मित्रों!
आज देखिए मेरी दो कुण्डलियाँ
(1)
खोल दो मन की खिड़की
खिड़की खोली जब सुबह,
आया
सुखद समीर।
उपवन में मुझको दिखा, मोती जैसा नीर।। मोती जैसा नीर, घास पर चमक रहा है। सूरज की किरणों में, हीरक दमक रहा है।। कह मयंक कविराय, शीत देता था झिड़की। रवि का है सन्देश, खोल दो मन की खिड़की।।
(2)
बनेंगे सारे अपने
अपने सुर में गा रहे, पंछी अभिनव गीत।
गूँज रहा परिवेश में, कलरव का संगीत।।
कलरव का संगीत, सीख हमको सिखलाता।
यज्ञ-भजन करके, बन जायें सब उदगाता।।
कह मयंक होते हैं, जग में झूठे सपने।
बाँटो कुछ तो प्यार, बनेंगे सारे अपने।।
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बुधवार, 5 दिसंबर 2018
कुण्डलियाँ "मेरी दो कुण्डलियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 9 मार्च 2018
कुण्डलियाँ "कम्प्यूटर और इण्टरनेट" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
सोमवार, 8 मई 2017
कुण्डलियाँ "आज शाखाएँ बहकी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
काम-काम में दिन गया, आयी सुख की रात।।
आयी सुख की रात, मिले आराम बदन को।
भटकाना मत कभी, रात में अपने मन को।।
कह “मयंक” कविराय, उठो सुख-चैन मना कर।
कुछ अभिनव सन्देश, सुनाओ गीत बना कर।।
--
चहकी कोयल बाग में, देख आम पर बौर।
कुदरत के उपहार को, धरती है सिरमौर।।
धरती है सिरमौर, खुशी के गीत सुनाती।
अपने मीठे सुर से, खुशियों को उपजाती।।
कह “मयंक” कविराय, आज शाखाएँ बहकी।
होकर भावविभोर, तभी तो कोयल चहकी।।
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रविवार, 23 अप्रैल 2017
कुण्डलियाँ "कम्प्यूटर और जालजगत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 26 नवंबर 2016
दो कुण्डलियाँ "खोल दो मन की खिड़की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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खिड़की खोली जब सुबह, आया सुखद समीर।
उपवन में मुझको दिखा, मोती जैसा नीर।।
मोती जैसे नीर, घास पर चमक रहा था।
सूरज की किरणों में, हीरक दमक रहा था।।
कह मयंक कविराय, शीत देता था झिड़की।
रवि देता सन्देश, खोल दो मन की खिड़की।।
--
अपने सुर में गी रहे, पंछी अभिनव गीत।
गूँज रहा परिवेश में, कलरव का संगीत।।
यजन-भजन करके, बन जायें सब उदगाता।
कलरव का संगीत, सीख हमको सिखलाता।।
कह मयंक होते हैं, जग में झूठे सपने।
बाँटो तो कुछ प्यार, बनेंगे सारे अपने।।
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शुक्रवार, 8 मई 2015
"दो कुण्डलियाँ-कोयल चहकी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गीत बना कर मैं नया, कहता मन की
बात।
काम-काम में दिन गया, आयी सुख की
रात।।
आयी सुख की रात, करो आराम
ठाठ से।
सपनों में खो जाओ, करो अब बात
खाट से।।
कह “मयंक” कविराय, उठो सुख-चैन मना कर।
कुछ अभिनव सन्देश, सुनाओ गीत बना कर।।
--
चहकी कोयल बाग में, देख आम पर बौर।
कुदरत के उपहार को, धरती हूँ सिरमौर।।
धरती हूँ सिरमौर, खुशी के गीत सुनाऊँ।
अपने मीठे सुर से, खुशियों को उपजाऊँ।।
कह “मयंक” कविराय, आज शाखाएँ बहकी।
