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शनिवार, 30 नवंबर 2019

संस्मरण "काठी का दर्द" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


       उन दिनों मेरे दोनों पुत्र बहुत छोटे थे। तब अक्सर पिकनिक का कार्यक्रम बन जाता था। कभी हम लोग पहाड़ पर श्यामलाताल चले जाते थे, कभी माता पूर्णागिरि देवी के मन्दिर में माथा टेकने चले जाते थे और कभी नेपाल के शहर महेन्द्रनगर में घूम आते थे। यहाँ से 20-25 किमी की दूरी पर गुरू नानक साहिब का विशाल गुरूद्वारा "नानकमत्ता साहिब" भी है कभी-कभी वहाँ भी मत्था टेक आते थे। 
        अब तो नानकमत्ता में 5 कमरों का एक घर भी बना लिया है। जब तक पिता जी समर्थ थे तब तक इसमें तपस्थली विद्यापीठ के नाम से एक छोटे बालकों का विद्यालय भी वो चलाते थे। तब से यह क्रम अभी तक जारी है। अक्सर रविवार के दिन तो हम लोग कहीं न कहीं घूमने जाते ही हैं।
अब एक पौत्र और एक पौत्री हो गये हैं तो अक्सर पिकनिक के कार्यक्रम बन ही जाते हैं।
      लगभग 10 वर्ष पूर्व की बात है। एक दिन मन में यह विचार आया कि इस बार कार से नेपाल की सैर करने नही जायेंगे। कार सिर्फ बनबसा तक ही ले जायेंगे। उसके बाद घोड़े ताँगे से नेपाल जायेंगे।
      इतवार का दिन था। हम लोग कार से बनबसा तक गये और वहाँ से 400रुपये में आने जाने के लिए घोड़ा ताँगा कर लिया और चारों ओर का नजारा देखते हुए नेपाल के महेन्द्रनगर जा पहुँचे। वहाँ पर घने पेड़ों के बीच सिद्धबाबा का एक प्राचीन मन्दिर है। हमने वहाँ पर प्रसाद चढ़ा कर भोजन किया। फिर थोड़ा आराम करके घोड़े-ताँगें मे सवार हो गये। इस अलौकिक सवारी में बैठ कर खास तौर से बच्चे बहुत खुश थे।
     घोड़ा-ताँगा अपनी मस्त चाल से चलता जा रहा था परन्तु उसका मालिक घोड़े को चाबुक मार ही देता था। मैंने उसे एक-दो बार टोका ता वह बोला-
     ‘‘बाबू जी! घोड़े को बीच-बीच में चाबुक लगानी ही पड़ती है।’’
     यह घोड़ा-वान इस घोड़े को अक्सर बारातों में भी घुड़-चढ़ी के लिए भी इस्तेमाल करता था और उसकी पीठ पर काठी बड़ी जोर से कस कर बाँधता था। संयोगवश् एक बार मैंने इसे घोड़े को इतनी जोर से काठी बाँधते हुए देख लिया था।
     मैंने इससे कहा भी कि भाई इतनी जोर से घोड़े को कस कर काठी मात बाँधा करो।
     इस पर उसने अपना तर्क दिया-
    ‘‘बाबू जी! घोड़े का तंग और आदमी का अंग कस का ही बाँधा जाता है।’’
     बात आई गयी हो गयी। एक दिन मैं बनबसा गया तो पता लगा कि सुलेमान तांगेवाले की कमर की हड्डी क्रेक हो गयी हैं। पुरानी जान-पहचान होने के कारण मैं उसे देखने के लिए उसके घर चला गया। वहाँ जाकर मैंने देखा कि सुलेमान भाई की पीठ में काठीनुमा एक बेल्ट कस कर बँधी हुई है।
     मुझे देख कर उसकी आँखों में आँसू आ गये वह बोला- ‘‘बाबू जी! करनी भरनी यहीं पर हैं। 
बाबू जी! आपने ठीक ही कहा था। 
अब मुझे अहसास होता है कि 
काठी का दर्द क्या होता है?
     कभी मैं घोड़े को काठी कस कर बाँधता था। आज मुझे कस का काठी बाँध दी गयी है।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

