रसना से मिलती सौगातें खुलता मुख हो जाती बातें दो के चार नयन जब होते आँखों में हो जाती बातें दोपाये और चौपाये भी करते प्यारी-प्यारी बातें हाव-भाव और भाव-भंगिमा मिलकर करते कितनी बातें पलकों पर जब बिन्दु छलकते पीड़ा की हो जाती बातें जब अधरों पर हँसी चहकती हो जाती तब सुख की बातें जब बातों से बात निकलतीं टीका-टिप्पणी करती बातें काली-अंधियारी रातों में होती विस्मयकारी बातें त्यौहारों की मधु-बेला में आशा की संचारी बातें बाग-बगीचे, वन-उपवन में तन की बातें-मन की बातें अपनी बातें-उनकी बातें जीवन के पल-पल की बातें बातें करना है लाचारी कितनी हैं बेचारी बातें |
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बुधवार, 16 मई 2012
"कितनी हैं बेचारी बातें" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 22 दिसंबर 2011
"चाँद और तारों की बातें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
चाँद और तारों की बातें, मन के उद्गारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! उत्सव-त्यौहारों की बातें, मोहक उपहारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! यौवन शृंगारों की बाते, उन्नत बाज़ारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! अपने अधिकारों की बातें, स्वप्निल संसारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! सुख के उजियारों की बातें, भोले बंजारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! चहके परिवारों की बातें, महके गलियारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! बढ़ते आधारों की बातें, भरते भण्डारों की बातें, कितनी अच्छी लगती हैं! |
गुरुवार, 30 जून 2011
"हम वही अन्दाज़ कहना चाहते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
अपने मन की बात कहना चाहते हैं कुछ दबे अल्फाज़ कहना चाहते हैं कब तलक तुमसे छिपायें असलियत कल नहीं हम आज कहना चाहते हैं सोचकर रिश्ते बनाना अज़नबी से राज़ हम हमराज़ कहना चाहते हैं मधुर सुर सजता सदा आघात से दर्द का हम साज़ कहना चाहते हैं इश्क करना है सरल लेकिन निभाना है कठिन दिल की हम आवाज कहना चाहते हैं आशिको-माशूक के बिन शायरी बेजान है हम इसे सरताज कहना चाहते हैं सुनके जिसको “रूप” शरमाने लगे हम वही अन्दाज़ कहना चाहते हैं |
बुधवार, 22 जून 2011
"बातों की ग़ज़ल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
![]() बात-बात में हो जाती हैं, देखो कितनी सारी बातें। घर-परिवार, देश-दुनिया की, होतीं सबसे न्यारी बातें।। रातों में देखे सपनों की, दिन भर की दिनचर्या की भी, सुबह-शाम उपवन में जाकर, होतीं प्यारी-प्यारी बातें। बातों का नहीं ठौर-ठिकाना, बातों से रंगीन जमाना, गली-गाँव चौराहे करते, मेरी और तुम्हारी बातें। बातें ही तो मीत बनातीं, बातें बैर-भाव फैलातीं, बातों से नहीं मन भरता है, सुख-दुख की संचारी बातें। जाल-जगत के ढंग निराले, हैं उन्मुक्त यहाँ मतवाले, ज्यादातर करते रहते हैं, गन्दी भ्रष्टाचारी बातें। लेकिन कोश नहीं है खाली, सुरभित इसमें है हरियाली, सींच रहा साहित्य सरोवर, उपजाता गुणकारी बातें। खोल सको तो खोलो गठरी, जिसमें बँधी ज्ञान की खिचड़ी, सभी विधाएँ यहाँ मिलेंगी, होंगी विस्मयकारी बातें। नहीं “रूप” है, नहीं रंग है, फिर भी बातों की उमंग है, कभी-कभी हैं हलकी-फुलकी, कभी-कभी हैं भारी बातें। |
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