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गुरुवार, 28 मई 2020

गीत "ख़ाक सड़कों की अभी तो छान लो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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ख़ाक सड़कों की अभी तो छान लो।
धूप में घर को बनाना ठान लो।।
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भावनाओं पर कड़ा पहरा लगा,
दुःख से आघात है गहरा लगा,
मीत इनको ज़िन्दग़ी का मान लो।
धूप में घर को बनाना ठान लो।।
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काल का तो चक्र अब ऐसा चला,
आज कोरोना ने दुनिया को छला,
वेदना के रूप को पहचान लो।
धूप में घर को बनाना ठान लो।।
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रास्तों में धूप है और धूल है,
समय श्रमिकों के लिए प्रतिकूल है,
आदमीयत को जरा सा जान लो।
धूप में घर को बनाना ठान लो।।
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'रूप' तो इक रोज़ ढल ही जायेगा, 
आँच में जीवन पिघल ही जायेगा, 
दानवों से सभ्यता का ज्ञान लो। 
धूप में घर को बनाना ठान लो।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(३०-०५-२०२०) को 'आँचल की खुशबू' (चर्चा अंक-३७१७) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही लाजवाब और सार्थक गीत

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रवासी श्रमिकों की व्यथा पर आपका यह सृजन स्तुत्य है 💐
    सादर नमन 🙏

    जवाब देंहटाएं
  4. आज के परिवेश पर रची गई सुंदर सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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