दोहे "ठिठुर रहा है गात" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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बादल नभ में छा गये, शुरू हुई बरसात।
अन्धकार ऐसा हुआ, जैसे श्यामल रात।।
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अकस्मात सरदी बढ़ी, निकले कम्बल-शाल।
पर्वत के भूभाग में, जीना हुआ मुहाल।।
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पर्वत पर दिनभर हुआ, खूब आज हिमपात।
किट-किट बजते दाँत हैं, ठिठुर रहा है गात।।
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मैदानी भू-भाग में, ओलों की बरसात।
तेज हवाएँ बाँटती, जाड़े की सौगात।।
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रात ढली सूरज उगा, खिला सुबह का रूप।
सेंक रहे हैं लोग अब, बाहर बैठे धूप।।
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धूल-धुन्ध सब धुल गयी, निर्मल है परिवेश।
सारे जग से अलग है, अपना भारत देश।।
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दूध नहीं अच्छा लगे, अच्छी लगती चाय।
नया जमाना लिख रहा, नये-नये अध्याय।।
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गुरुवार, 28 नवंबर 2019

कुण्डलियाँ "तिगड़ी की खिचड़ी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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तिगड़ी की खिचड़ी पकी, रचा नया इतिहास।
सत्ता पाने के लिए, छत्रप आये पास।।
छत्रप आये पास मिलाकर सुर में सुर को।
नये खिलाड़ी को सिखलाते सारे गुर वो।।
कह मयंक कविराय, सुधारी बाजी बिगड़ी।
देखें कब तक रहे साथ, दल-बल की तिगड़ी।।
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कभी जुदायी हो जहाँ, कभी जहाँ हो मेल।
होता है शह-मात का, राजनीति का खेल।।
राजनीति का खेल खेलते निपट अनाड़ी।
जो जीता वो ही कहलाता बड़ा खिलाड़ी।।
कह मयंक कविराय सियासत है दुखदायी।
कभी मिलन की घड़ी और है कभी जुदायी।।
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बुधवार, 27 नवंबर 2019

दोहे "उद्धव की सरकार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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फड़नवीस सरकार की, बन्द हो गयी राह।
असमंजस में हैं पड़े, मोदी-नड्डा-शाह।।
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बाला साहब का हुआ, सपना अब साकार।
राजनीति के खेल में, गयी भा.ज.पा. हार।।
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छल की नौका से भला, कौन हुआ है पार।
जब आये मझधार में, टूट गयी पतवार।।
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तुरुप चाल अपनी चले, छत्रप शरद पवार।
महाराष्ट्र में आ गयी, उद्धव की सरकार।।
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बीच धार में छोड़कर, भागे अजित पवार।
सत्ता पाने के सभी, बन्द कर दिये द्वार।।
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दाँव सभी उलटे पड़े, पलट गयी है चाल।
तीन दिनों के बाद में, उजड़ गयी चौपाल।।
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आगे-आगे देखिए, क्या होगा यजमान।
बदल सका कोई नहीं, कुदरत का फरमान।।
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पहन लिया है शीश पर, शिव सेना ने ताज।
हँसी-खेल मत समझना, शासन की परवाज।।
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गीत "पंक से मैला हुआ है आवरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सभ्यताशालीनता के गाँव में
खो गया जाने कहाँ है आचरण
कर्णधारों की कुटिलता देखकर
देश का दूषित हुआ वातावरण।
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सुर हुए गायबमृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान कीसम्मान में,
आब खोता जा रहा अन्तःकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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लग रहे घट हैं भरेपर रिक्त हैं,
लूटने में राज कोसब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ है आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

