दिल है शीशे सा नाजुक हमारा प्रिये! ठेस लगते ही यह तो चटक जायेगा। प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे, प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।। फूल सा खिल रहा यह तुम्हारे लिए, दीप सा जल रहा यह तुम्हारे लिए, झूठी तारीफ से यह भटक जायेगा। प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे, प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।। मन जरूरत से ज्यादा सरल है प्रिये, दुर्जनों के लिए ये गरल है प्रिये, नेह के गेह में ये अटक जायेगा। प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे, प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।। मस्त रहता भ्रमर पुष्प की गन्ध में, मन बंधा भावनाओं के सम्बन्ध में, प्यार में यह हलाहल गटक जायेगा। प्रीत का खाद-पानी पिलाओ इसे, प्यार पाते ही यह तो मटक जायेगा।। |
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सोमवार, 21 मई 2012
"शीशे सा नाजुक दिल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 7 जनवरी 2012
"दर्द उभरता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बस टीस सी उठती है, और दर्द उभरता है भट्टी में पिघलकर ही, तो स्वर्ण निखरता है सच्चाई अगर है तो, कुछ आँच नहीं आती अग्नि की परीक्षा से, तो खोट ही डरता है कलियुग हो या हो सतयुग, त्रेता हो या हो द्वापर प्रह्लाद भक्त का तो, कुछ भी न बिगड़ता है सच्ची लगन अगर हो, दिल में भी आग हो कुछ उसका ही दो-जहाँ में, बस प्यार सँवरता है आशिक है “रूप” का जो, मजनूँ वो क्या बनेगा शीशा चटक गया तो, हरग़िज़ न सुधरता है "विनीत संग पल्लवी-सत्यकथा" |
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