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बुधवार, 15 अगस्त 2018

दोहे "नागपंचमी-तीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नागपञ्चमी-हरेला, रक्षाबन्धन-तीज।
घर-घर में बनते यहाँ, व्यञ्जन आज लजीज।१।
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श्रावण शुक्ला पञ्चमी, बहुत खास त्यौहार।
नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार।२।
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महादेव ने गले में, धारण करके नाग।
विषधर कण्ठ लगाय कर, प्रकट किया अनुराग।३।
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दुनिया को अमृत दिया, किया गरल का पान।
जो करते कल्याण को, उनका होता मान।४।
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अद्भुत अपनी सभ्यता, अद्भुत अपना देश।
दया-धर्म के साथ में, सजा हुआ परिवेश।५।
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खग-मृग, हिल-मिल कर रहे, दुनिया रहे निरोग।
नागदेव रक्षा करें, निर्भय हों सब लोग।६।
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पूरी निष्ठा से करो, अपने-अपने कर्म।
जीवों पर करना दया, सिखलाता है धर्म।७।
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मन्दिर-मस्जिद-चर्च की, नहीं हमें दरकार।
पंडित-मुल्ला-पादरी, बने न ठेकेदार।८।
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जो कण-कण में रम रहा, वो है मालिक एक।
धर्मपरायण सब रहें, बने रहें सब नेक।९।
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मन में कभी न लाइए, ऊँच-नीच का भेद।
नौका में करना नहीं, जान-बूझ कर छेद।१०।
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वैज्ञानिकता से भरा, पर्वों का विन्यास।
देते हैं जो ऊर्जा, लाते हैं उल्लास।११।

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

दोहे "स्वतन्त्रता का मन्त्र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
मुशकिल से हमको मिला, आजादी का तन्त्र।
सबको जपना चाहिए, स्वतन्त्रता का मन्त्र।।

आजादी के साथ में, मत करना खिलवाड़।
तोड़ न देना एकता, ले मजहब की आड़।।

मत-मजहब या जाति का, नहीं किया अभिमान।
आजादी के समर में, हुए सभी बलिदान।।


दुनिया में विख्यात है, भारत का जनतन्त्र।
 लोकतन्त्र के साथ में, मत करना षड़यन्त्र।।

मुरझाने मत दीजिए, प्रजातन्त्र की बेल।
आपस में रखना यहाँ, भाईचारा-मेल।।

कई दशक के बाद अब, सुधर रहा परिवेश।
विकसित होता जा रहा, अपना भारत देश।। 

बिना शस्त्र संधान के, मिला देश को मान।
आज विदेशों में बढ़ी, निज भारत की शान।।

उस शासक को नमन है, जिसने किया कमाल।
दुनिया भर में योग का, दीप दिया है बाल।।

शासक अपने देश का, करते ऊँचा नाम।
नतमस्तक होकर करें, सारे देश सलाम।। 

सोमवार, 13 अगस्त 2018

दोहे "काँटे और गुलाब" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सीमाओं पर हो रहा, बद से बदतर हाल। 
रोज काल है लीलता, माताओं के लाल।।

जनमानस की है यहाँ, याददाश्त कमजोर। 
इसीलिए हैं जीतते, लोकतन्त्र में चोर।।

नेताओं की बात से, जनता में है रोष। 
एक दूसरे पर सभी, लगा रहे हैं दोष।।

शस्यश्यामला धरा से, नष्ट हो रहे फूल। 
उपवन में उगने लगे, चारों ओर बबूल।।

धरती पर सूखा पड़े, या आये सैलाब। 
साथ-साथ फिर भी रहें, काँटे और गुलाब।।

रविवार, 12 अगस्त 2018

दोहे "सावन की है तीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सावन आया झूम के, रिमझिम पड़ें फुहार।
धानी धरती ने किया, हरा-भरा सिंगार।।