संस्मरण "हम पहाड़ी मनीहार हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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     आज सुबह–सुबह मेरे आयुर्वेदिक चिकित्सालय में गठिया-वात का इलाज कराने के लिए जाहिद हुसैन पधारे!
      जाहिद हुसैन जब अपनी औषधि ले चुके तो मुझसे बोले - “सर! आप देसी हैं या पहाड़ी हैं।”  
     मैंने उत्तर दिया - “50 साल से ज्यादा समय से तो यहीं पहाड़ की तराई में रह रहा हूँ। फिर यह देशी-पहाड़ी की बात कहाँ से आ गई?” 
     अब मुझे भी जाहिद हुसैन के बारे में जानने की उत्सुकता हुई! मैंने इनसे पूछा- “अच्छा अब तुम बताओ कि तुम देशी हो या पहाड़ी।” 
 जाहिद हुसैन ने कहा- “सर जी! हम तो पहाड़ी हैं।”  
        अब चौंकने की बारी मेरी थी।  
      मैंने इनसे पूछा- “अच्छा तो यह बतलाइए कि तुम्हारे घर में आपस में सब लोग पहाड़ी भाषा में बात करते हैं या मैदानी भाषा में।”  
      जाहिद हुसैन ने बतलाया- “सर जी! हम लोग घर में आपस में पहाड़ी भाषा में बात-चीत करते हैं।”   
     मैंने पूछा- “तो क्या तुम मूल निवासी पहाड़ के ही हो?”  
      जाहिद हुसैन ने कहा- “सर जी! हमारे पुरखे यानि 5-7 पीढ़ी पहले के लोग राजस्थान के रहने वाले थे। जो बाद में दिल्ली में आकर बस गये थे। आपने गली मनीहारान का नाम सुना होगा। आज भी हमार बहुत से रिश्तेदार वहीं रहते हैं। 
        कुमाऊँ के चन्द राजा की शादी राजस्थान में हुई थी। उनकी दुल्हिन रानी रानी साहिबा को चूड़ी पहनाने के लिए मनीहार के रूप में हम लोग साथ आये थे।” मैंने पूछा कि तुम्हारे पूर्वज चूड़ी पहनाने के बाद वापिस राजस्तान या दिल्ली क्यों नहीं चले गये थे? 
      जाहिद हुसैन ने कहा- “सर जी! राजे-महाराजों की बात आप क्या पूछते हो? रानी को हमारे पुरखे सुबह को चूड़ियाँ पहनाते थे रात को रनिवास में राजा के साथ रास लीला में रानी की चूड़ियाँ टूट जाती थीं तो सुबह को फिर रानी नई चूड़ियाँ पहनती थी।”  
      उसने आगे कहा- “इसलिए तत्कालीन  चन्द राजा ने स्थायीरूप से कुछ मनीहारों को दिल्ली से पहाड़ में बुला लिया और उनके रहने के लिए एक गाँव और उसके आस-पास का इलाका खेती करने के लिए दे दिया।”  
      मैंने पूछा- “जाहिद हुसैन! क्या आज भी पहाड़ में आपका कोई गाँव है?”  
     जाहिद हुसैन ने फरमाया- “जी सर! चम्पावत से 7 किमी आगे लोहाघाट की ओर पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राज मार्ग-125 पर “खूना मलिक” के नाम से एक गाँव है। वही हमारा प्राचीन पहाड़ी गाँव है। जिसमें आज भी केवल मनीहार लोग ही निवास करते हैं ।”  
     अच्छा जाहिद हुसैन यह बतलाओ कि टनकपुर के पास “मनीहार-गोठ” के नाम से जो आपका गाँव है उसका इतिहास क्या है?  
    जाहिद हुसैन ने कहा- “सर जी! पहले पहाड़ों पर आने-जाने के साधन नहीं थे। इसलिए हम लोग जब अपने मूल निवास राजस्थान जाया करते थे तो पहाड़ से नीचे मैदान में आने पर 1-2 दिन यहाँ आराम किया करते थे। बाद में इसका नाम मनीहार-गोठ पड़ गया और इसके आस-पास की भूमि पर हमारे पुरखे खेती करने लगे। आज भी हर एक मनीहार परिवार की भूमि और घर “मनीहार-गोठ” और “खूना मलिक” में भी है।” 
"इसीलिए सर! मैंने आपको बतलाया है कि 
हम लोग पहाड़ी हैं 
और इस्लाम मज़हब को मानने वाले हैं।”

