नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' -- मीत बेशक बनाओ बहुत से मगर, मित्रता में शराफत की आदत रहे। स्वार्थ आये नहीं रास्ते में कहीं, नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- भारती का चमन आप सिंचित करो, भाव मौलिक भरो, शब्द
चुनकर धरो, काल को जीत लो अपने ऐमाल से, गीत में सुर की धारा सलामत रहे। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- आपकी बात से, ज्ञान
गंगा बहे, मन में उल्लास हो, गात चंगा
रहे, बन्दगी में दिखावा कभी मत करो, आशिकी में भी शुचिता सलामत रहे। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- मत घमण्डी बनो, बैर को
छोड़ दो, जिन्दगी सादगी की, तरफ मोड़
दो, ढाई आखर का है बस यही फलसफा, आदमीयत का ज़ज़्बा सलामत रहे।। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- दिलरुबा नेह का धर्म तो जान लो, आप अच्छा-बुरा कर्म तो जान लो, ‘रूप’ दरिया
नहीं एक तालाब है, साथ सूरत के सीरत सलामत रहे। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- |
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सोमवार, 16 दिसंबर 2024
प्रकाशन "साहित्यसुधा पाक्षिक पत्रिका में मेरा गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 12 जनवरी 2023
प्रकाशन "ग़ज़ल-परिन्दे आ गये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- जंगलों में जब दरिन्दे आ गये। मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।। -- पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से, जिन्दगी महरूम क्यों है प्यार से? क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये? मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।। -- हो गया क्यों बे-रहम भगवान है? हो गया नीलाम क्यों ईमान है? हबस में मशगूल बन्दे आ गये। मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।। -- जुल्म की जो छाँव में हैं जी रहे, जहर को अमृत समझकर पी रहे, उनको भी अब दाँव-फन्दे आ गये। मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।। -- |
शुक्रवार, 6 जनवरी 2023
गुरुवार, 5 जनवरी 2023
प्रकाशन "बालगीत-सबका हाड़ कँपाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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-- कल केवल कुहरा आया था, अब बादल भी छाया है। हाय भयानक इस सर्दी ने, सबका हाड़ कँपाया है।। भीनी-भीनी पड़ी फुहारें, झीना-झीना उजियारा। आग सेंकता सरजू दादा, दिन में छाया अँधियारा। कॉफी और चाय का प्याला, सबसे ज्यादा भाया है। हाय भयानक इस सर्दी ने, सबका हाड़ कँपाया है।। -- आलू और शकरकन्दी भी, सबके मन को भाते हैं। गर्म-गर्म गाजर का हलवा, खुश होकर सब खाते हैं। कम्बल-लोई और कोट से, कोमल बदन छिपाया है। हाय भयानक इस सर्दी ने, सबका हाड़ कँपाया है।। -- हीटर-गीजर और अँगीठी, गज़क, रेवड़ी-मूँगफली। गर्म समोसे, टिक्की-डोसा, अच्छी लगती हैं इडली। मौसम के अनुकूल बया ने, अपना नीड़ बनाया है। हाय भयानक इस सर्दी ने, सबका हाड़ कँपाया है।। -- |
रविवार, 25 दिसंबर 2022
प्रकाशन "ग़ज़ल-पहाड़ों के ढलानों पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- बनाये नीड़ हैं हमने, पहाड़ों के मचानों पर उगाते फसल अपनी हम, पहाड़ों के ढलानों पर -- मशीनों से नहीं हम हाथ से रोज़ी कमाते हैं नहीं हम बेचते गल्ला, लुटेरों को दुकानों पर -- बशर करते हैं अपनी ज़िन्दग़ी, दिन-रात श्रम करके वतन के वास्ते हम जूझते, दुर्गम ठिकानों पर -- हमारे दिल के टुकड़े, होटलों में माँजते बर्तन बने दरबान कुछ लड़के, सियासत के मुकामों पर -- पहाड़ी "रूप" की अपने, यही असली कहानी है हमारी तो नहीं गिनती, चमन के पायदानों पर -- |
शनिवार, 12 नवंबर 2022
प्रकाशन "मेरी ग़ज़ल-जय विजय-नवम्बर, 2022" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- आम, जामुन, नीम-शीशम, जल गये हैं आग में कुछ कँटीले पेड़ ही अब, रह गये हैं बाग में -- सुमन तो मुरझा गये हैं, सिर्फ काँटे ही बचे, प्रीत पहले सी नहीं, अब तो रही अनुराग में -- बढ़ रहे हैं आज जंगल, कंकरीटों के यहाँ खेत घटते जा रहे हैं, उर्वरा भूभाग में -- थक गया है हाथ-हाथी, आप आगे बढ़ रहा कमल फिर भी खिल रहे हैं, आज दीन तड़ाग में -- कंटकों की सेज पर, सुख की तमन्ना क्या करें उम्र सारी कट गयी अब, सिर्फ भागम-भाग में -- ताल जब बेताल हो तो, सुर भला कैसे सधे खो गया संगीत देशी, शोर वाले राग में -- लग रही अन्धेर नगरी, और चौपट काज है खा रहे बदमाश काजू, विश्व के अनुभाग में -- बाँटती ठण्डक सभी को, चन्द्रमा की चाँदनी किन्तु मैला हो रहा है, “रूप” अब तो दाग में -- |
शनिवार, 30 जुलाई 2022