आते सावन मास में, कई बड़े त्यौहार।
उत्सव प्राणीमात्र के, जीवन के आधार।।

साजन सजनी के लिए, होते बहुत अजीज।
गिरिजा-शंकर का मिलन, याद दिलाती तीज।।

घर-आँगन झूले पड़े, सावन की है तीज।
बनते हैं इस वर्व पर, व्यंजन बहुत लजीज।।

मेंहदी हाथों में रचा, कितनी खुश हैं नार।
बिन्दी माथे पर लगा, रिझा रही भरतार।।

धान खेत में झूमते, चलता मस्त समीर।
झील-सरोवर, ताल में, भरा हुआ है नीर।।

चौमासे में गाँव की, चहक रही चौपाल।
काम-धाम कुछ भी नहीं, ठन-ठन है गोपाल।।

तन के शोधन के लिए, आवश्यक उपवास।
श्रवण-मनन के ही लिए, होता है चौमास।।  

शनिवार, 11 अगस्त 2018

दोहे "गुर्गे देते बाँग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जब से सत्ता में बढ़ी, शैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते बाँग।।
--
हुए नशे में चूर सब, पड़ी कूप में भाँग।
एक दूसरे की सभी, खीँच रहे हैं टाँग।।
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संसद में सब गा रहे, अपने-अपने गीत।
यहाँ निठल्ले खा रहे, ठूँस-ठूँस नवनीत।।
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बाहर बने कपोत से, भीतर से सब काग।
मात्र दिखावे के लिए, अलग-अलग हैं राग।।
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केँचुलियों में ढक लिए, सबने काले दाग।
डसने को अब देश को, आये आदम नाग।।
--
आज पिशाचों की हुई, दल-दल में भरमार।
थामी सबने हाथ में, छल-बल की पतवार।।
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उनकी पूजा हो रही, जिनके खोटे कर्म।
राजनीति की कैद में, पड़ा हुआ अब धर्म।।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

गीत "लगी है झड़ी सावन की" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

चमकती बिजुरिया चपला,
गगन में मेघ हैं छाये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।

धरा की घास थी सूखी,
त्वचा थी राख सी रूखी,
हुई घनघोर जब बारिस,
नदी-नाले उफन आये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।।

दिवस में छिप गया सूरज,
दबा माटी का उड़ता रज,
किसानों के लिए बादल,
सुधा का जाम ले आये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।।

लगी है झड़ी सावन की,
जगी है आग विरहिन की,
मिलन की आस में उनके,
हृदय के कुसुम मुरझाये।
मिटाने प्यास धरती की,
जलद जल धाम ले आये।।

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

दोहे "कर लेना कुछ गौर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लोगों मेरी बात पर, कर लेना कुछ गौर।
ठण्डा करके खाइए, भोजन का हर कौर।।

अफरा-तफरी में नहीं, होते पूरे काम।
मनोयोग से कीजिए, अपने काम तमाम।।

कर्मों से ही भाग्य का, बनता है आधार।
कर्तव्यों के बिन नहीं, मिलते हैं अधिकार।।

देकर पानी-खाद को, फसल करो तैयार।
तब विचार से लाभ क्या, जब हो उपसंहार।।

बैरी की उसको नहीं, अब कोई दरकार।
जिसके घर को लूटते, उसके ही सरदार।।

बुधवार, 8 अगस्त 2018

दोहे "राजनीति के सन्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बनी हुई सम्भावना, नियमित-नित्य अनन्त।
गली-हाट में बिक रहे, राजनीति के सन्त।

नेता बनकर कर रहे, लोग घिनौने काम।
इसीलिए तो हो रहा, लोकतन्त्र बदनाम।।

बाहर बने कपोत से, भीतर से सब काग।
मात्र दिखावे के लिए, अलग-अलग हैं राग।।

जब से सत्ता में बढ़ी, शैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते बाँग।।

हुए नशे में चूर सब, पड़ी कूप में भाँग।
एक दूसरे की सभी, खीँच रहे हैं टाँग।।

केँचुलियों में ढक लिए, सबने काले दाग।
डसने को अब देश को, आये आदम नाग।।

  आज पिशाचों की हुई, दल-दल में भरमार।
थामी सबने हाथ में, छल-बल की पतवार।।

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

दोहे "सावन का उपहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सावन आने पर धराकरती है शृंगार।
हरा-भरा परिवेश हैसावन का उपहार।१।
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चोटी-बिन्दी-मेंहदीआपस में बतियाय।
हर्ष और अनुराग मेंसुहागिनें बौराय।२।
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तीजों के त्यौहार पर, कर सोलह सिंगार।
आज नारियाँ हर्ष सेगातीं मेघ-मल्हार।३।
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आँगन में झूले पड़ेझूल रहीं हैं नार।
घेवर-फेनी से सजाहलवाई बाजार।४।
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नागपञ्चमी पर लगीदेवालय में भीड़।
कानन में सब खोजतेनागदेव के नीड़।५।
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सोमवार के दिन सभी, मन्दिर जाते लोग।
शिव-शंकर को प्यार से, लगा रहे हैं भोग।६।
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काँवड़ लेकर आ रहे, श्रद्धा से अनुरक्त।
हर-हर, बम-बम घोष को, करते सारे भक्त।७।
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गंगा जी के घाट पर, लम्बी लगी कतार।
लोग नहाने जा रहे, हर-हर के हरद्वार।८।
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आता सावन मास मेंरक्षाबन्धन पर्व।
जब करती बहनें तिलकभाई करता गर्व।९।
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बहनें करतीं कामनाभाई हो खुशहाल।
भाई की लम्बी उमरमाँग रहीं हर साल।१०।

सोमवार, 6 अगस्त 2018

ग़ज़ल "सात रंगों से सजा है गगन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

savan ke jhoole
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला 
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला 

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज
 

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला 

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें
 

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला 
 
 पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला 

इन्द्र ने अपने धनुष का 
“रूप” सुन्दर सा दिखाया 

सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला
indradhanush

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