होकर भावविभोर, तभी तो कोयल चहकी।।
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मंगलवार, 7 अगस्त 2012
"रक्खो मूछ सँवार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आभूषण हैं वदन का, रक्खो मूछ सँवार, बिना मूछ के मर्द का, जीवन है बेकार। जीवन है बेकार, शिखण्डी जैसा लगता, मूछदार राणा प्रताप, ही अच्छा दिखता, कह ‘मंयक’ मूछों वाले, ही थे खरदूषण , सत्य वचन है मूछ, मर्द का है आभूषण। (२) पाकर मूछें धन्य हैं, वन के राजा शेर, खग-मृग सारे काँपते, भालू और बटेर। भालू और बटेर, केसरि नही कहलाते, भगतसिंह, आजाद मान जन-जन में पाते। कह ‘मयंक’ मूछों से रौब जमाओ सब पर, रावण धन्य हुआ जग में, मूछों को पा कर। (३) मूछें बिकती देख कर, हर्षित हुआ ‘मयंक’, सोचा-मूछों के बिना, चेहरा लगता रंक। चेहरा लगता रंक, खरीदी तुरन्त हाट से, ऐंठ-मैठ कर चला, रौब से और ठाठ से। कह ‘मंयक’ आगे का, मेरा हाल न पूछें, हुई लड़ाई, मार-पीट में, उखड़ गई थी मूछें। |
मंगलवार, 3 मई 2011
"आज फिर दो कुण्डलियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
(१) भारत में आतंक की, आई कैसी बाढ़। भाई अपने भाई से, ठान रहा है राड़।। ठान रहा है राड़, चाल है बदली-बदली। क्यों है कण्टक-ग्रस्त, सलोना पादप कदली। कह मयंक कविराय, हुए सज्जन हैं आरत। कैसे निज सम्मान, पुनः पायेगा भारत?? |
कम्प्यूटर अब बन गया, जन-जीवन का अंग। कलियुग ने बदले सभी, दिनचर्या के ढंग।। दिनचर्या के ढंग, हो गयी दुनिया छोटी। देता है यह यन्त्र, आजकल रोजी-रोटी।। कह मयंक कविराय, यही नवयुग का ट्यूटर। बाल-वृद्ध औ’ तरुण, सीख लो अब कम्प्यूटर।। |
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
"दो कुण्डलियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
(१) जालजगत है देवता, कम्प्यूटर भगवान। शोभा है यह मेज की, ऑफिस की है शान।। ऑफिस की है शान, सजाता अनुबन्धों को। दूर देश में बहुत, बढ़ाता सम्बन्धों को।। कह मयंक कविराय, अनागत ही आगत है। सबसे ज्ञानी अब दुनिया में जालजगत है।। (२) कम्प्यूटर अब बन गया, जीवन का आधार। इसके बिन चलता नही, चिट्ठों का व्यापार।। चिट्ठों का व्यापार, लेख-रचना का आँगन। चिट्ठी-पत्री, बातचीत का है यह साधन।। कह मयंक कविराय, यही है उन्नत ट्यूटर। खाता-बही हटाय, लगाओ अब कम्प्यूटर।। |
बुधवार, 9 मार्च 2011
"कड़वी कुण्डलियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
होली के रंग में, भंग की तरंग में, रंगों की फुहार, छींटे और बौछार सबको अच्छे लगते हैं! इस क्रम में आज प्रस्तुत हैं -
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सोमवार, 7 मार्च 2011