सोमवार, 25 नवंबर 2019

दोहे "मन में पसरा मैल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जनसेवा के नाम पर, मन में पसरा मैल।
निर्धन श्रमिक-किसान तो, कोल्हू के हैं बैल।।
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छँटे हुए सब नगर के, बन बैठे गुणवान।  
पत्रकारिता में बचे, कम ही अब विद्वान।।
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जो समाज की नजर में, कभी रहे बेकार।
वो अब अपने देश में, चला रहे अखबार।।
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पत्रकारिता में हुआ, गोल आज किरदार।
विज्ञापन के नाम पर, चमड़ी रहे उतार।।
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नाजायज जायज बना, करते रकम वसूल।
आय-आय के नाम पर, बिकते आज उसूल।।
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बैतरणी में नरक की, कोई नहीं अनाथ।
राजनीति की मीन पर, मगरमच्छ का हाथ।।
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छुटभइये हों या बड़े, सबकी है अब मौज।
बढ़ती जाती देश में, बाबाओं की फौज।।
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रविवार, 24 नवंबर 2019

गीत "कारा में सच्चाई बन्द है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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तन्त्र अब खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।
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कंस हो गये कृष्ण आज,
मक्कारी से चल रहा काज,
भक्षक बन बैठे यहाँ बाज,
महिलाओं की लुट रही लाज,
तन्त्र अब खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।
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जहाँ कमाई हो हराम की
लूट वहाँ है राम नाम की,
महफिल सजती सिर्फ जाम की
बोली लगती जहाँ चाम की,
तन्त्र अब खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।
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जहरीली बह रही गन्ध है,
जनता की आवाज मन्द है,
कारा में सच्चाई बन्द है,
गीतों में अब नहीं छन्द है,
तन्त्र अब खटक रहा है।
सुदामा भटक रहा है।।
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शनिवार, 23 नवंबर 2019

दोहे "अंकगणित के अंक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सागर में रखना नहीं, किसी जीव से बैर।
राम नाम के जाप से, पाहन जाते तैर।।
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एक रात में गुम हुए, अंकगणित के अंक।
आज वही राजा बने, कल तक थे जो रंक।।
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कौन यहाँ खुद्दार है, और कौन गद्दार।
लड्डू पाता है वही, जो होता मक्कार।।
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राजनीति में आज भी, चलता यही रिवाज।
जोड़-तोड़ जो कर सके, वो ही पाता ताज।।
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हारे बल के सामने, पूजा-जप अरदास।
उसकी होती भैंस है, लाठी जिसके पास।।
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कल तक जो बैरी रहे, आज बन गये मित्र।
अच्छे-अच्छों के यहाँ, बिकते रोज चरित्र।।
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इस असार संसार में, सब दौलत का खेल।
धनवानों के खेत में, फलती धन की बेल।।
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दोहे "जनमानस लाचार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जगह-जगह पर हैं लगीं, लोगों की चौपाल।
सियासती रुख देखकर, होता बहुत मलाल।।
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सियासती दरवेश अब, नहीं रहे अनुकूल।
मजबूरी में भा रहे, नागफनी के फूल।।
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फूलों के बदले मिले, जनता को तो शूल।
नये ढंग से हो रहे, वादे ऊल-जुलूल।।
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राजनीति के आज तो, बदल गये हैं अर्थ।
उपयोगी वो बन गये, जो लगते थे व्यर्थ।।
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कैसे रक्खें सन्तुलन, थमता नहीं उबाल।
खाली मन शैतान का, करता बहुत बवाल।।
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भूखी जनता खा रही, भाषण लच्छेदार।
अब बहरी सरकार में, जनमानस लाचार।।
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