मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।बहुत आभार है उसका, बहुत उपकार है उसका,दिया माटी के पुतले को, उसी ने प्राण प्यारा है।।बहाई ज्ञान की गंगा, मधुरता ईख में कर दी,कभी गर्मी, कभी वर्षा, कभी कम्पन भरी सरदी।किया है रात को रोशन, दिये हैं चाँद और तारे,अमावस को मिटाने को, दियों में रोशनी भर दी।।मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।।लगा जब रोग का सदमा, तो उसने ही दवा दी है,कुहासे को मिटाने को, उसी ने तो हवा दी है।जो रहते जंगलों में, भीगते बारिश के पानी में,उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।।सुबह और शाम को मच्छर, सदा गुणगान करते हैं,जगत के उस नियन्ता को, सदा प्रणाम करते हैं।मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।।
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बुधवार, 27 मई 2026
गीत "पर्यावरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
गीत "जन्मदिन फिर आज आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- आ रहा मधुमास फिर से, साज मौसम ने बजाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- साल बीता, माह बीते, बीतते दिन-पल गये, बालपन-यौवन समय के साथ सारे ढल गये, फिर दरकते पत्थरों ने, ज़िन्दग़ी का गीत गाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- धार के विपरीत ही चलता रहा हूँ मैं हमेशा, वक्त की रफ्तार को छलता रहा हूँ मैं हमेशा, प्रतिकूल को अनुकूल करके, पथ अलग मैंने बनाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- गान कर भँवरे रिझाते हैं हमेशा ही सुमन को, सीख ली है देखकर मैंने परिन्दों की लगन को, बीन कर तृण-पात मैंने, नीड़ सपनों का बनाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- लोग मेरे जन्मदिन पर, रस्म की करते अदायी, कम हुआ है साल पर, स्वीकार करता हूँ बधायी, देखकर अपनत्व सबका, हर्ष है मन में समाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- |
बुधवार, 17 दिसंबर 2025
गीत "सभ्यता का रूप मैला हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- लाज कैसे अब बचायेगी की अहिंसा, पल रही चारों तरफ है आज हिंसा सत्य कहने में झमेला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- अब किताबों में सजे हैं ढाई आखर, सिर्फ कहने को बचे हैं नाम के घर, आदमी कितना अकेला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- इंसान के अब दाँत पैने हो गये हैं. मनुज के सिद्धान्त सारे खो गये हैं, बस्तियों का ढंग बनैला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- प्रीत की अब आग ठण्डी हो गयी है, पीढ़ियों की सोच गन्दी हो गयी है, सभ्यता का रूप मैला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- |
बुधवार, 14 मई 2025
गीत "सजी माँग सिन्दूरी होगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- महक रहा है मन का आँगन, दबी हुई कस्तूरी होगी। दिल की बात नहीं कह पाये, कुछ तो बात जरूरी होगी।। -- सूरज-चन्दा जगमग करते, नीचे धरती, ऊपर अम्बर। आशाओं पर टिकी ज़िन्दग़ी, अरमानों का भरा समन्दर। कैसे जाये श्रमिक वहाँ पर, जहाँ न कुछ मजदूरी होगी। कुछ तो बात जरूरी होगी।। -- प्रसारण भी ठप्प हो गया, चिट्ठी की गति मन्द हो गयी। लेकिन चर्चा अब भी जारी, भले वार्ता बन्द हो गयी। ऊहापोह भरे जीवन में, शायद कुछ मजबूरी होगी। कुछ तो बात जरूरी होगी।। -- हर मुश्किल का समाधान है, सुख-दुख का चल रहा चक्र है। लक्ष्य दिलाने वाला पथ तो, कभी सरल है, कभी वक्र है। चरैवेति को भूल न जाना, चलने से कम दूरी होगी। कुछ तो बात जरूरी होगी।। -- अरमानों के आसमान का, ओर नहीं है, छोर नहीं है। दिल से दिल को राहत होती, प्रेम-प्रीत पर जोर नहीं है। जितना चाहो उड़ो गगन में, चाहत कभी न पूरी होगी। कुछ तो बात जरूरी होगी।। -- “रूप”-रंग पर गर्व न करना, नश्वर काया, नश्वर माया। बूढ़ा बरगद क्लान्त पथिक को, देता हरदम शीतल छाया। साजन के द्वारा सजनी की, सजी माँग सिन्दूरी होगी। कुछ तो बात जरूरी होगी।। -- |
मंगलवार, 13 मई 2025
