योग।।
मत-मज़हब का है नहीं, जिससे कुछ अनुबन्ध।
रखना ऐसे योग से, जीवन भर सम्बन्ध।।
मधुर कण्ठ से ही सदा, अच्छा लगता गीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।२।

सन्त हमारे देश के, अगर छोड़ दें भोग।
नहीं अदालत में चले, फिर उन पर अभियोग।।
सत्य-सनातन योग की, महिमा बड़ी अनन्त।
योगी को ही समझिए, अब तो असली सन्त।।
जो सिखलाता योग को, वो होता है मीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।३।

धन से हो जाता नहीं, कोई बहुत अमीर।
जग में वो धनवान है, जिसका स्वस्थ शरीर।।
दूषण फैला हर जगह, फैले घातक रोग।
शमन करेगा रोग को, जग में केवल योग।।
अपना आज सँवार लो, कर लो कर्म पुनीत। 
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।४।

बिगड़ गया वातावरण, बिगड़ा आज चरित्र।
ऐसे में तो योग ही, तन-मन करे पवित्र।।
दीर्घ आयु का विश्व में, एक मात्र आधार।
तभी जगत ने लिया, योगदिवस स्वीकार।।
मौसम के उपहार हैं, गरमी-पावस-शीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।५।

सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।।

सोमवार, 18 जून 2018

दोहे "क्या होता है प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छिपा हुआ है प्यार में, जीवन का विज्ञान।
प्यार और मनुहार से, गुरू बाँटता ज्ञान।।

बन जाते हैं प्यार से, सारे बिगड़े काम।
प्यार और अनुराग तो, होता ललित-ललाम।।

दुनियाभर में प्यार की, बड़ी अनोखी रीत।
गैरों को अपना करे, ऐसी होती प्रीत।।

विरह तभी है जागता, जब होता है स्नेह।
विरह-मिलन के मूल में, विद्यमान है नेह।।

छोटे से इस शब्द की, महिमा अपरम्पार।
रोम-रोम में जो रमा, वो होता है प्यार।।

उपवन सींचो प्यार से, खिल जायेंगे फूल।
पौधों को भी चाहिए, नेह-नीर अनुकूल।।

जीव-जन्तु भी जानते, क्या होता है प्यार।
आ जाते हैं पास में, सुनकर मधुर पुकार।।

रविवार, 17 जून 2018

" झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की 160वीं पुण्यतिथि पर विशेष"

अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की

160वीं पुण्यतिथि पर 
उन्हें अपने श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए

श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की
यह अमर कविता सम्पूर्णरूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ!
सिंहासन हिल उठेराजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछीढालकृपाणकटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पायाशिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्यमुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हायविधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता हैविकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं-नब्वाबों के उसने पैरों को ठुकराया,
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली कीलिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर मेंहुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुरतंजौरसताराकरनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंधपंजाबब्रह्म पर अभी हुआ था वज्रनिपात,
बंगालेमद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों मेंबेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लोलखनऊ के लो नौलख हार,
यों परदे की इज्जत पर देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटिया में थी विषम वेदनामहलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में थाअपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधुंपंत-पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आगझोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरमन से आई थी,
झाँसी चेतीदिल्ली चेतीलखनउ लपटें छाई थीं,
मेरठकानपूरपटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुरकोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नानाधुंधुंपंतताँतियाचतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह, मौलवीठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी वो कुर्बानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचाआगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच लीहुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आईकर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि परगया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दीकिया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिलीपर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख थाउसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
परपीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आयाथा यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ानया घोड़ा थाइतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरेहोने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधारचिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेजतेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र थी कुल तेईस कीमनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथसिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहासलगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजयमिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

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