"कुण्डलियाँ के साथ परिभाषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मित्रों! कल भाई कनिष्क कश्यप जी ने कुण्डलिया की पोस्ट लगाने पर पर अपनी टिप्पणी में कहा था- नमन आपका, शास्त्रीजी...उत्तम रचनाएँ... कुण्डलियों की रचना के मूल को समझाएँ तो कृपा होगी...” उन्ही के आदेश का पालन करते हुए अपनी क्षुद्रबुद्धि के अनुसार कुण्डलिया के बारे में अपना मत प्रस्तुत कर रहा हूँ। अधिकांश विद्वान कुण्डलिया छन्द की परिभाषा निम्नवत् देते हैं- कुण्डलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। परन्तु यह मेरी समझ के बाहर है। क्योंकि यह तर्क परिभाषा की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। यह बिल्कुल सत्य है कि कुण्डलिया छन्द का प्रारम्भ दोहे से ही होता है। जिसके प्रथम और तीसरे चरण में 13 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं। परन्तु अन्तिम दो पंक्तियों को हम दोहे की श्रेणी में नहीं रख सकते क्योंकि इसके प्रथम और तीसरे चरण में 11 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। इसे हम सोरठा कह सकते हैं परन्तु दूसरे और अन्तिम चरण के वर्ण दीर्घ होने चाहिएँ। जिससे की छन्द की लय और गेयता बनी रहे। कुण्डलिया छन्द में जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। इसमें कुण्डलिया का बहुत बड़ा रहस्य छिपा है। सत्य तो यह है कि इसी से इसका कुण्डलिया नाम पड़ा है। सर्प जब कुण्डली बना कर बैठता है तो उसका मुँह और पूँछ बिल्कुल पास में होते हैं। सम्भवतः काव्यशास्त्र के मनीषियों ने यह देख कर ही इसका नाम कुण्डलिया रखा होगा और इसकी उत्पत्ति की होगी। आज भी प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वरचित दो कुण्डलियाँ! (1) केशर-क्यारी को सदा, स्नेह सुधा से सींच। पुरुष न होता उच्च है, नारि न होती नीच।। नारि न होती नीच, पुरुष की खान यही है। है विडम्बना फिर भी इसका मान नहीं है।। कह ‘मयंक’ असहाय, नारि अबला-दुखियारी। बिना स्नेह के सूख रही यह केशर-क्यारी।। (2) दिल मिल जाएँ दिलों से, समझो तभी बसन्त। पल-प्रतिपल मधुमास है, समझो आदि न अन्त।। समझो आदि न अन्त, खिलेंगे सुमन मनोहर। रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर।। कह ‘मयंक’ कविराय, हृदय में चाह जगाएँ। ऐसे करें उपाय, जगत में दिल मिल जाएँ।। |
सोमवार, 16 मार्च 2009
मूछ वाणी । (कुण्डलियाँ छन्द में कुछ पुरानी रचनाऐं) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)
(१)
आभूषण हैं वदन का, रक्खो मूछ सँवार,
बिना मूछ के मर्द का, जीवन है बेकार।
जीवन है बेकार, शिखण्डी जैसा लगता,
मूछदार राणा प्रताप, ही अच्छा दिखता,
कह ‘मंयक’ मूछों वाले, ही थे खरदूषण ,
सत्य वचन है मूछ, मर्द का है आभूषण।
(२)
पाकर मूछें धन्य हैं, वन के राजा शेर,
खग-मृग सारे काँपते, भालू और बटेर।
भालू और बटेर, केसरि नही कहलाते,
भगतसिंह, आजाद मान, जन-जन में पाते।
कह ‘मयंक’ मूछों से रौब जमाओ सब पर,
रावण धन्य हुआ जग में, मूछों को पा कर।
(३)
मूछें बिकती देख कर, हर्षित हुआ ‘मयंक’,
सोचा-मूछों के बिना, चेहरा लगता रंक।
चेहरा लगता रंक, खरीदी तुरन्त हाट से,
ऐंठ-मैठ कर चला, रौब से और ठाठ से।
कह ‘मंयक’ आगे का, मेरा हाल न पूछें,
हुई लड़ाई, मार-पीट में, उखड़ गई थी मूछें।
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“ हिन्दी में रेफ लगाने की विधि ” अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्र...