गीत "चाय हमारे मन को भायी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- वही हमारे मन को भाई।। -- कैसे जुड़ा चाय से नाता, मैं इसका इतिहास बताता, शुरू-शुरू में इसकी प्याली, गोरों ने थी मुफ्त पिलाई। वही हमारे मन को भाई।। -- यह जीवन का अंग बनी अब, बहुत चाव से पीते हैं सब, बिना चाय के मेहमानों को, खातिर नहीं समझ में आई। वही हमारे मन को भाई।। -- बच्चों को नहीं दूध सुहाता, चाय देख मन खुश हो जाता, गर्म चाय की चुस्की लेकर, बीच-बीच में मठरी खाई। वही हमारे मन को भाई।।-- |
सोमवार, 7 अप्रैल 2025
गीत "हर समय सुहाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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-- कुछ उसने जाना है, कुछ मैंने जाना है। जीवन को जीने का, बस एक बहाना है।। -- कुछ अच्छा करने को, सब लोग यहाँ आते हैं, रीती गागर लेकर, लेकिन जग से जाते हैं, कुछ पुण्य कमा लो भाई, पूजा-वन्दन करके- गंगा तट पर आकर भी, कुछ नहीं नहाते हैं, किस्मत में जो लिक्खा, उतना ही पाना है। जीवन को जीने का, बस एक बहाना है।। -- मिलता अच्छे कर्मों का, दुनिया में यही सिला, जो खिलकर मुस्काया, उसको ही प्यार मिला, उपवन में आकर भी, ताजगी न जो पाया- बे-वजह रहा करता, कुछ शिकवा और गिला, मत दोष वक्त को दो, हर समय सुहाना है। जीवन को जीने का, बस एक बहाना है।। -- मैंने क्यों ज्यादा पाया, उसने ज्यादा क्यों खोया वैसा ही सबने पाया, है जैसा सबने बोया, मन साफ जरा करके, तन साफ करो अपना- उतना ही साफ दिखा वो, जिसने वस्त्रों को धोया, मन को भक्ति के जल से, हर रोज नहाना है। जीवन को जीने का, बस एक बहाना है।। -- गुलशन हरियाली बिन, लगता वीराना है, उजड़ी बगिया में फिर, कुछ पेड़ लगाना है, पुरखों की खातिर तुम, बन जाओ भगीरथ से- इक और नई गंगा, धरती पे बहाना है। मानवता का हमको, अस्तित्व बचाना है। जीवन को जीने का, बस एक बहाना है।। -- |
रविवार, 30 मार्च 2025
"नूतन नवसम्वत्सर आया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- फिर से उपवन के सुमनों में देखो यौवन मुस्काया है। उपहार हमें कुछ देने को, नूतन सम्वत्सर आया है।। -- उजली-उजली ले धूप सुखद, फिर सुख का सूरज सरसेगा, चौमासे में बादल आकर, फिर उमड़-घुमड़ कर बरसेगा, फिर नई ऊर्जा देने को, नूतन सम्वत्सर आया है।। -- क्रिसमस-दीवाली-ईद, दिलों में खुशियाँ लेकर आयेगी, भूले-बिछुड़ों को अपनों से, आ कर फिर गले मिलायेगी, प्रगति के खुलते द्वार लिए, नूतन सम्वत्सर आया है।। -- पागलपन का उन्माद न हो, हो और न कोई बँटवारा, शस्त्रों की भूख मिटे मन से, फैले जग में भाईचारा, भू का अभिनव शृंगार लिए, नूतन सम्वत्सर आया है।। -- शिक्षा में हो विज्ञान भरा, गुरुओं का आदर-मान रहे, प्राचीन धरोहर बनी रहे, मर्यादा का भी ध्यान रहे, नवल-अमल सुविचार लिए, नूतन सम्वत्सर आया है।। -- शासक अपने खुद्दार बनें, गद्दार न गद्दी को पाये, सारे जग में सबसे अच्छा, गणतन्त्र हमारा कहलाए, झंकृत वीणा के तार लिए, नूतन सम्वत्सर आया है।। -- |
बुधवार, 5 मार्च 2025
गीत "पौत्र प्राँजल का 26वाँ जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- वासन्ती मौसम में उपवन, खुल करके मुस्काया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को, खुशबू से महकाया है।। -- नेह नीर की पावन सरिता, मेरे मन मॆं बहती है, बीससाल से पाँच मार्च की, प्रबल प्रतीक्षा रहती है, मार्च मास सूनी बगिया में, खुशियाँ लेकर आया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को, खुशबू से महकाया है।। -- जैसे मथुरा नगरी चहक रही है, कान्हा-कृष्ण-मुरारी से, वैसे ही गुंजित है मेरा, सदन सहज किलकारी से, सौम्य-सलौना और खिलौना, बालक मैंने पाया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को, खुशबू से महकाया है।। -- बालक होते हैं जिस घर में, वो लगता गहवारा सा, दादा-दादी को तब मिलता, अभिनव एक सहारा सा, शिवजी ने भी इस अवसर पर, डमरू खूब बजाया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को खुशबू से महकाया है।। -- कल के नन्हे पौधे पर, अब नूतन यौवन आया है, पथ पर जाने वालों को, वो देता अपनी छाया है, जन्मदिवस पर शुभ आशीषों का, यह गीत बनाया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को खुशबू से महकाया है।। -- |
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