"मेरे दोहे-दोहा दंगल में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अमर शहीदों का कभी, मत करना अपमान। किया इन्दोंने देशहित, अपना तन बलिदान।। जीवन तो त्यौहार है, जानों इनका सार। प्यार और मनुहार से, बाँटो कुछ उपहार।। जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार। दौलत से मत तौलना, पावन प्यार-दुलार।। गौमाता से ही मिले, दूध-दही-नवनीत। सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।। कैमीकल का उर्वरक, कर देगा बरबाद। खेतों में डालो सदा, गोबर की ही खाद।। कुटिया-महलों में जलें, जगमग-जगमग दीप। सरिताओं के रेत में, मोती उगले सीप।। पथ में मिलते रोज ही, भाँति-भाँति के लोग। तब ही होती मित्रता, जब बनता संयोग।। रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख। जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।। सरिता और तड़ाग के, सब ही जाते तीर। मगर आचमन के लिए, गंगा का है नीर।। शिशुओं की किलकारियाँ, गूँजें सबके द्वार। बेटा-बेटी में करो, समता का व्यवहार।। चाहे कोई वार हो, कोई हो तारीख। संस्कार देते हमें, कदम-कदम पर सीख।। तोड़ रही दम सभ्यता, आहत हैं परिवेश। पुस्तक तक सीमित हुए, सन्तों के सन्देश।। झेल नहीं पाया मनुज, कभी समय का वार। ज्ञानी-राजा-रंक भी, गये समय से हार।। कभी रूप की धूप पर, मत करना अभिमान। डरकर रहना समय से, समय बड़ा बलवान।। सच्ची होती मापनी, झूठे सब अनुमान। ताकत पर अपनी नहीं, करना कुछ अभिमान।। |
शनिवार, 5 दिसंबर 2020
बालकविता "जय विजय-अच्छे-अच्छे काम करूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मैं अपनी मम्मी-पापा के, नयनों का हूँ नन्हा-तारा। मुझको लाकर देते हैं वो, रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।। -- मुझे कार में बैठाकर, वो रोज घुमाने जाते हैं। पापा जी मेरी खातिर, कुछ नये खिलौने लाते हैं।। -- मैं जब चलता ठुमक-ठुमक, वो फूले नही समाते हैं। जग के स्वप्न सलोने, उनकी आँखों में छा जाते हैं।। -- ममता की मूरत मम्मी-जी, पापा-जी प्यारे-प्यारे। मेरे दादा-दादी जी भी, हैं सारे जग से न्यारे।। -- सपनों में सबके ही, सुख-संसार समाया रहता है। हँसने-मुस्काने वाला, परिवार समाया रहता है।। -- मुझको पाकर सबने पाली हैं, नूतन अभिलाषाएँ। क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा, उनकी सारी आशाएँ।। -- मुझको दो वरदान प्रभू! मैं सबका ऊँचा नाम करूँ। मानवता के लिए जगत में, अच्छे-अच्छे काम करूँ।। -- |
शनिवार, 3 अक्टूबर 2020
बालगीत "राम सँवारे बिगड़े काम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हनुमानगढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित बालपत्रिका "टाबर टोली" में मेरा बालगीत प्रधानसम्पादक आदरणीय "दीन दयाल शर्मा जी" का आभार। राम नाम है सुख का धाम।राम सँवारे बिगड़े काम।। असुर विनाशक, जगत नियन्ता, मर्यादापालक अभियन्ता, आराधक तुलसी के राम। राम सँवारे बिगड़े काम।। मात-पिता के थे अनुगामी, चौदह वर्ष रहे वनगामी, किया भूमितल पर विश्राम। राम सँवारे बिगड़े काम।। कपटी रावण मार दिया था लंका का उद्धार किया था, राम नाम में है आराम। राम सँवारे बिगड़े काम।। जब भी अन्त समय आता है, मुख पर राम नाम आता है, गांधी जी कहते हे राम! राम सँवारे बिगड़े काम।। |
शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
बालकविता "पर्वत से बह निकले धारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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रिमझिम-रिमझिम पड़ीं फुहारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।
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तन-मन में थी भरी पिपासा,
धरती का था आँचल प्यासा,
झुलस रहे थे पौधे प्यारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।
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आँधी आई, बिजली कड़की,
जोर-जोर से छाती धड़की,
अँधियारे ने पाँव पसारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।
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जल की मोटी बूँदें आयी,
चौमासे ने अलख जगाई,
खुशी मनाते बालक सारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।
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अब मौसम हो गया सुहाना,
आम रसीले जमकर खाना,
पर्वत से बह निकले धारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।
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सोमवार, 22 जून 2020
प्रकाशन "रिमझिम वाले भादो-सावन नहीं रहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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महक लुटाते कानन पावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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आज आदमी में मानवता सुप्त हुई
गौशालाएँ भी नगरों से लुप्त हुई
दाग लगे हैं आज चमन के दामन में
वैद्यराज सा नीम नहीं है आँगन में
ताल और लय मनभावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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यौवन आने से पहले सूखी डाली
लुटी-पिटी सी है पेड़ों की हरियाली
कौन करेगा आज चमन की रखवाली
बने हुए खुदगर्ज आज वन के माली
कृष्णचन्द्र के अब वृन्दावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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इन्द्रधनुष ने रंग बदलने छोड़ दिये
इतिहासों के पृष्ठ पलटने छोड़ दिये
रीत-रिवाज पुराने हमने छोड़ दिये
भारतीय परिधान पहनने छोड़ दिये
रिमझिम वाले भादो-सावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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शिक्षा का अब है अकाल विद्यालय में
मस्त हो रही नई पौध मदिरालय में
दादा-दादी पड़े हुए वृद्धालय में
घर के मसले तय होते न्यायालय में
देवतुल्य पर्वत के पाहन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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