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जीवन ! दो चक्र कभी सरल कभी वक्र, जीवन ! दो रूप कभी छाँव कभी धूप जीवन! दो रुख कभी सुख कभी दुःख जीवन ! दो खेल कभी जुदाई कभी मेल जीवन ! दो ढंग कभी दोस्ती कभी जंग जीवन ! दो आस कभी तम कभी प्रकाश जीवन ! दो सार कभी नफरत कभी प्यार |
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
‘‘जीवन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
बुधवार, 15 जुलाई 2009
‘‘पानी नदारत है, आने वाली कयामत है?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
सावन का महीना बादलों की आँख-मिचौली और पानी नदारत है, -०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०- चारों ओर सूखा और सिर्फ सूखा प्यासे हैं बाग, तड़ाग, व्यर्थ हो गई सब प्रार्थना और इबादत हैं -०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०- खेतों में उड़ रही है धूल चमन में मुरझा रहे हैं फूल क्या आने वाली कयामत है? -०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०- |
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सोमवार, 13 अप्रैल 2009
"महान टिप्पणीकारों को प्रणाम करता हूँ।" (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
इस पोस्ट को क्या शीर्षक दूँ?
लघु-कथा, हादसा या संस्मरण या शब्द-चित्र।
यदि कोई ब्लागर मित्र सही शीर्षक सुझायें तो उनका बड़ा उपकार होगा।
हिन्दी साहित्य के जाज्वलयमान नक्षत्र महान साहित्यकार
श्री विष्णु प्रभाकर जी के अस्त हो जाने पर कल मैंने अपनी
एक पोस्ट में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए
उन्हें अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि समर्पित की थी।
मेरे एक ब्लागर मित्र ने इस पोस्ट को टिपियाते हुए लिखा था-
‘‘ ............................ शुक्रिया।’’
अब आप स्वयं ही विचार कर लें कि इतना महान साहित्यकार
इस दुनिया से चला गया है। तो उनके लिए श्रद्धांजलि लिखने में
कौन सी विपत्ति आ जाती।
मर जाने जैसे विषय पर "शुक्रिया!"
बहुत खूब।
-०-०--०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
मेरे दूसरे ब्लागर मित्र ने तो कमाल ही कर दिया।
उन्होंने लिख मारा-
‘‘बहुत सुंदर .................. शास्त्री जी को मेरी भी श्रद्धांजलि।’’
इन्होंने तो मुझ जीते-जागते व्यक्ति को ही अपनी श्रद्धांजलि समर्पित कर दी।
खैर, मुझे "शुक्रिया" और "श्रद्धांजलि" दोनो ही स्वीकार हैं।
आशा है आप सभी टिप्पणीकार मुझ पर कृपादृष्टि बनाए रक्खेंगे।
कहिए जनाब!!
कैसी लगी आपको मेरी ये नई पोस्ट?
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